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सोमवार, 27 अगस्त 2012

A week of enlightenment - Short story by M.Bulgakov


शिक्षा सप्ताह
(एक सीधी-सादी कहानी)                          
                           -मिखाइल बुल्गाकोव
                                         अनुवाद: ए. चारुमति रामदास

शाम को हमारी टुकड़ी में मिलिट्री कमिसार आया और मुझसे कहने लगा:
”सिदोरोव!”
और मैंने जवाब दिया: “यस सर!”
उसने तीखी नज़रों से मेरी ओर देखा और पूछने लगा:
 “तुम”, कहने लगा, “क्या?”
 “मैं”, मैंने कहा, “ठीक ठाक हूँ...”
 “तुम,” पूछता है, “अनपढ़ हो?”
 मैंने तपाक से जवाब दिया, “सही फरमाया, कॉम्रेड कमिसार, अनपढ़ हूँ.”
 अब उसने एक बार फिर मेरी ओर देखा और कहने लगा:
” ठीक है, अगर तुम अनपढ़ हो तो आज शाम को मैं तुम्हें ‘त्रावियाता’ भेजूँगा!”
 “मेहेरबानी करके यह तो बताइए,” मैंने कहा, “किसलिए? अगर मैं अनपढ़ हूँ, तो इसकी वजह हम तो नहीं हैं. पुरानी सरकार के ज़माने में हमें पढ़ाया ही नहीं गया.”
और उसने जवाब दिया:
 “बेवकूफ! डर क्यों गया? ये तुम्हें सज़ा के तौर पर थोड़ी ना भेज रहे हैं, बल्कि ये तुम्हारे ही फ़ायदे के लिए है. नाटक देखोगे, और तुम्हें ख़ुशी भी होगी.”
मगर हमने तो अपनी टुकड़ी के पान्तेलेयेव के साथ शाम को सर्कस जाने का प्रोग्राम बनाया था.
इसलिए मैंने कहा, “कॉम्रेड कमिसार , क्या मैं थियेटर के बदले सर्कस नहीं जा सकता?”
उसने एक आँख सिकोड़कर पूछा:  “सर्कस?... वो किसलिए?”
“हाँ,” मैं कहता हूँ, “बहुत ही दिलचस्प होता है... पढ़े लिखे हाथी को लाते हैं, और फिर जोकर, फ्रांसीसी लड़ाई...”
उसने उँगली से धमकाया.  “मैं तुझे दिखाता हूँ पढ़ा लिखा हाथी! नासमझ चीज़! जोकर...जोकर! तू खुद ही गँवार-जोकर है! हाथी तो पढ़े-लिखे हैं, मगर तुम लोग, मेरी मुसीबत, अनपढ़ हो! सर्कस से तुम्हारा क्या फ़ायदा होने वाला है? हाँ? और थियेटर में तो तुम्हें ज्ञान मिलेगा...प्यारा लगेगा, अच्छा लगेगा... तो, एक लब्ज़ में, तुझसे ज़्यादा बात करने के लिए मेरे पास वक़्त नहीं है...टिकट लो और मार्च!”
कुछ नहीं किया जा सकता था – मैंने टिकट ले लिया. पान्तेलेयेव को , वह भी अनपढ़ है, टिकट दिया गया और हम चल पड़े.  तीन गिलास पॉपकॉर्न के खरीदे और ‘फर्स्ट सोवियत थियेटर” में आए.
 देखते क्या हैं कि जाली के पास, जहाँ से लोगों को अन्दर छोड़ते हैं, - गज़ब की धक्का-मुक्की हो रही है. लोगों की एक लहर सी थियेटर की ओर बढ़ रही है. और हम अनपढ़ लोगों के बीच पढ़े-लिखे भी हैं, और उनमें भी ज़्यादातर महिलाएं. एक तो टिकट चेकर पर चढ़ गई, और टिकट दिखाने लगी, और वह उससे पूछता है, “माफ़ कीजिए,” उसने कहा, “कॉम्रेड मैडम, आप पढ़ी-लिखी हैं?”
और वो तो ताव खा गई.
 “कैसा अजीब सवाल है! बेशक, पढ़ी-लिखी हूँ! मैंने हाईस्कूल में पढ़ा है!”
 “ओह,” वह बोला, “ हाईस्कूल में. बड़ी ख़ुशी हुई. तब मुझे आपको अलबिदा कहने की इजाज़त दीजिए!”
और उससे टिकट वापस ले लिया.
 “किस आधार पर,” महिला चीखी, “ऐसा कैसे कर सकते हो?”
 “वो इसलिए,” वह जवाब देता है, “कि सीधी सी बात है, क्योंकि सिर्फ अनपढ़ लोगों को ही अन्दर छोड़ रहे हैं.”
 “मगर मैं भी ऑपेरा या कन्सर्ट सुनना चाहती हूँ.”
 “अगर आप,” वह कहता है, “चाहती हैं तो मेहेरबानी करके काव्सयूज़ (यहाँ तात्पर्य कॉकेशस सयूज़ नामक थियेटर से है – अनु.) में जाइए. वहाँ आपके सारे पढ़ लिखे लोगों को इकट्ठा किया गया है – वहाँ डॉक्टर हैं, कम्पाउण्डर हैं, प्रोफेसर हैं. बैठते हैं और दनादन चाय पे चाय पिये जाते हैं, क्योंकि उन्हें बिना शक्कर की चाय दी जाती है, और कॉम्रेड कुलीकोव्स्की उनके लिए प्रेम-गीत (रोमान्स) गाता रहता है.”
महिला चली गई.
तो, मुझे और पान्तेलेयेव को बेधड़क अन्दर जाने दिया गया और सीधे स्टाल में दूसरी पंक्ति में बिठा दिया गया.
बैठ गए.
शो अभी शुरू नहीं हुआ था, इसलिए बोरियत के मारे पॉपकॉर्न का एक-एक ग्लास साफ कर दिया. इस तरह हम क़रीब डेढ़ घण्टा बैठे रहे, आख़िरकार थियेटर में अँधेरा हो गया.
देखता हूँ कि मुख्य जगह पर, जो कठघरे जैसी थी, कोई चढ़ा. सील मछली की खाल की टोपी और ओवर कोट पहने. मूँछें, दाढ़ी से झाँकती सफ़ेदी, और बड़ा सख़्त मालूम हो रहा था. चढ़ा, बैठ गया और सबसे पहले उसने चश्मा चढ़ा लिया.
मैं पान्तेलेयेव से पूछता हूँ (वो, हाँलाकि अनपढ़ है, मगर सब जानता है):
 “ये कौन है?”
और वो जवाब देता है:
 “ ये डाइ,” कहता है, “रेक्टर है. ये इनमें सबसे खास है. संजीदा महाशय!”
 “तो फिर,” मैं पूछता हूँ, “इसे सबको दिखाने के लिए कठघरे में क्यों बिठाते हैं?”
 “इसलिए,” वो जवाब देता है, “क्यों कि ये इनके ऑपेरा में सबसे ज़्यादा पढ़ा लिखा है. इसे, मतलब,  हमारे लिए मिसाल के तौर पर बिठाते हैं.”
 “तो फिर इसे हमारी ओर पीठ करके क्यों बिठाया है?”
 “”आ S,” वो कहता है, “इस तरह इसे ऑर्केस्ट्रा को चलाना आसान होता है!...”
और इस डाइरेक्टर ने अपने सामने कोई किताब खोल ली, उसमें देखा और सफ़ेद छड़ी घुमाई, और फ़ौरन फर्श के नीचे से वायलिन बजने लगे. रोतली, पतली आवाज़ में; एकदम रोने को जी चाहने लगा.
हाँ, ये डाइरेक्टर वाक़ई में काफ़ी पढ़ा-लिखा मालूम होता था, क्योंकि वो दो-दो काम एक साथ कर रहा था – किताब भी पढ़ता है और छड़ी भी घुमाता है. और ऑर्केस्ट्रा गर्मा रहा था. जैसे-जैसे समय बीत रहा था, और ज़्यादा तैश में आ रहा था! वायलिनों के पीछे बांसुरियों के पीछे पड़ जाता, और बाँसुरियों के बाद ड्रम के पीछे. पूरे थियेटर में कड़कड़ाहट फैल गई. इसके बाद दाईं ओर से कैसे रेंकने की आवाज़ आई...मैंने ऑर्केस्ट्रा की ओर देखा और चीखा:
 “पांतेलेयेव, ये तो, मुझ पर ख़ुदा की मार पड़े, लोम्बार्द है, जो हमारी फौज में राशन देता है!”
और उसने भी देखा और बोला:
”हाँ, वही तो है! उसके अलावा कोई और इतने तैश में त्रोम्बोन नहीं बजा सकता!”
तो, मैं एकदम खुश हो गया और चिल्लाने लगा:
 “शाबाश, वन्स मोर, लोम्बार्द!”
मगर, न जाने कहाँ से, पुलिस वाला प्रकट हो गया और मेरी ओर लपका”
 “ प्लीज़, कॉम्रेड, शांति भंग न करें!”
हम खामोश हो गए.
इस बीच परदा भी खुल गया, और हम देखते हैं कि स्टेज पर – शोर, हल्ला-गुल्ला ! कोट पहने घुड़सवार दस्ते के जवान, औरतें बढ़िया पोषाकों में, नाच रही हैं, गा रही हैं. ख़ैर, बेशक, शराब-वराब भी थी, ताशों के जुए के खेल में भी वही सब कुछ चल रहा था.
एक लब्ज़ में कहूँ तो, पुराने ही तौर-तरीके चल रहे थे!
तो, वहाँ, मतलब, औरों के बीच अल्फ्रेड भी था. वह भी पी रहा है, खा रहा है.
और पता चलता है, मेरे भाई, कि वह इसी त्रावियाता से प्यार करता था. मगर लब्ज़ों में इसे बयान नहीं करता, बस गाए जाता है, गा-गाकर बताता है. और वो भी जवाब में गाए चली जाती है.  
और होता ये है कि वह उससे शादी करने से बच नहीं सकता, मगर, बस, पता चलता है कि इस अल्फ्रेड का एक बाप भी है, जिसका नाम है ल्युब्चेंको. और अचानक, न जाने  कहाँ से दूसरे अंक में वह अचानक स्टेज पर आ धमकता है.
कद तो छोटा है, मगर है बड़ा सजीला, बाल सफ़ेद, और आवाज़ खनखनाती हुई, भारी – गहरी
आते ही उसने गाते हुए अल्फ्रेड से कहना शुरू कर दिया:
  “ तू, क्या, ऐसा है – वैसा है, अपनी जनम भूमि को भूल गया?”
गाता रहा, गाता रहा और इस अल्फ्रेड का सारा मामला गुड़-गोबर कर दिया. गम का मारा अल्फ्रेड तीसरे अंक में पीता है, पीता है और, भाईयों, अपनी त्रावियाता के सामने हंगामा खड़ा कर देता है.
सबके सामने उस पर चिल्लाता है, जो मुँह में आए बके जाता है.
गाता है:
 “तू,” कहता है, “ऐसी है, -वैसी है, और मुझे,” कहता है, “तुझसे कोई वास्ता नहीं रखना है.”
तो, वह, ज़ाहिर है, आँसू बहाने लगी, हो-हल्ला, बदनामी!
और चौथे अंक में उस गम की मारी को तपेदिक हो जाती है. तो, ज़ाहिर है, डॉक्टर को बुलाया गया.
डॉक्टर आता है.
मगर, देखता क्या हूँ कि हाँलाकि उसने कोट पहना है, मगर सभी लक्षण तो हमारे भाई, मज़दूर-सर्वहारा-वर्ग के ही हैं. बाल लम्बे, और आवाज़ – खनखनाती, तन्दुरुस्त, जैसे किसी बैरेल से आ रही हो.
त्रावियाता के पास आता है और गाने लगता है:
”आप,” कहता है, “इत्मीनान रखिए, आपकी बीमारी ख़तरनाक है, और आप ज़रूर मर ही जाएँगी!”
उसने कोई पुर्जा भी लिखकर नहीं दिया, बस सीधे बिदा लेकर चला गया.
तो, देखती है त्रावियाता, कि कुछ भी नहीं किया जा सकता – मरना ही पड़ेगा.
मगर, वहाँ अल्फ्रेड और ल्युब्चेन्को आते हैं, उससे विनती करते हैं कि वह मरे नहीं. ल्युब्चेन्को ने शादी के लिए अपनी रज़ामन्दी भी दे दी. मगर कोई फ़ायदा नहीं हुआ!
 “माफ कीजिए,” त्रावियाता कहती है, “यह मुमकिन नहीं है, मरना ही होगा.”
और वाक़ई में, वे तीनों एक साथ गाते हैं, और त्रावियाता मर जाती है.
तब डाइरेक्टर ने अपनी किताब बन्द की, चश्मा उतारा और चला गया. और सब अपने-अपने रास्ते चले गए. बस, इतना ही.
मैं सोचने लगा, ‘तो, शिक्षा हासिल कर ली, और बस, बहुत हो गया! बोरियत है!’
और मैं पान्तेलेयेव से कहता हूँ, “तो, पान्तेलेयेव, चल, कल सर्कस चलते हैं!”
सो गया, मगर मुझे सारी रात यही सपना आता रहा कि त्रावियाता गा रही है और लोम्बार्द अपने त्रोम्बोन पर चिंघाड़ रहा है.
तो, दूसरे दिन मैं मिलिट्री कमिसार के पास आता हूँ और कहता हूँ:
 “आज शाम को, कॉम्रेड मिल्कमिसार, मुझे सर्कस जाने की इजाज़त दीजिए...”
और वह कैसे दहाड़ा:
 “अभी तक”, कहता है, “तेरे दिमाग में हाथी ही भरे हैं! कोई सर्कस-वर्कस नहीं! नहीं, भाई, आज तुम सोव्प्रोफ जाओगे कॉंन्सर्ट सुनने. वहाँ तुम्हें,” कहता है, “कॉम्रेड ब्लोख अपने ऑर्केस्ट्रा पर दूसरी राप्सोदी (लोकगीत) सुनाने वाला है!”
मैं वैसे ही बैठ गया और सोचने लगा, ‘देखते रहो अपने हाथी!’
 “तो ये क्या, फिर से लोम्बार्द अपने त्रोम्बोन पर दनादन मारने वाला है?”
 “बेशक,” वह कहता है.
ये खूब रही, भगवान बचाए, जहाँ मैं जाता हूँ वहीं वह अपना त्रोम्बोन लेकर आ जाता है!
मैंने इधर-उधर देखा और पूछा, “तो, कल जा सकता हूँ?”
 “और कल भी,” कहता है, “मैं तुम सबको ड्रामा देखने भेज रहा हूँ.”
 “तो, परसों?”
 “परसों, फिर से ऑपेरा!”
और, वैसे भी, कहता है, बहुत हो गया तुम लोगों का सर्कस जाना. शिक्षा-सप्ताह चल रहा है.
मैं तो उसकी बातों से तैश में आ गया! सोचने लगा, इस तरह तो पूरा कबाड़ा हो जाएगा. और पूछता हूँ, “तो क्या हमारी पूरी कम्पनी को ऐसे ही भगाते रहोगे?”
 “सबको क्यों!” कहता है, “ पढ़े-लिखे लोगों को नहीं भगाएँगे. पढ़ा-लिखा दूसरी राप्सोदी के बिना भी अच्छा ही है! ये तो सिर्फ तुम लोगों को: अनपढ़ शैतानों को. और पढ़ा-लिखा जहाँ चाहे वहाँ जा सकता है!”
मैं उसके पास से आ गया और सोचने लगा. देखता हूँ कि हालत तो बड़ी ख़तरनाक है! अगर तुम अनपढ़ हो तो तुम्हें सभी तरह के मनोरंजन से हाथ धोना पड़ेगा.
सोचता रहा, सोचता रहा और फैसला कर लिया.
मिल्कमिसार के पास गया और कहने लगा, “दरख़ास्त देनी है!”
 “कहो!”
 “मुझे,” कहता हूँ, “पढ़ाई के स्कूल में भेज दीजिए.”
 “शाबाश!” और उसने स्कूल में मेरा नाम लिख लिया.
तो, मैं स्कूल गया, और, सोच क्या रहे हैं, पढ़ाई कर ही ली! और अब शैतान मेरा भाई नहीं है, क्योंकि मैं पढ़ा-लिखा हूँ!

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रविवार, 26 अगस्त 2012

Discussion on Master&Margarita(Hindi) - 17


अध्याय 17

आपको याद होगा कि वेरायटी में काले जादू के ‘शो’ के बाद सैकड़ों निर्वस्त्र महिलाएँ सादोवाया स्ट्रीट पर दौड़ती नज़र आई थीं – उनके कपड़े तो उन्होंने फागोत की फर्म को दे दिए थे और स्वयँ फर्म द्वारा दिए गए आधुनिक फैशन के कपड़े पहन लिए थे;

रीम्स्की की वारेनूखा से मुठभेड़ हो गई थी जो हरी आँखों वाली नग्न महिला के साथ मिलकर उसे मारने की कोशिश कर रहा था – वह मुर्गे की बदौलत ही बच पाया था!

चलिए, देखते हैं कि उन करेंसी नोटों का क्या हुआ जो हॉल में तैरते हुए आए थे और जिन्हें पब्लिक ने लपक लिया था.
जैसा कि पोस्टर्स में लिखा गया था, काले जादू का ‘शो’ दो दिनों तक होने वाला था, इसलिए वेरायटी के बाहर टिकट के लिए लम्बी लम्बी दो कतारें खड़ी थीं.
शुक्रवार का दिन था.
जैसा कि हम जानते हैं, वेरायटी के सारे अधिकारी ग़ायब हो गए थे...रीम्स्की, स्त्योपा लिखोदेयेव, वारेनूखा; और जो इकलौता अफ़सर वहाँ उपस्थित था वह था रोकड़िया वासिली स्तेपानोविच लास्तोच्किन.
वेरायटी के अन्दर परेशानी बढ़ती ही जा रही थी, लोग लगातार फोन करके पूछ रहे थे कि अधिकारी कहाँ हैं. रीम्स्की की पत्नी रोते-रोते तीर की तरह घुसी और विनती करने लगी कि उसके पति को ढूँढ़ निकाला जाए...
कोई अविश्वसनीय-सी चीज़ हो गई थी...पुलिस ने इस लफ़ड़े वाले ‘शो’ के बारे में पूछताछ आरम्भ कर दी...
जादूगर कौन था? कहाँ से आया था? उसका नाम क्या था? कोई नहीं जानता था. जब किसीने कहा कि उसका नाम वोलान्द या फोलान्द था, तो विदेशियों के ब्यूरो में पूछताछ की गई. उन्हें किसी वोलान्द या फिर फोलान्द के बारे में कोई जानकारी नहीं थी;
पोस्टर्स थे? थे तो सही, मगर रातों-रात उन पर नए पोस्टर्स चिपका दिए गए थे और अब दफ़्तर में एक भी पोस्टर उपलब्ध नहीं था;
इस ‘शो’ की इजाज़त किसने दी थी? जादूगर को अग्रिम राशि किसने दी थी? इस लेन-देन से सम्बन्धित कागज़ात कहाँ हैं? कुछ भी उपलब्ध नहीं था.
पत्रवाहक लड़के कार्पोव ने बताया कि जादूगर शायद स्त्योपा के फ्लैट में रुका था, वे वहाँ भी गए: स्त्योपा तो पहले ही गायब हो चुका था; उसकी नौकरानी ग्रून्या भी ग़ायब हो गई थी; और तो और हाऊसिंग सोसायटी के प्रमुख गायब हो गए थे; सेक्रेटरी भी ग़ायब हो गया था.
एक खोजी कुत्ते को रीम्स्की के कमरे में ले जाया गया...वह गुर्राने लगा, खिड़की पर चढ़ गया, वहशियाना ढंग से चिल्लाते हुए खिड़की से बाहर कूदने की कोशिश करने लगा...फिर वह टैक्सी स्टैण्ड की ओर भागा और वहाँ जाकर उसकी जाँच का सिरा टूट गया...
वेरायटी के गेट पर एक बड़ा-सा नोटिस लगा दिया गया कि कुछ दिनों तक कोई ‘शो’ नहीं होगा...भीड़ अप्रसन्नता से बिखर गई; फिर उन्होंने वासिली स्तेपानोविच को कल के ‘शो’ से प्राप्त 21,711 रुबल्स मनोरंजन कमिटी के दफ़्तर में जमा करने के लिए कहा.   

वासिली स्तेपानोविच ने उन नोटों को बैग में रखा और हिदायतों को ध्यान में रखते हुए टैक्सी से जाने का निश्चय किया. जैसे ही वहाँ खड़ी तीन टैक्सियों के चालकों ने हाथ में फूली हुई बैग लिए टैक्सी स्टैण्ड की ओर लपककर आते हुए मुसाफिर को देखा, तीनों के तीनों न जाने क्यों उसकी ओर गुस्से से देखते हुए अपनी गाड़ियों के साथ वहाँ से रफूचक्कर हो गए. एक टैक्सी ड्राइवर ने, जो कहीं से आ रही थी, मुसाफिर से गुस्से से पूछा कि उसके पास छुट्टे पैसे हैं या नहीं और जब वासिली स्तेपानोविच ने उसे 2-3 रुबल्स के नोट दिखाए तब कहीं जाकर वासिली स्तेपानोविच टैक्सी में बैठ सका.
 “क्या चिल्लर नहीं है?” रोकड़िए ने नर्मी से पूछा.
 “पूरी जेब भरी है चिल्लर से!” चालक दहाड़ा और सामने के नन्हे-से आईने में उसकी खून बरसाती आँखें दिखाई दीं, - “ये तीसरा हादसा हुआ आज मेरे साथ. औरों के साथ भी ऐसा ही हुआ. किसी एक सूअर के बच्चे ने दस का नोट दिया और मैंने उसे चिल्लर थमाई – साढ़े चार रूबल्स...उतर गया, बदमाश! पाँच मिनट बाद देखता क्या हूँ कि दस के नोट के बदले है, नरज़ान की बोतल का लेबल!” ड्राइवर ने कुछ न छापने योग्य शब्द कहे. दूसरी बार हुआ ज़ुब्बास्का के पास. दस का नोट! तीन रूबल्स की चिल्लर वापस की. चला गया! मैंने अपनी जेब में हाथ डाला, वहाँ एक बरैया ने मेरी उँगली में काट लिया! और दस का नोट नहीं है! ओ...ह!” चालक ने फिर कुछ न छापने योग्य गालियाँ दीं, “कल इस वेरायटी में (असभ्य शब्द) किसी एक गिरगिट के बच्चे ने दस के नोटों का करिश्मा दिखाया था (असभ्य गाली).”
रोकडिए को मानो साँप सूँघ गया. उसने ऐसा ज़ाहिर किया मानो ‘वेरायटी’ शब्द पहली बार सुन रहा हो, और सोचने लगा, ‘तो यह बात है, भुगतो...’
तो यह हश्र हुआ उन नोटों का जिनकी बरसात वेरायटी में हुई थी.
जब वासिली स्तेपानोविच मनोरंजन कमिटी के दफ़्तर में पहुँचा तो देखा कि वहाँ भगदड़ मची हुई थी.
मनोरंजन कमिटी के प्रमुख की सेक्रेटरी बिसूर रही थी; एक बड़ी लिखने की मेज़ के पीछे एक खाली सूट कुर्सी में बैठकर सूखी कलम से लगातार लिखे जा रहा था. कॉलर के ऊपर किसी की न तो गर्दन थी, न ही सिर; आस्तीनों से कलाइयाँ भी नहीं दिखाई दे रही थीं..
सेक्रेटरी ने उसे बताया:
    “ज़रा सोचिए, मैं बैठी हूँ,” परेशान अन्ना रिचार्दोव्ना रोकड़िए की बाँह पकड़कर सुनाने लगी, “और कमरे में घुसा बिल्ला, काला, हट्टा-कट्टा मानो बिल्ला नहीं हिप्पोपोटॆमस हो. मैंने उसे ‘शुक-शुक!’ कहा, वह बाहर भाग गया, फिर कमरे में घुसा बिल्ले जैसे मुँह वाला एक मोटा आदमी और बोला, “तो, मैडम, आप मेहमानों से ‘शुक-शुक!’ कहती हैं? वह बेशरम सीधा प्रोखोर पेत्रोविच के कमरे में घुसने लगा. मैं चिल्ला रही थी: ”क्या पागल हो गए हो?” और वह दुष्ट सीधा कमरे में घुसकर प्रोखोर पेत्रोविच के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया. और वह...सहृदय आदमी है, मगर जल्दी घबरा जाता है, भड़क उठा! मैं बहस नहीं करूँगा. भेड़िए की तरह काम करने वाला, कुछ जल्दी परेशान होने वाला, भड़क उठा: “आप ऐसे कैसे बिना सूचना दिए अन्दर घुस आए?” और वह ढीठ आदमी बेशरमी से मुस्कुराते हुए कुर्सी पर जम गया और बोला, “मैं आपसे काम के बारे में बात करने आया हूँ.” प्रोखोर पेत्रोविच ने गुस्से से कहा, “मैं व्यस्त हूँ!” और सोचो, वह बोला, “आप ज़रा भी व्यस्त नहीं हैं...” हाँ? अब प्रोखोर पेत्रोविच आपे से बाहर हो गया और चीखा, “ये क्या मुसीबत है? इसे यहाँ से ले जाओ, काश मुझे शैतान उठा लेता!” और वह बोला, “शैतान उठा ले? यह तो हो सकता है!” और झन् से हुआ, मैं चीख भी न सकी, देखती क्या हूँ: वह नहीं है...वह...बिल्ले से चेहरे वाला...और यह...सूट यहाँ बैठा है...हे-हे-हे!!!”
अन्ना रिचार्दोव्ना के होठ, दाँत सब गड्डमड्ड हो गए और वह भें...S...S...S--- करके रोने लगी.
वासिली स्तेपानोविच इस दफ़्तर से बाहर भागा और मनोरंजन कमिटी के दफ़्तर की शाखा में गया जो वहाँ से कुछ ही दूर स्थित थी.
वहाँ भी, पूरी तरह बदहवासी छाई थी...
लोग गाये जा रहे थे...बिना रुके...अपनी इच्छा के विरुद्ध...मगर एक अनुशासनबद्ध, सूत्रबद्ध तरीके से, मानो कोई उनका निर्देशन कर रहा हो. और रोकड़िए को पता चला कि ऐसा क्यों हो रहा है:
 “माफ़ करना, मैडम,” वासिली स्तेपानोविच अचानक लड़की से पूछ बैठा, “आपके पास काला बिल्ला तो नहीं आया?”
 “कैसा बिल्ला? कहाँ का बिल्ला?” गुस्से में लड़की चीखी, “गधा बैठा है हमारे ऑफिस में, गधा!” और उसने आगे पुश्ती जोड़ी, “सुनता है तो सुने! मैं सब कुछ बता दूँगी” – और उसने वास्तव में सब कुछ बता दिया.

बात यह थी कि शहर की इस मनोरंजन शाखा के प्रमुख को, जिसने सब कुछ गुड़-गोबर कर दिया था (लड़की के शब्दों में), शौक चर्राया अलग-अलग मनोरंजन कार्यक्रम सम्बन्धी गुट बनाने का.
 प्रशासन की आँखों में धूल झोंकी! लड़की दहाड़ी.
इस साल के दौरान उसने लेरमेन्तोव का अध्ययन करने के लिए, शतरंज, तलवार, पिंग-पांग और घुड़सवारी सीखने के लिए गुट बनाए. गर्मियों के आते-आते नौकाचलन और पर्वतारोहण के लिए भी गुट बनाने की धमकी दे दी. 
 और आज, दोपहर की छुट्टी के समय वह अन्दर आया, और अपने साथ किसी घामड़ को हाथ पकड़कर लाया, लड़की बताती रही, न जाने वह कहाँ से आया था चौख़ाने की पतलून पहने, टूटा चश्मा लगाए, और...थोबड़ा ऐसा जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता!
और इस आगंतुक का, लड़की के अनुसार, सभी भोजन कर रहे कर्मचारियों से यह कहकर परिचय कराया गया कि वह कोरस आयोजन करने की कला का विशेषज्ञ है.
संभावित पर्वतारोहियों के चेहरे उदास हो गए, मगर प्रमुख ने तत्क्षण सभी को दिलासा दिया. इस दौरान वह विशेषज्ञ मज़ाक करता रहा, फ़िकरे कसता रहा और कसम खाकर विश्वास दिलाता रहा कि समूहगान में समय काफ़ी कम लगता है और उसके फ़ायदे अनगिनत हैं.
लड़की के अनुसार पहले उछले फानोव और कोसार्चुक, इस दफ़्तर के सबसे बड़े चमचे, यह कहकर कि वे पहले नाम लिखवा रहे हैं. अब बाकी लोग समझ गए कि इस ग्रुप को रोकना मुश्किल है, लिहाज़ा सभी ने अपने-अपने नाम लिखवा दिए. यह तय किया गया कि गाने की प्रैक्टिस दोपहर के भोजन की छुट्टी के समय की जाएगी, क्योंकि बाकी का सारा समय लेरमेन्तोव और तलवारों को समर्पित था. प्रमुख ने यह दिखाने के लिए कि उसे भी स्वर ज्ञान है, गाना शुरू किया और आगे सब कुछ मानो सपने में हुआ. चौखाने वाला समूहगान विशेषज्ञ दहाड़ा:
 सा-रे-ग-म! गाने से बचने के लिए अलमारियों के पीछे छिपे लोगों को खींच-खींचकर बाहर निकाला. कोसार्चुक से उसने कहा कि उसकी सुर की समझ बड़ी गहरी है; दाँत दिखाते हुए सबको बूढ़े संगीतज्ञ का आदर करने के लिए कहा, फिर उँगलियों पर ट्यूनिंग फोर्क से खट्-खट् करते हुए वायलिन वादक से सुन्दर सागर बजाने के लिए कहा.
वायलिन झंकार कर उठा. सभी बाजे बजने लगे...खूबसूरती से. चौख़ाने वाला सचमुच अपनी कला में माहिर था. पहला पद पूरा हुआ. तब वह विशेषज्ञ एक मिनट के लिए क्षमा माँगकर जो गया...तो गायब हो गया. सबने सोचा कि वह सचमुच एक मिनट बाद वापस आएगा. मगर वह दस मिनट बाद भी वापस नहीं लौटा. सब खुश हो गए, यह सोचकर कि वह भाग गया.
और अचानक सबने दूसरा पद भी गाना शुरू कर दिया. कोसार्चुक सबका नेतृत्व कर रहा था, जिसको ज़रा भी स्वर ज्ञान नहीं था मगर जिसकी आवाज़ बड़ी ऊँची थी. सब गाते रहे. विशेषज्ञ का पता नहीं था! सब अपनी-अपनी जगह चले गए, मगर कोई भी बैठ नहीं सका, क्योंकि सभी अपनी इच्छा के विपरीत गाते ही रहे. रुकना हो ही नहीं पा रहा था! तीन मिनट चुप रहते, फिर गाने लगते! चुप रहते गाने लगते! तब समझ गए कि गड़बड़ हो गई है. दफ़्तर का प्रमुख शर्म के मारे मुँह छिपाकर अपने कमरे में छिप गया.

डॉक्टर ने सबको दवा दी और कुछ देर बाद सभी गायकों को स्त्राविन्स्की के क्लिनिक ले जाया गया.
बुल्गाकोव ने स्पष्ट लिखा है कि मनोरंजन कमिटी के दफ़्तर में क्या क्या होता है.
ज़ाहिर है, यह सब हंगामा उस काले जादू वाले ‘शो’ के एक अन्य पात्र ने फागोत ने खड़ा किया था.
वासिली स्तेपानोविच कैश-सेक्शन पहुँचा और पैसे जमा करने के लिए उसने निर्धारित फॉर्म भरा. फॉर्म भर कर जैसे ही उसने अपना बैग खोला उसे आश्चर्य का धक्का लगा: बैग में रूबल्स नहीं थे बल्कि विभिन्न देशों की करेंसियों के नोट थे. ज़ाहिर है वासिली स्तेपानोविच को गिरफ़्तार कर लिया गया.
आप सोच रहे होंगे कि वासिली स्तेपानोविच का अपराध क्या था? उसे क्यों गिरफ़्तार किया गया? इसलिए कि वह अधिकारियों को काले जादू के बारे में रिपोर्ट जो पेश करने वाला था... वेरायटी का अंतिम अफसर भी गायब हो जाता है!

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

Discussion on Master&Margarita - Chapter 16


अध्याय 16

पोंती पिलात और येशुआ-हा-नोस्त्री से सम्बन्धित उपन्यास का यह दूसरा अध्याय है.

इस अध्याय में मृत्युदण्ड की सज़ा सुनाए गए कैदियों के गंजे पहाड़ पर लाए जाने का वर्णन है और इसके बाद वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति की उस सुलगती गर्मी में हो रही दुर्दशा का वर्णन है; कैदियों के पास हम अध्याय के अंत में ही पहुँचते हैं. एक नए पात्र लेवी मैथ्यू से भी पाठकों का परिचय होता है.

बुल्गाकोव ने इस अध्याय में जिन शब्दों का प्रमुखता से प्रयोग किया है वे हैं: सूरज, शैतानी गर्मी, झुलसाता सूरज. ये सब सैनिकों और उनके कमाण्डरों पर कैसा प्रभाव डालते हैं इसका सजीव वर्णन किया गया है.

साधारण सैनिकों को थोड़ी-थोड़ी देर बाद पानी पीने के लिए जाने दिया जा रहा था, उन्हें अपने सिर की पगड़ी गीला करने की इजाज़त भी दे दी गई थी, मगर कमाण्डर अपनी सहनशीलता और धैर्य की मानो मिसाल प्रस्तुत कर रहे थे. मार्क क्रिसोबोय का आचरण तो बड़ा ही शानदार था.

”सूरज सीधे क्रिसोबोय पर पड़ रहा था, उस पर तो कुछ असर नहीं हो रहा था, मगर तमगों के शेरों की ओर तो देखते नहीं बन रहा था, उनसे निकलती उबलती चाँदी की चमक आँखों को अन्धा किए दे रही थी.

क्रिसोबोय के विद्रूप चेहरे पर न तो थकान दिखाई दे रही थी, न ही अप्रसन्नता; और ऐसा लगता था मानो यह भीमकाय अंगरक्षक पूरा दिन, पूरी रात, और एक और दिन – यानी जितने दिन चाहो इसी तरह चल सकता है. उसी तरह चल सकता है ताँबा जड़े भारी-भरकम पट्टे पर हाथ रखे; उसी तरह गंभीरता से कभी वध-स्तम्भों पर लटक रहे कैदियों को या फिर श्रृंखलाबद्ध सिपाहियों को देखते हुए; उसी तरह उदासीनता से जूते की नोक से अपने पैरों के नीचे आई हुई, समय के साथ सफ़ेद पड़ चुकी मानवीय हड्डियों के टुकड़ों और छोटॆ-छोटे कंकर-पत्थरों को हटाते हुए.”    

ज़रा सोचिए कि बुल्गाकोव इतनी बारीकी से क्रिसोबोय की गतिविधियों का वर्णन क्यों कर रहे हैं:
अध्याय 2 में हमने देखा था कि क्रिसोबोय येरूशलम की सुरक्षा सेनाओं के प्रमुख थे. वह अपनी बटालियन के सबसे ऊँचे सैनिक से भी ज़्यादा ऊँचे थे. क्रिसोबोय इतने भारी-भरकम, इतने विशालकाय थे, उनके कन्धे इतने चौड़े थे कि उन्होंने अभी-अभी उदित हुए सूरज को पूरी तरह ढाँक लिया था.

इस अध्याय का घटनाक्रम दोपहर को घटित हो रहा है. सूरज हर चीज़ को मानो जला रहा है, मगर क्रिसोबोय उससे पूरी तरह उदासीन है. वह अपना काम किए जा रहा है, जैसे इस शैतानी सूरज का उन पर कोई असर ही न हो रहा हो, अपने हाथ ताँबे के पिघलते पट्टे पर रखे, समय के साथ सफ़ेद पड़ गईं मानवीय हड्डियों को ठोकर मारते...जैसे उसे मौत की, हड्डियों की, शैतानी सूरज की आदत हो; उसके पास जैसे दिल ही नहीं है, वह सिर्फ एक मशीन है जिसे लोगों को मौत के घाट उतारने के लिए बनाया गया हो!

बुल्गाकोव कहते हैं कि मृत्युदण्ड के बाद का चौथा घण्टा बीत रहा था...तीन घण्टे बीत चुके थे...अगर आप प्राचीन काल से बुल्गाकोव के समय को जोड़ना चाहें तो यह समझ सकते हैं कि सूरज उस व्यक्ति को दर्शाता है जो उस समय के लोकप्रिय नारे  - ‘स्टालिन-हमारा सूरज’ – से प्रदर्शित होता है...और अगर आप एक घण्टे को एक दशक मानें तो यह अंदाज़ लगा सकते हैं कि यह शताब्दी का चौथा दशक था, याने तीस का दशक जब सूरज ने वाक़ई में हर चीज़ को जलाना आरम्भ कर दिया था मगर इसका    क्रिसोबोय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था, वह सत्ता के हाथों में एक उपकरण की तरह था.

लेवी मैथ्यू की ओर देखिए. मैं पवित्र बाइबल में प्रयुक्त वास्तविक नाम का प्रयोग नहीं कर रही हूँ. उसके बारे में हमें क्या ज्ञात होता है?

 - कि वह एक टैक्स-कलेक्टर था;
 - कि वह अपने आपको येशू का इकलौता शिष्य कहता है;
 - कि वह येशू को सूली पर चढ़ाए जाने से पहले मार डालना चाहता था ताकि उसे सूली की यंत्रणाओं से मुक्ति दिला सके.

इन बातों का पवित्र बाइबल में दिए गए वर्णन से मिलान कीजिए.

एक और बात:

जिन्हें सूली पर चढ़ाया गया था उनकी नाभि में भाले की नोक चुभोकर उन्हें मार डालने से पहले उन्हें पानी दिया जाता है:

 “पियो!” जल्लद ने कहा और पानी में डूबा एक स्पंज का टुकड़ा भाले की नोक पर सवार होकर येशू के होठों के निकट पहुँचा. उसकी आँखों में कुछ चमक दिखाई दी, वह अत्यंत अधीरता से उस पानी को चूसने लगा.
पास के वध-स्तम्भ से दिसमास की आवाज़ सुनाई दी:
”यह अन्याय है! मैं भी वैसा ही डाकू हूँ, जैसा यह है!”
.....
दिसमास चुप हो गया. येशू जल में डूबे स्पंज से दूर होकर प्रयत्नपूर्वक मीटःई और विश्वासयुक्त आवाज़ में बोलने की कोशिश करने लगा, मगर आवाज़ भर्राई हुई ही निकली, उसने जल्लाद से कहा:
 “उसे भी पानी पिलाओ.”

हम पिलात - येशुआ-हा-नोस्त्री से सम्बन्धित अगले अध्याय में इस प्रसंग पर लौटेंगे, तब तक के लिए इसे दिमाग के किसी कोने में पड़ा रहने दें.

इस अध्याय के कुछ वाक्यों पर ध्यान दीजिए:

जब लेवी मैथ्यू येशू तक नहीं पहुँच पाया, तो वह गंजे पहाड़ की पिछली ओर चला गया...वह ईश्वर को कोस रहा है और उससे पूछ रहा है कि वह येशू को इतनी पीड़ा क्यों दे रहा है. फिर उसने अपनी आँखें बन्द कर लीं और भगवान को शाप देने लगा...कुछ देर बाद जब उसने आपनी आँखें खोलीं तो देखा कि सूरज समुन्दर तक पहुँचने से पहले ही लुप्त हो गया है, जहाँ वह हर शाम डूबा करता था. उसे निगलते हुए पश्चिम से आकाश पर भयानक बादल निडरता से बढ़ा चला आ रहा था. उसकी किनार सफ़ेद झाग जैसी थी, काले आवरण से पीली चमक बार-बार दिखाई देती थी. बादल दहाड़ा. उसमें से रह-रहकर अग्निशलाकाएँ निकलने लगीं.

कहीं बुल्गाकोव पश्चिम से हुए आक्रमण की ओर तो इशारा नहीं कर रहे हैं?

और जब बारिश के कोड़ों को सहने में असमर्थ सब लोग गंजे पहाड़ से चले गए तो वहाँ केवल लेवी मैथ्यू बचा था सूली पर लटके मृत शरीरों के साथ. वह गिरते पड़ते वध-स्तम्भों की ओर चला. पहले वह येशुआ वाले वध-स्तम्भ पर आया. उसने सभी रस्सियाँ काट दीं, नीचे वाले क्रॉस पर चढ़ा, येशुआ के शरीर का आलिंगन करते हुए उसके दोनों हाथ मुक्त कर दिए. गीला, नंगा येशू का बदन लेवी को साथ लिए भूमि पर गिरा.

लेवी उसे अपने कन्धों पर उठाना चाह रहा था, मगर तभी किसी ख़याल ने उसे रोक दिया. उसने वहीं, पानी में डूबी धरती पर उस शरीर को छोड़ दिया और लड़खड़ाते, फिसलते पैरों से अन्य दो वध-स्तम्भों की ओर बढ़ा. उसने उनकी भी रस्सियाँ काट दीं, और दो और मृत शरीर ज़मीन पर गिर पड़े.

कुछ और क्षणों बाद पहाड़ की चोटी पर बचे थे केवल वे ही दो मृत शरीर और तीन खाली वध-स्तम्भ. पानी के थपेड़े इन शरीरों को उलट-पुलट रहे थे.

इस समय पहाड़ी पर न तो लेवी था और न ही येशू का शरीर.

क्या यह सब वास्तव में हुआ था?

हम इस प्रसंग पर 25वें और 26वें अध्याय में लौटेंगे.