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रविवार, 10 फ़रवरी 2013

Discussion on Master&Margarita(Hindi)-Chapter 29



अध्याय 29
मास्टर और मार्गारीटा के भाग्य का निर्णय

पिछले अध्याय में हमने देखा कि मार्गारीटा की इच्छा के अनुसार मास्टर और मार्गारीटा को अर्बात वाले घर के तहख़ाने में भेज तो दिया गया; मगर वोलान्द ने उनके बारे में कुछ और ही सोच रखा था.
अब हम देखेंगे कि उनके भाग्य में क्या है.
इस अध्याय में येरूशलम वाले अध्याय से काफ़ी कुछ बातें झाँक-झाँक जाती हैं. ऐसा लगता है मानो दोनों युग एक दूसरे में मिल गए हों. चलिए, देखें कि यह कैसे होता है:
फ्लैट नं. 50 से निकलने के बाद वोलान्द और अज़ाज़ेल मॉस्को की एक ऊँची बिल्डिंग की छत पर आते हैं. यहाँ से वे पूरे शहर को देख सकते हैं, मगर लोगों को वे दिखाई नहीं देते.
 वोलान्द वहाँ एक फोल्डिंग स्टूल पर अपनी काली पोशाक पहने बैठा था. उसकी लम्बी और चौड़ी तलवार छत की एक-दूसरे को छेदती हुई दो पट्टियों के मध्य खड़ी रखी थी, जिससे सूर्य-घड़ी का आकार बन गया था. तलवार की परछाईं धीरे-धीरे लम्बी होती जा रही थी और शैतानों के पैरों में पड़े काले जूतों की ओर रेंग रही थी.” वे देखते हैं कि ग्रिबोयेदोव जल रहा है और अन्दाज़ लगाते हैं कि कोरोव्येव और बेगेमोत अवश्य ही वहाँ गए होंगे.
समय सूर्यास्त का है और टुकड़ों में बँटे सूरज का वर्णन हमें उस दृश्य की याद दिलाता है जब उपन्यास के आरम्भ में पत्रियार्शी तालाब वाले पार्क में वोलान्द का आगमन होता है:
“...छत पर मौजूद दोनों ने देखा कि विशाल भवनों की पश्चिम की ओर खुलती खिड़कियों में, ऊपरी मंज़िलों पर टूटा हुआ, चकाचौंध करने वाला सूरज जल उठा. वोलान्द की आँख भी उसी तरह जल रही थी, हालाँकि उसकी पीठ सूरज की ओर थी.”
अचानक वहाँ लेवी मैथ्यू प्रकट होता है. वह येशुआ–हा-नोस्त्री का  संदेश लाया है. यहाँ वोलान्द और लेवी मैथ्यू के बीच अच्छाई और बुराई, प्रकाश और छाया पर बहस होती है:
“ब्बा!” आगंतुक पर मुस्कुराते हुए नज़र डालकर वोलान्द चहका, “तुम्हारे यहाँ आने की मुझे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी! तुम क्या कोई शिकायत लेकर आये हो, बिन–बुलाए, मगर अपेक्षित मेहमान?”
 “मैं तुम्हारे पास आया हूँ, बुराइयों की आत्मा और परछाइयों के शासक,” आने वाले ने कनखियों से वोलान्द की ओर अमैत्रीपूर्ण ढंग से देखते हुए कहा.
 “अगर तुम मेरे पास आए थे, तो मेरा अभिवादन कों नहीं किया, भूतपूर्व टैक्स-संग्राहक?” वोलान्द ने गम्भीरता से पूछा.
 “क्योंकि मैं नहीं चाहता कि तुम चिरंजीवी रहो,” आगंतुक ने तीखा जवाब दिया.
 “मगर तुम्हें इससे समझौता करना ही पड़ेगा,” वोलान्द ने आपत्ति करते हुए कहा और कटु मुस्कुराहट उसके मुख पर छा गई, “छत पर आए देर हुई नहीं कि लगे बेहूदगी करने. मैं तुम्हें बता दूँ, यह बेहूदगी है – तुम्हारे उच्चारण में, लहजे में. तुम अपने शब्दों का उच्चारण इस तरह करते हो, मानो तुम छायाओं को, बुराई को नहीं मानते. क्या तुम इस सवाल पर गौर करोगे : तुम्हारी अच्छाई को अच्छाई कौन कहता, अगर बुराई का अस्तित्व न होता? धरती कैसी दिखाई देगी, अगर उस पर से सभी परछाइयाँ लुप्त हो जाएँ? परछाइयाँ तो बनती हैं पदार्थों से, व्यक्तियों से. यह रही मेरी तलवार की परछाईं. परछाइयाँ वृक्षों की भी होती हैं और अन्य सजीव प्राणियों की भी. क्या पृथ्वी पर से सभी पेड़ एवम् सभी सजीव प्राणी हटाकर तुम पृथ्वी को एकदम नंगी कर देना चाहते हो, सिर्फ नंगी रोशनी का लुत्फ उठाने की अपनी कल्पना की खातिर? तुम बेवकूफ हो!”

“मैं तुमसे बहस नहीं करना चाहता, बूढ़े दार्शनिक,” लेवी मैथ्यू ने जवाब दिया.
 “तुम मुझसे बहस कर भी नहीं सकते, इसलिए कि तुम बेवकूफ़ हो,” वोलान्द ने जवाब देकर पूछा, “संक्षेप में बताओ, मुझे हैरान करते हुए तुम आए क्यों हो?”
 “उसने मुझे भेजा है.”
 “उसने तुम्हें कौन-सा संदेश देकर भेजा है, दास?”
 “मैं दास नहीं हूँ,” बुरा मानते हुए लेवी मैथ्यू ने जवाब दिया, “मैं उसका शिष्य हूँ.”
 “हम हमेशा की तरह आपस में भिन्न भाषाओं में बात कर रहे हैं. मगर इससे वे चीज़ें तो बदल नहीं जातीं, जिनके बारे में हम बातें कर रहे हैं. तो...” वोलान्द अपनी बहस पूरी किए बिना चुप हो गया.
 “उसने मास्टर का उपन्यास पढ़ा है,” लेवी मैथ्यू ने कहा, “वह तुमसे प्रार्थना करता है कि तुम मास्टर को अब अपने साथ ले जाओ और पुरस्कार स्वरूप उसे शांति दो. क्या यह तुम्हारे लिए मुश्किल है, बुराइयों की आत्मा?”
 “मेरे लिए कुछ भी करना मुश्किल नहीं है, यह बात तुम भी अच्छी तरह जानते हो.” कुछ देर चुप रहकर वोलान्द ने आगे कहा, “तुम उसे अपने साथ प्रकाश में क्यों नहीं ले जाते?”
 “वह प्रकाश के लायक नहीं है, उसे शांति की ज़रूरत है,” लेवी ने दुःखी होकर कहा.
 “कह देना कि काम हो जाएगा,” वोलान्द ने जवाब देकर आगे कहा, “तुम यहाँ से फौरन दफ़ा हो जाओ,” उसकी आँख में किनगारियाँ चमकने लगीं.
 “वह प्रार्थना करता है कि जिसने उसे प्यार किया और दुःख झेले, वह भी आपकी शरण पाए,” लेवी ने पहली बार वोलान्द से प्रार्थना के स्वर में बात की.
 “तुम्हारे बिना तो हम शायद यह बात समझ ही न पाते. अब जाओ!”
इसके बाद लेवी मैथ्यू गायब हो गया.
वोलान्द ने अज़ाज़ेलो को निकट बुलाकर आज्ञा दी, “उनके पास उड़कर जाओ और सब ठीक-ठाक करके आओ.”
अज़ाज़ेलो छत से चला गया और वोलान्द अकेला रह गया.
तो, हम देखते हैं कि बुल्गाकोव मास्टर के लिए शांति की कामना करता है न कि प्रकाश की, प्रसिद्धी की,  मान्यता की. शायद बुल्गाकोव जैसी योग्यता वाले लेखक के लिए यही उचित था; स्वयँ उसे भी केवल शांति की ज़रूरत थी.                             
फिर वहाँ प्रकट होते हैं कोरोव्येव और बेगेमोत... ग्रिबोयेदोव भवन के विनाश का ज़िक्र होता है और वोलान्द हुक्म देता है कि लेखकों के लिए, कला एवम् संस्कृति के निर्माताओं के लिए एक नई इमारत का निर्माण लिया जाए जो पहले वाली, एक ढर्रे वाली इमारत से बेहतर हो. उसे यक़ीन दिलाया जाता है कि ऐसा ही होगा.
 “वह बन जाएगी, मालिक,” कोरोव्येव बोल पड़ा, “मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ.”
 “ठीक है, तो फिर मैं कामना करता हूँ कि वह पहले वाली से अधिक बेहतर होगी,” वोलान्द ने कहा.
 “ऐसा ही होगा, मालिक!” कोरोव्येव बोला.
बिल्ला बोला, “आप मुझ पर भरोसा कीजिए, मैं सचमुच का पैगम्बर हूँ.”
 “ख़ैर, हम आ गए हैं, मालिक,” कोरोव्येव बोला, “और आपके हुक्म का इंतज़ार कर रहे हैं.”
वोलान्द अपने स्टूल से उठकर जँगले तक गया और काफी देर चुपचाप, अपनी मण्डली की ओर पीठ किए, दूर कहीं देखता रहा. फिर वह जँगले से हटा, वापस अपने स्टूल पर बैठ गया और बोला, “कोई भी हुक्म नहीं है – तुम लोगों ने वह सब किया, जो कर सकते थे और फिलहाल तुम्हारे सेवाओं की कुझे ज़रूरत नहीं है. तुम लोग आराम कर सकते हो. तूफान आने वाला है; आख़िरी तूफ़ान; वह सब काम पूरा कर देगा; और फिर हम चल पड़ेंगे.”
 “बहुत अच्छा मालिक,” दोनों जोकरों ने जवाब दिया और वे छत के बीचों-बीच बने गोल मध्यवर्ती गुम्बज के पीछे कहीं छिप गए.
 तूफ़ान, जिसके बारे में वोलान्द ने कहा था, क्षितिज पर उठने लगा था. पश्चिम की ओर से एक काला बादल उठा, जिसने सूरज को आधा काट दिया. फिर उसने उसे पूरी तरह ढाँक लिया. छत पर सुहावना लगने लगा. कुछ और देर के बाद अँधेरा छाने लगा.
पश्चिम की ओर से आए इस अँधेरे ने उस पूरे शहर को ढाँक लिया. पुल और महल गायब हो गए. सब कुछ अदृश्य हो गया, मानो दुनिया में उसका कभी अस्तित्व ही न रहा हो. पूरे आकाश में आग की एक लकीर दौड़ रही थी. फिर शहर पर कड़कड़ाते हुए बिजली गिरी. दुबारा बिजली की कड़क के बाद मूसलाधार बारिश शुरू हो गई, उस अँधेरे में वोलान्द अदृश्य हो गया.
पश्चिम की ओर से उठने वाले तूफ़ान से तात्पर्य शायद पश्चिमी ताक़तों के सैनिक हस्तक्षेप से है, जिसका ज़िक्र “लाल द्वीप” में भी है. यह तूफ़ान सूरज (!) को आधा काट देने वाला है.
आपको याद होगा कि अध्याय 16 में येरूशलम भी इसी प्रकार लुप्त हो गया था. इस वर्णन के माध्यम से दोनों युगों को आपस में मिला दिया गया है.
शायद बुल्गाकोव सोवियत संघ में वोलान्द जैसी किसी महान शक्ति की सहायता से किसी सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन की भविष्यवाणी कर रहे हों!

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

Discussion on Master&Margarita(Hindi) - Chapter28


अध्याय 28
कोरोव्येव और बेगेमोत के अंतिम कारनामे


तो, वोलान्द और उसकी टीम फ्लैट नं. 50 से निकल जाते हैं क्योंकि उनका अपनी दुनिया में जाने का समय हो गया है.
कुछ देर बाद वोलान्द, अज़ाज़ेलो और हैला कहीं और मुड़ जाते हैं और बेगेमोत और कोरोव्येव स्मोलेन्स्की मार्केट में स्थित ‘तोर्गसीन’ नामक दुकान में घुसते हैं. इस दुकान में सिर्फ विदेशी मुद्रा ही चलती थी.
इस अध्याय में बुल्गाकोव यह बताते हैं कि विदेशियों को किस प्रकार से प्राथमिकता दी जाती है, और कैसे रूसी लोग कभी-कभी स्वयँ को विदेशी बताकर उन चीज़ों को प्राप्त कर लेते हैं, जो आम तौर से उन्हें नसीब नहीं होती थीं. घटनाक्रम इस प्रकार है:
“...सबसे पहले उन्होंने चारों ओर देखा और फिर खनखनाती आवाज़ में, जो पूरी दुकान में गूँज उठी, कोरोव्येव बोला, “बहुत अच्छी दुकान है! बहुत, बहुत अच्छी दुकान!”
     
जनता काउंटरों से मुड़कर न जाने क्यों विस्मय से उस बोलने वाले की ओर देखने लगी, हालाँकि उसके पास दुकान की प्रशंसा करने के लिए कई कारण थे.
........
“....कोरोव्येव और बेगेमोत कंफेक्शनरी और किराना वाले विभाग की सीमा रेखा पर पहुँचे. यह बहुत खुली जगह थी. यहाँ रूमाल बाँधे, एप्रन पहने महिलाएँ बन्द कटघरों में नहीं थीं, जैसी कि वे कपड़ों वाले विभाग में थीं.
नाटा, एकदम चौकोर आदमी, चिकनी दाढ़ी वाला, सींगों की फ्रेम वाले चश्मे में, नई हैट जो बिल्कुल मुड़ी-तुड़ी नहीं थी और जिस पर पसीने के धब्बे नहीं थे, हल्के गुलाबी जामुनी रंग का सूट और लाल दस्ताने पहने शेल्फ के पास खड़ा था और कुछ हुक्म-सा दे रहा था. सफ़ेद एप्रन और नीली टोपी पहने सेल्स मैन इस हल्के गुलाबी जामुनी सूट वाले की ख़िदमत में लगा था. एक तेज़ चाकू से, जो लेवी मैथ्यू द्वारा चुराए गए चाकू के समान था, वह रोती हुई गुलाबी सोलोमन मछली की साँप के समान झिलमिलाती चमड़ी उतार रहा था.
 “यह विभाग भी शानदार है,” कोरोव्येव ने शानदार अन्दाज़ में कहा, “और यह विदेशी भी सुन्दर है,” उसने सहृदयता से गुलाबी जामुनी पीठ की ओर उँगली से इशारा करते हुए कहा.
 “नहीं, फ़ागोत, नहीं,” बेगेमोत ने सोचने के-से अन्दाज़ में कहा, “तुम, मेरे दोस्त, गलत हो...मेरे विचार से इस गुलाबी जामुनी भलेमानस के चेहरे पर किसी चीज़ की कमी है!”
गुलाबी जामुनी पीठ कँपकँपाई, मगर, शायद, संयोगवश, वर्ना विदेशी तो कोरोव्येव और बेगेमोत के बीच रूसी में हो रही बातचीत समझ नहीं सकता था.
 “अच्छी है?” गुलाबी जामुनी ग्राहक ने सख़्ती से पूछा.
 “विश्व प्रसिद्ध,” विक्रेता ने मछली के चमड़े में चाकू चुभोते हुए कहा.
 “अच्छी – पसन्द है; बुरी – नहीं –“ विदेशी ने गम्भीरता से कहा.
 “क्या बात है!” उत्तेजना से सेल्समैन चहका.
अब हमारे परिचित विदेशी और उसकी सोलोमन मछली से कुछ दूर, कन्फेक्शनरी विभाग की मेज़ के किनारे की ओर हट गए.
 “बहुत गर्मी है आज,” कोरोव्येव ने लाल गालों वाली जवान सेल्स गर्ल से कहा और उसे कोई भी जवाब नहीं मिला. “ये नारंगियाँ कैसी हैं?” तब उससे कोरोव्येव ने पूछा.
 “तीस कोपेक की एक किलो,” सेल्स गर्ल ने जवाब दिया.
 “हर चीज़ इतनी महँगी है,” आह भरते हुए कोरोव्येव ने फ़ब्ती कसी, “आह, ओह, एख़,” उसने कुछ देर सोचा और अपने साथी से कहा, “बेगेमोत, खाओ!”
मोटे ने अपना स्टोव बगल में दबाया, ऊपर वाली नारंगी मुँह में डाली और खा गया, फिर उसने दूसरी की तरफ हाथ बढ़ाया.
सेल्स गर्ल के चेहरे पर भय की लहर दौड़ गई.
 “आप पागल हो गए हैं?” वह चीखी, उसके चेहरे की लाली समाप्त हो रही थी, “रसीद दिखाओ! रसीद!” और उसने कन्फेक्शनरी वाला चिमटा गिरा दिया.
 “जानेमन, प्यारी, सुन्दरी,” कोरोव्येव सिसकारियाँ लेते हुए काउण्टर पर से नीचे झुककर विक्रेता लड़की को आँख मारते हुए बोला, “आज हमारे पास विदेशी मुद्रा नहीं है...मगर कर क्या सकते हैं? मगर मैं वादा करता हूँ कि अगली बार सोमवार से पहले ही पूरा नगद चुका दूँगा. हम यहीं, नज़दीक ही रहते हैं, सादोवाया पर, जहाँ आग लगी है.”
बेगेमोत ने तीसरी नारंगी ख़त्म कर ली थी, और अब वह चॉकलेटों वाले शेल्फ में अपना पंजा घुसा रहा था; उसने एक सबसे नीचे रखा चॉकलेट बार बाहर निकाला जिससे सारे चॉकलेट बार्स नीचे गिर पड़े ; उसने अपने वाले चॉकलेट बार को सुनहरे कवर समेत गटक लिया.
मछली वाले काउण्टर के सेल्समैन अपने-अपने हाथों में पकड़े चाकुओं के साथ मानो पत्थर बन गए; गुलाबी जामुनी इन लुटेरों की ओर मुड़ा, तभी सबने देखा कि बेगेमोत गलत कह रहा था : गुलाबी जामुनी के चेहरे पर किसी चीज़ की कमी होने के स्थान पर एक फालतू चीज़ थी – लटकते गाल और गोल-गोल घूमती आँख़ें.
पूरी तरह पीली पड़ चुकी सेल्स गर्ल डर के मारे ज़ोर से चीखी, “पालोसिच! पालोसिच!”
कपड़ों वाले विभाग के ग्राहक इस चीख को सुनकर दौड़े आए, और बेगेमोत कन्फेक्शनरी विभाग से हटकर अपना पंजा उस ड्रम में घुसा रहा था जिस पर लिखा था, ‘बेहतरीन केर्च हैरिंग’. उसने नमक लगी हुई दो मछलियाँ खींचकर निकालीं और उन्हें निगल गया. पूँछ बाहर थूक दी.
 “पालोसिच!” यह घबराहट भरी चीख दुबारा सुनाई दी, कन्फेक्शनरी वाले विभाग से, और मछलियों वाले काउण्टर का बकरे जैसी दाढ़ी वाला सेल्समैन गुर्राया, “तुम कर क्या रहे हो, दुष्ट!”
पावेल योसिफोविच फौरन तीर की तरह घटनास्थल की ओर लपका. यह प्रमुख था उस दुकान का – सफ़ेद, बेदाग एप्रन पहने, जैसा सर्जन लोग पहनते हैं, साथ में थी पेंसिल, जो उसकी जेब से दिखाई पड़ रही थी. पावेल योसिफोविच, ज़ाहिर है, एक अनुभवी व्यक्ति था. बेगेमोत के मुँह में तीसरी मछली की पूँछ देखकर उसने फ़ौरन ही परिस्थिति को भाँप लिया, सब समझ लिया, और उन बदमाशों पर चीखने और उन्हें गालियाँ देने के बदले दूर कहीं देखकर उसने हाथ से इशारा किया और आज्ञा दी:
 “सीटी बजाओ!”
स्मोलेन्स्क के नुक्कड़ पर शीशे के दरवाज़ों से दरबान बाहर भागा और भयानक सीटी बजाने लगा. लोगों ने इन बदमाशों को घेरना शुरू कर दिया, और तब कोरोव्येव ने मामले को हाथ में लिया.
 “नागरिकों!” कँपकँपाती , महीन आवाज़ में वह चीखा, “यह क्या हो रहा है? हाँ, मैं आपसे पूछता हूँ! गरीब बिचारा आदमी,” कोरोव्येव ने अपनी आवाज़ को और अधिक कम्पित करते हुए कहा और बेगेमोत की ओर इशारा किया, जिसने अपने शरीर को फौरन सिकोड़ लिया था, “गरीब आदमी, सारे दिन स्टोव सुधारता रहता है; वह भूखा था...उसके पास विदेशी मुद्रा कहाँ से आए?”
इस पर आमतौर से शांत और सहनशील रहने वाले पावेल योसिफोविच ने गम्भीरतापूर्वक चिल्लाते हुए कहा, “तुम यह सब बन्द करो!” और उसने दूर फिर से इशारा किया जल्दी-जल्दी. तब दरवाज़े के निकट सीटियाँ और ज़ोर से बजने लगीं.
मगर पावेल योसिफोविच के व्यवहार से क्षुब्ध हुए बिना कोरोव्येव कहता रहा, “कहाँ से? मैं आपसे सवाल पूछता हूँ! वह भूख और प्यास से बेहाल है! उसे गर्मी लग रही है. इस झुलसते आदमी ने चखने के लिए नारंगी मुँह में डाल ली. उसकी कीमत है सिर्फ तीन कोपेक. और ये सीटियाँ बजा रहे हैं, जैसे बसंत ऋतु में कोयलें जंगल में कूकती हैं; पुलिस वालों को परेशान कर रहे हैं, उन्हें अपना काम नहीं करने दे रहे. और वह खा सकता है? हाँ?” अब कोरोव्येव ने हल्के गुलाबी जामुनी मोटे की ओर इशारा किया, जिससे उसके मुँह पर काफी घबराहट फैल गई, “वह है कौन? हाँ? कहाँ से आया? किसलिए? क्या उसके बगैर हम उकता रहे थे? क्या हमने उसे आमंत्रित किया था? बेशक,” व्यंग्य से मुँह को टेढ़ा बनाते हुए पूरी आवाज़ में वह चिल्लाया, “वह, देख रहे हैं न, उसकी जेबें विदेशी मुद्रा से ठसाठस भरी हैं. और हमारे लिए...हमारे नागरिक के लिए! मुझे दुःख होता है! बेहद अफ़सोस है! अफ़सोस!” कोरोव्येप विलाप करने लगा. जैसे प्राचीन काल में शादियों के समय बेस्ट-मैन द्वारा किया जाता था.
इस बेवकूफी भरे, बेतुके, मगर राजनीतिक दृष्टि से ख़तरनाक भाषण ने पावेल योसिफोविच को गुस्सा दिला ही दिया, वह थरथराने लगा, मगर यह चाहे कितना ही अजीब क्यों न लग रहा हो, चारों ओर जमा हुई भीड़ की आँखों से साफ प्रकट हो रहा था कि लोगों को उससे सहानुभूति हो रही है! और जब बेगेमोत अपने कोट की गन्दी, फटी हुई बाँह आँख पर रखकर दुःख से बोला, “धन्यवाद, मेरे अच्छे दोस्त, तुम एक पीड़ित की मदद के लिए आगे तो आए!” तो एक चमत्कार और हुआ. एक भद्र, खामोश बूढ़ा, जो गरीबों जैसे मगर साफ़ कपड़े पहने हुए था, जिसने कन्फेक्शनरी विभाग में तीन पेस्ट्रियाँ खरीदी थीं, एकदम नए रूप में बदल गया. उसकी आँखें ऐसे जलने लगीं, मानो वह युद्ध के लिए तैयार हो रहा हो; उसका चेहरा लाल हो गया, उसने पेस्ट्रियों वाला पैकेट ज़मीन पर फेंका और चिल्लाने लगा, “सच है!” बच्चों जैसी आवाज़ में यह कहने के बाद उसने ट्रे उठाया, उसमें से बेगेमोत द्वारा नष्ट किए गए ‘एफिल टॉवर’ चॉकलेट के बचे-खुचे टुकड़े फेंक दिए, उसे ऊपर उठाया, बाएँ हाथ से विदेशी की टोपी खींच ली, और दाएँ हाथ से ट्रे विदेशी के सिर पर दे मारी. ऐसी आवाज़ हुई मानो किसी ट्रक से लोहे की चादरें फेंकी जा रही हैं. मोटा फक् हुए चेहरे से मछलियों वाले ड्रम में जा गिरा, इससे उसमें से नमकीन द्रव का फ़व्वारा निकल पड़ा.
तभी एक और चमत्कार हुआ, हल्का गुलाबी जामुनी व्यक्ति ड्रम में गिरने के बाद साफ-स्पष्ट रूसी में चिल्ला पड़ा, “मार डालेंगे! पुलिस! मुझे डाकू मारे डाल रहे हैं!” ज़ाहिर है, इस अचानक लगे मानसिक धक्के से वह अब तक अनजानी भाषा पर अधिकार पा चुका था.
तब दरबान की सीटी रुक गई, घबराए हुए ग्राहकों के बीच से पुलिस की दो टोपियाँ निकट आती दिखाई दीं. मगर चालाक बेगेमोत ने स्टोव के तेल से कन्फेक्शनरी विभाग का काउण्टर इस तरह भिगोना शुरू किया जैसे मशकों से हमाम की बेंच भिगोई जाती है; और वह अपने आप भड़क उठा. लपट ऊपर की ओर लपकी और पूरे विभाग को उसने अपनी गिरफ़्त में ले लिया. और दोनों दुष्ट – कोरोव्येव और बेगेमोत –छत से लगे-लगे उड़ते रहे और फिर ऐसे फूटकर बिखर गए, जैसे बच्चों के गुब्बारे हों.
बुल्गाकोव समाज की जिस बुराई को नापसन्द करते हैं वह आग में भस्म हो जाती है.
कोरोव्येव और बेगेमोत का अगला लक्ष्य है ग्रिबोयेदोव भवन. इसके बारे में हम अध्याय 5 में पढ़ चुके हैं. ग्रिबोयेदोव भवन मॉस्को की साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र था. यहाँ लेखक  ‘उगाये’ जाते थे. बुल्गाकोव उन तत्कालीन ’साहित्यिक स्टूडिओज़’ का मखौल उड़ाते हैं जहाँ लेखक ‘बनाए’ जाते थे.  
चलिए, देखते हैं कि वहाँ क्या होता है:
“...स्मोलेन्स्क वाली घटना के ठीक एक मिनट बाद बेगेमोत और कोरोव्येव ग्रिबोयेदोव वाली बुआजी के घर के निकट वाले उस रास्ते के फुटपाथ पर दिखाई दिए, जिसके दोनों ओर पेड़ लगे थे. कोरोव्येव जाली के निकट रुका और बोला,
“ब्बा! हाँ, यह लेखकों का भवन है. बेगेमोत, जानते हो, मैंने इस भवन की बहुत तारीफ सुनी है. इस घर की ओर ध्यान दो, मेरे दोस्त! यह सोचकर कितना अच्छा लगता है कि इस छत के नीचे इतनी योग्यता और बुद्धिमत्ता फल-फूल रही है!”
 “जैसे काँच से घिरे बगीचों में अनन्नास!” बेगेमोत ने कहा और वह स्तम्भों वाले इस भवन को अच्छी तरह देखने के लिए लोहे की जाली के आधार पर चढ़ गया.
 “बिल्कुल सही है,” कोरोव्येव अपने साथी की बात से सहमत होते हुए बोला, “दिल में यह सोचकर मीठी सुरसुरी दौड़ जाती है कि अब इस मकान में ‘दोन किखोत’ या ‘फाऊस्त’ या, शैतान मुझे ले जाए, यहाँ ‘मृत आत्माएँ’ जैसी रचनाएँ लिखने वाला भावी लेखक पल रहा है! हाँ?”
 “अजीब लगता है सोचकर,” बेगेमोत ने पुष्टि की.
 “हाँ,” कोरोव्येव बोलता रहा, “अजीब-अजीब चीज़ें होती हैं – इस भवन की क्यारियों में, जो अपनी छत के नीचे हज़ारों ऐसे लोगों को आश्रय देता है, जो साहित्य-सेवा में अपना पूरा जीवन बिता देना चाहते हैं. तुम सोचो, कितना शोर मचेगा तब, जब इनमें से कोई एक जनता के सम्मुख ऐसी रचना प्रस्तुत करेगा – जैसे ‘इन्स्पेक्टर जनरल’ या उससे भी ज़्यादा बदतर स्थिति में – ‘येव्गेनी अनेगिन’!”
 “काफी आसान है,” बेगेमोत ने फिर से कहा.
 “हाँ!” कोरोव्येव कहता रहा और उसने चिंता से उँगली ऊपर को उठाई, “लेकिन!...लेकिन, मैं कहता हूँ, और दुहराता हूँ यह – ‘लेकिन!’ अगर इन आरामदेह नाज़ुक फसलों पर कोई कीट न गिरे, उन्हें जड़ से न खा जाए, अगर वे मर न जाएँ! और ऐसा अनन्नासों के साथ होता है! ओय, ओय, ओय, कैसा होता है!”
बेगेमोत ने जाली में बने छेद से अपना सिर अन्दर घुसाते हुए पूछा, “लेकिन ये सब लोग बरामदे में क्या कर रहे हैं?”
 “खाना खा रहे हैं,” कोरोव्येव ने समझाया, “मैं तुम्हें यह भी बताता हूँ, मेरे प्यारे दोस्त, कि यहाँ एक बहुत अच्छा और सस्ता रेस्तराँ है. और मैं, जैसा कि दूर के सफर पर निकलने से पहले हर यात्री चाहता है, यहाँ कुछ खाना चाहता हूँ. ठण्डी शराब का एक पैग पीना चाहता हूँ.”
 “मैं भी,” बेगेमोत ने जवाब दिया और दोनों बदमाश लिण्डेन के वृक्षों की छाया तले सीमेण्ट के रास्ते पर चलते हुए सीधे, आगामी ख़तरे से बेख़बर रेस्तराँ के बरामदे के प्रवेश द्वार तक आ गए.
एक बदरंग-सी उकताई महिला सफ़ॆद स्टॉकिंग्स और फुँदे वाली गोल सफ़ॆद टोपी पहने, कोने वाले प्रवेश-द्वार के पास कुर्सी पर बैठी थी, जहाँ हरियाली बेलों के बीच छोटा-सा प्रवेश-द्वार बनाया गया था. उसके सामने एक साधारण-सी मेज़ पर एक मोटा रजिस्टर पड़ा था. उसमें यह महिला न जाने क्यों, रेस्तराँ में आने वालों के नाम लिख रही थी. इस महिला ने कोरोव्येव और बेगेमोत को रोका.
 “आपका परिचय-पत्र?” उसने कोरोव्येव के चश्मे की ओर और बेगेमोत की फटी हुई बाँह तथा बगल में दबे हुए स्टोव को आश्चर्य से देखते हुए पूछा.
 “हज़ार बार माफ़ी चाहता हूँ, कैसा परिचय-पत्र?” कोरोव्येव ने हैरानी से पूछा.
 “आप लेखक हैं?” महिला ने जवाब में पूछ लिया.
 “बेशक!” कोरोव्येव ने काफी अहमियत से कहा.
 “आपका परिचय-पत्र?” महिला ने दुहराया.
 “मेरी मनमोहिनी...,” कोरोव्येव ने भावुकता से कहना शुरू किया.
 “मैं मनमोहिनी नहीं हूँ,” महिला ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा.
 “ओह, कितने दुःख की बात है,” कोरोव्येव ने निराशा से कहा, “अगर आपको मोहक होना पसन्द नहीं है, तो चलिए, ऐसा ही हो, हालाँकि यह आपके लिए बढ़िया होता. तो मैडम, दोस्तोयेव्स्की लेखक है, यह सुनिश्चित करने के लिए क्या उसी से प्रमाण-पत्र माँगना चाहिए? आप उसके किसी भी उपन्यास के कोई भी पाँच पृष्ठ ले लीजिए, और बिना किसी परिचय-पत्र के आपको विश्वास हो जाएगा कि आप एक अच्छे लेखक को पढ़ रही हैं. हाँ, उसके पास शायद कोई परिचय-पत्र था ही नहीं! तुम्हारा क्या ख़याल है?” कोरोव्येव बेगेमोत से मुख़ातिब हुआ.
 “शर्त लगाता हूँ, कि नहीं था,” वह स्टोव को रजिस्टर के पास रखकर एक हाथ से धुएँ से काले हो गए माथे का पसीना पोंछता हुआ बोला.
 “आप दोस्तोयेव्स्की नहीं हैं,” कोरोव्येव की दलीलों से पस्त होकर महिला ने कहा.
 “लो, आपको कैसे मालूम? आपको कैसे मालूम?” उसने जवाब दिया.
 “दोस्तोयेव्स्की मर चुका है,” महिला ने कहा, मगर शायद उसे भी इस बात का विश्वास नहीं हो रहा था.
 “मैं इस बात का विरोध करता हूँ,” बेगेमोत ने तैश में आते हुए कहा, “दोस्तोयेव्स्की अमर है!”
 “आपके परिचय-पत्र, नागरिकों!” उस महिला ने फिर पूछा.
 “माफ कीजिए, यह तो हद हो गई?” कोरोव्येव ने हार नहीं मानी और कहता रहा, “लेखक को कोई उसके परिचय-पत्र से नहीं जानता, बल्कि उसे जाना जाता है उसके लेखन से! आपको क्या मालूम कि मेरे दिमाग में कैसे-कैसे विचार उठ रहे हैं? या इस दिमाग में?” उसने बेगेमोत के सिर की ओर इशारा किया, जिसने फौरन अपनी टोपी उतार ली, शायद इसलिए कि वह महिला उसका सिर अच्छी तरह देख सके.
 “रास्ता छोड़ो, श्रीमान,” उस औरत ने काफी घबराते हुए कहा.
कोरोव्येव और बेगेमोत ने एक ओर हटकर भूरे सूट वाले, बिना टाई के एक लेखक को रास्ता दिया. इस लेखक ने सफ़ेद कमीज़ पहन रखी थी, जिसका कॉलर कोट के ऊपर खुला पड़ा था. उसने बगल में अख़बार दबा रखा था. लेखक ने अभिवादन के अन्दाज़ में महिला को देखकर सिर झुकाया और सामने रखे रजिस्टर में चिड़ियों जैसी कोई चीज़ खींच दी और बरामदे में चला गया.
 “ओह,” बड़े दुःख से कोरोव्येव ने आह भरी, “हमें नहीं, बल्कि उसे मिलेगी वह ठण्डी बियर जिसका हम गरीब घुमक्कड़ सपना देख रहे थे. हमारी स्थिति बड़ी चिंताजनक हो गई है, समझ में नहीं आ रहा क्या किया जाए.”
बेगेमोत ने दुःख प्रकट करते हुए हाथ हिला दिए और अपने गोल सिर पर टोपी पहन ली जिस पर बिल्कुल बिल्ली की खाल जैसे घने बाल थे. उसी क्षण उस महिला के सिर पर एक अधिकार युक्त आवाज़ गूँजी, “आने दो, सोफ्या पाव्लोव्ना.”
रजिस्टर वाली औरत चौंक गई. सामने बेलों की हरियाली में से एक सफेद जैकेट वाला सीना और कँटीली दाढ़ी वाला समुद्री डाकू का चेहरा उभरा. उसने इन दोनों फटे कपड़ों वाले सन्देहास्पद प्राणियों की ओर बड़े प्यार से देखा, और तो और, उन्हें इशारे से आमंत्रित भी करने लगा. आर्किबाल्द आर्किबाल्दोविच का दबदबा पूरे रेस्तराँ में उसके अधीनस्थ कर्मचारियों द्वारा महसूस किया जाता था. सोफ्या पाव्लोव्ना ने कोरोव्येव से पूछा, “आपका नाम?”
 “पानायेव,” शिष्ठतापूर्वक उसने जवाब दिया. महिला ने वह नाम लिख लिया और प्रश्नार्थक दृष्टि से बेगेमोत की ओर देखा.
 “स्काबिचेव्स्की,” वह न जाने क्यों अपने स्टोव की ओर इशारा करते हुए चिरचिराया. सोफ्या पाव्लोव्ना ने यह नाम भी लिख दिया और रजिस्टर आगंतुकों की ओर बढ़ा दिया, ताकि वे हस्ताक्षर कर सकें. कोरोव्येव ने ‘पानायेव’ के आगे लिखा ‘स्काबिचेव्स्की’; और बेगेमोत ने ‘स्काबिचेव्स्की’ के आगे लिखा ‘पानायेव’.
 सोफ्या पाव्लोव्ना को पूरी तरह हैरत में डालते हुए आर्किबाल्द आर्किबाल्दोविच मेहमानों को बड़े प्यार से मुस्कुराते हुए बरामदे के दूसरे छोर पर स्थित सबसे बेहतरीन टेबुल के पास ले गया. वहाँ काफी छाँव थी. टेबुल के बिल्कुल निकट सूरज की मुस्कुराती किरणें बेलों से छनकर आ रही थीं. सोफ्या पाव्लोव्ना विस्मय से सन्न् उन दोनों विचित्र हस्ताक्षरों को देख रही थी, जो उन अप्रत्याशित मेहमानों ने किए थे.
बेयरों को भी आर्किबाल्द आर्किबाल्दोविच ने कम आश्चर्यचकित नहीं किया. उसने स्वयँ कुर्सी खींची और कोरोव्येव को बैठने की दावत दी, फिर एक बेयरे को इशारा किया, दूसरे के कान में फुसफुसाकर कुछ कहा, और दोनों बेयरे नये मेहमानों की ख़िदमत में तैनात हो गए. मेहमानों में से एक ने अपना स्टोव ठीक अपने लाल जूते की बगल में फर्श पर रखा था. टेबुल के ऊपर वाला पुराना पीले धब्बों वाला मेज़पोश फौरन गायब हो गया और हवा से उड़ता हुआ सफ़ेद कलफ़ लगा मेज़पोश उसकी जगह आ गया.
आर्किबाल्द आर्किबाल्दोविच हौले-हौले कोरोव्येव के ठीक कान के पास फुसफुसा रहा था, “आपकी क्या ख़िदमत कर सकता हूँ? खासतौर से बनाई गई लाल मछली, आर्किटेक्टों की कॉंन्फ्रेंस से चुराकर लाया हूँ...”
 “आप...अँ...हमें कुछ भी खाने को दीजिए,...अँ...” कोरोव्येव सहृदयता से कुर्सी पर फैलते हुए बोला.
 “समझ गया,” आँखें बन्द करते हुए आर्किबाल्द आर्किबाल्दोविच ने अर्थपूर्ण ढंग से कहा.
 “पहाड़ी बादाम और तीतर का पकवान हाज़िर कर सकता हूँ,” संगीतमय सुर में आर्किबाल्द आर्किबाल्दोविच बोला. टूटे चश्मे वाले मेहमान ने इस प्रस्ताव को बहुत पसन्द किया और धन्यवाद के भाव से बेकार के चश्मे की ओट से उसे देखा.
बगल की मेज़ पर बैठा कहानीकार पेत्राकोव सुखोयेव जो अपनी पत्नी के साथ पोर्क चॉप खा रहा था, अपनी स्वाभाविक लेखकीय निरीक्षण शक्ति से आर्किबाल्द आर्किबाल्दोविच द्वारा की जा रही आवभगत को देखकर काफी चौंक गया. उसकी सम्माननीय पत्नी ने कोरोव्येव की इस समुद्री डाकू से होती निकटता को देखकर जलन के मारे चम्मच बजाया, मानो कह रही हो – यह क्या बात है कि हमें इंतज़ार करना पड़ रहा है, जबकि आइस्क्रीम देने का समय हो गया है! बात क्या है?
आर्किबाल्द आर्किबाल्दोविच ने मुस्कुराते हुए पेत्राकोवा की ओर एक बेयरे को भेज दिया, लेकिन वह खुद अपने प्रिय मेहमानों से दूर नहीं हटा. आह, आर्किबाल्द आर्किबाल्दोविच बहुत अकलमन्द था! लेखकों से भी ज़्यादा पैनी नज़र रखने वाला.
आर्किबाल्द आर्किबाल्दोविच वेराइटी ‘शो’ के बारे में भी जानता था, और इन दिनों हो रही अनेक चमत्कारिक घटनाओं के बारे में भी उसने सुन रखा था; लेकिन औरों की भाँति ‘चौखाने वाला’ और ‘बिल्ला’ इन दो शब्दों को उसने कान से बाहर नहीं निकाल दिया था. आर्किबाल्द आर्किबाल्दोविच ने तुरंत अन्दाज़ लगा लिया था कि मेहमान लोग कौन हैं. वह जान चुका था, इसलिए उसने उनसे बहस नहीं की.
आर्किबाल्द आर्किबाल्दोविच बहुत धूर्त व्यक्ति था.
वह मेज़ से हटकर रेस्तराँ के अन्दरूनी गलियारे में गायब हो गया. अगर कोई आर्किबाल्द आर्किबाल्दोविच के आगामी कार्यकलापों का निरीक्षण करता, तो वे उसे कुछ रहस्यमय ही प्रतीत होतीं.
 वह टेबुल से दूर हटकर तेज़ी से किचन में नहीं, अपितु रेस्तराँ के भंडारघर में गया. उसने अपनी चाभी से उसे खोला और उसमें बन्द हो गया. बर्फ से भरे डिब्बे में से सावधानी से दो भारी-भारी लाल मछलियाँ निकालकर सावधानी से उन्हें अख़बार में लपेटा. उसके ऊपर से रस्सी बाँध दी और एक किनारे पर रख दिया. फिर बगल वाले कमरे में जाकर इत्मीनान कर लिया कि उसका रेशमी अस्तर वाला गर्मियों वाला कोट और टोपी अपनी जगह पर हैं या नहीं. तभी वह रसोईघर में पहुँचा, जहाँ रसोइया मेहमानों से वादा की गई तीतर तल रहा था.
कहना पड़ेगा कि आर्किबाल्द आर्किबादोविच के कार्यकलाप में कुछ भी रहस्यमय नहीं था और उन्हें रहस्यमय केवल एक उथला निरीक्षक ही कह सकता है. पहले घटित हो चुकी घटनाओं के परिणामों को देखते हुए आर्किबाल्द आर्किबाल्दोविच की हरकतें तर्कसंगत ही प्रतीत होती थीं. हाल की घटनाओं की जानकारी और ईश्वर प्रदत्त पूर्वानुमान करने की अद्वितीय शक्ति ने आर्किबाल्द आर्किबाल्दोविच को बता दिया था, कि उसके दोनों मेहमानों का भोजन चाहे कितना ही लजीज़ और कितना ही अधिक क्यों न हो, वह बस कुछ ही देर चलेगा. और उसकी इस शक्ति ने उसे इस बार भी धोखा नहीं दिया.
जब कोरोव्येव और बेगेमोत मॉस्को की अत्यंत परिशुद्ध वोद्का का दूसरा जाम टकरा रहे थे, तब बरामदे में पसीने से लथपथ घबराया हुआ संवाददाता बोबा कान्दालूप्स्की घुसा जो मॉस्को में अपने हरफनमौला ज्ञान के कारण सुप्रसिद्ध था. आते ही वह पेत्राकोव दम्पत्ति के पास बैठ गया. अपनी फूली हुई ब्रीफकेस टेबुल पर रखते हुए बोबा ने अपने होठ तुरंत पेत्राकोव के कान से सटा दिए और बहुत ही सनसनीख़ेज़ बातें फुसफुसाने लगा. मैडम पेत्राकोवा ने भी उत्सुकतावश अपना कान बोबा के चिकने फूले-फूले होठों से लगा दिया. वह कनखियों से इधर-उधर देखता बस फुसफुसाए जा रहा था. कुछ अलग-थलग शब्द जो सुनाई पड़े वे थे:

 “कसम खाकर कहता हूँ! सादोवाया पर...सादोवाया पर...” बोबा ने आवाज़ और नीची करते हुए कहा, “गोलियाँ नहीं लग रहीं! गोलियाँ...गोलियाँ...तेल... तेल, आग... गोलियाँ...”

 “ऐसे झूठों को, जो ऐसी गन्दी अफ़वाहें फैलाते हैं,” गुस्से में मैडम पेत्राकोवा कुछ ऊँची, भारी आवाज़ में, जैसी बोबा नहीं चाहता था, बोल पड़ी, “उनकी तो ख़बर लेनी चाहिए! ख़ैर, कोई बात नहीं, ऐसा ही होगा, उन्हें सबक सिखाया ही जाएगा! ओह, कैसे ख़तरनाक झूठे हैं!”

 “कहाँ के झूठे, अंतोनीदा पोर्फिरेव्ना!” लेखक की पत्नी के अविश्वास दिखाने से उत्तेजित और आहत होकर बोबा चिल्लाया, और फुसफुसाते हुए बोला, “मैं कह रहा हूँ आपसे, गोलियों से कोई फ़ायदा नहीं हो रहा...और अब आग...वे हवा में...हवा में... “ बोबा कहता रहा, बिना सोचे-समझे कि जिनके बारे में वह बता रहा है, वे उसकी बगल में ही बैठे हैं, और उसकी सीटियों जैसी फुसफुसाहट का आनन्द ले रहे हैं. मगर यह आनन्द जल्दी ही समाप्त हो गया.

रेस्तराँ के अन्दरूनी भाग से तीन व्यक्ति बरामदे में आए. उनके बदन पर कई पट्टे कसे हुए थे. हाथों में रिवॉल्वर थे. सबसे आगे वाले ने गरजते हुए कहा, “अपनी जगह से हिलो मत!” और फौरन उन तीनों ने बरामदे में कोरोव्येव और बेगेमोत के सिर को निशाना बनाते हुए गोलीबारी शुरू कर दी. गोलियाँ खाकर वे दोनों हवा में विलीन हो गए, और स्टोव से आग की एक लपट उस शामियाने में उठी जहाँ रेस्तराँ था. काली किनार वाला एक विशाल फन मानो शामियाने में प्रकट हुआ और चारों ओर फैलने लगा. आग की लपटें ऊँची होकर ग्रिबोयेदोव भवन की छत तक पहुँचने लगीं. दूसरी मंज़िल पर सम्पादक के कमरे में रखी फाइलें भभक उठीं; उसके बाद लपटों ने परदों को दबोच लिया, फिर आग भीषण रूप धारण कर बुआजी वाले मकान में घुस गई, मानो उसे कोई हवा दे रहा हो.

कुछ क्षणों बाद सीमेण्ट वाले रास्ते पर, आधा खाना छोड़कर लेखक, बेयरे, सोफ्या पाव्लोव्ना, बोबा, पेत्राकोवा और पेत्राकोव भाग रहे थे. यह वही रास्ता है जो लोहे की जाली तक जाता है, और जहाँ से बुधवार की शाम को इस दुर्भाग्य की प्रथम सूचना देने वाला अभागा इवानूश्का आया था, और जिसे कोई समझ नहीं पाया था.

समय रहते पिछले दरवाज़े से बिना जल्दबाज़ी किए निकला आर्किबाल्द आर्किबाल्दोविच – जलते हुए जहाज़ के कप्तान की तरह, जो सबसे अंत में जहाज़ छोड़ता है. वह अपना रेशमी अस्तर का कोट पहने था और बगल में दो मछलियों वाला पैकेट दबाए था.

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

Discussion on Master & Margarita(Hindi)-Chapter 27


 अध्याय – 27

फ्लैट नं. 50 का अंत

 अब हम मॉस्को में घटित हो रहे प्रसंगों की ओर लौटते हैं और यह वापसी भी बड़ी सहजता से होती है....पिछले अध्याय के अंतिम वाक्य से यह अध्याय आरम्भ होता है. अब हम समझ गए हैं कि बुल्गाकोव ने हमेशा यह बताने की कोशिश की है कि दोनों काल खण्ड एक ही हैं, उन्हें अलग करने वाली रेखा इतनी महीन है कि वह लगभग लुप्त हो जाती है!

तो, मास्टर और मार्गारीटा अर्बात वाले मकान के तहख़ाने में वापस आ गए हैं, मार्गारीटा मास्टर के उपन्यास की अपनी सबसे प्रिय पंक्तियाँ पढ़ रही थी और जब तक मार्गारीटा अध्याय के आखिरी शब्दों  “... इस तरह निसान माह की पन्द्रहवीं तिथि की सुबह का स्वागत किया जूडिया के पाँचवें न्यायाधीश पोंती पिलात ने,” तक पहुँची, सुबह हो चुकी थी.
 मार्गारीटा का दिल और दिमाग बिल्कुल ठीक-ठाक थे. उसके ख़याल इधर-उधर भटक नहीं रहे थे, उसे ज़रा भी आश्चर्य नहीं हो रहा था कि रात उसने अत्यंत अद्भुत ढंग से गुज़ारी है. शैतान के नृत्योत्सव में अपनी उपस्थिति की यादें उसे परेशान नहीं कर रही थीं. वह इस बात से भी विस्मित नहीं थी कि किस आश्चर्यजनक तरीके से उसका मास्टर उसे लौटा दिया गया था; कि अँगीठी से उपन्यास निकल आया था; कि उस तहख़ाने में सब कुछ अपनी पूर्व स्थिति में था, जहाँ से चुगलखोर अलोइज़ी मोगारिचको निकाल दिया गया था. संक्षेप में वोलान्द से हुई मुलाकात का उस पर कोई मानसिक असर नहीं हुआ. सब कुछ वैसा ही था जैसा होना चाहिए था.
वह बगल वाले कमरे में गई, इस बात का इत्मीनान कर लिया कि मास्टर गहरी और शांत नींद में सोया है, अनावश्यक टेबुल लैम्प बुझा दिया और स्वयँ भी सामने की दीवार से लगे दीवान पर लेट गई, जिस पर फटी पुरानी चादर पड़ी हुई थी. एक मिनट बाद ही उसकी आँख लग गई और इस सुबह को उसने कोई सपना नहीं देखा. तहख़ाने के दोनों कमरे ख़ामोश थे, कॉन्ट्रेक्टर का छोटा सा मकान चुप था, उस बंद गली में भी सब कुछ सुनसान था.

मगर इस समय, यानी शनिवार की सुबह मॉस्को के एक दफ़्तर वाली पूरी मंज़िल जाग रही थी. बड़े, सिमेंट के चौक में खुलने वाली उसकी खिड़कियाँ, जिन्हें  इस समय बड़ी-बड़ी विशेषा गाड़ियाँ हल्की-हल्की बुदबुदाहट के साथ ब्रशों की सहायता से साफ कर रही थीं, पूरी रोशनी से चमक रही थी और उगते हुए सूरज की रोशनी को काट रही थी.
पूरी मंज़िल वोलान्द वाले मामले की छानबीन में व्यस्त थी. दफ़्तर के दसियों कमरों में रात भर बत्तियाँ जलती रही थीं.
असल में मामला पिछले दिन, शुक्रवार को ही प्रकाश में आ गया था, जब पूरी व्यवस्थापकों की टोली गायब हो जाने के बाद और काले जादू के उस मशहूर शो के बाद हुई ऊटपटाँग घटनाओं के फलस्वरूप वेराइटी थियेटर को बंद कर देना पड़ा था. मगर ख़ास बात यह थी कि तब से अब तक लगातार एक के बाद एक अजीबोग़रीब घटनाओं की सूचना इस निद्राहीन मंज़िल पर आती जा रही थी.
अब विशेषज्ञ इस विचित्र मामले की सभी शैतानी, सम्मोहनकारी, चोरी-बेईमानी भरी, उलझन में डालने वाली, मॉस्को के विभिन्न भागों में घटने वाली घटनाओं को एक कड़ी में पिरोने का प्रयत्न कर रहे थे.
सबसे पहला व्यक्ति, जिसे इस निद्राहीन, बिजली की रोशनी से जगमगाती मंज़िल पर बुलाया गया, वह था ध्वनिसंयोजक समिति का प्रमुख अर्कादी अपोलोनोविच सिम्प्लेयारोव.
पूरी शाम अर्कादी अपोलोनोविच ने उसी मंज़िल पर गुज़ारी जहाँ जाँच-पड़ताल जारी थी. तकलीफदेह बातचीत लम्बी खिंच रही थी...अत्यंत अप्रिय थी यह बातचीत. सब कुछ सच-सच बताना पड़ा था, न केवल उस घृणित कार्यक्रम के बारे में और बॉक्स में हुए झगड़े के बारे में, बल्कि बातों-बातों में वह भी बताना पड़ा जो वाकई में ज़रूरी था; एलोखोव्स्काया मार्ग पर रहने वाली मिलित्सा अन्द्रेयेव्ना पाकोबात्का के बारे में, सरातोव वाली भतीजी के बारे में, और भी बहुत कुछ जिसे बताते हुए अर्कादी अपोलोनोविच को अवर्णनीय दुःख हो रहा था.

ज़ाहिर है कि अर्कादी अपोलोनोविच ने, जो एक बुद्धिमान और सुसंस्कृत व्यक्ति था; जो उस ऊलजलूल शो का गवाह था; जो हर बात भली भाँति परख सकता था, इस शो का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया; उस रहस्यमय जादूगर का जो नकाब पहने था, और उसके दोनों साथियों का भी; उसे अच्छी तरह याद था कि उस जादूगर का नाम वोलान्द था. इन गवाहियों ने खोज को आगे बढ़ाने में काफी मदद की. अर्कादी अपोलोनोविच की गवाहियों की अन्य लोगों द्वारा बताई गई बातों से तुलना करने पर, ख़ासकर ऐसी महिलाओं की बातों से जो शो के बाद काफी परेशान हुई थीं (वह, जो बैंगनी रंग के अंतर्वस्त्रों में थी, जिसने रीम्स्की को चौंका दिया था, और, और भी अनेक औरतें), पत्रवाहक कार्पोव की कथा से जो सादोवायाके फ्लैट नं. 50 में भेजा गया था – यह बात निश्चित हो गई, कि किस जगह पर इन सब चमत्कारों के लिए दोषी व्यक्ति को खोजा जा सकता है.

फ्लैट नं. 50 में भी गए, एक बार नहीं, कई बार और न केवल उसे भली भाँति देखा गया, बल्कि दीवारों को भी ठोक-ठोककर देखा गया , अँगीठी से ऊपर जाते धुएँ के पाइप तलाशे गए, गुप्त स्थान ढूँढ़े गए, मगर इन सबसे कोई नतीजा नहीं निकला और एक भी बार उस फ्लैट में कोई भी नहीं मिला, हालाँकि यह बात लगातार महसूस हो रही थी कि फ्लैट में कोई है ज़रूर; जबकि वे सभी व्यक्ति जो मॉस्को में आने वाले विदेशियों के बारे में जानकारी रखते थे बता रहे थे कि वोलान्द नामक कोई भी काले जादू का जादूगर मॉस्को में नहीं है और हो भी नहीं सकता.

सचमुच, उसने आने पर कहीं भी अपना नाम नहीं लिखवाया था, किसी को अपना पासपोर्ट या अन्य कोई दस्तावेज़ नहीं दिखाया था; कोई अनुबंध, कोई समझौता...कुछ भी नहीं और किसी ने भी उसके बारे में कुछ भी सुना नहीं था! थियेटरों की प्रोग्राम संयोजन समिति का प्रमुख कितायेत्सेव कसम खाकर, हाथ जोड़कर कह रहा था कि गायब हो चुके स्त्योपा लिखोदेयेव ने वोलान्द के प्रोग्राम से सम्बंधित कोई भी प्रस्ताव पुष्टि के लिए उसके पास नहीं भेजा था, ना ही उस वोलान्द के आगमन के बारे में कितायेत्सेव को उसने कोई टेलिफोन ही किया था. इसलिए कितायेत्सेव को कुछ समझ में नहीं आ रहा और न ही कुछ मालूम है कि स्त्योपा वेराइटी थिएटर में ऐसे कार्यक्रम का संयोजन कैसे कर सका. जब यह बताया गया कि अर्कादी अपोलोनोविच ने अपनी आँखों से इस जादूगर का कार्यक्रम देखा है, तो कितायेत्सेव ने हाथ नचाते हुए आकाश की ओर नज़रें गडा दीं. कितायेत्सेव की पारदर्शी काँच की तरह आँखों की ओर देखने मात्र से ही यह पता चलताथा कि वह निर्दोष और साफ़ है.
प्रोखोर पेत्रोविच जो पुलिस के प्रवेश करते ही अपने सूट में वापस लौट आया था, कुछ भी न बता सका.
रीम्स्की को लेनिनग्राद में ढूँढ़ लिया गया, उसने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया; उसे कड़ी सुरक्षा में मॉस्को लाया गया; लिखोदेयेव भी याल्टा से हवाई जहाज़ में बैठकर मॉस्को आ गया...वारेनूखा को दो दिन ढूँढ़ लिया गया.
अज़ाज़ेलो को दिए गए आश्वासन के बावजूद कि वह कभी झूठ नहीं बोलेगा, व्यवस्थापक ने झूठ से ही शुरुआत की. हालाँकि इसके लिए उसे अत्यंत कठोर दण्ड देना ठीक नहीं, क्योंकि अज़ाज़ेलो ने उसे टेलिफोन पर झूठ बोलने और दादागिरी करने से मना किया था और इस वक्त व्यवस्थापक टेलिफोन पर नहीं बोल रहा था. आँखें झपकाते हुए इवान सावेल्येविच ने बताया कि गुरुवार को दिन में थियेटर के अपने कमरे में अकेले बैठकर उसने खूब शराब पी, उसके  बाद वह कहीं चला गया, मगर कहाँ – यह उसे याद नहीं. कहीं और भी पुरानी शराब पी, मगर कहाँ – याद नहीं. फिर कहीं गिर पड़ा, किसी आँगन के पास, मगर कहाँ – यह भी याद नहीं. मगर जब व्यवस्थापक से कहा गया कि वह अपनी इस बेवकूफी भरी ऊटपटाँग हरकत से एक महत्वपूर्ण मामले की जाँच में बाधा डाल रहा है और इसकी ज़िम्मेदारी उसी पर होगी, तो वारेनूखा रो पड़ा और थरथराते गले से कसमें खाते हुए उसने फुसफुसाते हुए कहा कि झूठ सिर्फ डर के मारे बोल रहा है, क्योंकि उसे डर है कि वोलान्द की मण्डली उससे ज़रूर बदला लेगी, जिनके हाथों में वह पहले ही पड़ चुका है, और वह विनती करता है, प्रार्थना करता है कि उसे बुलेट प्रूफ सुरक्षित कमरे में बन्द रखा जाए.
साथ ही वेराइटी के बाहर, मॉस्को के अन्य स्थानों पर घटित घटनाओं की भी जाँच करनी थी. ‘सुन्दर सागर’ वाली घटना के पीछे क्या कारण था, जिसे दर्शक कमिटी के सभी कर्मचारी गा रहे थे, यह भी समझाना था (यह बता दूँ कि प्रोफेसर स्त्राविन्स्की ने कोई इंजेक्शन देकर दो घण्टों के अन्दर उन्हें ठीक कर दिया था), उन व्यक्तियों का पता लगाना ज़रूरी था जो पैसों के नाम पर दूसरे व्यक्तियों या संस्थाओं को शैतान जाने क्या दे रहे थे, और साथ ही उनका भी जिन्हें इन हरकतों से नुक्सान उठाना पड़ा था.
इन सभी घटनाओं में सबसे अधिक अप्रिय, लफ़ड़े वाली और न सुलझ सकने वाली घटना थी, ग्रिबोयेदोव हॉल में कॉफ़िन में रखे साहित्यिक बेर्लिओज़ के मृत शरीर से उसके सिर का चुरा लिया जाना., जो दिन-दहाड़े हुई थी.
बारह व्यक्तियों की जाँच समिति पूरे मॉस्को में बिखरे इस कठिन मामले की विभिन्न कड़ियाँ समेटने में लगी थी.
एक जाँचकर्ता प्रोफेसर स्त्राविन्स्की के अस्पताल में पहुँच गया और सबसे पहले उसने उन लोगों की लिस्ट दिखाने के लिए कहा, जो पिछले तीन दिनों में अस्पताल में लाए गए थे . इस तरह निकानोर इवानोविच बासोय और मुसीबत का मारा सूत्रधार, जिसका सिर उखाड़ दिया गया था, नज़र आए. उनकी तरफ, न जाने क्यों, काफी कम ध्यान दिया गया. अब यह साबित करना आसान था कि ये दोनों एक ही गुट का शिकार हुए थे, जिसका नेतृत्व वह रहस्यमय जादूगर कर रहा था. मगर इवान निकोलायेविच बेज़्दोम्नी ने जाँचकर्ता को काफ़ी आकर्षित किया.
इवान अब अपने आसपास घटित हो रही घटनाओं से उदासीन था, मगर फिर भी उसने बेर्लिओज़ की मृत्यु का सही-सही विवरण दिया.
हाँ, सुबूत काफ़ी इकट्ठे हो चुके थे, यह भी ज्ञात हो चुका था कि किसे पकड़ना है और कहाँ पकड़ना है. मगर बात यह थी कि पकड़ना सम्भव ही नहीं हो पा रहा था. उस त्रिवार शापित फ्लैट नं. 50 में, अवश्य ही, हम फिर से दुहराएँगे, कोई मौजूद था. कभी-कभी इस फ्लैट से टेलिफोन की घंटियों का भर्राई या चिरचिरी आवाज़ में जवाब दिया जाता, कभी-कभी फ्लैट की खिड़की खोली जाती; कमाल की बात यह थी कि उससे हार्मोनियम की आवाज़ सुनाई देती. मगर फिर भी, हर बार, जब उसमें कोई जाता, तो वहाँ किसी को न पाता; और वहाँ कई बार, दिन के अलग-अलग वक़्त पर गए. फ्लैट में जाली लेकर गए, सभी कोनों के जाँच की गई. यह फ्लैट काफी समय से सन्देहास्पद बना हुआ था. न केवल उस रास्ते पर नज़र रखी जा रही थी, जो गली के नुक्कड़ से आँगन तक आता था, बल्कि गुप्त दरवाज़े की भी निगरानी की जा रही थी. इतना ही नहीं, छत पर निकलने वाली धुएँ की चिमनियों के पास भी पहरा लगा दिया गया था. हाँ, फ्लैट नं. 50 शरारतें किए जा रहा था, मगर उसके साथ कुछ भी करना असम्भव हो गया था.
इस तरह यह काम लम्बा खिंचता गया, शुक्रवार से शनिवार आधी रात तक, जब सामंत मायकेल अपनी शाम की पार्टियों वाली पोषाक पहने, चमकीले जूते डाले मेहमान बनकर फ्लैट नं.50 में जा रहा था. सुनाई पड़ रहा था कि सामंत को किस तरह फ्लैट के अन्दर लिया गया. इसके ठीक दस मिनट बाद, बगैर घण्टी बजाए, फ्लैट को छान मारा गया, मगर उसमें मेज़बान मालिक मिला ही नहीं. आश्चर्य की बात तो यह थी कि सामंत मायकेल का भी वहाँ कोई नामोनिशान नहीं मिला.
अन्नूश्का को उस समय गिरफ़्तार  किया गया जब वह अर्बात के एक डिपार्टमेंटल स्टोर में कैशियर को दस डॉलर्स का नोट थमा रही थी. अन्नूश्का की कहानी – सादोवाया बिल्डिंग की खिड़की से उड़कर बाहर जाते हुए लोगों के बारे में और घोड़े की नाल के बारे में, जिसे अन्नूश्का के अनुसार उसने इसलिए उठाया था कि उसे पुलिस में जमा कर सके, बड़े ध्यान से सुनी गई.
 “क्या घोड़े की नाल सचमुच सोने की थी और उस पर हीरे जड़े हुए थे?” अन्नूश्का से पूछा गया.
 “जैसे कि मैं हीरे-वीरे नहीं पहचानती,” अन्नूश्का ने जवाब दिया.
 “मगर जैसे आपने बताया, उसने आपको दस रूबल्स के नोट दिए थे.”
 “जैसे कि मैं दस रूबल के नोट नहीं जानती!” अन्नूश्का ने कहा.
 “मगर वे डॉलर्स में कब बदल गए?”
 “मैं कुछ नहीं जानती, कहाँ के डॉलर्स, कैसे डॉलर्स, मैंने कोई डॉलर-वॉलर नहीं देखे,” अन्नूश्का ने उत्तेजित होकर कहा, “हम अपने अधिकार का उपयोग कर रहे थे! हमें इनाम दिया गया , हम कपड़ा ख़रीदने गए...” और उसने कहा कि वह हाउसिंग सोसाइटी के किसी भी काम के लिए ज़िम्मेदार नहीं है, जिसने पाँचवी मंज़िल पर शैतानों को पाल रखा है, जिससे जीना मुश्किल हो रहा है.
अब जाँचकर्ता ने पेन के इशारे से उसे चुप रहने को कहा, क्योंकि वह सबको बहुत तंग कर चुकी थी. उसे हरे कागज़ पर बिल्डिंग से बाहर जाने का अनुमति-पत्र लिखकर दे दिया. इसके बाद सबको राहत देती हुई अन्नूश्का उस बिल्डिंग से गायब हो गई.
इसके बाद अन्य अनेक लोगों से पूछताछ की गई, जिनमें निकोलाय इवानोविच भी था, जो अपनी ईर्ष्यालु बीवी की बेवकूफी के कारण पकड़ा गया, जिसने सुबह पुलिस में रिपोर्ट लिखाई थी, कि उसका पति गायब हो गया है. निकोलाय इवानोविच के बयान से समिति को कोई आश्चर्य नहीं हुआ, जब उसने शैतान के नृत्योत्सव में गुज़ारी गई रात के बारे में फूहड़-सा सर्टिफिकेट पेश किया. अपनी कहानियों में कि वह कैसे हवा में उड़ते हुए अपनी पीठ पर मार्गारीटा निकोलायेव्ना की नग्न नौकरानी को न जाने कहाँ, सब शैतानों के साथ नहाने के लिए नदी पर ले गया, और इससे पूर्व कैसे उसने खिड़की में नग्न मार्गारीटा निकोलायेव्ना को देखा – निकोलाय इवानोविच सत्य से कुछ दूर हट गया था.

लगभग चार बजे, गर्मियों की उस दोपहर में, सरकारी यूनिफ़ॉर्म पहने एक बहुत बड़ा आदमियों का दल तीन गाड़ियों से सादोवाया की बिल्डिंग नं. 302 के नज़दीक उतरा. यह बड़ा दल दो छोटे दलों में बँट गया, जिनमें से एक, गली के मोड़ से आँगन में होते हुए छठे प्रवेश द्वार में घुसा; और दूसरे ने अक्सर बन्द रहने वाला छोटा दरवाज़ा खोला, जो चोर दरवाज़े तक ले जाता था. ये दोनों दल अलग-अलग सीढ़ियों से फ्लैट नं. 50 की ओर चले.
 अब तक सीढ़ियाँ चढ़ने वाले तीसरी मंज़िल पर पहुँच चुके थे. वहाँ पानी का नल ठीक करने वाले दो प्लम्बर बिल्डिंग गरम करने वाले पाइप की मरम्मत कर रहे थे. आने वालों ने अर्थपूर्ण नज़रों से पाइप ठीक करने वालों की ओर देखा.
 “सब घर पर ही हैं,” उनमें से एक नल ठीक करने वाला बोला, और हथौड़े से पाइप पर खट्खट् करता रहा.
तब आने वालों में से एक ने अपने कोट की जेब से काला रिवॉल्वर निकाला और दूसरे ने, जो उसके निकट ही था, निकाली ‘मास्टर की’. फ्लैट नं. 50 में प्रवेश करने वाले आवश्यकतानुसार हथियारों से लैस थे. उनमें से दो की जेबों में थीं आसानी से मुड़ने वाली महीन, रेशमी जालियाँ, और एक के पास था – बड़ा-सा चिमटा, तो दूसरा लिए था – मास्क और क्लोरोफॉर्म की नन्ही-नन्ही बोतलें.
एक ही सेकण्ड में फ्लैट नं. 50 का दरवाज़ा खुल गया और सभी आए हुए लोग प्रवेश-कक्ष में घुस गए. रसोई के धम्म से बन्द हुए दरवाज़े ने यह साबित कर दिया कि दूसरा गुट भी ठीक समय पर चोर-दरवाज़े से फ्लैट के अन्दर दाखिल हो चुका है.
इस समय शत-प्रतिशत नहीं तो कुछ अंशों में सफलता मिलती दिखाई दी. फौरन सभी कमरों में ये लोग बिखर गए, और कहीं भी, किसी को भी न पा सके, मगर डाइनिंग हॉल में अभी-अभी छोड़े नाश्ते के चिह्न ज़रूर मिले; और ड्राइंगरूम में फायर प्लेस के ऊपर की स्लैब पर क्रिस्टल की सुराही की बगल में विशालकाय काला बिल्ला बैठा हुआ मिला. उसने अपने पंजों में स्टोव पकड़ रखा था.
बिल्ले और इस टीम के सदस्यों के बीच भयानक गोलीबारी होती है, मगर आश्चर्य की बात यह थी कोई भी घायल नहीं हो रहा था.
सूरज डूबने वाला है
बिल्ले को पकड़ने की एक और कोशिश की गई. एक फँदा फेंका गया जो एक मोमबत्ती में जाकर फँसा, झुम्बर नीचे आ गया. उसकी झनझनाहट ने पूरी बिल्डिंग को झकझोर कर रख दिया, मगर इससे कोई लाभ नहीं हुआ. वहाँ मौजूद लोगों पर काँच के टुकड़ों की बौछार हुई, और बिल्ला हवा में उड़कर ऊपर, अँगीठी के ऊपर जड़े शीशे की सुनहरी फ्रेम के ऊपरी हिस्से पर जा बैठा. वह कहीं भी जाने को तैयार नहीं था और, उल्टे आराम से बैठे-बैठे, एक और भाषण देने लगा : “मैं ज़रा भी समझ नहीं पा रहा हूँ...” वह ऊपर से बोला, “कि मेरे साथ हो रहे इस ख़तरनाक व्यवहार का कारण क्या है?”

तभी इस भाषण के बीच ही में टपक पड़ी एक भारी, निचले सुर वाली आवाज़, “फ्लैट में यह क्या हो रहा है? मुझे आराम करने में परेशानी हो रही है.”

एक और अप्रिय नुकीली आवाज़ ने कहा, “यह ज़रूर बेगेमोत ही है, उसे शैतान ले जाए!”

तीसरी गरजदार आवाज़ बोली, “महाशय! शनिवार का सूरज डूब रहा है. हमारे जाने का समय हो गया.”

 “माफ़ करना, मैं आपसे और बातें नहीं कर सकूँगा,” बिल्ले ने आईने के ऊपर से कहा, “हमें जाना है.” उसने अपनी पिस्तौल फेंककर खिड़की के दोनों शीशे तोड़ दिए. फिर उसने तेल नीचे गिरा दिया, और यह तेल अपने आप भभक उठा. उसकी लपट छत तक जाने लगी.

सब कुछ बड़े अजीब तरीके से जल रहा था, अत्यंत द्रुत गति से और पूरी ताकत से, जैसा कभी तेल के साथ भी नहीं होता. देखते-देखते वॉल पेपर जल गया, फटा हुआ परदा जल गया जो फर्श पर पड़ा था और टूटी हुई खिड़कियों की चौखटें पिघलने लगीं. बिल्ला उछल रहा था, म्याँऊ-म्याऊँ कर रहा था. फिर वह आईने से उछलकर खिड़की की सिल पर गया और अपने स्टोव के साथ उसके पीछे छिप गया. बाहर गोलियों की आवाज़ें गूँज उठीं. सामने, जवाहिरे की बीवी के फ्लैट की खिड़कियों के ठीक सामने, लोहे की सीढ़ी पर बैठे हुए आदमी ने बिल्ले पर गोलियाँ चलाईं, जब वह एक खिड़की से दूसरी खिड़की फाँदते हुए बिल्डिंग के पानी के पाइप की ओर जा रहा था. इस पाइप से बिल्ला छत पर पहुँचा.

यहाँ भी उसे वैसे ही, ऊपर पाइपों के निकट तैनात दल द्वारा, बिना किसी परिणाम के गोलियों से दागा गया और बिल्ला शहर को धूप में नहलाते डूबते सूरज की रोशनी में नहा गया.

फ्लैट के अन्दर मौजूद लोगों के पैरों तले इस वक़्त फर्श धू-धू कर जलने लगा, और वहाँ जहाँ नकली ज़ख़्म से आहत होकर बिल्ला गिर पड़ा था, वहाँ अब शीघ्रता से सिकुड़ता हुआ भूतपूर्व सामंत का शव दिखाई दे रहा था, पथराई आँखों और ऊपर उठी ठुड्डी के साथ. उसे खींचकर निकालना अब असम्भव हो गया था. फर्श की जलती स्लैबों पर फुदकते, हथेलियों से धुएँ में लिपटे कन्धों और सीनों को थपथपाते, ड्राइंगरूम में उपस्थित लोग अब अध्ययन-कक्ष और प्रवेश-कक्ष में भागे. वे, जो शयन-कक्ष और डाइनिंग रूम में थे, गलियाए से होते हुए भागे. वे भी भागे जो रसोईघर में थे. सभी प्रवेश-कक्ष की ओर दौड़े. ड्राइंगरूम पूरी तरह आग और धुएँ से भर चुका था. किसी ने भागते-भागते अग्निशामक दल का टेलिफोन नम्बर घुमा दिया और बोला, “सादोवाया रास्ता, तीन सौ दो बी!”

और ठहरना सम्भव नहीं था. लपटें प्रवेश-कक्ष तक आने लगीं. साँस लेना मुश्किल हो चला.

जैसे ही उस जादुई फ्लैट की खिड़कियों से धुएँ के पहले बादल निकले, आँगन में लोगों की घबराई हुई चीखें सुनाई दीं:

 “आग, आग, जल रहे हैं!”

बिल्डिंग के अन्य फ्लैट्स में लोग टॆलिफोनों पर चीख रहे थे, “ सादोवाया, सादोवाया, तीन सौ दो बी!”

उस वक्त जब शहर के सभी भागों में लम्बी-लम्बी लाल गाड़ियों की दिल दहलाने वाली घंटियाँ सुनाई देने लगीं, आँगन में ठहरे लोगों ने देखा कि धुएँ के साथ-साथ पाँचवीं मंज़िल की खिड़की से पुरुषों की आकृति के तीन काले साए तैरते हुए बाहर निकले, इनके साथ एक साया नग्न महिला की आकृति का भी था.