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शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

The Fateful Eggs - 8

अध्याय 8

सोव्खोज़ (सोवियत फार्म) में काण्ड
 

कम से कम स्मोलेन्स्क प्रांत में बीच-अगस्त के मौसम से शानदार कोई और मौसम हो ही नहीं सकता. सन् 1928 की गर्मियाँ, जैसा कि ज्ञात है, सबसे शानदार थीं, बसंत की बारिश सही समय पर हुई थी, कड़ी धूप थी, फ़सल भी बेहद बढ़िया हुई थी...शेरेमेत्येवों की भूतपूर्व जागीर में सेब पक रहे थे, जंगलों पर हरियाली छा रही थी, चौकोर खेत सुनहरे-पीले हो चुके थे..प्रकृति की गोद में इन्सान भी बेहतर हो जाता है. और अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच भी उतना बदसूरत नहीं लग सकता था, जैसा वह शहर में प्रतीत हो रहा था. वो घिनौना जैकेट भी अब उस पर नहीं था. चेहरा तांबे जैसा चमक रहा था, खुली हुई फूलदार कमीज़ के भीतर से उसका घने काले बालों से ढँका सीना दिखाई दे रहा था, उसने नई कैनवास की पतलून पहनी थी. और उसकी आँखों से शांति और दया छलक रही थी.
स्तम्भों वाले पोर्च से निकल कर, जिस पर सितारे के नीचे बैनर लगा था:
 ‘सोव्खोज़ (सोवियत फ़ार्म)’ ‘लाल किरण’
अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच उत्तेजना से ट्रक की ओर भागा, जो सुरक्षा-गार्डों की निगरानी में तीन काले चैम्बर्स लाए थे.
 भूतपूर्व शिशिर-उद्यान – शेरेमेत्येवों के ग्रीन-हाऊस - में चैम्बर्स फिक्स करने की गड़बड़ में अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच अपने सहायकों के साथ पूरे दिन भागदौड़ करता रहा... शाम होते-होते सब तैयार हो गया. काँच की छत के नीचे सफ़ेद मटमैला लैम्प जल उठा, ईंटों पर चैम्बर्स रख दिए गए, और चैम्बर्स के साथ आए हुए मैकेनिक ने चमकदार स्क्रूज़ को थपथपाकर, इधर-उधर घुमाकर काले डिब्बों के एस्बेस्टस के फर्श पर रहस्यमय लाल किरण जला दी.
अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच भाग-दौड़ करता रहा, सीढ़ी पर चढ़कर जाँच करता रहा कि तार ठीक से लगे हैं या नहीं.                  
दूसरे दिन वही ट्रक स्टेशन से लौटा और बढ़िया प्लायवुड के तीन खोके उतारे, जिन पर तरह तरह के लेबल्स चिपके हुए थे और काली पृष्ठभूमि पर सफ़ेद अक्षरों वाले नोटिस लगे थे:
  
VORSICHT: EIER!!
सावधान: अंडे!!
                          
“ये इतने कम क्यों भेजे हैं?” अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच को अचरज हुआ, मगर वह फ़ौरन उन्हें खोलने में लग गया. अण्डे बाहर निकालने का काम उसी ग्रीन-हाऊस में किया गया, और इसमें शामिल थे: ख़ुद अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच, उसकी असाधारण रूप से मोटी बीबी मान्या, भूतपूर्व शेरेमेत्येवों का भूतपूर्व काणा गार्डनर, जो अब सोव्खोज़ में हरफ़नमौला चौकीदार का काम करता था, और झाडू लगाने वाली दून्या. ये मॉस्को नहीं था, और यहाँ हर चीज़ सीधी-सादी, दोस्ताना और पारिवारिक भावना लिए हुए थी. अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच प्यार से उन खोकों की ओर देखते हुए निर्देश दे रहा था, जो ग्रीन-हाऊस की काँच की छत के नीचे फैले सूर्यास्त के नर्म-मद्धिम प्रकाश में किसी ज़बर्दस्त उपहार जैसे प्रतीत हो रहे थे. चौकीदार, जिसकी संगीन दरवाज़े के पास मीठी नींद ले रही थी, प्लायर्स की सहायता से धातु की पट्टियाँ और क्लिप्स निकाल रहा था. चरमराहट हो रही थी...धूल गिर रही थी. अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच अपने सैण्डिल्स खटखटाते हुए खोकों के पास भाग दौड़ कर रहा था.
 “धीरे से, प्लीज़,” वह चौकीदार से बोला. “और ज़्यादा सावधानी से. क्या देख नहीं रहे हो – अण्डे हैं?...”
 “कोई बात नहीं,” कस्बाई योद्धा चहकते हुए भर्राया, “ बस, अभी हो जाता है...”
 टर्-र्-र्... और धूल गिरने लगी.
अण्डे एकदम ‘सुपर’ तरीक़े से रखे गए थे: लकड़ी के ढक्कन के नीचे मोमजामे वाले कागज़ की तह थी, इसके नीचे ब्लॉटिंग पेपर की, इसके नीचे मोटी तह लकड़ी की छीलन की, फिर बुरादा, और उनके बीच से अण्डों के सफ़ेद सिर झाँक रहे थे.
 “विदेशों की पैकिंग है”, भूसे में हाथ डालते हुए अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने प्यार से कहा, “ हमारे जैसी नहीं. मान्या, ध्यान से, तू उन्हें तोड़ देगी.”
 “तुम तो, अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच, पगला गए हो,” पत्नी ने जवाब दिया, “ कौनसा सोना भरा है इनमें. क्या मैंने कभी अण्डे देखे नहीं हैं? ओय!...कितने बड़े-बड़े हैं!”
 “विदेश,” अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने अण्डे लकड़ी की मेज़ पर रखते हुए कहा, “क्या ये हमारे किसानों वाले अण्डे हैं...सब, शायद, ब्रह्मपुत्रा के हैं, शैतान ले जाए! जर्मन...”
 “सही बात है,” अण्डों की ओर प्यार से देखते हुए चौकीदार ने हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा.
 “बस, एक बात समझ नहीं पा रहा हूँ, कि ये इतने गन्दे क्यों हैं,” अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने सोच में पड़ कर कहा.  “मान्या, तुम ज़रा देखना. उन्हें और अण्डे बाहर निकालने दो, और मैं फोन करके आता हूँ.”
और अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच आँगन से होकर सोव्खोज़ के दफ़्तर में फोन करने गया.             
शाम को प्राणि-विज्ञान संस्था की कैबिनेट में टेलिफोन बजने लगा. प्रोफेसर पेर्सिकोव ने अपने बालों में ऊँगलियाँ फेरीं और फोन की ओर आया.
“येस?” उसने पूछा.
“कस्बे से आपके लिए फोन है,” रिसीवर से धीमी फुसफुसाहट में किसी जनानी आवाज़ ने कहा.
 “ठीक है. सुन रहा हूँ,” कुछ हिकारत से पेर्सिकोव ने टेलिफोन के काले मुँह में कहा... उसमें कुछ खट्-खट् हुई, और फिर दूर से आती हुई मर्दानी आवाज़ ने उत्तेजना से कान में कहा:
 “क्या अण्डे धोने हैं, प्रोफेसर?”
 “क्या कहा? क्या? क्या पूछ रहे हैं?” प्रोफेसर चिढ़ गया, “कहाँ से बोल रहे हैं?”
 “निकोल्स्कोए से, स्मोलेन्स्क प्रांत से,” रिसीवर ने जवाब दिया.
 “कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है. मैं किसी निकोल्स्कोए को नहीं जानता. कौन बोल रहा है?”
 “रोक्क,” रिसीवर ने संजीदगी से कहा.
 “कौनसा रोक्क? आह, हाँ...ये आप हैं...तो, आप क्या पूछ रहे थे?”
 “क्या उन्हें धोना पड़ेगा?...मुझे विदेश से मुर्गी के अण्डे भेजे गए हैं...”
 “अच्छा?”
 “...और वे किसी तरह की गन्दगी में लिपटे हैं...”
 “आपको कुछ ग़लतफ़हमी हो रही है...उन पर ‘गन्दगी’ कैसे हो सकती है, जैसा कि आप कह रहे हैं? बेशक, हो सकता है, कि थोड़ा सा कचरा चिपक गया हो...या कोई और चीज़...”
 “तो धोने की ज़रूरत नहीं है?”
 “बेशक, कोई ज़रूरत नहीं है... क्या आप चैम्बर्स में अण्डे रखने भी लगे?”
 “रख रहा हूँ. हाँ,” रिसीवर ने जवाब दिया.
 “हुम्,” प्रोफेसर गुर्राया.
 “ओके,” रिसीवर ने कहा और ख़ामोश हो गया.
 “ठीक है,” बड़ी नफ़रत से प्रोफेसर ने प्राइवेट सहायक-प्रोफेसर इवानोव की ओर देखते हुए दुहराया और पूछा, “आपको ये नमूना कैसे लगा, प्योत्र स्तेपानोविच?”
इवानोव हँस पड़ा.
 “ये ‘वो’ था? मैं कल्पना कर सकता हूँ कि वहाँ वो इन अण्डों का क्या हाल करेगा.”
  “हाँ...हाँ...हाँ...” पेर्सिकोव ने कटुतापूर्वक कहना शुरू किया. “आप कल्पना कीजिए, प्योत्र स्तेपानोविच... ठीक है, बढ़िया है...बहुत मुमकिन है, कि मुर्गियों के अण्डों के ड्यूटेरोप्लाज़्मा पर किरण का वैसा ही प्रभाव हो जैसा कि मेंढ़कों के प्लाज़्मा पर होता है. काफ़ी मुमकिन है कि उसके अण्डों से मुर्गियाँ निकल आएँगी. मगर न तो आप, न ही मैं बता सकते हैं कि वे मुर्गियाँ कैसी होंगी...हो सकता है कि वे किसी भी काम की न हों. हो सकता है कि वे दो दिनों में मर भी जाएँ. हो सकता है, कि उन्हें खाना नामुमकिन हो! और क्या मैं इस बात की ग्यारंटी दे सकता हूँ कि वे अपने पैरों पर खड़ी भी हो पायेंगी या नहीं? हो सकता कि उनकी हड्डियाँ भुरभुरी हों.” पेर्सिकोव तैश में आ गया, और अपनी हथेली नचाने लगा, उँगलियाँ चटख़ाने लगा.
 “बिल्कुल सही है,” इवानोव ने सहमति दर्शाई.
 “क्या आप ग्यारंटी दे सकते हैं, प्योत्र स्तेपानोविच कि उनमें प्रजनन क्षमता होगी? हो सकता है ये बांझ मुर्गियों की किस्म हो. उन्हें कुत्ते जितना बड़ा कर लो और फिर अगली पीढ़ी का इंतज़ार प्रलय तक करते रहो.”
 “ग्यारंटी नहीं दे सकते,” इवानोव की भी यही राय थी.
 “और कैसी बेतकल्लुफ़ी,” पेर्सिकोव गुस्से में आ गया, “कैसी स्मार्टनेस! और मुलाहिज़ा फ़रमाईये, मुझे इस कमीने को निर्देश देना हैं,” पेर्सिकोव ने रोक्क द्वारा दिए गए कागज़ की ओर इशारा किया (वह प्रयोगों वाली मेज़ पर पड़ा था)...और मैं कैसे उस बेवकूफ़ को निर्देश दूँगा, जबकि मैं ख़ुद ही इस बारे में कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूँ.”
 “क्या मना करना संभव नहीं था?” इवानोव ने पूछा.
पेर्सिकोव लाल हो गया, उसने कागज़ उठाया और इवानोव को दिखाया. उसने उसे पढ़ा और व्यंग्य से मुस्कुरा दिया.
 “हुँ..हाँ,” उसने गहरे अंदाज़ में कहा.
 “और, ज़रा मुलाहिज़ा फ़रमाईये...मैं अपने ऑर्डर का दो महीने से इंतज़ार कर रहा हूँ, उसके बारे में कोई ख़बर ही नहीं है. मगर इसे फ़ौरन अण्डे भी भेज दिए और हर तरह की मदद भी मिल गई...”
 “उससे कुछ होने वाला नहीं है, व्लादीमिर इपातिच. आख़िर में आपके चैम्बर्स आपको लौटाने पडेंगे. “
 “बस, जल्दी से लौटा दें, वर्ना मेरे सारे प्रयोग रुके पड़े हैं.”
 “हाँ, ये बड़ी ख़राब बात है. मैंने सारी तैयरियाँ पूरी कर ली हैं.”
 “क्या आपको सुरक्षा-सूट मिल गए हैं?”
 “हाँ, आज आ गए हैं”
पेर्सिकोव कुछ शांत हुआ और उसकी आँखों में कुछ चमक आ गई.
 “हुँ...मेरा ख़याल है कि हम ऐसा करेंगे. प्रयोगशाला के दरवाज़े कस के बन्द कर देंगे और खिड़की हम खोल देंगे...”
 “बेशक,” इवानोव ने सहमति दर्शाई.
 “तीन हेल्मेट्स हैं?”
 “तीन. हाँ.”
 “तो, ऐसा करेंगे...आप तो हैं ही, मैं और विद्यार्थियों में से किसी एक को बुलाया जा सकता है. उसे तीसरा हेल्मेट दे देंगे.”
 “ग्रीनमुत को बुला सकते हैं.”
 “ये वो तो नहीं, जो आपके साथ सैलामैंडर्स पर काम कर रहा है? हुम्...वो ठीक है...मगर, ग़ौर फ़रमाईये, बसंत की परीक्षा में वह ये नहीं बता पाया था कि प्स्युडोटाइफ्लोप्स के एयर-ब्लैडर की संरचना कैसी होती है,” पेर्सिकोव ने कड़वाहट से आगे कहा.
 “नहीं, वह ठीक ही है, वह अच्छा स्टूडेंट है,” इवानोव ने उसकी तरफ़दारी करते हुए कहा.
 “एक रात बिना नींद के गुज़ारनी पड़ेगी,” पेर्सिकोव कहता रहा, “बस, एक बात है, प्योत्र स्तेपानोविच, आप गैस चेक कर लेना, वर्ना शैतान जाने, उनके ये वालंटीयर-केमिस्ट कैसे हैं. न जाने क्या भेज दें.”
 “नहीं, नहीं,” और इवानोव ने हाथ हिलाते हुए कहा, “मैंने कल ही ट्रायल ले लिया था. उनकी तारीफ़ करनी पड़ेगी, व्लादीमिर इपातिच, बेहतरीन किस्म की गैस है.”
 “आपने किस पर ट्रायल लिया था?”
 “साधारण मेंढकों पर. जैसे ही गैस की फ़ुहार छोड़ते हो – फ़ौरन मर जाते हैं. हाँ, व्लादीमिर इपातिच, हम एक काम और कर सकते हैं. आप गेपेऊ को लिखिए कि आपको इलेक्ट्रिक रिवॉल्वर भेजा जाए.”
 “मगर मुझे तो उसका इस्तेमाल करना आता ही नहीं है...”
 “ये आप मुझ पर छोड़ दीजिए,” इवानोव ने जवाब दिया, “हमने क्ल्याज़्मा में उससे फ़ायर किए थे, बस, यूँ ही मज़ाक में...वहाँ मेरी बगल में एक गेपेऊ वाला रहता था...बढ़िया चीज़ है. एकदम बेहतरीन...सौ क़दम की दूरी से बिना आवाज़ के मार गिराती है. हमने कौओं पर चलाई थी...मेरे ख़याल में तो गैस की भी ज़रूरत नहीं है.”
 “हुम्...ये ब्रिलियंट आइडिया है...बेहद...” पेर्सिकोव कोने में गया, रिसीवर उठाया और चहका...
 “मुझे वो दीजिए...क्या कहते हैं...लुब्यान्का...”
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दिन बेहद गर्म थे. खेतों के ऊपर घनी, पारदर्शक गर्मी वातावरण में घुलती हुई साफ़-साफ़ दिखाई दे रही थी. मगर रातें ग़ज़ब की थीं, छलावे जैसी, हरी-हरी. चान्द चमक रहा था और शेरेमेत्येवों की भूतपूर्व जागीर पर ऐसी ख़ूबसूरती बिखेर रहा था कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता. महल-सोव्खोज़ ऐसे चमक रहा था, मानो शक्कर का हो, परछाईयाँ थरथरा रही थीं, और पोखर मानो दो रंगों में बँट गए हों – एक तिरछा चाँद का स्तम्भ और दूसरा आधा अंतहीन अंधेरा. चांद के प्रकाश में आसानी से ‘इज़्वेस्तिया’ पढ़ा जा सकता था, शतरंज वाले स्तम्भ को छोड़कर, जो बहुत छोटी लिखाई में था. मगर ऐसी रातों में, ज़ाहिर है, कोई भी ‘इज़्वेस्तिया’ नहीं पढ़ता...दून्या, सफ़ाई करने वाली, सोव्खोज़ के पीछे वाली बगिया में थी, और, संयोगवश, सोव्खोज़ के ख़स्ताहाल ट्रक का लाल मूंछों वाला ड्राइवर भी वहीं पर था. वे वहाँ क्या कर रहे थे – पता नहीं. वे एल्म की अस्थिर छाया में, सीधे ड्राइवर के बिछाए गए चमड़े के कोट पर दुबके बैठे थे. किचन में लैम्प जल रहा था, वहाँ दो माली खाना खा रहे थे, और मैडम रोक्क, सफ़ेद गाऊन में, स्तम्भों वाले बरामदे में बैठी, ख़ूबसूरत चाँद की ओर देखते हुए सपने देख रही थी.
रात के दस बजे, जब सोव्खोज़ के पीछे वाले कोन्त्सोव्का गाँव में सारी आवाज़ें शांत हो गईं, तो यह अप्रतिम वातावरण बन्सी की शानदार, नाज़ुक स्वरलहरियों से भर गया. वे बागों के और शेरेमेत्येवों के महल के भूतपूर्व स्तम्भों के ऊपर कितनी भली प्रतीत हो रही थीं, इसका बखान करने से कोई लाभ नहीं है. ‘ हुक्म की बेगम’ की नाज़ुक लीज़ा जोशीली पोलिना के साथ अपनी आवाज़ मिलाकर चाँद की ऊँचाई तक यूँ ले जा रही थी, मानो प्राचीन, मगर फिर भी सदा प्यारे, आँसुओं की हद तक सम्मोहित करने वाले जीवन की छवि हो.                       
बुझते हैं...बुझते हैं...
आहें भरते हुए, बन्सी स्वर-लहरियाँ बिखेर रही थी.
बगिया मानो जम गई, और दून्या, वन-देवी जैसी लचीली, ड्राइवर के खुरदुरे, लाल, सोमर्दाने गाल पर अपना गाल टिकाए सुन रही थी. 
 “ये, कम्बख़्त, बन्सी अच्छी बजाता है,” दून्या की कमर में अपना मर्दाना हाथ डालते हुए ड्राइवर ने कहा.
बन्सी ख़ुद सोव्खोज़ का डाइरेक्टर अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच रोक्क बजा रहा था, और मानना पड़ेगा कि बेहद अच्छी बजा रहा था. बात ये थी कि बन्सी ही अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच की विशेषता थी. सन् 1917 तक वह निर्देशक पेतूखोव के प्रसिद्ध कॉन्सर्ट ग्रुप में काम करता था, जो ओडेसा के ‘जादुई सपने’ नामक सिनेमा के प्रवेश-हॉल में हर शाम अपनी स्वर लहरियाँ बिखेरता था. मगर अनेक लोगों के कैरियर को चौपट करने वाला महान सन् 1917 अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच को भी नई राहों पर ले चला. उसने ‘जादुई सपने’ और प्रवेश-हॉल का धूल भरा सितारों जड़ा सैटिन छोड़ दिया और युद्ध एवम् क्रांति के समन्दर में कूद पड़ा, बन्सी के बदले मौत बिखेरने वाले रिवॉल्वर को अपना लिया. लहरों के थपेड़ो ने उसे कई बार उछालकर ला पटका कभी क्रीमिया में, कभी मॉस्को में, तो कभी तुर्किस्तान में, यहाँ तक कि व्लादीवोस्तोक में भी. अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच की सम्पूर्ण योग्यता को प्रकट होने के लिए, कि ये आदमी वाक़ई में महान है, और, बेशक, ‘सपनों’ का प्रवेश-हॉल इसके लिए नहीं है, क्रांति की ही ज़रूरत थी. ज़्यादा विस्तार में न जाते हुए ये कहेंगे कि सन् 1927 के अंत और सन् 1928 के आरंभ में अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने अपने आप को तुर्किस्तान में पाया, जहाँ पहले, वह एक बड़े राजनैतिक-साहित्यिक अख़बार का संपादन करता था, और इसके बाद सर्वोच्च आर्थिक कमिशन के स्थानीय सदस्य के रूप में तुर्किस्तान में सिंचाई से संबंधित अपने आश्चर्यजनक कामों के कारण प्रसिद्ध हो गया. सन् 1928 में रोक्क मॉस्को आया और उसे थोड़ी छुट्टी मिली, जिसका वह वाक़ई में हक़दार था. उस संस्था की सर्वोच्च कमिटी ने जिसका पहचान-पत्र बड़े सम्मान से यह पुराने फ़ैशन का प्रांतीय व्यक्ति लिये-लिये घूमता था, उसकी योग्यता को पहचाना और उसे एक सुकूनभरी और सम्माननीय ज़िम्मेदारी सौंप दी. हाय! हाय! रिपब्लिक की बदकिस्मती से अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच का खदखदाता दिमाग़ शांत नहीं हुआ, मॉस्को में रोक्क का सामना पेर्सिकोव के आविष्कार से हो गया, और त्वेर्स्काया वाले 'लाल पैरिस’ हॉटेल के कमरे में अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच के दिमाग में इस ख़याल ने जन्म लिया कि पेर्सिकोव की किरण की सहायता से एक महीने के भीतर रिपब्लिक में मुर्गी-पालन को पुनर्जीवित किया जाए. क्रेमलिन ने अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच की बात सुनी, क्रेमलिन उसकी बात से सहमत हो गया और रोक्क सनकी प्राणी-वैज्ञानिक के पास पक्का ऑर्डर लेकर आ गया.
शीशे जैसे पारदर्शी जल, क्यारियों और पार्क पर झूमता हुआ यह संगीत अंत की ओर बढ़ ही रहा था कि अचानक कुछ ऐसा हुआ जिसने उसे बीच ही में रोक दिया. ख़ास तौर से कोन्त्सोव्का में कुत्ते, जिन्हें अब तक सो जाना चहिए था, अचानक बेतहाशा भौंकने लगे, जो क्रमशः एक सामूहिक दर्दभरे रुदन में परिवर्तित हो गया. यह रुदन बड़ा होते-होते खेतों पर तैर गया, और रुदन का जवाब पोखरों के मेंढकों की लाखों आवाज़ों ने अपनी टर्राहट वाले संगीत से दिया. यह सब इतना डरावना था कि एक पल को ऐसा लगा जैसे रहस्यमयी जादुई रात बुझ गई है.
अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने बन्सी रख दी और बाहर बरामदे में आया.
 “मान्या. तुम सुन रही हो? ये नासपीटे कुत्ते...क्या सोचती हो, ये, ऐसे पगला क्यों रहे हैं?”
 “मुझे कहाँ से मालूम?” मान्या ने चाँद की ओर देखते हुए जवाब दिया.
 “चलो, मानेच्का, चलकर अण्डों को देखते हैं,” अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने कहा.
 “ऐ ख़ुदा, अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच, तुम अपने अण्डों और मुर्गियों के कारण एकदम पागल हो गए हो. थोड़ा आराम कर लो!”
 “नहीं, मानेच्का, चल, जाएँगे.”
 ग्रीन-हाऊस में प्रखर रोशनी का बल्ब जल रहा था. तमतमाया हुआ चेहरा और चमकती आँखें लिए दून्या भी आई. अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने प्यार से निरीक्षण करने वाली खिड़की को खोला, और सब चैम्बर्स के भीतर देखने लगे. सफ़ेद ऐस्बेस्टस के फर्श पर सही-सही क़तारों में करीने से रखे थे धब्बों वाले चमकीले- लाल अण्डे, चैम्बर्स में निपट ख़ामोशी थी...और ऊपर का 15,000 वाट वाला बल्ब हौले हौले सन्-सन् कर रहा था...
 “ऐह, निकालूँगा मैं चूज़ों को!” जोश में अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने कभी किनारे से, निरीक्षण के लिए बनी झिरियों से, कभी ऊपर से, वेंटीलेटर वाले बड़े-बड़े छेदों से, झाँकते हुए कहा, “देख ही लेना...क्या? नहीं निकालूँगा?”
 “आपको मालूम है, अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच,” दून्या ने मुस्कुराते हुए कहा, “कोन्त्सोव्का के किसान कह रहे थे कि आप एन्टीक्राईस्ट हैं. कहते हैं कि आपके अण्डे शैतानी हैं. मशीनों से चूज़े पैदा करना गुनाह है. आपको ख़त्म करने की सोच रहे थे.”
अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच काँप गया और बीबी की ओर मुड़ा. उसका चेहरा पीला पड़ गया था.
 “ख़ैर, क्या कह सकते हैं? लोग हैं! ऐसे लोगों के साथ आप कर भी क्या सकते हो? हँ? मानेच्का, उनकी एक मीटिंग बुलानी पड़ेगी...कल फोन करके जिले से पार्टी-वर्कर्स को बुलाऊँगा. मैं ख़ुद भी भाषण दे दूँगा. यहाँ, थोड़ा काम करना ही पड़ेगा...वर्ना तो, ये कैसा भालुओं जैसा उजाड़ कोना है...”
“अज्ञान का अंधकार,” ग्रीन-हाऊस के दरवाज़े के पास अपने ओवरकोट पर बैठा गार्ड बुदबुदाया.
अगले दिन की शुरूआत ही अत्यंत विचित्र और अनाकलनीय घटनाओं से हुई. सुबह, सूरज की पहली किरण के साथ ही बगिया, जो अक्सर सूरज का स्वागत पक्षियों की निरंतर चहचहाहट से करतीं थीं, उससे पूरी निःशब्दता से मिलीं. इस बात को सभी ने महसूस किया. ये, जैसे तूफ़ान से पहले की शांति थी. मगर किसी भी तूफ़ान का कोई नामोनिशान नहीं था. सोव्खोज़ में कुछ अजीब तरह की और अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच के लिए दुहरे अर्थ की बातें हो रही थीं, और ख़ास तौर से इसलिए भी कि कोन्त्सोव्का के उपद्रवी एवम् विद्वान, जिसे ‘बकरे की दाढ़ी’ के नाम से जाना जाता था, के अनुसार अगर सारे पंछी झुण्ड बनाकर सुबह होते ही शेरेमेत्योव से कहीं दूर, उत्तर की ओर, चले गए हैं, तो ये बड़ी बेवकूफ़ी भरी बात है. अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच बेहद परेशान हो गया और उसने पूरा दिन फ़ोन पर ग्राचेव में कमिटी से बात करने की कोशिश में बिता दिया. वहाँ से अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच से वादा किया गया कि क़रीब दो दिन बाद दो विषयों पर बोलने के लिए वक्ता भेजेंगे – अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति और ‘वालंटीयर मुर्गियों’ के प्रश्न पर.
शाम को भी अजीब-अजीब घटनाएँ होती रहीं. अगर सुबह बगीचे ख़ामोश हो गए थे, पूरी शिद्दत से यह साबित करते हुए कि पेड़ों के बीच की ख़ामोशी कैसी संदेहास्पद रूप से अप्रिय होती है; अगर दोपहर को सोव्खोज़ के कम्पाऊण्ड से चिड़ियों के झुण्ड कहीं उड़ गए थे; तो शाम को शेरेमेत्योव्का का तालाब भी ख़ामोश हो गया. ये वाक़ई में चौंकाने वाली बात थी, क्योंकि चालीस मील के दायरे में स्थित बस्तियों में रहने वाले सभी को शेरेम्त्योव के मेंढ़कों की टर्राहट चिर-परिचित थी. मगर, अब मानो वे मर गए हों. तालाब से एक भी आवाज़ नहीं आ रही थी, और घास के पौधे भी गुमसुम खड़े थे. मानना पड़ेगा कि अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच पूरी तरह बेचैन हो गया था. इन घटनाओं के बारे में लोग अत्यंत अप्रिय तरीक़े से बहस करते रहे, करते रहे – मतलब अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच की पीठ के पीछे.
 “वाक़ई में ये अचरज की बात है,” दोपहर के खाने पर अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने पत्नी से कहा, “मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि इन पंछियों को उड़ कर जाने की ज़रूरत क्या थी?”
 “मुझे कैसे मालूम?” मान्या ने जवाब दिया. “हो सकता है, तुम्हारी किरण की वजह से?”
 “तू भी ना मान्या, बिल्कुल बेवकूफ़ है,” अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने चम्मच फेंकते हुए जवाब दिया, “तू – किसानों जैसे ही कह रही है. यहाँ किरण कहाँ से आ गई?”
 “मुझे नहीं मालूम. मुझे तो तुम बख़्श ही दो.”
शाम को तीसरी आश्चर्यजनक घटना हुई – कोन्त्सोव्का में फिर से कुत्ते रोने लगे, और वो भी कैसे! चाँद से प्रकाशित खेतों पर निरंतर कराहें गूंजती रही, दुष्ट दयनीय कराहें.
अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच को एक आश्चर्य का झटका और लगा, मगर यह सुखद था, और वह भी ग्रीन-हाऊस में. चैम्बर्स में लाल अण्डों में लगातार खट्-खट् होने लगी. टोकी...टोकी...टोकी...टोकी – कभी एक अण्डे में, तो कभी दूसरे में और कभी तीसरे में खटखटाहट होती.
अण्डों में हो रही खटखट अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच की जीत की दस्तक थी. बगीचे में और तालाब में हुई अजीब घटनाओं के बारे में सब भूल गए. सभी ग्रीन-हाऊस में इकट्ठे हो गए : मान्या, और दून्या, और गार्ड, और चौकीदार जिसने संगीन को दरवाज़े के पास छोड़ दिया था.
 “तो, फिर? क्या कहते हैं?” विजयी मुद्रा से अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने पूछा. सभी उत्सुकता से पहले चैम्बर के दरवाज़े से कान लगाए खड़े थे.  “ये वे अपनी चोचों से खड़खड़ा रहे हैं – चूज़े,” दमकते हुए अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच कहता रहा. “नहीं निकाल पाऊँगा चूज़े, कहेंगे? नहीं, मेरे प्यारों,” और असीम भावावेग में उसने चौकीदार की पीठ थपथपाई. “ऐसे चूज़े निकालूँगा, कि आप लोग आहें भरने लगेंगे. अब मुझे बहुत सावधान रहना होगा,” उसने कड़ाई से कहा, “जैसे ही बाहर निकलने लगें, फ़ौरन मुझे ख़बर करो.”
 “ठीक है,” एक कोरस में गार्ड ने, दून्या ने और चौकीदार ने जवाब दिया.
 ‘टकी...टकी...टकी...’ पहले चैम्बर के कभी एक, तो कभी दूसरे अण्डे में खड़खड़ाहट हो रही थी. वाक़ई, आँखों के सामने पतली खोल से जन्म लेते हुए नए जीवन की तस्वीर इतनी आकर्षक थी कि सारे लोग काफ़ी देर तक उलटे रखे खाली डिब्बों पर बैठे रहे, ये देखते हुए कि उस झिलमिलाते रहस्यमय प्रकाश में लाल अण्डे कैसे पक रहे हैं. देर रात गए सब लोग सोने चले गए, जब सोव्खोज़ और आसपास की बस्तियों पर हरी रात बिखर चुकी थी.  वह रहस्यमय थी, और, कह सकते हैं, कि भयानक भी, शायद इसलिए कि उसकी निपट ख़ामोशी को बीच-बीच में शुरू हो जाता कोन्त्सोव्का के कुत्तों का अकारण, दयनीय और टीस भरा रुदन भंग कर रहा था. ये नासपीटे कुत्ते क्यों पागल हो रहे थे – बिल्कुल पता नहीं.
सुबह-सुबह एक अप्रियता अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच के सामने मुँह बाँए खड़ी थी. चौकीदार बेहद परेशान था, दिल पर हाथ रखकर क़सम खा रहा था, ख़ुदा का वास्ता दे रहा था कि वह सोया नहीं था, मगर उसने कुछ नहीं देखा.
 “समझ में न आने वाली बात है,” चौकीदार यक़ीन दिला रहा था, “मेरा इसमें कोई क़ुसूर नहीं है, कॉम्रेड रोक्क.”
 “धन्यवाद और तहे दिल से आपका शुक्रगुज़ार हूँ,” अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने उस पर बरसते हुए कहा, “आप सोचते क्या हैं, कॉम्रेड? आपको यहाँ किसलिए रखा गया था? निगरानी रखने के लिए. तो, आप मुझे बताएँगे कि वे कहाँ गुम हो गए? आख़िर बाहर तो निकले थे न वो? मतलब, चुरा लिया. मतलब, हमने दरवाज़ा खुला छोड़ दिया और ख़ुद घर चले गए. मुझे अभ्भी चूज़े चाहिए!”
 “मैं कहीं नहीं गया. मैं, क्या, अपना काम नहीं जानता,” आख़िर फ़ौजी को गुस्सा आ ही गया, “आप बेकार में मुझे क्यों डाँट रहे हैं, कॉम्रेड रोक्क?”
 “फिर वो गए कहाँ?”
 “मुझे कैसे मालूम,” फ़ौजी भी आख़िरकार तैश में आ गया, “मैं क्या उन पर पहरा दूँ? मुझे यहाँ क्यों रखा गया है? ये देखने के लिए कि कोई चैम्बर्स को उठाकर न ले जाए, अपनी ड्यूटी मैं कर रहा हूँ. ये रहे आपके चैम्बर्स. और आपके चूज़ों को पकड़ना क़ानूनन मेरा काम नहीं है. किसे मालूम कि आपके चूज़े कैसे निकलते हैं, हो सकता है, कि उन्हें साईकल पे भी पकड़ना मुश्किल हो!”
अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच थोड़ा स्तब्ध रह गया, वह कुछ और बुदबुदाया और आश्चर्य की स्थिति में आ गया. बात थी ही विचित्र. पहले चैम्बर में, जिसमें सबसे पहले उपकरण फिट किए गए थे, दो अण्डे, जो किरण के उद्गम के पास रखे थे, टूटे हुए पाए गए. और उनमें से एक तो एक किनारे को लुढ़क गया था. छिलका एस्बेस्टोस के फर्श पर पड़ा था.
 “शैतान ही जाने,” अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच बड़बड़ाया, “खिड़कियाँ बन्द हैं, वे छत से तो उड़ नहीं गये हैं!”
उसने सिर को झटका दिया और उस ओर देखा जहाँ छत पर लगे काँच में कुछ चौड़े-चौड़े छेद थे.
 “क्या, आप भी, अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच,” बड़े अचरज से दून्या ने कहा, “आपके चूज़े तो उड़ने भी लगे. वे यहीं कहीं हैं...त्सिप्...त्सिप्...” वह चिल्लाने लगी और ग्रीन हाऊस के कोनों में देखने लगी, जहाँ धूल भरे फ्लॉवर-पॉट्स, कुछ लकड़ी के बोर्ड और पुराना रद्दी सामान पड़ा था. मगर किसी भी चूज़े ने प्रत्युत्तर नहीं दिया.
इन फुर्तीले चूज़ों की खोज में कर्मचारियों की पूरी टीम क़रीब दो घंटे सोव्खोज़ के कम्पाउण्ड में भागती रही, और कहीं भी कुछ नहीं मिला. दिन बड़ी उत्तेजना में बीता. चैम्बर्स की सुरक्षा बढ़ा दी गई, अब चौकीदार भी साथ में पहरा दे रहा था, और उन्हें कड़ी हिदायत दी गई थी: हर पन्द्रह मिनट बाद चैम्बर्स की खिड़कियों में झाँका जाए और, कोई बात हो, तो फ़ौरन अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच को बुलाया जाए. गार्ड घुटनों के बीच संगीन दबाए, मुँह चढ़ाकर, दरवाज़े के पास बैठा था. अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच पूरी तरह व्यस्त था और तब कहीं जाकर दो बजे वह खाना खाने बैठा. खाने के बाद ठण्डी छाँव में शेरेमेत्योवों की भूतपूर्व गद्देदार लम्बी चौकी पर वह क़रीब घंटा भर सोया, फिर सोव्खोज़ में बनाया गया क्वास पीकर ग्रीन हाऊस गया और उसने इत्मीनान कर लिया कि अब वहाँ सब कुछ बिल्कुल ठीक ठाक है. बूढ़ा गार्ड फूस की चटाई पर पेट के बल लेटकर आँखें मिचकाते हुए पहले चैम्बर के निरीक्षण काँच से भीतर देख रहा था. गार्ड दरवाज़े से बिना हटे नज़र रख रहा था.
मगर कुछ तो हो रहा था : तीसरे चैम्बर के अण्डे, जिन्हें सबसे बाद में रखा गया था, जैसे सिसकारियों ले रहे थे, फुफकार रहे थे, मानो उनके भीतर कोई सिसकियाँ ले रहा हो.
“ऊह, चूज़े निकलने वाले हैं,” अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने कहा, “अब देख रहा हूँ कि वे तैयार हो रहे हैं. देखा?” वह गार्ड से मुख़ातिब हुआ...
“हाँ, बड़ा लाजवाब काम है,” उसने सिर हिलाते हुए और पूरी तरह दुहरा अर्थ दर्शाते लहज़े में कहा.
अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच थोड़ी देर चैम्बर्स के पास बैठा रहा, मगर उसके सामने अण्डे से कोई भी बाहर नहीं निकला. वह उठ गया, थोड़ा अलसाते हुए बोला कि वह सोव्खोज़ से दूर नहीं जा रहा है, सिर्फ तालाब तक तैरने के लिए जाएगा और ज़रूरत पड़ने पर उसे फ़ौरन बुलाया जाए. वह महल के भीतर अपने शयन कक्ष में भागा, जहाँ दो संकरे लोहे के पलंग पड़े थे, जिन पर मुड़ी-तुड़ी चादरें थीं, और कोने में हरे सेबों का ढेर लगा था और था बाजरे का छोटा सा पहाड़, नवजात चूज़ों को खिलाने के लिए, उसने रोंएदार तौलिया उठाया, और कुछ सोचकर, अपने साथ बन्सी भी ले ली, जिससे ख़ामोश पानी पर फुर्सत से बजा सके. वह फुर्ती से महल से बाहर भागा, सोव्खोज़ का आँगन पार किया, और विलो वृक्षों के गलियारे से होते हुए तालाब की ओर चल पड़ा. रोक्क तेज़-तेज़ चल रहा था, तौलिए को हिलाते हुए, बगल में बन्सी दबाए. विलो वृक्षों से छनकर आसमान ऊमस फैला रहा था, जिस्म टूट रहा था और पानी मांग रहा था. रोक्क के दाएँ हाथ पर चौड़ी-चौड़ी पत्तियों वाली घनी झाड़ियाँ थीं, जिनमें उसने, जाते-जाते, थूका. फ़ौरन चौड़े पंजों की उलझी हुई गहराई में कुछ सरसराहट हुई, जैसे कोई लकड़ी के लट्ठे को खींच रहा हो. पल भर को लगा जैसे अचानक दिल डूब रहा है, अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने झाड़ियों की ओर सिर घुमाया और अचरज से देखा. तालाब से पिछले दो दिनों से किसी तरह की आवाज़ें नहीं आ रही थीं. सरसराहट रुक गई, झाड़ियों के ऊपर से तालाब के जल की चिकनी सतह और कपड़े बदलने वाली झोंपड़ी की भूरी छत आकर्षित करते हुए कौंध गई. कुछ जंगली मक्खियाँ अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच के सामने चक्कर लगा रही थीं. वह लकड़ी के छोटे-से पुल की तरफ़ मुड़ने ही वाला था कि झाड़ियों में दुबारा सरसराहट सुनाई दी और इस बार उसके साथ छोटी सी फुफकार भी थी, जैसे इंजिन से तेल और भाप निकल रही हो. अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच सतर्क हो गया और जंगली झाड़ियों की घनी दीवार की ओर देखने लगा.
 “अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच,” इसी समय रोक्क की पत्नी की आवाज़ गूंजी, और रास्पबेरी की झाड़ियों में उसका सफ़ेद ब्लाउज़ कभी झलक जाता, कभी छुप जाता. “रुको, मैं भी तैरने के लिए जाऊँगी.”
पत्नी तेज़ी से तालाब की ओर आ रही थी, मगर अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने उसे कोई जवाब नहीं दिया, जैसे झाड़ियों से चिपक गया था. भूरा-ज़ैतूनी लट्ठा उसकी आँखों के सामने उस घने झुरमुट से ऊपर उठने लगा और देखते-देखते बढ़ने लगा. कुछ गीले, पीले-पीले धब्बे, जैसा कि अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच को प्रतीत हुआ, उस लट्ठे पर बिखरे थे. वह तनकर सीधा होने लगा, लचकते हुए और डोलते हुए, और इतनी ऊँचाई तक तन गया कि एक छोटे विलो-वृक्ष से ऊँचा हो गया.  फिर लट्ठे का शीर्ष टूट गया, थोड़ा झुका और अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच के ऊपर मॉस्को के बिजली के खम्भे जैसी कोई चीज़ आ गई. मगर, ये ‘कोई चीज़’ बिजली के खम्भे से तीन गुना मोटी थी और उसके मुक़ाबले काफ़ी ख़ूबसूरत भी थी, छिलकों जैसे गोदने की वजह से. अभी तक कुछ भी न समझ पाते हुए, मगर ठण्ड़े पड़ते हुए, अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने उस भयानक खम्भे के शिखर की ओर देखा, और कुछ पलों के लिए उसके दिल की धड़कन रुक गई. उसे ऐसा लगा कि अगस्त के गर्म दिन में अचानक बर्फ़बारी हो गई हो, और आँखों के आगे ऐसा अँधेरा छा गया, मानो वह गर्मियों वाली पतलून से होकर सूरज को देख रहा हो.
लट्ठे के ऊपरी सिरे पर सिर था. वो चपटा था, ज़ैतूनी पार्श्वभूमि पर एक गोल पीले धब्बे की सजावट ने उसे नुकीला बना दिया था. सिर की छत पर पलक-रहित, खुली, सर्द और मिचमिची आँखें बैठी थीं, और इन आँखों में ऐसी दुष्टता थी, जैसी अब तक कभी देखी नहीं थी. सिर इस तरह घूम रहा था, मानो हवा को काट रहा हो, पूरा खम्भा झाड़ियों में वापस चला गया, बस सिर्फ आँखें रह गईं जो बिना झपके अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच की ओर देख रही थीं. वो, चिपचिपे पसीने से लथपथ, एकदम अविश्वसनीय और पागलपन की हद तक ले जाने वाले भय के कारण उत्पन्न बस चार शब्द बोल पाया. ऐसी बढ़िया थी पत्तों के बीच से झाँकती ये आँखें.
 “ये क्या मज़ाक है...”
उसे याद आया कि फ़कीर...हाँ...हाँ...इण्डिया...बुनी हुई टोकरी और तस्वीर...सम्मोहित करते हैं.
सिर फिर से उठा और अब उसका धड़ भी बाहर आने लगा. अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच बन्सी को अपने होठों पर ले गया, भर्राहट से फूँक मारी और बजाने लगा, हर पल गहरी साँस लेते हुए वह ‘येव्गेनी ओनेगिन’ से वाल्ट्ज़ बजाने लगा. इस ऑपेरा के प्रति असीम नफ़रत से हरियाली वाली आँखें फ़ौरन जलने लगीं.
 “तुम क्या, पगला गए हो, ऐसी गर्मी में बजाने के लिए?” मान्या की प्रसन्न आवाज़ सुनाई दी, और आँखों के कोने से अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने सफ़ेद धब्बा देखा.
इसके बाद खून जमा देने वाली एक चीख़ पूरे सोव्ख़ोज़ को चीरती चली गई, वह ऊँची हो गई और फैल गई, और वाल्ट्ज़ ऐसे उछला जैसे टूटे पैर से उछल रहा हो. हरियाली से सिर बाहर झपटा, उसकी आँखों ने अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच की आत्मा को अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए छोड़ दिया. क़रीब पन्द्रह हाथ लम्बा और एक आदमी जितना चौड़ा साँप किसी स्प्रिंग की तरह उछल कर झाड़ियों से बाहर आया. रास्ते से धूल का बादल उछला, और वाल्ट्ज़ बन्द हो गया. साँप सोव्खोज़ के डाइरेक्टर के सामने से होकर तेज़ी से उस तरफ़ लपका, जहाँ रास्ते पर सफ़ेद ब्लाउज़ था. रोक्क ने साफ़-साफ़ देखा: मान्या पीली-सफ़ेद हो गई और उसके लम्बे बाल, तारों जैसे सिर के ऊपर आधा हाथ उठ गए. साँप ने रोक्क की आँखों के सामने, एक पल को अपना जबड़ा खोलकर, जिससे फोर्क जैसी कोई चीज़ बाहर लपलपाई, दाँतों से धूल में गड़ी जा रही मान्या को कन्धे से उठा लिया, और झटके से ज़मीन से एक हाथ ऊपर उठा दिया. तब मान्या ने मृत्युपूर्व की कर्कश चीख़ दुहराई. साँप ने पाँच हाथ ऊँची कुंडली बना ली, उसकी पूँछ टॉर्नेडो बना रही थी, और वह मान्या को दबाने लगा. उसके मुँह से फिर कोई आवाज़ नहीं निकली, और सिर्फ रोक्क ने उसकी हड्डियाँ टूटने की आवाज़ सुनी. ज़मीन से काफ़ी ऊपर साँप के गाल पर प्यार से चिपका हुआ मान्या का सिर हिल रहा था. मान्या के मुँह से ख़ून का फ़व्वारा निकला, टूटा हुआ हाथ उछला, और नाखूनों के नीचे से ख़ून के फ़व्वारे निकलने लगे. इसके बाद साँप ने अपना जबड़ा खोला, और एकदम मान्या के सिर पर अपना सिर पहना दिया और उस पर ऐसे चढ़ने लगा जैसे ऊँगली पर हाथमोज़ा चढ़ रहा हो. साँप से चारों ओर ऐसी गरम-गरम साँस निकल रही थी कि उसने रोक्क के चेहरे को भी छू लिया, और पूँछ ने उसे क़रीब-क़रीब रास्ते से दूर धूल में फेंक ही दिया. रोक्क के बाल वहीं पर सफ़ेद हो गए. जूतों जैसे काले उसके बालों का पहले दाँया और फिर बायाँ भाग चांदी से ढँक गया. मृत्यु जैसी उबकाई से वह आख़िरकार रास्ते से दूर हुआ और किसी भी ओर न देखते हुए, जंगली चीत्कार से आसपास के वातावरण को भरते हुए, तीर की तरह भागा.


***

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

The Fateful Eggs - 7

अध्याय 7
रोक्क
पता नहीं कि क्या वाक़ई में लेफ़ोर्तोव वेटेरिनरी इन्स्टीट्यूट के टीके बढ़िया थे, या समारा की क्वरन्टाइन टीमें कुशल थीं, या फिर कालुगा और वोरोनेझ में अंड़ों की जमाखोरी के विरुद्ध उठाए गए क़दम प्रभावशाली थे, या मॉस्को की आपात-कमिटी का काम सफ़ल एवम् सराहनीय था, मगर ये अच्छी तरह मालूम हो गया कि पेर्सिकोव की अल्फ्रेड के साथ हुई अंतिम मीटिंग के दो सप्ताह बाद रिपब्लिक में मुर्गियों के मामले की पूरी तरह सफ़ाई हो चुकी थी. कस्बाई शहरों के पिछवाड़े के आँगनों में मुर्गियों के अनाथ पंख बिखरे थे, जो आँखों में आँसू भर देते, और अस्पतालों में कुछ अंतिम खवैये डायरिया और खून की उल्टियों से निजात पा रहे थे. सौभाग्य से पूरे देश में मरने वालों की संख्या एक हज़ार से ज़्यादा नहीं थी. बड़े पैमाने पर गड़बडी भी नहीं हुई. हाँ, वोलोकोलाम्स्क में ज़रूर एक फ़कीर प्रकट हुआ था, जिसने यह घोषित कर दिया कि मुर्गियों के विनाश के पीछे कोई और नहीं , बल्कि  कमिसार ही ज़िम्मेदार हैं, मगर उसकी ओर किसी ने विशेष ध्यान नहीं दिया. वोलोकोलाम्स्क के बाज़ार में कुछ पुलिस वालों की पिटाई हो गई जो औरतों के हाथों से मुर्गियाँ छीन रहे थे, और स्थानीय पोस्ट एवम् टेलिग्राफ़ ऑफ़िस की शाख़ा की खिड़कियों के शीशे तोड़ दिए. मगर, सौभाग्य से स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों ने फ़ौरन कुछ कदम उठाए जिनके फलस्वरूप सबसे पहले, फ़कीर कोई नामो-निशान छोड़े बगैर ग़ायब हो गया; और इसके बाद टेलिग्राफ़ ऑफ़िस के शीशे बिठा दिए गए.
उत्तर में अर्खांगेल्स्क और स्यूम्किन वीस्योलक पहुँचने के बाद प्लेग अपने आप ही इस वजह से रुक गया कि उसे आगे बढ़ने के लिए कोई जगह ही नहीं थी – श्वेत सागर में, जैसा कि सर्व विदित है मुर्गियाँ होती ही नहीं हैं. वो व्लादीवोस्तोक में भी रुक गया, क्योंकि आगे महासागर था. दूर दक्षिण में- ओर्दुबात, जुल्फी और कराबुलाक के तप्त भागों में नष्ट हो गया और शांत हो गया, और पश्चिम में आश्चर्यजनक तरीके से पोलैण्ड और रुमानिया की सीमा पर ही रुक गया. या तो वहाँ की आबोहवा अलग तरह की थी, या फिर पड़ोसी राज्यों द्वारा प्रयुक्त रोक-थाम के उपाय कारगर साबित हुए, मगर वास्तविकता ये थी कि प्लेग आगे नहीं बढ़ा. विदेशी अख़बार इस अप्रत्याशित बीमारी के बारे में ज़ोर-शोर से बहस कर रहे थे, मगर सोवियत गणराज्यों का शासन बिना कोई शोर मचाए निरंतर काम करता रहा. ‘मुर्गियों के प्लेग से संघर्ष’ के लिए बनी आपात-कमिटी का नाम बदलकर ‘गणराज्य में मुर्गीपालन के पुनर्जीवन एवम् संवर्धन’ से संबंधित आपात-कमिटी कर दिया गया, जिसके सोलह सदस्यों में एक नई, असाधारण त्रोइका का समावेश था. “दोब्रोकूर (वालंटियर-मुर्गियाँ)” की स्थापना की गई जिसके मानद डेप्युटी-चेयरमैन के रूप में पेर्सिकोव और पोर्तुगालोव को शामिल किया गया. अख़बारों में छपी उनकी तस्वीरों के नीचे शीर्षक प्रकट हुए: “विदेशों से थोक में अण्डे ख़रीदे जाएँगे”, और “ह्यूज़ महाशय अण्डों का प्रचार रोकने की कोशिश में”. पूरे मॉस्को में पत्रकार कोलेच्किन का ज़हरीला लेख लोकप्रिय हो रहा था, जो इन शब्दों से समाप्त होता था: “महाशय ह्यूज़, हमारे अण्डों को नज़र न लगाएँ, आपके पास अपने अण्डे हैं!”
पिछले तीन सप्ताहों में प्रोफेसर पेर्सिकोव पूरी तरह पस्त हो गया था और बुरी तरह थक गया था. मुर्गियों वाली घटनाओं ने उसे अपने मार्ग से पूरी तरह विचलित कर दिया था और उस पर दोहरा बोझ डाल दिया था. पूरी-पूरी शाम उसे मुर्गियों वाली कमिटी की सभाओं में भाग लेना पड़ता था और समय-समय पर अल्फ्रेड ब्रोन्स्की या यांत्रिक पैर वाले मोटे से लम्बी-लम्बी बहस करनी पड़ती थी. प्रोफेसर पोर्तुगालोव, प्राइवेट-रीडर इवानोव और बोर्नगार्त के साथ मिलकर प्लेग के बेसिलस की खोज में मुर्गियों की चीर-फाड़ करनी पड़ती थी, उन्हें माइक्रोस्कोप के नीचे रखकर उनका अध्ययन करना पड़ता था;  और तीन शामों को बैठकर अति शीघ्रता से एक ब्रोश्युर भी लिखना पड़ा “प्लेग से प्रभावित मुर्गियों के यकृत में हुए परिवर्तनों के बारे में.”
मुर्गियों के क्षेत्र में पेर्सिकोव बगैर किसी विशेष उत्साह के काम कर रहा था, और यह बात समझ में भी आती थी – उसका पूरा दिमाग़ दूसरी – मुख्य और महत्वपूर्ण- समस्या में उलझा था, उसमें, जिससे उसे इस मुर्गियों वाली दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने ज़बर्दस्ती खींच कर अलग कर दिया था, मतलब लाल किरण में. अपने पहले से ही ख़राब स्वास्थ्य को और अधिक ख़राब करते हुए, भोजन और नींद के समय से कुछ घंटे छीनकर, कभी-कभी प्रेचिस्तेन्को वापस लौटने के बदले इंस्टीट्यूट के मोमजामा चढ़े दीवान पर ही झपकी ले लेता - इस तरह पेर्सिकोव रातों में अपने चैम्बर्स और माइक्रोस्कोप के पास ही काम करता रहता..

जुलाई के अंत तक गड़बड़ कुछ शांत हो गई. नवगठित कमिटी के कार्य-कलाप भी साधारण गति से चलने लगे, और पेर्सिकोव अपने अधूरे काम की ओर लौटा. माइक्रोस्कोप्स के नीचे नए प्रिपैरेटिव रखे गए, चैम्बर में लाल किरण के नीचे जादुई शीघ्रता से मछलियों और मेंढकों के अंडसमूह बढ़ रहे थे. केनिग्सबेर्ग से हवाई जहाज़ में ख़ास तौर से ऑर्डर किए गए शीशे मंगवाए गए, और जुलाई के अंतिम दिनों में इवानोव की निगरानी में कारीगरों ने दो नए, बड़े चैम्बर्स को सुसज्जित कर दिया जिनमें किरण अपने उद्गम पर सिगरेट के पैकेट जितनी चौड़ी थी और दूसरे सिरे पर – पूरे एक मीटर. पेर्सिकोव ने प्रसन्नता से अपने हाथ मले और किन्हीं रहस्यमय एवम् क्लिष्ट प्रयोगों की तैयारी करने लगा. सबसे पहले उसने शिक्षा विभाग के कमिसार से बात की, और रिसीवर ने उसे अत्यंत प्रिय और हर तरह के आश्वासन का वादा किया. इसके बाद पेर्सिकोव ने सर्वोच्च कमिशन के पशुपालन विभाग के प्रमुख प्ताखा-पोरोस्यूक से बात की. प्ताखा ने बड़ी गर्मजोशी से पेर्सिकोव की बात सुनी. बात हो रही थी प्रोफेसर पेर्सिकोव के लिए विदेश से किसी बहुत बड़े ऑर्डर की. प्ताखा ने फोन पर कहा कि वह फ़ौरन बर्लिन और न्यूयॉर्क में तार भेज देगा. इसके पश्चात् क्रेमलिन द्वारा पूछा गया कि पेर्सिकोव का काम कैसे चल रहा है, और उस महत्वपूर्ण और मीठी आवाज़ ने पूछा कि पेर्सिकोव को कार की ज़रूरत तो नहीं है.
 “नहीं, धन्यवाद. मुझे ट्रामगाड़ी में जाना ज़्यादा अच्छा लगता है,” पेर्सिकोव ने जवाब दिया.
 “मगर क्यों?” उस रहस्यमय आवाज़ ने हल्के से मुस्कुराते हुए पूछा.
पेर्सिकोव के साथ अक्सर सब लोग या तो भय मिश्रित आदर से बात करते या फिर प्यार भरी मुस्कान के साथ जैसे किसी छोटे मगर अत्यन्त महत्वपूर्ण बच्चे से की जाती है.
 “उसकी रफ़्तार ज़्यादा तेज़ होती है,” पेर्सिकोव ने जवाब दिया, जिसके बाद टेलिफोन से आती खनखनाती, मोटी आवाज़ ने जवाब दिया:
 “ठीक है, जैसी आपकी मर्ज़ी.”
एक सप्ताह और बीत गया, जिसके दौरान मुर्गियों की अपेक्षाकृत शांत होती समस्याओं से स्वयम् को अधिकाधिक दूर रखते हुए पेर्सिकोव पूरी तरह से किरण के अध्ययन में जुट गया. अनिद्रा और अत्यधिक थकान के कारण उसका सिर मानो पारदर्शी और हल्का हो गया. अब उसकी आँखों के सामने से लाल छल्ले हटते ही नहीं थे, और लगभग हर रात पेर्सिकोव इंस्टिट्यूट में ही गुज़ारता था. एक बार उसने इस प्राणि-शास्त्रीय आश्रयस्थल को छोड़ा ज़रूर था, जिससे कि प्रेचिस्तेन्को पर स्थित त्सेकुबु (वैज्ञानिकों की जीवन शैली सुधारने संबंधी सेंट्रल कमिशन) के विशाल हॉल में अपनी किरण और अंडों के कोशाणुओं पर उसके प्रभाव के बारे में अपना शोध-पत्र पढ़ सके. ये सिरफिरे प्राणिशास्त्रज्ञ की महान जीत थी. स्तम्भों वाले हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट से छत से कुछ-कुछ बिखर रहा था, गिर रहा था, और सनसनाते आर्क लैम्प्स त्सेकुबिस्तों के काले जैकेट्स और महिलाओं की सफ़ेद पोषाकों पर रोशनी बिखेर रहे थे. स्टेज पर, भाषण-मंच के पास, काँच की कुर्सी पर भारी-भारी सांसें लेते हुए और भूरा पड़ते हुए एक प्लेट में बिल्ली के आकार का नम मेंढक विराजमान था. भाषण-मंच पर चिटें फेंकी गईं. उनमें सात प्रेम-पत्र थे, उन्हें पेर्सिकोव ने फाड़ कर फेंक दिया. त्सेकुबु का प्रमुख बड़ी कठिनाई से उसे घसीट कर मंच पर लाया ताकि वह लोगों का अभिवादन कर सके. पेर्सिकोव ने गुस्से से अभिवादन किया, उसके हाथ पसीने से तर-बतर थे और काली टाई ठोढ़ी के नीचे न होकर बाएँ कान के नीचे विराजमान थी. उसके सामने मानो सांसों की धुंध में लिपटे मौजूद थे सैकड़ों पीले चेहरे और मर्दों के सफ़ेद सीने, और अचानक पिस्तौल का पीला होल्स्टर कौंधकर सफ़ेद स्तम्भ के पीछे गायब हो गया. पेर्सिकोव को वह कुछ अस्पष्ट-सा नज़र आया और फिर वह उसके बारे में भूल गया. मगर भाषण के बाद बाहर निकलते हुए, सीढ़ियों के लाल कार्पेट पर अचानक उसकी तबियत बिगड़ने लगी. एक पल को लॉबी के जगमगाते झुम्बर पर कालिमा छा गई, और पेर्सिकोव को सब कुछ धुँधला नज़र आने लगा, उसका जी घबराने लगा...उसे बेहद गर्मी महसूस होने लगी, ऐसा लगा कि गर्दन में गरम, चिपचिपा खून बह रहा है...और थरथराते हाथ से प्रोफेसर ने रेलिंग थाम ली.
 “आपकी तबियत ख़राब है, व्लादीमिर इपातिच?” चारों तरफ़ से परेशान आवाज़ें आने लगीं.
“नहीं, नहीं,” पेर्सिकोव ने संभलते हुए जवाब दिया, “मैं, बस, बेहद थक गया हूँ...हाँ...एक ग्लास पानी मंगवा दीजिए.”
***

अगस्त का कड़ी धूप वाला दिन था.  इससे प्रोफ़ेसर को परेशानी हो रही थी इसलिए परदे गिरा दिए गए थे. एक एडजेस्टेबल रिफ्लेक्टर विभिन्न उपकरणों और लेन्सों से अटी कांच की मेज़ पर तेज़ प्रकाश पुंज फेंक रहा था. घूमती कुर्सी की पीठ से टिककर, थकान से चूर प्रोफेसर कश लगा रहा था और बेहद थकी हुई मगर प्रसन्न आँखों से धुँए के बादल से चैम्बर के अधखुले दरवाज़े के भीतर देख रहा था, जहाँ कैबिनेट की दमघोंटू और गन्दी हवा को कुछ-कुछ गरमाते हुए लाल रंग का प्रकाश पुंज पड़ा था.       
दरवाज़े पर खटखट हुई.
“क्या है?” पेर्सिकोव ने पूछा.
दरवाज़ा हौले से चरमराया और पन्क्रात भीतर आया. उसने अटेन्शन की मुद्रा में हाथ रखे और इस महान हस्ती के सामने भय से पीले पड़ते हुए कहा:
 “वहाँ, आपके पास, प्रोफेसर महाशय, रोक्क आया है.”
वैज्ञानिक के गालों पर मुस्कुराहट जैसा कुछ दिखाई दिया. उसने आँखों को सिकोड़ा और कहा:
”दिलचस्प बात है. बस, मैं व्यस्त हूँ.”
 “वे कहते हैं कि क्रेमलिन से सरकारी कागज़ लाए हैं.”
 “रोक, (रूसी में ROK शब्द का अर्थ है – किस्मत, जबकि जो व्यक्ति आया है उसका नाम है ROKK. उच्चारण की समानता के कारण प्रोफेसर ने उसे किस्मत वाला ROK समझ लिया है. निस:न्देह बुल्गाकोव किसी गहरी बात की ओर इशारा करना चाहते हैं! – अनु.) कागज़ के साथ? विरल संयोग है,” पेर्सिकोव ने टिप्पणी की और आगे कहा: “ख़ैर, भेजो उसे यहाँ!”
 “जी,” पन्क्रात ने जवाब दिया और घास के साँप की तरह दरवाज़े के पीछे ग़ायब हो गया.
एक मिनट बाद वो फिर चरमराया, और देहलीज़ पर एक आदमी प्रकट हुआ. पेर्सिकोव कुर्सी पर कसमसाया और उसने चश्मे के ऊपर से और कंधे के ऊपर से आगंतुक पर नज़र गड़ा दी. पेर्सिकोव असल ज़िन्दगी से काफ़ी दूर था – उसे इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी, मगर पेर्सिकोव की आँखों ने भी इस आदमी का प्रमुख लक्षण भाँप लिया. वह अजीब किस्म के पुराने फैशन का था. सन् 1919 में यह आदमी राजधानी की सडकों पर पूरी तरह चल जाता; सन् 1924 में, वर्ष के आरंभ में, लोग उसे बर्दाश्त कर लेते; मगर सन् 1928 में वह विचित्र ही लग रहा था. उस समय, जब प्रोलेटेरिएट का सबसे पिछड़ा वर्ग – नानबाई- भी कोट पहनता था; जब मॉस्को में मिलिट्री ट्यूनिक – पुराने फ़ैशन का सूट जिसे सन् 1924 के अंत में पूरी तरह खारिज कर दिया गया था- कभी-कभार ही दिखाई देता था; आगंतुक ने दुहरे पल्ले वाली चमड़े की जैकेट, हरी पतलून पहन रखी थी, पैरों पर कसी हुई पट्टियाँ, और फ़ौजी जूते थे, और बगल में लटक रही थी भारी-भरकम, पुराने फैशन की पिस्तौल ‘माउज़ेर’ - पीले खोल में. आगंतुक के चेहरे का भी पेर्सिकोव पर वैसा ही प्रभाव पड़ा जैसा और सब पर पड़ता था – अत्यंत अप्रिय . छोटी-छोटी आँखें पूरी दुनिया को हैरत से, मगर साथ ही आत्मविश्वास से देख रही थीं. सपाट पैरों वाली छोटी-छोटी टाँगों में कुछ बेतकल्लुफ़ी सी थी. चेहरा नीलाई लिए सफ़ाचट. पेर्सिकोव ने फ़ौरन नाक-भौंह चढ़ा लिए. वह बड़ी बेरहमी से घूमती कुर्सी पर चरमराया, और आगंतुक की ओर अब चश्मे के ऊपर से नहीं, बल्कि सीधे देखते हुए बोला:
 “आप कोई कागज़ लाए हैं? कहाँ है वो?”
आगंतुक, ज़ाहिर है, उस सबसे भौंचक्का हो गया, जो उसने देखा था. आमतौर से तो वह कम ही परेशान होता था, मगर इस समय वह परेशान हो ही गया. उसकी आँखों से पता चल रहा था कि उसे सबसे ज़्यादा 12 ख़ानों वाली शेल्फ ने चौंका दिया था, जो सीधे छत तक पहुँच रही थी और किताबों से ठँसी थी. इसके बाद, बेशक, चैम्बर्स ने, जिनमें, नर्क के समान, झिलमिलाती लाल रंग की किरण लैन्सों से फूटी पड़ रही थी. और आधे-अंधेरे में, रेफ्लेक्टर से आती नुकीली किरण के पास बैठे ख़ुद पेर्सिकोव ने भी, जो स्क्रू वाली घूमती कुर्सी में काफ़ी विचित्र और महान प्रतीत हो रहा था. आगंतुक ने उस पर नज़र गड़ा दी, जिसमें साफ़ तौर से उसके आत्मविश्वास को फांदते हुए आदर की चिनगारियाँ फूटी पड़ रही थीं, कोई कागज़-वागज़ नहीं दिया, मगर बोला:
 “मैं अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच रोक्क हूँ!”
 “अच्छा? तो फिर?”
 “मुझे ‘रेड रे’ मॉडेल सोव्खोज़ (सोवियत फ़ार्म) का डाइरेक्टर बनाया गया है,” आगंतुक ने स्पष्ट किया.
 “तो?”
 “और मैं, कॉम्रेड, आपके पास सीक्रेट मिशन पर आया हूँ.”
 “मुझे उसके बारे में जानने में दिलचस्पी है. संक्षेप में, अगर संभव हो तो.”
पेर्सिकोव की ’कॉम्रेड’ शब्द सुनने की आदत इतनी छूट गई थी कि अब वह शब्द मानो उसके कानों को चीरता चला गया. वह बुरी तरह झल्ला गया.
आगंतुक ने जैकेट का पल्ला खोला और शानदार चिकने कागज़ पर टाइप किया हुआ ‘ऑर्डर’ बाहर निकाला. उसने इसे पेर्सिकोव की ओर बढ़ा दिया. और उसके बाद पेर्सिकोव के बिना कहे घूमते स्टूल पर बैठ गया.
 “मेज़ को धक्का मत मारो,” घृणा से पेर्सिकोव ने कहा.
आगंतुक ने घबरा कर मेज़ की ओर देखा, जिसके दूर वाले किनारे पर एक नम अंधेरे छेद में पन्ने के समान किसी की निर्जीव आँखें टिमटिमा रही थीं. उनसे अजीब सी ठण्डक निकल रही थी.
जैसे ही पेर्सिकोव ने कागज़ पढ़ा, वह उछला और टेलिफोन की ओर लपका. कुछ ही पल बाद वह अत्यंत तैश में आकर जल्दी-जल्दी बात कर रहा था:
 “माफ़ कीजिए...मैं समझ नहीं पा रहा हूँ...ऐसा कैसे हो सकता है? मैं...बिना मेरी अनुमति के, सलाह के...शैतान जाने वो क्या कर डालेगा!!”
यहाँ अजनबी अत्यंत अपमानित होकर स्टूल पर घूमा.
 “माफ़ी चाहता हूँ,” उसने कहना शुरू किया,” मैं डाइ...”
मगर पेर्सिकोव ने टेढ़ी ऊँगली से उसे धमकाया और कहता रहा:
 “माफ़ कीजिए, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ...मैं, अंत में, कड़ा विरोध प्रकट करता हूँ. अण्डों पर प्रयोग करने की इजाज़त मैं नहीं दूँगा...जब तक कि मैं ख़ुद इन्हें न आज़मा लूँ...”
रिसीवर में कोई चीज़ चहकी और खड़खड़ाई, और दूर से भी समझ में आ रहा था कि रिसीवर से जैसे एक पुचकारती हुई आवाज़ किसी छोटे बच्चे से बात कर रही है. इसका अंत ये हुआ कि लाल पड़ गए पेर्सिकोव ने धड़ाम् से रिसीवर लटका दिया और उससे मुख़ातिब होकर दीवार से कहा:
 “मैं अपने हाथ धो लेता हूँ!”
वह मेज़ की तरफ़ आया, वहाँ से कागज़ उठाया, उसे एक बार ऊपर से नीचे चश्मे के ऊपर से पढ़ा, फिर
नीचे से ऊपर सीधे चश्मे से पढ़ा और अचानक चिंघाड़ा:
“पन्क्रात!”
पन्क्रात इस तरह दरवाज़े में प्रविष्ट हुआ मानो ऑपेरा में सीढ़ी चढ़ कर आया हो. पेर्सिकोव ने उसकी ओर देखा और ज़ोर से चीख़ा:
 “बाहर निकल, पन्क्रात!”
और पन्क्रात, अपने चेहरे पर ज़रा सा भी विस्मय का प्रदर्शन किए बगैर ग़ायब हो गया.
 इसके बाद पेर्सिकोव आगंतुक की ओर मुड़ा और कहने लगा:
 “ठीक है...मैं आदेश का पालन करूँगा. मुझे क्या करना है! और मुझे कोई दिलचस्पी भी नहीं है.”
प्रोफेसर ने आगंतुक का जितना अपमान नहीं किया, उतना उसे विस्मित कर दिया.
 “माफ़ी चाहता हूँ,” उसने शुरूआत की, “आप तो, कॉम्रेड...”
 “ये आप हमेशा कॉम्रेड, कॉम्रेड क्या करते रहते हैं...” पेर्सिकोव नाक-मुँह चढ़ा कर बुदबुदाया और ख़ामोश हो गया.
 ‘तो ये बात है’, रोक्क के चेहरे पर लिखा था.
 “माफ़...”
 “तो, ये, प्लीज़,” पेर्सिकोव ने उसकी बात काटते हुए कहा, “ये आर्क-लैम्प है. इससे आई-पीस को इधर- उधर सरका कर,” पेर्सिकोव ने चैम्बर के कैमेरे जैसे ढक्कन को खट्-खट् किया, “किरण प्राप्त कर सकते हैं, जिसे आप लैन्सों को, ये नं. 1...और शीशों को, ये नं. 2, सरका-सरका कर इकट्ठा कर सकते हैं,” पेर्सिकोव ने किरण को बुझा दिया, उसे फिर से एस्बेस्टस के चैम्बर के फर्श पर जला दिया, “और फर्श पर, किरण में वो सब कुछ रख सकते हैं, जो आपको अच्छा लगे, और प्रयोग कर सकते हैं. बहुत ही आसान है, है ना?”
पेर्सिकोव व्यंग्य और नफ़रत प्रकट करना चाहता था, मगर चमकती आँखों से चैम्बर के भीतर ध्यानपूर्वक देख रहा आगंतुक इसे देख ही नहीं पाया.
 “सिर्फ ये चेतावनी देता हूँ,” पेर्सिकोव ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “हाथों को किरण में मत रखिए, क्योंकि मेरे अवलोकनों के अनुसार, इससे कोशिकाओं में वृद्धि होने लगती है...और वे हानिकारक हैं अथवा नहीं, अफ़सोस है कि ये मैं अभी तक सिद्ध नहीं कर पाया हूँ.”
यहाँ आगंतुक ने फ़ौरन अपनी चमड़े की कैप गिराकर, हाथ पीठ के पीछे छुपा लिए, और प्रोफेसर के हाथों की ओर देखने लगा. वे पूरी तरह आयोडिन से पुते थे और दाहिने हाथ पर, कलाई के पास, बैण्डेज बंधा था.
 “और आप कैसे करते हैं, प्रोफेसर?”
  “कुज़्नेत्स्की पर श्वाब की दुकान से रबड़ के दस्ताने ख़रीद सकते हैं,” प्रोफेसर ने चिढ़कर जवाब दिया. “ये मेरी ज़िम्मेदारी नहीं है.”
अब पेर्सिकोव ने आगंतुक की ओर यूँ देखा मानो मैग्निफ़ाईंग ग्लास से देख रहा हो.
 “आप कहाँ से टपक पड़े? मतलब...आपको क्यों?...”
आख़िर रोक्क ने बेहद अपमानित महसूस कर ही लिया.
 “माफ़...”
 “आख़िर इन्सान को ये तो मालूम होना चाहिए कि वह कर क्या रहा है!...आप इस किरण के पीछे क्यों पड़ गए?”
 “इसलिए कि ये महत्वपूर्ण सरकारी काम है...”
 “ओहो. सरकारी? तब...पन्क्रात!”
और जब पन्क्रात प्रकट हुआ:
 “ठहर, मैं ज़रा सोच लूँ.”
और पन्क्रात नम्रता से ग़ायब हो गया.
 “मैं,” पेर्सिकोव ने कहा, “समझ नहीं पा रहा हूँ कि आख़िर इतनी जल्दबाज़ी की और इतने राज़ की ज़रूरत क्या है?”
 “आपने, प्रोफेसर, मुझे पूरी तरह उलझा दिया है,” रोक्क ने जवाब दिया,  “आपको तो मालूम ही है कि सारी मुर्गियों का सफ़ाया हो चुका है, एक भी बाक़ी नहीं है.”
 “तो, इससे क्या?,” प्रोफेसर चीख़ा, “क्या आप पल भर में ही उन्हें पुनर्जीवित करना चाहते हैं? और फिर उस किरण की सहायता से क्यों, जिसका अभी तक अध्ययन नहीं किया गया है?”
 “कॉम्रेड प्रोफेसर,” रोक्क ने जवाब दिया, “आप मुझे, क़सम से, परेशान किए जा रहे हैं. मैं आपसे कह रहा हूँ कि सरकार को मुर्गीपालन को नए सिरे से शुरू करना होगा, क्यों कि विदेशों में हमारे बारे में हर तरह की ऊटपटांग बातें लिखी जा रही हैं. हाँ.”
 “तो, लिखने दो...”
 “मगर, आप जानते हैं...,” भेद भरे अंदाज़ में रोक्क ने जवाब दिया और सिर को गोल-गोल घुमाया.
“मैं जानना चाहूँगा कि अण्डों से मुर्गियाँ पैदा करने का ख़याल किसके दिमाग़ में आया...”
”मेरे...” रोक्क ने जवाब दिया.
 “”ऊहू...चुक्... और किसलिए, कृपया बताने का कष्ट करेंगे? किरण के गुणों के बारे में आपको कैसे पता चला?”
 “मैं, प्रोफेसर, आपके लेक्चर पे मौजूद था.”
 “मैंने अभी तक अण्डों पर कोई प्रयोग नहीं किया है!...बस, करने का इरादा है!”
 “ऐ ख़ुदा, सब ठीक हो जाएगा,” रोक्क ने तहे दिल से बड़े आत्मविश्वास से कहा, “आपकी किरण इतनी लाजवाब है कि चाहे तो हाथी भी पैदा कर सकते हो, मुर्गियों की तो बात ही क्या है.”
 “बात ये है,” पेर्सिकोव ने बड़ी दीनता से कहा, “आप प्राणि विशेषज्ञ नहीं हैं? नहीं ना? अफ़सोस...अगर होते तो आप एक बिन्दास प्रयोगकर्ता होते...हाँ...मगर, आप बहुत बड़ा ख़तरा मोल ले रहे हैं...क़ामयाबी तो नहीं मिलेगी...और आप बस मेरा समय बर्बाद कर रहे हैं...”
 “चैम्बर्स हम आपको वापस लौटा देंगे. ठीक है?”
 “कब?”
 “बस, मैं पहली खेप निकाल लूँ.”
 “ये आप कितने यक़ीन के साथ कह रहे हैं! ठीक है. पन्क्रात!”
 “मैं अपने साथ आदमी लाया हूँ,” रोक्क ने कहा, “और सेक्युरिटी गार्ड भी...”
शाम तक पेर्सिकोव की कैबिनेट अनाथ हो गई... मेज़ें ख़ाली हो गईं. रोक्क के आदमी तीन बड़े चैम्बर्स उठाकर ले गए, प्रोफेसर के लिए सिर्फ उसका पहले वाला, छोटा-सा चैम्बर छोड़ गए जिससे उसने अपने प्रयोग शुरू किए थे.
जुलै जैसा अंधेरा घिर आया, इन्स्टीट्यूट को उदासी ने घेर लिया, वह कॉरीडोर्स में फैल गई. कैबिनेट में क़दमों की एक सी आहट सुनाई दे रही थी – ये पेर्सिकोव था जो, बिना लाइट जलाए, बड़े कमरे में खिड़की से दरवाज़े की ओर निरंतर चक्कर लगा रहा था.
अजीब सी बात हो रही थी: इस शाम को इंस्टीट्यूट में रहने वाले इन्सानों और जानवरों पर भी एक ऐसी मायूसी की भावना हावी थी, जिसे समझाया नहीं जा सकता. न जाने क्यों मेंढक बडा दर्दभरा राग छेड़ रहे थे, और ख़ौफ़नाक ढंग से, मानो ख़तरे की चुनौती सी देते हुए टर्र-टर्र कर रहे थे. पन्क्रात को कॉरीडोर से एक घास के साँप को पकड़ना पड़ा, जो अपने पिंजरे से खिसक गया था, और, जब उसने उसे पकड़ा, तो ऐसे लगा, मानो साँप कहीं भागने की तैयारी में था, बस, वहाँ से जाना चाहता था.
देर शाम को पेर्सिकोव के कैबिनेट की घण्टी बजी. पन्क्रात ड्योढ़ी पर आया. और उसने एक अजीब सी तस्वीर देखी. कैबिनेट के बीचोंबीच वैज्ञानिक अकेला खड़ा था और मेज़ों की ओर देख रहा था. पन्क्रात खाँसा और, जैसे जम गया.
 “देखो, पन्क्रात,” पेर्सिकोव ने कहा और खाली मेज़ की ओर इशारा किया.
पन्क्रात बेहद डर गया. उसे ऐसा लगा कि अंधेरे में प्रोफेसर की आँखें रो रही थीं. ये इतना असाधारण, इतना डरावना था.
 “जी,” पन्क्रात ने रोनी आवाज़ में कहा और सोचा: ‘इससे बेहतर तो ये होता कि तुम मुझ पर गरजते!’
 “ये,” पेर्सिकोव ने दुहराया, और उसके होंठ एक बच्चे के होंठों जैसे थरथराए, जिससे बिना बात उसके प्यारे खिलौने को छीन लिया गया हो.
 “तुझे मालूम है, प्यारे पन्क्रात,” पेर्सिकोव ने खिड़की की ओर मुड़ते हुए आगे कहा, “ मेरी बीबी, जो पन्द्रह साल पहले ऑपेरा में काम करने के लिए चली गई थी, मगर अब, ऐसा लगता है, कि मर गई है... ये है बात, प्यारे पन्क्रात...मुझे ख़त भेजा गया है...”
मेंढक बड़ी दयनीयता से चिल्ला रहे थे, और शाम के अंधेरे ने प्रोफेसर को अपनी गिरफ़्त में ले लिया, और अब है...रात. मॉस्को...कहीं कुछ सफ़ेद गोले खिड़की के उस पार जल उठे. ..परेशान सा पन्क्रात दुखी हो रहा था, डर के मारे अटेन्शन की मुद्रा में खड़ा था.
 “जा, पन्क्रात,” प्रोफेसर ने बोझिल स्वर में कहा और हाथ हिलाया, “सो जा, प्यारे, दुलारे, पन्क्रात.”
और रात हो गई. पन्क्रात न जाने क्यों पंजों के बल कैबिनेट से भागा, अपनी कोठरी में आया, कोने में पड़े चीथड़ों को हटा कर वोद्का की बोतल निकाली और बड़ा गिलास भर के एक ही दम में पी गया. उसने नमक के साथ ब्रेड खाई और उसकी आँखों में कुछ चमक लौटी.
देर शाम, क़रीब-क़रीब आधी रात को, पन्क्रात नंगे पैर मद्धिम रोशनी वाले वेस्टिब्यूल में बेंच पर बैठकर फूलदार कमीज़ के नीचे अपने सीने को खुजाते हुए, ड्यूटी पर तैनात गार्ड-हैट से कह रहा था:
 “अच्छा होता अगर मार डालता, ऐ ख़ु...”
”क्या वाक़ई में रो रहा था?” गार्ड-हैट ने उत्सुकता से पूछा.
 “ऐ...ख़ु...” पन्क्रात ने यक़ीन दिलाया.
”महान वैज्ञानिक,” गार्ड-हैट ने सहमति दिखाई, “ज़ाहिर है कि मेंढक तो बीबी की जगह नहीं ले सकता.”
 “किसी हालत में नहीं,” पन्क्रात ने सहमत होते हुए कहा.
फिर उसने कुछ सोचा और आगे कहा:
 “मैं अपनी बीबी को यहाँ लाने की सोच रहा हूँ...वह गाँव ही में क्यों बैठी रहे. बस, वह इन साँपों को किसी हालत में बर्दाश्त न कर पाएगी...”
 “क्या कहें, ख़तरनाक किस्म का घिनौनापन है,” गार्ड-हैट ने सिर हिलाया.
वैज्ञानिक की कैबिनेट से कोई आवाज़ नहीं सुनाई दे रही थी. और उसमें रोशनी भी नहीं थी. दरवाज़े के नीचे रोशनी का धब्बा भी नहीं था.

***

शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

The Fateful Eggs - 6

अध्याय 6
जून 1928 का मॉस्को

वह जगमगा रहा था, रोशनियाँ नाच रही थीं, बुझतीं और फिर से जल उठतीं. थियेटर के चौक पर बसों की सफ़ेद बत्तियाँ, ट्रामों की हरी रोशनियाँ घूम रही थीं; भूतपूर्व ‘म्यूर और मेरिलिज़’ की छत पर, उस पर चढ़ाई गई दसवीं मंज़िल के ऊपर, एक रंगबिरंगी बिजली की औरत उछल रही थी, जो ‘वर्कर्स क्रेडिट’ का एक-एक अक्षर बाहर फेंकती जा रही थी. ‘बोल्शोय थियेटर’ के बाहर के चौक पर, जहाँ रात को रंगबिरंगा फ़व्वारा उछल रहा था, लोगों की भीड़ धक्का-मुक्की कर रही थी और भिनभिना रही थी. और बोल्शोय थियेटर के ऊपर एक भारी-भरकम लाउडस्पीकर घोषणा किए जा रहा था:
 ‘लेफ़ोर्तोव वेटेरिनरी इन्स्टीट्यूट के मुर्गियों की बीमारी वाले टीकों के बहुत अच्छे परिणाम आए हैं. मृत मुर्गियों की संख्या में आधे से भी ज़्यादा कमी हो गई है...’
इसके बाद लाउडस्पीकर ने अपना स्वर बदल दिया, उसके भीतर कुछ घरघराहट हुई, थियेटर के ऊपर हरी रोशनी जलती-बुझती रही, और लाउडस्पीकर गहरी आवाज़ में शिकायत-सी करने लगा:
 ‘मुर्गियों के प्लेग से निपटने के लिए एक आपात-कमिटी बनाई गई है जिसमें शामिल हैं पीपल्स कमिसार फॉर हेल्थ, पीपल्स कमिसार फॉर एग्रिकल्चर, डाइरेक्टर पशु-पालन विभाग कॉम्रेड प्ताखा-पोरोस्यूक, प्रोफेसर पेर्सिकोव, प्रोफेसर पोर्तुगालोव...और कॉम्रेड राबिनोविच!...घुसपैठ की नई कोशिशें!...’ लाउडस्पीकर सियार की तरह खिलखिलाता और रोता रहा, - ‘मुर्गियों के प्लेग के संबंध में!’
थियेटर का गलियारा, नेग्लिन्नी और लुब्यान्का, सफ़ेद और बैंगनी रोशनियों से दहक रहा था, किरणों से झिलमिला रहा था, साइरनों से चिंघाड़ रहा था और धूल के बादल से चकरा रहा था. तेज़ लाल-लाल रिफ्लेक्टरों से आलोकित दीवारों पर लगे बड़े-बड़े इश्तेहारों के पास लोगों के झुण्ड के झुण्ड जमा थे.
 “कड़ी सज़ा के प्रावधान को देखते हुए जनता को निर्देश दिया जाता है कि भोजन में मुर्गियों के माँस और अण्डों का उपयोग न करे. यदि प्राइवेट व्यापारी इन्हें बाज़ारों में बेचने की कोशिश करते पाए गए तो कानूनी कार्रवाई के अंतर्गत उनकी सारी सम्पत्ति ज़ब्त कर ली जाएगी. सभी नागरिक, जिनके पास अण्डे हैं, जल्दी से जल्दी उन्हें अपने निकट के पुलिस थाने में जमा कर दें.”
 ‘वर्कर्स न्यूज़पेपर’ की छत पर लगे स्क्रीन पर आसमान तक ऊँचा मुर्गियों का ढेर लगा था, और हरे-हरे अग्निशामक कर्मचारी, उनके छोटे-छोटे ढेर बनाकर उन पर पाइप से केरोसिन डालकर आग लगा देते. इसके बाद लाल-लाल लपटें स्क्रीन पर नाचतीं , बेजान धुँए का गुबार बाहर निकलता, बादलों की तरह बिखरने लगता, एक धार की तरह ऊपर उठता, चमकते अक्षर बाहर निकलते: “खोदीन्का में मुर्गियों के शव जलाए जा रहे हैं.”  
बदहवास रोशनी में नहाए दुकानों की शो-केसेस के बीच, जो रात के तीन बजे तक कारोबार करती थीं, सिर्फ दिन और रात के भोजनावकाश को छोड़कर, अन्धे छेदों से देख रही थीं कुछ ताले ठुँकी खिड़कियाँ जिन पर बैनर लगे थे ‘अण्डों का व्यापार. क्वालिटी की गारंटी.’
अक्सर, कर्कश साइरन बजातीं, फुफकारती ‘मॉस्को स्वास्थ्य विभाग.’ की एम्बुलेन्सें भारी बसों और पुलिस की गाड़ियों को ओवरटेक करते हुए निकल जातीं.         
“फिर कोई हो गया शिकार सड़े हुए अण्डों का,” भीड़ में सरसराहट होने लगती.
पेत्रोव्स्की लाइन्स पर विश्व प्रसिद्ध रेस्टॉरेंट ‘’एम्पायर’ हरे और नारंगी लैम्पों से जगमगा रहा था, और उसके भीतर की मेज़ों पर पोर्टेबल टेलिफोन्स के निकट पड़े थे शराब के धब्बों वाले कार्ड बोर्ड के नोटिस जिन पर लिखा था: ‘निर्देशों के अनुसार – ऑमलेट उपलब्ध नहीं है. ताज़े ऑयस्टर्स प्राप्त हुए हैं.’
हेर्मिटेज पार्क में, जहाँ बेजान, शिथिल हरियाली के बीच मोतियों की तरह मरियल चीनी लैम्प जल रहे थे, आँखों को चकाचौंध करते स्टेज पर गायक-जोड़ी श्राम्स और कर्मान्चिकोव कवियों की जोड़ी आर्गो और आर्गुयेव द्वारा रचित गीत गा रहे थे:
आह, मम्मा, क्या करूँगा मैं
बिना अण्डों के?? -              
और टॅप-डान्स कर रहे थे.
व्सेवोलोद मेयेरहोल्ड के नाम पर बना थियेटर, जो सन् 1927 में, जैसा कि सबको ज्ञात है, पूश्किन के ‘बोरिस गोदुनोव’ के प्रस्तुतिकरण के दौरान नग्न बोयारों वाले झूले के टूट जाने के कारण मर गये थे, रंगबिरंगी रोशनियों वाला इलेक्ट्रिक इश्तेहार दिखाए जा रहा था, जिसमें रिपब्लिक के प्रसिद्ध डाइरेक्टर, मेयेरहोल्ड के शिष्य कुख़्तेरमिअन द्वारा प्रस्तुत एरेन्डोर्ग के नाटक ‘मुर्गियों की बिदाई’ का ज़िक्र था. बगल में ही, ‘एक्वेरियम’ गार्डन में, निओन की रंगबिरंगी की रोशनियाँ फेंकते और अर्धनग्न औरत का शरीर दिखाते हुए,  ओपन-एयर स्टेज की हरियाली में तालियों के शोर के बीच लेखक लेवित्सेव का शो ‘मुर्गियों के बच्चे’ चल रहा था. और त्वेर्स्काया पर कान के नीचे एक एक लालटेन लटकाए, सर्कस के गधों की एक क़तार चली जा रही थी, जिनकी पीठ पर रखे थे जगमगाते पोस्टर्स. कोर्श थियेटर में रोस्तान के ‘शांतेक्लेर’ का पुन: प्रदर्शन हो रहा था.
मोटर-गाड़ियों के बीच से भागते हुए अख़बार बेचने वाले लड़के चीख़ रहे थे:
”ज़मीन के नीचे ख़तरनाक दौलत! पोलैण्ड ख़तरनाक युद्ध की तैयारी में!! प्रोफ़ेसर पेर्सिकोव के ख़तरनाक आविष्कार!!”
 भूतपूर्व निकितिन सर्कस के ताज़े गोबर से लिपे गीले भूरे अरेना में मुर्दना-सफ़ेद जोकर बोम ने ड्रॉप्सी के कारण फूल गए बीम से कहा:
 “मुझे मालूम है कि तू इतना दुखी क्यों है!”
 “कों?” फिसफिसाते हुए बीम ने पूछा.
 “तूने अपने अण्डे ज़मीन में गाड़ दिए थे, मगर पन्द्रहवें सेक्टर की पुलिस को वो मिल गए.”
 “हा-हा-हा-हा,” सर्कस में दर्शक इतनी ज़ोर से हँस पड़े कि नसों में बड़े प्यार से खून बहने लगा, और प्राचीन गुम्बद के नीचे ट्रेपेज़ी और मकड़-जाले हिलने लगे.
 “आ-आप्!” जोकर्स तीखे सुर में चिल्लाए, और एक तन्दुरुस्त सफ़ेद घोड़ा लाल पोषाक पहनी सुडौल पैरों वाली, ग़ज़ब की ख़ूबसूरत औरत को बिठाकर बाहर लाया.

*****

बिना किसी की ओर देखे, किसी पर भी ध्यान न देते हुए, वेश्याओं के धक्कों और नाज़ुक सिसकारियों का जवाब दिए बिना, उत्तेजित और अकेला, अप्रत्याशित प्रसिद्धी से मंडित पेर्सिकोव मोखोवाया स्ट्रीट पर मानेझ की निओन से प्रकाशित घड़ी की ओर चला जा रहा था. यहाँ, इधर-उधर देखे बगैर, अपने ख़यालों में डूबे वह एक विचित्र, पुराने फैशन के आदमी से टकरा गया, उँगलियाँ बड़ी ज़ोर से उस आदमी की कमर में लटके रिवॉल्वर के लकड़ी के होल्स्टर से टकराईं.
 “आह, शैतान!” पेर्सिकोव पतली आवाज़ में चीखा, “माफ़ कीजिए.”
 “माफ़ी चाहता हूँ,” अप्रिय आवाज़ में उस आदमी ने कहा, और लोगों की रेल-पेल में वे किसी तरह एक दूसरे से आज़ाद हुए. और प्रेचिस्तेन्को की ओर बढ़ता हुए प्रोफ़ेसर फ़ौरन ही इस टक्कर के बारे में भूल भी गया.

***