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मंगलवार, 11 अगस्त 2015

Reading Master and Margarita (HIndi) - 07

अध्याय 7

बुरा मकान
  

इससे पहले हम देख चुके हैं कि सोवियत संघ में साहित्यकारों को किस प्रकार की सुविधाएँ प्रदान की जाती थीं. बुल्गाकोव इस दुनिया को बहुत अच्छी तरह जानते थे. उन्हें मालूम था कि सिर्फ प्रोलेटरियन लेखकों को ही सरकार द्वारा सर्वोत्तम सुविधाएँ प्रदान की जाती थीं. मगर उन्हें शासकों द्वारा निर्धारित नियमों का कड़ाई से पालन करना पड़ता था. जो ऐसा नहीं करते थे उन्हें काफ़ी तकलीफ उठानी पड़ती थी. बुल्गाकोव इन्हीं में से एक थे.

अध्याय 7 से थियेटर-जगत के बारे में चर्चा आरम्भ होती है : कलाकारों, प्रशासकों, नाटककारों आदि के बारे में.

अध्याय 7 वेरायटी थियेटर के डाइरेक्टर स्तेपान लिखोदेयेव के बारे में है.

स्त्योपा (स्तेपान) सादोवाया स्ट्रीट पर बिल्डिंग नं. 302 के फ्लैट नं. 50 में रहता था. इसी फ्लैट में बेर्लिओज़ के पास भी दो कमरे थे.

यह फ्लैट बड़ा बदनाम था. यह जौहरी दे’फुजेर की विधवा पत्नी आन्ना फ्रांत्सेव्ना दे’फुजेर का था. अक्टूबर क्रांति के बाद उसने पाँच में से तीन कमरे दो लोगों को किराए पर दे दिए थे. वे बिना कोई नामोनिशान छोड़े गायब हो गए; आन्ना फ्रांत्सेव्ना गायब हो गई; उसकी धर्मभीरू नौकरानी अन्फीसा भी गायब हो गई. जो लोग गायब हो गए थे, वे फिर कभी भी दिखाई नहीं दिए.

 यहाँ यह बताना उचित होगा कि यह क्वार्टर, 50 नम्बर वाला, बदनाम तो नहीं, मगर फिर भी विचित्र रूप से चर्चित था. दो वर्ष पहले तक इसकी मालकिन जौहरी दे’फुझेर की विधवा थी. पचास वर्षीय अन्ना फ्रांत्सेव्ना दे’फुझेर ने, जो बड़ी फुर्तीली और आदरणीय महिला थी, पाँच में से तीन कमरे किराए पर दे दिए थे. एक ऐसे व्यक्ति को जिसका कुलनाम, शायद, बेलामुत था; और एक अन्य व्यक्ति को जिसका कुलनाम खो गया था.

और पिछले दो सालों से इस घर में अजीब-अजीब घटनाएँ होनी शुरू हो गईं. इस घर से लोग बिना कोई सुराग छोड़े गायब होने लगे.

एक बार किसी छुट्टी के दिन घर में एक पुलिसवाला आया. उसने दूसरे किराएदार को (जिसका कुलनाम खो चुका था) बाहर ड्योढ़ीं पर बुलाया और कहा कि उसे एक मिनट के लिए किसी कागज़ पर दस्तखत करने के लिए पुलिस थाने बुलाया गया है. किराएदार ने अन्ना फ्रांत्सेव्ना की वफादार नौकरानी अन्फीसा से कहा कि वह दस मिनट में लौट आएगा. इतना कहकर वह सफ़ेद दस्ताने पहने चुस्त-दुरुस्त पुलिसवाले के साथ चला गया. मगर वह न केवल दस मिनट बाद नहीं लौटा, बल्कि कभी भी नहीं लौटा. इससे भी अधिक आश्चर्य की बात यह हुई कि उसके साथ-साथ वह पुलिसवाला भी सदा के लिए लुप्त हो गया.

ईश्वर में विश्वास करने वाली, और स्पष्ट कहा जाए तो अंधविश्वासी, अन्फीसा ने बेहद परेशान अन्ना फ्रांत्सेव्ना से साफ-साफ कहा, कि यह काला जादू है और वह अच्छी तरह जानती है कि किराएदार और पुलिसवाले को कौन घसीट कर ले गया है, मगर रात में उसका नाम नहीं लेना चाहती. मगर काला जादू यदि एक बार शुरू हो जाए तो फिर उसे किसी भी तरह रोका नहीं जा सकता. दूसरा, बिना कुलनाम का किराएदार, जहाँ तक याद पड़ता है, सोमवार को ग़ायब हुआ था, और बुधवार को बेलामुत को माने ज़मीन गड़प कर गई, मगर भिन्न परिस्थितियों में. सुबह आम दिनों की तरह उसे काम पर ले जाने वाली कार आई और ले गई, मगर न उसे और दिनों की तरह वापस लाई और न ही फिर कभी इस तरफ दिखाई दी.

बेलामुत की पत्नी का दु:ख और भय अवर्णनीय है. मगर, अफ़सोस, दोनों ही अधिक दिनों तक नहीं रहे. उसी शाम अन्फीसा के साथ दाचा (शहर से बाहर बनाई गई समर क़ॉटेज) से, जहाँ कि अन्ना फ्रांत्सेव्ना जल्दबाजी में चली गई थी, लौटने पर उन्हें बेलामुत की पत्नी भी घर में नज़र नहीं आई. यह भी कम है : बेलामुत के दोनों कमरों के दरवाज़े भी सीलबन्द पाए गए.

किसी तरह दो दिन गुज़रे. तीसरे दिन अनिद्रा से ग्रस्त अन्ना फ्रांत्सेव्ना फिर से जल्दबाजी में दाचा चली गई...यह बताना पड़ेगा कि वह वापस नहीं लौटी.

अकेली रह गई अन्फीसा. जी भर कर रो लेने के बाद रात को दो बजे सोई. उसके साथ आगे क्या हुआ, मालूम नहीं, लेकिन दूसरे क्वार्टरों में रहने वालों ने बताया कि क्वार्टर नं. 50 में जैसे सुबह तक बिजली जलती रही और खटखटाहट की आवाज़ें आती रहीं. सुबह पता चला कि अन्फीसा भी नहीं है.

ग़ायब हुए लोगों के बारे में और इस शापित घर के बारे में इमारत के लोग कई तरह के किस्से कहते रहे, जैसे कि दुबली-पतली, ईश्वर भीरु अन्फीसा एक थैले में अन्ना फ्रांत्सेव्ना के पच्चीस कीमती हीरे ले गई; कि दाचा के लकड़ियाँ रखने के कमरे में उसी तरह के कई हीरे और सोने की कई मुहरें पाई गईं, और भी इसी तरह के कई किस्से; मगर जो बात हमें मालूम नहीं, उसे दावे के साथ नहीं कहेंगे.

जो कुछ भी हुआ हो, यह क्वार्टर सीलबन्द और खाली सिर्फ एक हफ़्ते तक रहा. उसके बाद उसमें रहने आए मृतक बेर्लिओज़ – अपनी पत्नी के साथ और यही स्त्योपा – अपनी बीबी के साथ. स्वाभाविक है कि जैसे ही वह इस घर में रहने लगे, उनके साथ भी शैतान जाने क्या-क्या होने लगा. केवल एक महीने के भीतर ही दोनों की पत्नियाँ ग़ायब हो गईं, मगर कुछ सुराग छोड़े बिना नहीं. बेर्लिओज़ की पत्नी के बारे में सुना गया कि वह खारकोव में किसी बैले प्रशिक्षक के साथ देखी गई; और स्त्योपा की पत्नी बोझेदोम्का में मिली, जहाँ, जैसी कि ख़बर है, वेराइटी थियेटर के डाइरेक्टर ने अपने असीमित प्रभाव के बल पर इस शर्त पर उसे कमरा दिलवा दिया कि सादोवाया रास्ते पर उसका नामोनिशान न रहे...

यह तत्कालीन वस्तुस्थिति की ओर इशारा करता है, जब लोग अचानक गायब हो जाते थे, खासकर रातों में. उनका क्या हश्र होता था यह किसी को पता भी नहीं चलता था.

तो, बेर्लिओज़ की मृत्यु के दूसरे दिन सुबह स्त्योपा ने बड़ी मुश्किल से अपने शयन-कक्ष में आँखें खोलीं. अपने सामने वह एक विदेशी को देखता है, जो काले जादू के प्रोफेसर के रूप में अपना परिचय देता है. प्रोफेसर यह भी बताता है कि पिछले ही दिन उसने स्त्योपा के साथ एक एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए हैं जिसके अनुसार वेरायटी में काले जादू के ‘शो’ का आयोजन किया जाना था. प्रोफेसर को वेरायटी की ओर से कुछ अग्रिम धन राशि भी दी गई थी.

स्त्योपा ने सोचा कि यह कल रात की वोद्का का ही परिणाम है. उसने कल कुछ ज़्यादा ही पी ली थी, इसीलिए उसे इस जादूगर और उसके ‘शो’ के बारे में कुछ भी याद नहीं रहा. जादूगर उसे ‘कॉन्ट्रेक्ट’ दिखाता है...स्त्योपा वेरायटी के वित्तीय डाइरेक्टर को फोन करता है और उसे बताया जाता है कि जादूगर का ‘शो’ आज ही शाम को होने वाला है...

जब स्त्योपा फोन करने के बाद अपने शयन-कक्ष में वापस आता है तो देखता है कि जादूगर अब अपने सहयोगियों के साथ बैठा है, जिन्हें फोन करते समय स्त्योपा ने अपने शयन-कक्ष के शीशे से एक-एक करके बाहर आते देखा था:

शयनगृह में अब मेहमान अकेला नहीं था, बल्कि अपने पूरे गुट के साथ था. दूसरी कुर्सी में वही व्यक्ति था जो अभी-अभी आइने से प्रकट हुआ था. अब वह अच्छी तरह दिखाई दे रहा था : परों जैसी मूँछें, चश्मे की एक काँच चमकती हुई और दूसरी काँच गायब. शयनगृह में और भी बदतर चीज़ें दिखाई दे रही थीं : गद्देदार स्टूल पर पालथी मारे जो तीसरा प्राणी बैठा था वह कोई और नहीं बल्कि वही अकराल-विकराल बिल्ला था जिसने एक पंजे में वोद्का का पैग और दूसरे में नमकीन कुकुरमुत्ता टँका काँटा पकड़ रखा था.

रोशनी, जो शयनगृह में वैसे ही कम थी, स्त्योपा को गुल होती नज़र आई – ‘शायद ऐसे ही पागल हुआ करते हैं!’ उसने सोचा और दीवार की सहारा लेकर अपने आप को गिरने से रोका.

 “मैं देख रहा हूँ कि आपको कुछ आश्चर्य हो रहा है, परमप्रिय स्तेपान बोग्दानोविच?” वोलान्द दाँत किटकिटाते हुए स्त्योपा से मुखातिब हुआ, “असल में अचरज करने जैसी कोई बात है ही नहीं. यह मेरे सहयोगी हैं.”

जैसे ही बिल्ले ने वोद्का का पैग खत्म किया, स्त्योपा का हाथ दरवाज़े की चौखट से सरककर नीचे गिर पड़ा.

 “और इन सहयोगियों को जगह चाहिए,” वोलान्द बोलता रहा, “मतलब यह कि हम चारों में से कोई एक इस क्वार्टर में फालतू है. मेरा ख़्याल है कि वह फालतू व्यक्ति हैं आप!”
 “वे ही! वे ही!” बकरी जैसी आवाज़ में चौखाने वाला लम्बू मिमियाया, स्त्योपा के लिए बहुवचन का प्रयोग करते हुए, “ख़ास तौर से पिछले कुछ दिनों से बहुत सुअरपना कर रहे हैं. शराब पीते रहते हैं, अपने पद का फ़ायदा उठाकर औरतों से सम्बन्ध बनाते रहते हैं, कुछ भी काम नहीं करते, और कुछ कर भी नहीं सकते, क्योंकि जो भी काम दिया जाता है, उसे ये समझ ही नहीं पाते. अधिकारियों की आँखों में धूल झोंकते रहते हैं!”
 “सरकारी कार को फालतू दौड़ाते रहते हैं!” कुकुरमुत्ते को चूसते हुए बिल्ले ने रूठे हुए स्वर में जोड़ा.

और तभी इस क्वार्टर में चौथी और अंतिम घटना घटी, जब स्त्योपा ने लगभग फर्श पर घिसटते हुए दरवाज़े की चौखट को खरोचना शुरू किया.

शीशे में से सीधे कमरे में उतरा एक छोटा-सा मगर असाधारण रूप से चौड़े कन्धों वाला आदमी, जिसने सिर पर हैट लगा रखा था और जिसका एक दाँत बाहर को निकला था. इस दाँत ने वैसे ही गन्दे उसके व्यक्तित्व को और भी अस्त-व्यस्त बना दिया था. इस सबके साथ उसके बाल भी आग जैसे लाल रंग के थे.

 “मैं,” बातचीत में यह नया व्यक्ति भी टपक पड़ा, “समझ नहीं पा रहा, कि वह डाइरेक्टर कैसे बन गया!”

लाल बालों वाला अनुनासिक स्वर में बोले जा रहा था, “यह वैसा ही डाइरेक्टर है जैसा कि मैं बिशप!”
 “तुम बिशप जैसे बिल्कुल नहीं लगते, अज़ाज़ेलो!” बिल्ले ने सॉसेज के टुकड़े अपनी प्लेट में डालते हुए फिकरा कसा.
 “यही तो मैं भी कहता हूँ!” लाल बालों वाले की नाक बोली, और वोलान्द की ओर मुड़कर वह आदरपूर्वक बोला, “महाशय, उसे मॉस्को के सब शैतानों के बीच फेंकने की आज्ञा दें!”
 “फेंक दो!!!” अचानक अपने बाल खड़े करते हुए बिल्ला गुर्राया.

तब स्त्योपा के चारों ओर शयनगृह घूमने लगा, वह सिर के बल दहलीज़ से टकराया और होश खोते हुए सोचने लगा, ‘मैं मर रहा हूँ...’

जादूगर स्त्योपा को समझाता है कि यह उसकी ‘टीम’ है और इसे रहने के लिए जगह चाहिए. सिर्फ एक ही व्यक्ति जो इस कमरे में फालतू है, किसी काम का नहीं है, वह है स्त्योपा, और इसलिए उसे जाना पड़ेगा.

स्त्योपा का फालतूपन बिल्ले द्वारा सिद्ध कर दिया जाता है : बिल्ला कहता है कि स्त्योपा गुण्डा, बदमाश है; कई लफ़ड़ों में उलझ जाता है; अपनी सरकारी कार का दुरुपयोग करता है; अपने शासकीय ओहदे का उपयोग करके अपने लिए काम करवा लेता है; औरतों के पीछे पड़ा रहता है; एक भी काम ढंग से नहीं करता क्योंकि उसे कुछ करना आता ही नहीं है!

ये बुल्गाकोव केवल स्त्योपा के ही बारे में नहीं कह रहे हैं, उनका इशारा ऐसे अनेक निठल्ले, निकम्मे लोगों की ओर है जो थियेटर जगत में महत्त्वपूर्ण जगहों पर विराजमान हैं.


तो, स्त्योपा को फ्लैट नं. 50 से बाहर फेंक दिया जाता है और आँख खुलने पर वह पाता है कि वह याल्टा में समुद्र के एकदम किनारे पर पड़ा है!

सोमवार, 10 अगस्त 2015

Reading Master and Margarita (Hindi) - 06

अध्याय – 6

उन्माद, यही बताया गया

जब मॉस्को के बाहर, नदी के किनारे स्थित हाल ही में बनाए गए प्रख्यात मानसिक रुग्णालय के अतिथि-कक्ष में सफ़ेद कोट पहने तीखी दाढ़ी वाला एक व्यक्ति दाख़िल हुआ, तब रात का डेढ़ बज रहा था. तीन स्वास्थ्य कर्मचारी सोफ़े पर बैठे हुए इवान निकोलायेविच पर से दृष्टि नहीं हटा रहे थे. वहीं, बहुत परेशान कवि र्‍यूखिन भी था. जिन तौलियों से इवान निकोलायेविच को बाँधा गया था, वे अब उसी सोफ़े पर एक ढेर में पड़े थे. इवान निकोलायेविच के हाथ और पैर अब मुक्त थे.

प्रोफेसर स्त्राविन्स्की का क्लिनिक शहर के बाहर नया नया खुला है. हम देखेंगे कि अधिकाधिक लोग वहाँ लाए जाएँगे.

इवान बेज़्दोम्नी धमकी देता है कि वह बलपूर्वक इस मानसिक रुग्णालय में लाए जाने का विरोध करेगा. वह इस बात पर ज़ोर देता है कि वह पूरी तरह सामान्य है.

“तुम सब मुझसे दूर हटो, जहन्नुम में जाओ, सचमुच जहन्नुम में जाओ!” इवान रूखेपन से चिल्लाया और उसने मुँह फेर लिया.
 “आप गुस्सा क्यों होते हैं? क्या मैंने आपसे कोई अप्रिय बात कह दी?”
 “मेरी उम्र तेईस वर्ष है,” तैश में आकर इवान बोला, “और मैं आप सबकी शिकायत करूँगा, और जूँ के अण्डे, तुम्हें तो मैं अच्छी तरह देख लूँगा!” उसने र्‍यूखिन से अलग से कहा.
 “आप किस बात की शिकायत करेंगे?”
 “यही कि आप सब, मुझको, एक स्वस्थ आदमी को ज़बर्दस्ती पागलखाने ले आए है!” इवान ने क्रोधित होकर कहा.
अब र्‍यूखिन ने इवान को ग़ौर से देखा. उसके हाथ-पैर ठण्डे पड़ गए : सचमुच, उसकी आँखों में पागलपन के कोई लक्षण नहीं थे. अब वे धुँधली के स्थान पर, जैसी कि ग्रिबोयेदव में थीं, पूर्ववत स्पष्ट पारदर्शी दिखाई देने लगी थीं.
 ‘बाप रे!’ घबराहट से र्‍यूखिन ने सोचा, ‘हाँ, यह तो बिल्कुल सामान्य है? ओह, क्या गड़बड़ हो गई! हम उसे, सचमुच, यहाँ क्यों घसीट लाए हैं? सामान्य है, एकदम सामान्य, सिर्फ कुछ खरोंचें हैं...’


अब र्‍यूखिन  को एहसास होता है कि इवान के चेहरे पर तो किसी भी मानसिक बीमारी का कोई लक्षण ही नहीं है. वह घबरा जाता है...

इवान पर तो र्‍यूखिन का भण्डा फोड़ करने की धुन सवार हो गई:

....बेवकूफ़ों की भीड़ में एक सामान्य व्यक्ति तो मिला, उन बेवकूफ़ों में से पहला है मूढ़ और प्रतिभाशून्य साश्का!”
 “यह साश्का प्रतिभाशून कौन है?” डॉक्टर ने जानना चाहा.
 “यही र्‍यूखिन!” इवान ने अपनी गन्दी उँगली से र्‍यूखिन की ओर इशारा करते हुए कहा.
वह अपमान से फट पड़ा.
 ....
“इसकी मानसिकता एकदम कुलाकों जैसी है,” इवान निकोलायेविच ने आगे कहा, जिसे र्‍यूखिन का भंडाफोड़ करने की धुन सवार थी, “ऐसा कुलाक, जिसने सर्वहारा वर्ग का नक़ाब पहन रखा है. इसके मरियल जिस्म को देखिए और उसे इसकी खनखनाती कविता से मिलाइए जो इसने पहली मई के उपलक्ष्य में लिखी थी : हा...हा...हा... ‘ऊँचे उठो!’ और ‘बिखर जाओ!’...और आप इसकी अंतरात्मा में झाँककर देखिए, वह क्या सोच रहा है...और आप चौंक पड़ेंगे!” इवान निकोलायेविच भयंकर हँसी हँसा.

र्‍यूखिन गहरी साँसें ले रहा था. उसका चेहरा लाल हो गया था. वह सिर्फ एक ही बात सोच रहा था – उसने आप ही नाग को अपने सीने पर बुला लिया है, कि उसने उस व्यक्ति के मामले में टाँग अड़ाई है जो उसका कट्टर शत्रु साबित हुआ है. रोना तो इस बात का था कि अब कुछ किया भी नहीं जा सकता था : पागल के ऊपर कौन गुस्सा कर सकता है?

र्‍यूखिन बहस नहीं करता, मगर जब वह इवान को अस्पताल में छोड़कर मॉस्को वापस लौट रहा था तो वह स्वीकार करता है कि वे शब्द जो इवान ने उस पर फेंके थे हालाँकि बड़े अपमानजनक थे, मगर थे एकदम सही.

बुल्गाकोव ने जिस प्रकार र्‍यूखिन का चित्रण किया है, उससे पता चलता है कि उसका इशारा प्रसिद्ध क्रांतिकारी कवि व्लादीमिर मायाकोव्स्की की ओर है. निम्नलिखित वर्णन इस बात को स्पष्ट करने में सहायक है:

 इसकी मरियल कदकाठी की ओर ध्यान दीजिए और उसकी तुलना इसकी गरजदार कविता से कीजिए, जो इसने पहली मई के मौके पर लिखी है...’उठो!....और बिखर जाओ!’ और क्या यह अपने द्वारा लिखी गई कविता के एक भी शब्द पर विश्वास करता है? ज़रा उसके दिल में झाँक कर देखिए और आप चौंक जाएँगे यह देखकर कि वह क्या सोच रहा है!”

मास्टर और मार्गारीटा” में हम अक्सर सभी घरों से, शहर के सभी कोनों से रेडिओ से आती हुई एक भारी-भरकम आवाज़ को सुनते हैं...यह मायाकोव्स्की की ही आवाज़ है.

बुल्गाकोव और मायाकोव्स्की एक दूसरे को पसन्द नहीं करते थे और एक दूसरे की खिंचाई करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते थे. मायाकोव्स्की ने अपने नाटक ‘खटमल’ के एक दृश्य में बुल्गाकोव का मज़ाक उड़ाया है यह कहकर कि उसका नाम सिर्फ पुरातन शब्दों के शब्दकोष में ही पाया जाता है.
बुल्गाकोव ने भी मायाकोव्स्की को कभी छोड़ा नहीं...

मगर मॉस्को वापस लौटते समय र्‍यूखिन अपनी परिस्थिति का विश्लेषण करता है और उसे इस बात का एहसास हो जाता है कि उसका जीवन व्यर्थ हो चुका है और अब उसे सुधारने के लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता. “मैं 32 वर्ष का हूँ, और आगे क्या? शायद मैं हर साल कुछ कविताएँ लिखता रहूँ...फिर क्या? कब तक? बुढ़ापे तक? इन कविताओं से उसे मिला ही क्या है? प्रसिद्धी? ओह, कम से कम अपने आप को तो धोखा न दो....प्रसिद्धी कभी उनके कदम नहीं चूमती जो वाहियात किस्म की, बेवकूफी भरी कविताएँ लिखते हैं. वे कविताएँ वाहियात क्यों हैं? जो कुछ भी मैं लिखता हूँ, उसके एक भी शब्द पर मैं विश्वास नहीं करता! ज़िन्दगी में अब कुछ भी सुधारना मुमकिन नहीं है...वह बरबाद हो गई है!”

फिर र्‍यूखिन को लेकर आ रहा ट्रक एक स्मारक के पास रुकता है...पाषाण का बना हुआ एक आदमी सिर झुकाए खड़ा है, “ये है वास्तविक, सम्पूर्ण सफलता का उदाहरण! जो कुछ भी उसने किया, चाहे जिस परिस्थिति में भी उसे धकेला गया, हर चीज़ ने उसे प्रसिद्धी ही प्रदान की! वर्ना कैसा सम्मोहन है इन शब्दों में, ‘तूफ़ानी धुँध...’? और उस श्वेत सैनिक ने उसे मार डाला और अमर बना दिया...

यह ज़िक्र है पूश्किन के बारे में...

तो, बुल्गाकोव ने बीसवीं शताब्दी के दूसरे-तीसरे दशकों की साहित्यिक झलक दिखला दी है और उसकी तुलना उन्नीसवीं शताब्दी के साहित्य से करके यह दिखा दिया है कि वह कौन सी चीज़ है जो कविता को अमर बना देती है!

कृपया ध्यान दीजिए कि हमारे घटनाक्रम का पहला दिन यहाँ समाप्त होता है. ये सप्ताह का कौन सा दिन है, यह अभी तक पता नहीं चल पाया है. घटनाक्रम पत्रियार्शी तालाब के किनारे बने पार्क में और उसके आसपास तथा ग्रिबोयेदोव भवन में घटित होता है फिर वह मॉस्को के सीमावर्ती भाग में बने स्त्राविन्स्की क्लिनिक में स्थानांतरित हो जाता है. इवान को ‘शिज़िफ्रेनिया’ का मरीज़ बता दिया जाता है...तो इस तरह रहस्यमय प्रोफेसर की दोनों भविष्यवाणियाँ सही साबित होती हैं.



इवान को इस अस्पताल के कमरा नं. 117 में रखा जाता है और हम देखेंगे कि शीघ्र ही उसके आसपास और कई लोग आ जाते हैं.

रविवार, 9 अगस्त 2015

Reading Master and Margarita (Hindi) - 05

अध्याय - 5

सारा मामला ग्रिबोयेदोव में ही था


ग्रिबोयेदोव भवन का, जहाँ मासोलित का कार्यालय स्थित था, विस्तार से वर्णन किया गया है. बुल्गाकोव बताते हैं कि इस भवन में क्या क्या होता था...

मॉसोलित ग्रिबोयेदव में इस तरह स्थित था कि उससे अच्छा और आरामदेह विकल्प कोई और हो ही नहीं सकता था. ग्रिबोयेदव में आने वाले हर व्यक्ति को, इच्छा न होते हुए भी, विभिन्न खेल मण्डलियों के विज्ञापनों को और मॉसोलित के सदस्यों के सामूहिक तथा व्यक्तिगत फोटो को देखना ही पड़ता था, जिनसे इस भवन की दूसरी मंज़िल को जाने वाली सीढ़ियों की दीवारें सुसज्जित थीं.
दूसरी मंज़िल के पहले ही कमरे के दरवाज़े पर लिखा हुआ था, ‘मछली-अवकाश विभाग’ वहीं जाल में फँसी लाल पंखों वाली बड़ी-सी मछली का चित्र भी लगा था.

दूसरे नम्बर के कमरे के दरवाज़े पर कुछ-कुछ समझ में न आने वाली बात लिखी थी : ‘एक दिवसीय सृजनात्मक यात्रा पास. एम.वी. पद्लोझ्नाया से मिलें’
अगले दरवाज़े पर एक छोटी-सी किन्तु बिल्कुल ही समझ में न आने वाली इबारत थी. फिर ग्रिबोयेदव में आए व्यक्ति की नज़रें बुआजी के घर के अखरोट के मज़बूत दरवाज़े पर लटकी तख़्तियों पर घूमने लगतीं. ‘पक्लोव्किना से मिलने के लिए यहाँ नाम लिखाइए’, ‘टिकट-घर’, ‘चित्रकारों का व्यक्तिगत हिसाब’...  
नीचे की मंज़िल पर लगी बहुत लम्बी क़तार के ऊपर से, जिसमें हर मिनट लोगों की संख्या बढ़ती जा रही थी, वह तख़्ती देखी जा सकती थी, जिस पर लिखा था : ‘क्वार्टर-सम्बन्धी प्रश्न’.
‘क्वार्टर-सम्बन्धी प्रश्न’ के पीछे एक शानदार पोस्टर देखा जा सकता था. उसमें एक बहुत बड़ी चट्टान दिखाई गई थी. चट्टान के किनारे-किनीरे नमदे के जूते पहने, कन्धों पर बर्छा लिए एक नौजवान चला जा रहा था. नीचे लिण्डन के वृक्ष और एक बालकनी. बालकनी पर एक नौजवान परों का टोप पहने, कहीं दूर साहसी आँखों से देखता हुआ, हाथ में फाउंटेन पेन पकड़े हुए. इस पोस्टर के नीचे लिखा था : ‘सृजनात्मक कार्यों के लिए पूरी सुविधाओं सहित छुट्टियाँ – दो सप्ताह से (कथा – दीर्घकथा) एक वर्ष (उपन्यास – तीन खण्डों वाला उपन्यास) तक, याल्टा, सूकसू, बोरावोये, त्सिखिजिरी महिंजौरी, लेनिनग्राद (शीतमहल)’. इस दरवाज़े के सामने भी लाइन लगी थी, मगर बहुत लम्बी नहीं, क़रीब डेढ़ सौ व्यक्ति होंगे.

आगे, ग्रिबोयेदव भवन के हर मोड़ पर, सीढ़ी पर, कोने पर कोई न कोई तख़्ती देखी जा सकती थी :
मॉसोलित निदेशक : टिकट घर नं. 2,3,4,5.; सम्पादक मण्डल, मॉसोलित अध्यक्ष, बिलियर्ड कक्ष, विभिन्न प्रकार के प्रशासनिक कार्यालय. और अंत में वही स्तम्भों वाला हॉल जहाँ बुआ जी अपने बुद्धिमान भतीजे की हास्यपूर्ण रचना का आस्वाद लिया करती थीं.

ग्रिबोयेदव में आने वाला हर व्यक्ति, यदि वह बिल्कुल ही मूर्ख न हो, सहजता से अनुमान लगा सकता था कि मॉसोलित के भाग्यशाली सदस्य कितना शानदार जीवन बिता रहे हैं, और तत्क्षण ईर्ष्या की एक काली छाया उस पर हावी होने लगती थी. फ़ौरन ही वह आकाश की ओर दुःखभरी नज़र डालकर उस परमपिता परमात्मा को कोसने लगता था कि उसने उसे कोई भी साहित्यिक योग्यता क्यों नहीं प्रदान की, जिसके बिना मॉसोलित के भूरे, महँगे चमड़े से मढ़े, सुनहरी किनारी वाले पहचान-पत्र का स्वामी होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, जिससे मॉस्को के लगभग सभी लोग परिचित थे.

ईर्ष्या के बारे में कोई क्या कह सकता है? यह एक बुरा गुण है, मगर फिर भी अतिथि की दृष्टि से देखना होगा. जो कुछ भी उसने ऊपर की मंज़िल पर देखा है, वही और केवल वही सब कुछ नहीं था. बुआ जी के मकान की पूरी निचली मंज़िल एक रेस्तराँ ने घेर रखी थी, वह भी कैसा रेस्तराँ! सच कहा जाए तो यह मॉस्को का सबसे बढ़िया रेस्तराँ था. न केवल इसलिए कि वह लम्बी अयालों वाले घोड़ों के चित्रों से सुसज्जित कमानीदार छत वाले दो हॉलों में स्थित था, न केवल इसलिए कि उसकी हर टेबल पर सुन्दर ढक्कन वाला लैम्प था, न केवल इसलिए कि सड़क से गुज़रने वाला हर आदमी वहाँ प्रवेश नहीं पा सकता था, बल्कि इसलिए कि उसमें प्राप्त होने वाली हर वस्तु बहुत बढ़िया किस्म की होती थी और इस बढ़िया वस्तु के लिए कीमत भी एकदम वाजिब थी.

मासोलित के सदस्यों को हरसम्भव बेहतरीन सुविधाएँ प्रदान करना, जिनमें शामिल था बेहतरीन खाना, लेखकों की बस्ती पेरेलीगिनो में आवास प्रदान करना, साहित्य की रचना करने के लिए मुफ्त यात्रा एवम् अवकाश...संक्षेप में ये वो जगह थी जहाँ प्रोलेटेरियन लेखकों का ‘पालन-पोषण’ किया जाता था. उन्हें समाज से दूर रखा जाता था और उनकी बेहतरीन आवभगत की जाती थी. मासोलित का पहचान-पत्र रखना बड़े गर्व की बात समझी जाती थी.

आइए, अब कुछ और चीज़ों की ओर चलते हैं:

इस भवन को ग्रिबोयेदोव का नाम क्यों दिया गया? बुल्गाकोव कहते हैं कि यह घर प्रख्यात लेखक ग्रिबोयेदोव की बुआ का था और वह अपने नाटक ‘बुद्धि से दुर्भाग्य’ के अंश इस बुआ को पढ़कर सुनाया करता था, जो स्तम्भों वाले हॉल में सोफे पर पड़े-पड़े उन्हें सुना करती थी. मगर बुल्गाकोव फौरन ही अपने इस कथन को नकार देते हैं और कहते हैं, “हमें मालूम नहीं कि ग्रिबोयेदोव की कोई ऐसी बुआजी भी थीं जो इतने विशाल प्रासाद की मालकिन थीं,” और आगे कहते हैं, “ऐसी कोई बुआजी थीं या नहीं, हमें मालूम नहीं...वह अपने नाटक के अंश उन्हें पढ़कर सुनाया करता था या नहीं, हम विश्वास के साथ नहीं कह सकते...हो सकता है उसने पढ़े हों, हो सकता है, नहीं भी पढ़े हों.”

यह भी उस प्रसंग  जैसा है जब बेर्लिओज़ प्रोफेसर से कहता है कि हालाँकि उसकी कहानी है तो बड़ी दिलचस्प मगर वह पवित्र बाइबल में दिए गए प्रसंग से मेल नहीं खाती...पाठक को फौरन यह आभास हो जाता है कि येशुआ – पोन्ती पिलात प्रसंग वास्तविक ईसा के बारे में नहीं है!
यही बात यहाँ भी है.

मगर फिर ‘ग्रिबोयेदोव’ क्यों? जिस बिल्डिंग का ज़िक्र हो रहा है, वह वास्तव में है ‘गेर्त्सेन-भवन’... बुल्गाकोव ने इसे ग्रिबोयेदोव-भवन का नाम दे दिया. फिर वही बात: बुद्धि से / विचार प्रक्रिया से सम्बन्धित. ग्रिबोयेदोव के नाटक ‘बुद्धि से दुर्भाग्य’ में इस बात का वर्णन है कि किस प्रकार एक पढ़ा-लिखा/ बुद्धिमान/ तर्कपूर्ण विचार करने वाला नौजवान अनपढ़ लोगों के समाज में दुख पाता है. 

यहाँ यही बात बुल्गाकोव के तत्कालीन समाज (साहित्यिक समाज) पर लागू होती है.

तो, इवान बेज़्दोम्नी ग्रिबोयेदोव भवन पहुँचता है प्रोफेसर की तलाश में...

वहाँ बारह लेखक (बारह शिष्य!) मीटिंग के लिए बेर्लिओज़ का इंतज़ार कर रहे हैं...एक छोटे, उमस भरे कमरे में और बेर्लिओज़ को देर करने के लिए कोसते हुए अपनी खीझ उतारते हैं.

जब बेर्लिओज़ पत्रियार्शी पर मर गया, उस रात साढ़े ग्यारह बजे, ग्रिबोयेदव की ऊपरी मंज़िल पर सिर्फ एक ही कमरे में रोशनी थी. वहाँ क़रीब बारह साहित्यकार मीटिंग के लिए ठँसे हुए थे और मिखाइल अलेक्सान्द्रोविच का इंतज़ार कर रहे थे.
मेज़ों, कुर्सियों और दोनों खिड़कियों की देहलीज़ पर बैठे इन लोगों का मॉसोलित के प्रबन्धक के कमरे में गर्मी और उमस के मारे दम घुटा जा रहा था. खुली खिड़कियों से ताज़ी हवा की एक छोटी-सी लहर भी प्रवेश नहीं कर पा रही थी. मॉस्को दिन भर की सीमेंट के रास्तों पर जमा हुई ऊष्मा को बाहर निकाल रहा था और यह स्पष्ट था कि इस गर्मी से रात को कोई राहत नहीं मिलेगी. बुआजी के घर के तहख़ाने में स्थित रेस्तराँ के रसोई घर से प्याज़ की ख़ुशबू आ रही थी. सभी प्यासे, घबराए और क्रोधित थे.
शांत-व्यक्तित्व कथाकार बेस्कुदनिकोव ने सलीके से कपड़े पहन रखे थे. उसकी आँखें हर चीज़ को ध्यानपूर्वक देखती थीं, मगर जिनका भाव किसी पर प्रकट नहीं होता था. उसने घड़ी निकाली. सुई ग्यारह के अंक पर पहुँचने वाली थी. बेस्कुदनिकोव ने घड़ी के डायल पर ऊँगली से ठक-ठक किया और उसे पास ही मेज़ पर बैठे कवि दुब्रात्स्की को दिखाया. वह व्याकुलता से अपनी टाँगें हिला रहा था. उसने पीले रबड़ के जूते पहन रखे थे.
 “सचमुच”, दुब्रात्स्की बड़बड़ाया.
 “पट्ठा शायद क्ल्याज़्मा में फँस गया है,” भारी आवाज़ में नस्तास्या लुकिनीश्ना नेप्रेमेनोवा ने कहा. नस्तास्या मॉस्को के एक व्यापारी वर्ग की अनाथ बेटी थी, जो लेखिका बन गई थी और ‘नौचालक जॉर्ज’ के उपनाम से समुद्री बटालियन सम्बन्धी कहानियाँ लिखा करती थी.
 “माफ़ करें!” लोकप्रिय स्केच लेखक जाग्रिवोव ने बेधड़क कहा, “मैं तो यहाँ उबलने के बजाय बाल्कनी में चाय पीना पसन्द करता. सभा तो दस बजे होने वाली थी न?”
  “इस समय क्ल्याज़्मा में बड़ा अच्छा मौसम है...” नौचालक जॉर्ज ने सभी उपस्थितों को उकसाते हुए कहा. वह जानती थी कि साहित्यकारों की देहाती बस्ती पेरेलीगिनो क्ल्याज़्मा में है, जो सभी की कमज़ोरी थी.
 “शायद अब कोयल ने भी गाना शुरु कर दिया होगा. मुझे तो हमेशा शहर से बाहर ही काम करना अच्छा लगता है, ख़ासतौर से बसंत में.”
 “तीन साल से पैसे भर रहा हूँ, ताकि गलगण्ड से ग्रस्त अपनी बीमार पत्नी को इस स्वर्ग में भेज सकूँ, मगर अभी दूर-दूर तक आशा की कोई किरण नहीं नज़र आती,” ज़हर बुझे और दुःखी स्वर में उपन्यासकार येरोनिक पप्रीखिन ने कहा.
 “यह तो जिस-तिसका नसीब है,” आलोचक अबाब्कोव खिड़की की देहलीज़ से भनभनाया.
नौचालक जॉर्ज की आँखों में ख़ुशी तैर गई. वह अपनी भारी आवाज़ को थोड़ा मुलायम बनाकर बोली, “मित्रों..., हमें ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए. उस देहाती बस्ती में हैं केवल बाईस घर और सिर्फ सात और नए घर बनाए जा रहे हैं, और हम मॉसोलित के सदस्य हैं तीन हज़ार.”
 “तीन हज़ार एक सौ ग्यारह,” कोने से किसी ने दुरुस्त किया.
 “हूँ, देखिए” - नौचालक ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “क्या किया जाए? ज़ाहिर है कि देहाती घर हममें से सबसे योग्य व्यक्तियों को ही मिले हैं...”
 “जनरलों!” सीधे-सीधे झगड़े में कूदता हुआ नाट्य कथाकार ग्लुखारेव बोला.
बेस्कुदनिकोव कृत्रिम ढंग से जँभाई लेता हुआ कमरे से बाहर निकल गया.
 “पेरेलीगिनो के पाँच कमरों में एक अकेला!” उसके जाते ही ग्लुखारेव ने कहा.
 “लाव्रोविच तो छह कमरों में अकेला है,” देनिस्कीन चिल्लाया, “और भोजनगृह में पूरा शाहबलूत का फर्नीचर है!”
 “ऐ, इस समय बात यह नहीं है,” अबाब्कोव भिनभिनाया, “बात यह है कि साढ़ ग्यारह बज चुके हैं.”
अचानक शोर सुनाई दिया, शायद कुछ आदमियों में लड़ाई हो रही थी. घृणित पेरेलीगिनो में लोग फोन करने लगे, फोन की घण्टी किसी और घर में बजी, जहाँ लाव्रोविच रहता था; पता चला कि लाव्रोविच नदी पर गया है, और यह सुनकर सभी को बड़ा गुस्सा आया. फिर यूँ ही ललित कला संघ में एक्सटेंशन नम्बर 930 पर फोन किया गया, मगर, ज़ाहिर है, वहाँ से किसी ने जवाब नहीं दिया.
 “वह कम से कम फोन तो कर ही सकता था,” देनीस्किन, ग्लुखारेव और क्वांत चिल्लाए.

और जब ग्रिबोयेदोव का प्रसिद्ध ‘जाज़’ आरम्भ हो जाता है, तो वे कुछ खाने के लिए नीचे आ जाते हैं. अचानक बेर्लिओज़ की मृत्यु की खबर फैल जाती है. जाज़ रुक जाता है, लोग कुछ समय के लिए खाना और पीना बन्द कर देते हैं, मगर धीरे-धीरे फिर से शुरू हो जाते हैं, यह कहते हैं हम कर भी क्या सकते हैं? वोद्का क्यों फेंकी जाए? वह मर गया मगर हम तो ज़िन्दा हैं और ज़िन्दा रहने के लिए हमें खाना पीना तो पड़ेगा ही. एक कड़वा सच!

ग्रिबोयेदोव भवन के मैनेजर की ओर ध्यान दीजिए. बुल्गाकोव कहते हैं और फौरन अपनी बात को नकार भी देते हैं कि पूर्व में वह एक समुद्री डाकू था! मगर उन लोगों की पृष्ठभूमि पर गौर करना दिलचस्प होगा जो सर्वहारा साहित्य की रचना कर रहे हैं / सर्वहारा वर्ग के लेखकों का संरक्षण कर रहे हैं.

...और इस नरक में आधी रात को एक भूत दिखाई दिया. काले बालों और छुरी के समान दाढ़ी वाला एक युवक बरामदे में आया. उसने पल्लेदार कोट पहन रखा था. बरामदे पर आकर उसने शाही नज़र से अपनी इस सम्पदा को देखा. रहस्यवादी कहते हैं, कि एक समय था जब यह नौजवान पल्लेदार कोट नहीं पहना करता था, बल्कि चमड़े का चौड़ा कमरबन्द उसकी कमर पर कसा रहता था, जिसमें से पिस्तौलों के हत्थे नज़र आया करते थे. उसके कौए के परों जैसे बाल लाल रेशमी रुमाल से बँधे होते थे और उसकी आज्ञा से कराईब्स्की समुद्र में दो मस्तूलों वाला व्यापारिक जहाज़ चलता था, जिसके काले झण्डे पर आदम का सिर बना हुआ था.
मगर नहीं, नहीं! ये रहस्यवादी बिल्कुल बकवास करते हैं, झूठ बोलते हैं, दुनिया में कहीं भी कराईब्स्की नामक समुद्र है ही नहीं, और उस पर व्यापारिक जहाज़ भी नहीं चलते थे, न ही उनका पीछा तीन मस्तूलों वाले जहाज़ किया करते थे, न ही गोला-बारूद का धुँआ पानी के ऊपर तैरा करता था. नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं था, बिल्कुल नहीं था. बस यही पुराना, मरियल-सा सुगन्ध वाला छायादार पेड़ है. उसके पीछे लोहे की जाली और जाली के पीछे तरुमण्डित रास्ता...और फूलदानी में बर्फ तैर रही है, और पड़ोस की मेज़ पर शराब के नशे से खून जैसी लाल हुई जानवरों जैसी आँखें दिख रही हैं, और डरावना-डरावना-सा...हे भगवान...मेरे देवता, इससे बेहतर तो ज़हर ही होगा, मुझे वही दे दो!...

हास्यास्पद पोषाक में इवान को ग्रिबोयेदोव भवन में ईसा की तस्वीर और जलती हुई मोमबत्ती लिए प्रवेश करते देखकर लोगों की क्या प्रतिक्रिया होती है इस पर गौर कीजिए. गौर कीजिए कि मैनेजर आर्चिबाल्द आर्चिबाल्दोविच इवान को इस हालत में ग्रिबोयेदोव भवन में घुसने देने के लिए चौकीदार को किस तरह डाँटता है;

जब तक कर्मचारियों ने तौलियों से कवि को बाँधा, नीचे कोट रखने की जगह पर चौकीदार और कमाण्डर के बीच इस तरह की बातचीत हुई :

 “तुमने देखा कि वह सिर्फ कच्छे में है?” ठण्डी आवाज़ में उसने पूछा.
 “हाँ, आर्चिबाल्द आर्चिबाल्दोविच!” संकोच से सिकुड़ते हुए चौकीदार ने उत्तर दिया, “मगर मैं उन्हें अन्दर जाने से कैसे रोक सकता था, अगर वे मॉसोलित के सदस्य हैं?”
 “तुमने देखा कि वह कच्छे में था?” कमाण्डर ने फिर दोहराया.
 “क्षमा करें आर्चिबाल्द आर्चिबाल्दोविच,” लाल पड़ते हुए चौकीदार बोला, “मैं क्या कर सकता था? मैं ख़ुद भी समझता हूँ कि बरामदे में महिलाएँ बैठी हैं...”
 “महिलाओं का यहाँ कोई काम नहीं, महिलाओं को इससे कुछ फरक नहीं पड़ता,” कमाण्डर चौकीदार को आँखों से भस्म करते हुए बोला, “मगर पुलिस को इससे फरक पड़ता है! कच्छा पहना आदमी मॉस्को की सड़कों पर तभी घूम सकता है, जब उसे पुलिस पकड़कर ले जा रही हो, और वह भी जब उसे पुलिस थाने ले जाया जा रहा हो! और तुम्हें, अगर चौकीदार हो, तो यह मालूम होना चाहिए कि ऐसे आदमी को देखने के बाद, एक क्षण की भी देरी किए बिना, सीटी फूँकना शुरू कर देना चाहिर. तुम सुन रहे हो?”
आधे पागल-से हो गए चौकीदार ने अन्दर बरामदे से ऊई...ऊई...की आवाज़ें, प्लेटों के फेंके जाने की और औरतों के चीखने की आवाज़ें सुनीं.
 “तो, इसके लिए तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जाए?” कमाण्डर ने पूछा.
चौकीदार के चेहरे का रंग टाइफाइड के मरीज़ के रंग जैसा हो गया. आँखें मृतप्राय हो गईं. उसे महसूस हुआ कि काले, ढंग से कंघी किए बाल, आग से घिर गए हैं. कोट गायब हो गया. कमर से बंधे बेल्ट से पिस्तौल का हत्था प्रकट हो गया है. चौकीदार ने अनुभव किया कि वह फाँसी के फन्दे पर लटका है. अपनी आँखों से उसने अपनी जीभ बाहर को निकली देखी. अपना प्राणहीन सिर कन्धे पर लटका देखा. उसे लहरों की आवाज़ भी सुनाई दी. चौकीदार के घुटने काँपने लगे. मगर तभी कमाण्डर ने उस पर दया दिखाई और अपनी जलती आँखों को बुझा लिया.
 “देखो, निकोलाय! यह आख़िरी बार कह रहा हूँ, हमें तुम जैसे चौकीदारों की ज़रा-सी भी ज़रूरत नहीं है. तुम चर्च के चौकीदार बन जाओ!” इतना कह कर कमाण्डर ने शीघ्र, स्पष्ट, ठीक-ठीक आज्ञा दी, “जलपान गृह से पन्तेलेय को बुलाया जाए. पुलिस रिपोर्ट. गाड़ी – पागलखाने ले जाया जाए,” और आगे बोला, “सीटी बजाओ!”

उस फूले-फूले चेहरे पर भी गौर कीजिए जो इवान के ठीक कान में पुचकारते हुए उससे रहस्यमय प्रोफेसर का नाम पूछता है. कवि ऋयुखिन की ओर भी गौर फरमाइए.

ऋयुखिन के बारे में अगले अध्याय में.


इस अध्याय के समाप्त होते होते इवान को तौलियों में लपेटकर एक ट्रक में डॉक्टर स्त्राविन्स्की के क्लीनिक में ले जाया जाता है, जिसके बारे में भी रहस्यमय प्रोफेसर ने पत्रियार्शी पार्क में भविष्यवाणी कर दी थी.