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गुरुवार, 3 अप्रैल 2025

Theatrical Novel - 15

 

 

भाग दूसरा


अध्याय – 15

 

भूरे, पतले सांप की भांति, पूरे स्टाल में फैला हुआ, न जाने कहाँ जाता हुआ, स्टाल के फर्श पर आवरण से ढंका हुआ इलेक्ट्रिक तार पड़ा था. उससे स्टालों के मध्य एक छोटी सी मेज़ पर रखे हुए नन्हे से लैम्प को बिजली जा रही थी. लैम्प ठीक उतना ही प्रकाश दे रहा था, ताकि मेज़ पर पड़े कागज़ और दवात को प्रकाशित कर सके. कागज़ पर चपटी नाक वाला थोबड़ा चित्रित किया गया था, थोबड़े की बगल में अभी तक ताज़ा संतरे का छिलका पडा था और ऐश ट्रे थी, सिगरेट के ठूंठों से पूरी तरह भरी हुई. पानी की सुराही धुंधली चमक रही थी, वह चमकते हुए वृत्त से बाहर थी.

स्टाल आधे अँधेरे में इतना डूबा हुआ था, कि उजाले से आ रहे लोग, उसमें प्रवेश करते हुए, कुर्सियों की पीठ का सहारा लेते हुए, अंदाज़ से चल रहे थे, जब तक कि आंख अभ्यस्त नहीं हो जाती. 

स्टेज खुला था और ऊपर से दूरस्थ स्पॉट लाईट द्वारा प्रकाशित था. स्टेज पर कोई दीवार थी, जिसका पिछला हिस्सा दर्शकों की तरफ़ मुड़ा हुआ था, उस पर लिखा हुआ था: “भेड़िए और भेड़ें – 2”. वहां एक कुर्सी, लिखने की मेज़, दो स्टूल थे. कुर्सी में रूसी कमीज़ और जैकेट पहने एक मज़दूर बैठा था, और एक स्टूल पर – जैकेट और पतलून पहने, मगर बेल्ट बांधे एक जवान बैठा था, जिस पर सेंट जॉर्ज के बिल्ले वाली तलवार लटक रही थी.

हॉल में उमस थी, बाहर कब से पूरा मई का महीना था.  

ये रिहर्सल का मध्यांतर था – कलाकार नाश्ते के लिए बुफ़े गए थे. मगर मैं रुक गया था. पिछले कुछ महीनों की घटनाओं को शिद्दत से महसूस कर रहा था, मैं जैसे खुद को टूटा हुआ महसूस कर रहा था, पूरे समय बैठने का और देर तक, निश्चल बैठने का मन करता था. मगर इस हालत को अक्सर मानसिक शक्ति का उछाल सुधार देता, जब चलने का, समझाने का, बोलने का और बहस करने का मन होता. और अब, फिलहाल मैं पहली अवस्था में हूँ. लैम्प के शेड के नीचे घने धुएँ की परतें जमा हो गयी थीं, उसे लैम्प का शेड सोख रहा था, और फिर वह कहीं ऊपर चला जाता.

मेरे विचार सिर्फ एक ही बात के चारों ओर घूम रहे थे – मेरे नाटक के चारों ओर. ठीक उसी दिन से, जब फ़ोमा स्त्रिझ ने मुझे निर्णायक पत्र भेजा था, मेरी ज़िंदगी इतनी बदल गयी थी, कि उसे पहचानना मुश्किल था. जैसे आदमी ने नया जन्म लिया हो, जैसे उसका कमरा भी बदल गया हो, हालांकि यह वही कमरा था, जैसे उसके चारों तरफ़ के लोग बदल गए हों, और मॉस्को शहर में, उसने, इस आदमी ने, अचानक अस्तित्व का अधिकार प्राप्त कर लिया हो, उसने कोई उद्देश्य और अर्थ भी प्राप्त कर लिया हो.

मगर मेरे ख़याल सिर्फ एक ही विषय पर केन्द्रित थे, मेरे नाटक पर, पूरे समय उसी में मगन रहता – मेरे सपने भी – क्योंकि वह मुझे किन्हीं अब तक अस्तित्वहीन दृश्यों के बीच प्रदर्शित हो चुका दिखाई दिया, सपने में प्रदर्शनों की सूची से हटाया गया दिखाई दिया, या तो वह विफ़ल हो गया या भारी सफ़ल हो गया. इनमें से दूसरे मामले में, याद आता है, उसे ढलान वाले जंगलों में खेला गया, जिनमें कलाकार बिखर गए थे, प्लास्टर करने वालों की तरह और हाथों में लालटेनें लिए, हर मिनट गाना गा रहे थे. लेखक, न जाने क्यों वहीं था, नाज़ुक क्रॉसबार्स पर वैसी ही आज़ादी से घूमते हुआ, जैसे मक्खी दीवार पर घूमती है, और नीचे थे नींबू और सेब के पेड़, क्योंकि नाटक उत्साहित दर्शकों से भरे बगीचे में खेला जा रहा था. जनता से भरा था.

पहले में अक्सर एक विकल्प दिखाई देता था – लेखक, जनरल र्रिहर्सल में जाते हुए पतलून पहनना भूल गया. रास्ते पर उसने कुछ कदम सकुचाते हुए रखे, कुछ उम्मीद से, कि बिना किसी की नज़र में पड़े पहुँच जाएगा, और उसने आने-जाने वालों के लिए कोई बहाना तैयार कर लिया – कोई बहाना स्नानघर से संबंधित, जहां वह अभी-अभी होकर आया था, और पतलून, स्टेज के पीछे थी, मगर जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया, हालात बदतर होते गए, और बेचारा लेखक फुटपाथ से चिपके-चिपके चलता रहा, अखबार वाले को ढूँढ़ता रहा, वह नहीं था, ओवरकोट खरीदना चाहा, मगर पैसे नहीं थे, प्रवेश द्वार में छुप गया और समझ गया कि जनरल रिहर्सल में पहुँचने में देर हो गयी है...              

“वान्या!” स्टेज से धीमी आवाज़ आई. – “पीला दे!

टीयर के अंतिम बॉक्स में, जो स्टेज के पोर्टल के पास ही स्थित है, कुछ जलने लगा, बॉक्स से एक तिरछी किरण विशिष्ट रूप से गिरी, स्टेज के फर्श पर गोल पीला धब्बा जलने लगा, रेंगने लगा, पुराने कवर वाली, सुनहरे हत्थों वाली कुर्सी को, या हाथों में लकड़ी का मोमबत्तीदान पकडे अस्त-व्यस्त सहारे को समेटते हुए.

जैसे जैसे मध्यांतर समाप्ति की ओर बढ़ रहा था, वैसे-वैसे स्टेज पर हलचल होने लगी. ऊपर उठाए हुए, स्टेज के आकाश के नीचे अनगिनत कतारों में लटके हुए परदे अचानक सजीव हो उठे. उनमें से एक ऊपर गया और फ़ौरन आंखों में चुभती हुई हज़ारों लैम्पों की कतार को अनावृत कर गया. दूसरा, न जाने क्यों, इसके विपरीत, नीचे की ओर आ रहा था, मगर, फ़र्श तक पंहुचने से पहले ही, चला गया. विंग्स में काली छायाएं प्रकट होती रहीं, पीली किरण चली गयी, बॉक्स में शोषित हो गई. कहीं हथौड़ों से ठक ठक हो रही थी. सिविलियन पतलून पहने, मगर एड वाले जूतों में, नागरिक प्रकट हुआ, और उन्हें खनखनाते हुए, स्टेज से गुज़रा. फिर कोई और, स्टेज के फ़र्श पर झुककर, ढाल की तरह मुंह पर हाथ रखकर फर्श में चिल्लाया:

“ग्नोबिन! चल!”

तब लगभग बिना कोई आवाज़ किये, स्टेज की हर चीज़ किनारे पर जाने लगी. इसने उस आदमी को भी आकर्षित किया, वह अपने मोमबत्तीदान समेत चला गया, कुर्सी और मेज़ भी बहते गए. कोई आदमी इस घूमते हुए गोल में गति की विपरीत दिशा में भागा, नृत्य करने लगा, सीधा होते हुए, और, सीधा होकर, चला गया. गुनगुनाहट बढ़ गई, और पहले वाली पार्श्वभूमि के स्थान पर, अजीब सी, लकड़ी की संरचनाएं दिखाई दीं, जो बिना पेंट की हुई खड़ी सीढ़ियों, क्रॉस बीम्स, डेकिंग्स, से बनी थीं. ‘पुल आ रहा है, - मैंने सोचा और जब वह अपनी जगह पर खड़ा होता, तो हमेशा, न जाने क्यों, उत्तेजना का अनुभव करता.

“ग्नोबिन! स्टॉप!” – स्टेज पर लोग चिल्लाए. “ग्नोबिन, पीछे कर!”

पुल रुक गया. इसके बाद, ग्रेट्स के नीचे से थकी हुई आंखों पर प्रकाश बिखेरते हुए, मोटे पेट वाले लैम्प प्रकट हुए, फिर से लुप्त हो गए, और ऊपर से भद्दा रंग किया हुआ कपड़ा ऊपर से नीचे आया, तिरछा होकर खड़ा हो गया. “गेट हाउस...”, - मैंने सोचा, स्टेज की जोमेट्री से गड़बड़ाते हुए, घबराते हुए, ये समझने की कोशिश करते हुए कि ये सब कैसा नज़र आयेगा, जब अन्य नाटकों की वस्तुओं से बची खुची वस्तुओं से फेन्सिंग के स्थान पर, आखिरकार, वास्तविक पुल बनाया जाएगा. विंग्स में शेड्स के नीचे बाहर निकलती हुई आंखों वाले प्रोजेक्टर्स भड़क उठे , नीचे से स्टेज को गर्म प्रकाश की लहर ने सराबोर कर दिया. “रैम्प दिया...”  

मैं अँधेरे में आंखें बारीक किये उस आकृति को देख रहा था, जो निर्धारित कदमों से डाइरेक्टर की मेज़ की तरफ बढ़ रही थी.

‘रमानस आ रहा है, मतलब, अब कुछ-न-कुछ होने वाला है...’ – हाथ से अपने चेहरे को लैम्प से छुपाते हुए मैंने सोचा.

और सचमुच में, कुछ ही पलों में मेरे ऊपर कंटीली दाढ़ी दिखाई दी, आधे अँधेरे में डाइरेक्टर रमानस की उत्तेजित आंखें चमक रही थीं. रमानस के बटन होल में ‘स्वतन्त्र थियेटर अक्षरों वाला जुबिली-बैज था. 

“अगर ये झूठ भी है, तो भी अच्छा ढूँढा, या हो सकता है, और भी प्रभावशाली!” रमानस ने हमेशा की तरह शुरूआत की, उसकी आंखें स्तेपी के भेड़िये की तरह जल रही थीं. रमानस कोई शिकार ढूंढ रहा था, और उसे न पाकर, मेरी बगल में बैठ गया.

“आपको ये कैसा लग रहा है? आँ?” आंखें सिकोड़ते हुए रमानस ने मुझसे पूछा.

घसीट रहा है, ओय, वह अब मुझे बातचीत में घसीट रहा है,” मैंने लैम्प के पास सिकुडते हुए सोचा.

“नहीं, आप, कृपया मुझे अपनी राय बताइये,” मेरी ओर एकटक देखते हुए, रमानस ने कहा, “ये इसलिए भी ज़्यादा दिलचस्प है, कि आप लेखक हैं, और यहाँ हो रही गडबडियों की ओर उदासीन नहीं रह सकते, जो हमारे यहाँ हो रही हैं.    

‘मगर, वह कितनी आसानी से यह करता है...’ इस हद तक परेशान होते हुए, कि बदन में खुजली होने लगी, मैंने सोचा.

“संगतकार को, वह भी महिला संगतकार को तुरही से पीठ पर मारना?” रमानस ने तैश से पूछा. “नहीं. ये पाईप्स हैं! मैं पैंतीस सालों से स्टेज पर हूँ, और आज तक मैंने ऐसी घटना नहीं देखी. स्त्रिझ सोचता है, कि संगीतकार सुअर हैं, और उन्हें बाड़े में खदेड़ा जा सकता है? एक लेखक का दृष्टिकोण जानना दिलचस्प होगा.

ज़्यादा देर तक चुप रहना संभव नहीं था.
“बात क्या है
?

रमानस को इसी का इंतज़ार था. खनखनाती आवाज़ में, जिससे मज़दूर सुनें, जो उत्सुकतावश फ़ुटलाईट्स के पास इकट्ठे हो रहे थे, रमानस ने कहा, कि स्त्रिझ ने संगीतकारों को स्टेज की पॉकेट  में धकेला था, जहां निम्नलिखित कारणों से प्रदर्शन करने की कोई संभावना नहीं है: पहली बात – जगह की तंगी, दूसरा – अन्धेरा है, और तीसरा, हॉल में कोई भी आवाज़ सुनाई नहीं देती, चौथा, उसे खड़ा होने के लिए कोई जगह नहीं है, संगीतकार उसे नहीं देख सकते.

“ये सही है, कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं,” रमानस ने ज़ोर से घोषणा की, “संगीत में जिनकी समझ कुछेक जानवरों से अधिक नहीं होती...”

‘काश, तुझे शैतान ले जाए!” मैंने सोचा.

“...किन्हीं बेवकूफों में!”

रमानस की कोशिशें कामयाब हुईं – इलेक्ट्रो टेक्नीकल बूथ से खिलखिलाहट सुनाई दी, बूथ से एक सिर बाहर आया.

“सचमुच, ऐसे लोगों को डाइरेक्टर का काम करने की ज़रुरत नहीं है, बल्कि उन्हें तो नोवो-देविच्ये कब्रिस्तान में क्वास बेचना चाहिए!...” रमानस चीख रहा था.

खिलखिलाहट की पुनरावृत्ति हुई. आगे स्पष्ट हुआ, कि स्त्रिझ द्वारा की गयी ज्यादतियों के अपने परिणाम सामने आये. तुरही वाले ने अँधेरे में कॉन्सर्टमास्टर आन्ना अनुफ्रेव्ना देन्झिना को इस तरह पीठ में तुरही चुभोई कि ...

“एक्स-रे दिखाएगा, कि इसका क्या हश्र होगा!”

रमानस ने आगे कहा, कि पसलियाँ थियेटर में नहीं, बल्कि शराबखाने में तोड़ना चाहिए, जहां, वैसे भी, कुछ लोग कलात्मक शिक्षा प्राप्त करते हैं.”

इलेक्ट्रीशियन का उल्लासपूर्ण चेहरा बूथ के स्लॉट के ऊपर चमक रहा था, उसका मुँह हंसी से फटा जा रहा था.

मगर रमानस ज़ोर देकर कहता है, कि ये ऐसे समाप्त नहीं होगा. उसने आन्ना को समझाया है कि उसे क्या करना है. हम, खुदा का शुक्र है, सोवियत राज्य में रहते हैं, रमानस ने याद दिलाया, कि प्रोफसयुज़ के सदस्यों की पसलियाँ तोड़ने की ज़रुरत नहीं है. उसने आन्ना अनुफ्रेव्ना को स्थानीय कमिटी में दरख्वास्त देने के लिए कहा है.

“खैर, आपकी आँखों से मैं देख सकता हूँ,” रमानस ने मुझे घूरते हुए और प्रकाश के घेरे में पकड़ने की कोशिश करते हुए कहा, “कि आपको इस बात में पूरा विश्वास नहीं है कि हमारी स्थानीय कमिटी का चेयरमैन संगीत को उतनी ही अच्छी तरह समझता है, जितना रीम्स्की-कर्साकव या शुबर्ट.”

“ये है नमूना!” मैंने सोचा.
“माफ़ कीजिये!...” गंभीरता से बोलने की कोशिश करते हुए मैंने कहा.

“नहीं, ईमानदारी से बात करेंगे!” मुझसे हाथ मिलाते हुए रमानस चहका, “आप लेखक हैं! और अच्छी तरह जानते हैं, कि मीत्या मालाक्रोशेच्नी, चाहे बीस बार चेयरमैन रह चुका हो, ओबोय और सेलो में,  या बाख़ के फ़ुगू और फ़ॉक्सट्राट “अल्लेलुइया” में अंतर बता सकेगा.”

यहाँ रमानस ने ख़ुशी ज़ाहिर की, कि ये भी अच्छा था, कि उसका सबसे क़रीबी दोस्त...

-    ... और हमप्याला!”

ऊंची आवाज़ की खिलखिलाहट में एक भारी कर्कश आवाज़ शामिल हो गयी. बूथ के ऊपर दो चहरे खुश हो रहे थे.    

अन्तोन कलोशिन मालाक्रोशेच्नी की कला विषयक प्रश्नों को सुलझाने में मदद करता है. हालांकि इसमें अचरज वाली कोई बात नहीं है, क्योंकि थियेटर में काम करने से पहले अन्तोन अग्निशामक दल में काम करता था, जहां वह तुरही बजाया करता था. और अगर अन्तोन न होता, रमानस दावे के साथ कहता है, कि कोई-कोई डाइरेक्टर, आसानी से चक्कर में पड़ जाते, और ‘रुसलान के परिचय को बेहद साधारण “संतों के साथ आराम” में फर्क न कर पाते.

‘ये आदमी खतरनाक है,’ मैंने रमानस की ओर देखते हुए सोचा, ‘गंभीर तौर पर खतरनाक. उससे लड़ने का कोई साधन नहीं है!”

“अगर कलोशिन न होता, तो, बेशक, हमारे यहाँ संगीतकार को आउटबोर्ड स्पॉट लाईट से उल्टा लटकाकर बजाने पर मजबूर कर देते, ख़ुशकिस्मती से इवान वसिल्येविच थियेटर में नहीं आता है, मगर फिर भी थियेटर को आन्ना अनुफ्रियेव्ना को पैसा तो देना ही पडेगा, टूटी हुई पसलियों के लिए. और रमानस  ने उसे यूनियन में जाने की, ये पता करने की सलाह दी है, कि वहां ऐसी चीज़ों को किस तरह देखते हैं, जिनके बारे में वाक़ई में कहा जा सकता है:        

     “अगर ये झूठ भी है, तो भी अच्छा ढूँढा, या हो सकता है, और भी प्रभावशाली!”   

पीछे से हलके कदमों की आहट सुनाई दी, राहत निकट आ रही थी. मेज़ के पास अन्द्रेई अन्द्रेइच खड़ा था. अन्द्रेई अन्द्रेइच थियेटर में पहला सहायक निर्देशक था और उसने नाटक “काली बर्फ” का निर्देशन किया था.             
अन्द्रेई अन्द्रेइच मोटा, हट्टाकट्टा भूरे बालों वाला, क़रीब चालीस साल का, चंचल, अनुभवी आंखों वाला, अपने काम को अच्छी तरह जानता था. और यह काम मुश्किल था.

अन्द्रेई अन्द्रेइच, मई के अवसर पर हमेशा वाले काले सूटकेस और पीले जूतों में नहीं, बल्कि नीली सैटिन की कमीज़ और पीले कैनवास के जूते पहने था, मेज़ के पास आया, बगल में सदाबहार फोल्डर दबाये.

रमानस की आंख और तीव्रता से जल रही थी, और अन्द्रेई अन्द्रेइच अभी लैम्प के नीचे फोल्डर रख भी न पाया था, कि हंगामा शुरू हो गया. वह रमानस के वाक्य से शुरू हुआ:

“मैं दृढ़ता से संगीतकारों पर हो रही हिंसा का विरोध करता हूँ, और विनती करता हूँ, कि जो कुछ भी हो रहा है, उसे रिपोर्ट में दर्ज किया जाए!”

“कैसी हिंसा?” अन्द्रेई अन्द्रेइच ने आधिकारिक आवाज़ में पूछा और हल्के से एक भौं ऊपर उठाई.

“अगर हमारे यहाँ ऐसे नाटकों का प्रदर्शन किया जा रहा है, जो ऑपेरा के अधिक निकट हैं...” रमानस ने शुरूआत की, मगर उसे सहसा एहसास हुआ, कि लेखक वहीं बैठा है, और उसने मेरी ओर देखते हुए, मुस्कान से अपने चेहरे को बिगाड़ते हुए कहा, “जो कि सही है! क्योंकि हमारा लेखक नाटक में संगीत के महत्व को समझता है!...तो...मैं विनती करता हूँ, कि ओर्केस्ट्रा को एक जगह दी जाए, जहां वह बजा सके!”

‘उसे तो ‘पॉकेट में जगह दी गयी है,” अन्द्रेई अन्द्रेइच ने ऐसा दिखाते हुए कहा, जैसे किसी ज़रूरी मामले पर फोल्डर खोल रहा हो.

“पॉकेट में? हो सकता है, प्रॉम्प्टर के बूथ में बेहतर होगा? या किसी प्रॉप-रूम में?

“आपने कहा था, कि आप ‘होल्ड में नहीं बजा सकते.”

“होल्ड में?” रमानस चीख़ा. “मैं दुहराता हूँ, कि ये असंभव है. और आपकी जानकारी के लिए बता दूं,  कि चाय के बुफ़े में नहीं बजा सकते.

“आपकी जानकारी के लिए, मैं खुद भी जानता हूँ, कि चाय के बुफ़े में इसकी अनुमति नहीं है,” अन्द्रेई अन्द्रेइच ने कहा, और उसकी दूसरी भौं भी हिली.

“आप जानते हैं,” रमानस ने जवाब दिया और, यह सुनिश्चित करने के बाद कि स्त्रिझ अभी तक स्टाल में नहीं है, आगे कहा, “क्योंकि आप पुराने कार्यकर्ता हैं और कला के क्षेत्र में जानकारी रखते हैं, जो किसी डाइरेक्टर के बारे में नहीं कहा जा सकता...”

“फिर भी, डाइरेक्टर से संपर्क कीजिये. वह ध्वनि की जांच कर रहा था...”

“ध्वनि की जांच करने के लिए, किसी उपकरण का होना आवश्यक है, जिसकी सहायता से जांच की जा सके, उदाहरण के लिए, कान! मगर यदि किसी को बचपन में...”

“मैं इस लहजे में बात करने से इनकार करता हूँ,” अन्द्रेई अन्द्रेइच ने कहा और फाईल बंद कर दी.   

“कैसा लहजा?! कैसा लहजा?” रमानस चकित हो गया. “मैं लेखक से मुखातिब हो रहा हूँ, वही इस  बारे में अपने आक्रोश की पुष्टि करे, कि हमारे यहाँ संगीतकारों को कैसे विकृत किया जाता है!”        

“इजाज़त दें...” मैंने अन्द्रेई अन्द्रेइच की चकित नज़र देखकर कहना शुरू किया.

“नहीं, माफ़ी चाहता हूँ!” रमानस ने चिल्लाकर अन्द्रेई अन्द्रेइच से कहा, “अगर सहायक, जिसे स्टेज को अपनी पांच उँगलियों की तरह जानना चाहिए...”

“कृपया, मुझे न सिखाइए, की स्टेज को कैसे जानना चाहिए,” अन्द्रेई अन्द्रेइच ने कहा और फोल्डर की रस्सी तोड़ दी.   

“करना पडेगा! करना पडेगा,” ज़हरीली हंसी से अपने दांत दिखाते हुए, रमानस भर्राया.

“जो कुछ आप कह रहे हैं, वह मैं रेकॉर्ड में डाल दूंगा!” अन्द्रेई अन्द्रेइच ने कहा.

“मुझे भी खुशी होगी, कि आप ये सब लिखेंगे!”

“कृपया मुझे अकेला छोड़ दें! आप कार्यकर्ताओं को रिहर्सल में बाधा डाल रहे हैं!”

“कृपया ये शब्द भी शामिल करें!” रमानस तारसप्तक में चिल्लाया.

“कृपया चिल्लाए नहीं!”

“मैं भी विनती करता हूँ, कि चिल्लाए नहीं!”

“कृपया चिल्लाए नहीं,” आंखें चमकाते हुए अन्द्रेई अन्द्रेइच ने जवाब दिया और अचानक वहशी की तरह चीखा : “घुड़सवारों! आप वहाँ क्या कर रहे हैं?!” और वह सीढ़ी से स्टेज की तरफ़ लपका.

स्त्रिझ गलियारे को तेज़ी से पार कर रहा था, और उसके पीछे कलाकारों की काली आकृतियाँ दिखाई दीं.

मुझे याद है कि स्त्रिझ के साथ लफड़ा कैसे शुरू हुआ था. रमानस तेज़ी से उसके सामने आया, उसका हाथ पकड़ा और बोला:

“फोमा! मुझे मालूम है, कि तुम संगीत की कदर करते हो, और ये तुम्हारा कुसूर नहीं है, मगर मैं विनती करता हूँ और मांग करता हूँ, कि सहायक संगीतकारों का मज़ाक उड़ाने की हिम्मत न करे!”

“घुड़सवारों!” स्टेज पर अन्द्रेई अन्द्रेयेविच चिल्लाया. “बबिल्योव कहाँ है?!”

“बबिल्योव खाना खा रहा है,” आसमान से दबी-दबी आवाज़ आई.

कलाकारों ने रमानस और स्त्रिझ के चारों ओर गोल घेरा बना लिया.

गर्मी थी, मई का महीना था, सैंकड़ों बार ये लोग, जिनके चेहरे लैम्प शेड के ऊपर आधे अँधेरे में रहस्यमय प्रतीत हो रहे थे, पेंट से पुते हुए थे, रूप बदल चुके थे, परेशान हो रहे थे, थक गए थे...वे सीज़न में थक चुके थे, परेशान थे, चिड़चिड़े हो रहे थे, एक दूसरे को चिढ़ा रहे थे. रमानस उन्हें बहुत बड़ा और प्यारा मनोरंजन प्रदान कर रहा था.

लंबे, नीली आंखों वाले स्कव्रोन्स्की ने खुशी से हाथ मले और बुदबुदाया:

“अच्छा, अच्छा, अच्छा....चल! सच्चे खुदा! तुम उन्हें सब बताओ, ऑस्कर!”

इस सबका अपना परिणाम निकला.

“कृपया, मुझ पर न चिल्लाएं!” स्त्रिझ अचानक भौंका और उसने नाटक को मेज़ पर पटक दिया.

“ये तू चिल्ला रहा है?” रमानस चीखा.

“सही है! सच्चे खुदा!” स्कव्रोन्स्की खुश हो गया, कभी रमानस को बढ़ावा देता: - “सही है, ऑस्कर! हमारी पसलियाँ इन प्रदर्शनों से ज़्यादा मूल्यवान हैं! – तो कभी स्त्रिझ को:

“और क्या, कलाकार इन संगीतकारों की तुलना में हीन हैं? तू, फोमा, इस तथ्य पर गौर करना!” 

“अब क्वास पीना चाहिए,” एलागिन ने उबासी लेते हुए कहा, “ न कि रिहर्सल करना चाहिए...और ये झगड़ा कब ख़त्म होगा?

झगड़ा कुछ देर और चलता रहा, लैम्प को घेरते हुए गोल घेरे से चीखें आती रहीं, और धुआं ऊपर उठता रहा.

मगर मुझे अब इस झगड़ें में कोई दिलचस्पी नहीं थी. पसीने से भरा माथा पोंछते हुए मैं रैम्प के पास खड़ा था, देख रहा था कि कैसे मॉक-अप रूम से कलाकार – अव्रोरा गुस्ये गोल के किनारे-किनारे एक नापने वाली छड़ी के साथ चल रही थी, उसे फर्श पर टिकाते हुए. गोस्ये का चेहरा शांत था, थोड़ा सा दुखी, होंठ भींचे हुए. गोस्ये के सुनहरे बाल कभी जल उठते, मानो उन्हें जलाया गया हो, जब वह रैम्प के किनारे पर झुकती, या कभी बुझ जाते और राख जैसे हो जाते. और मैं सोच रहा था कि सब कुछ, जो यहाँ हो रहा है, जो इतने दर्दनाक तरीके से खिंच रहा है, सबका अंत हो ही जाएगा...

इस बीच झगड़ा ख़त्म हो गया था.

“चलो, साथियों! चलो!” स्त्रिझ चिल्लाया. – “ हम बेकार ही वक्त बर्बाद कर रहे हैं!”

पत्रिकेएव, व्लदीचिन्स्की, स्कव्रोन्स्की पहले ही स्टेज पर प्रॉप्स के बीच में घूम रहे थे. स्टेज पर रमानस भी आया. उसकी उपस्थिति बेकार नहीं गई. वह व्लदीचिन्स्की के पास गया और उससे चिंतित स्वर में पूछा कि क्या उसे ऐसा नहीं लगता कि पत्रिकेयेव मसखरेपन का ज़रा ज़्यादा ही इस्तेमाल करता है, जिसके कारण दर्शक उसी समय हंसते हैं, जब व्लदीचिन्स्की अत्यंत महत्वपूर्ण वाक्य कह रहा होता है: “और मुझे कहाँ जाने को कहते हैं? मैं अकेला हूँ, मैं बीमार हूँ...”       

व्लदीचिन्स्की मौत की तरह विवर्ण हो गया, और एक मिनट बाद कलाकार, और कामगार, और प्रॉप्स कतार बनाए रैम्प के पास खड़े थे, कि कैसे पुराने दुश्मन व्लदीचिन्स्की और पत्रिकेयेव एक दूसरे को गालियाँ देते हैं. व्लदीचिन्स्की हट्टा-कट्टा आदमी था, स्वभाव से मरियल, और अब कटुता के कारण और भी मरियल, मुट्ठियाँ बांधे और यह कोशिश करते हुए कि उसकी ज़ोरदार आवाज़ भयानक रूप से गूंजे, पत्रिकेयेव की तरफ़ देखे बिना बोला:

“मैं इस मामले से पूरी तरह निपटूंगा! कब से समय आ गया है कि सर्कस के कलाकारों पर ध्यान देने का, जो, स्टाम्प्स पर खेलकर, थियेटर के ब्राण्ड का अपमान करते हैं!”

कॉमेडी कलाकार पत्रिकेयेव ने, जो स्टेज पर मजाकिया युवाओं की भूमिकाएँ करता है, मगर जीवन में असाधारण रूप से निपुण, चपल, और सघन है, चेहरे को धृष्ठ और साथ ही डरावना बनाने की कोशिश की, जिससे उसकी आंखें उदासी व्यक्त कर रही थीं, और चेहरा शारीरिक वेदना, भर्राई हुई आवाज़ में जवाब दिया:

“कृपया यह न भूलें! मैं ‘स्वतन्त्र थियेटर का कलाकार हूँ, न कि आप जैसा हैक फिल्मों का डाइरेक्टर!”  

 रमानस विंग्स में खड़ा था, संतोष से आंखें चमकाते हुए, बहस करने वालों की आवाज़ें स्त्रिझ की आवाज़ को दबा रही थीं, जो कुर्सियों से चीख रहा था :

“ये सब इसी पल बंद करो! अन्द्रेई अन्द्रेइच! स्त्रोएव को अलार्म बेल दो! वह कहाँ है? आप मेरे प्रदर्शन प्लान में बाधा डाल रहे हैं!”

अन्द्रेई अन्द्रेइच ने अभ्यस्त हाथ से सहायक के बोर्ड पर बटन दबाए, और दूर कहीं विंग्स के पीछे, और बुफे में, और फ़ॉयर में उत्तेजना, और कर्कशता से घंटियाँ बजने लगीं.

स्त्रोएव, जो इस समय तरपेत्स्काया के वेटिंग रूम में डोल रहा था, सीढ़ियाँ फांदते हुए, दर्शक हॉल की ओर लपका. स्टेज पर वह हॉल की तरफ़ से नहीं घुसा, बल्कि किनारे से, स्टेज वाले दरवाजे से, पोस्ट की ओर लपका और वहाँ से रैम्प की तरफ़, हौले-हौले एड़ें बजाते हुए, जो सिविलियन जूतों पर पहनी थीं, और कृत्रिम भाव से यह दिखाते हुए कि वह यहाँ कब से मौजूद है. 

“स्त्रोएव कहाँ है?” स्त्रिझ चीखा. “उसे फोन करो, फोन करो! मैं मांग करता हूँ, कि ये बहस बंद करें!”

“फ़ोन करता हूँ,” अन्द्रेई अन्द्रेयेविच ने जवाब दिया. वह मुड़ा और सामने स्त्रोएव को देखा. “मैं आपको  फ़ौरन बुला रहा हूँ!” अन्द्रेई अन्द्रेयेविच ने गंभीरता से कहा, और फ़ौरन थियेटर में घंटी खामोश हो गई.

“मुझे?” स्त्रोएव ने जवाब दिया. “मेरे लिए अलार्म की घंटी की ज़रुरत क्या है? मैं यहाँ, पंद्रह नहीं, तो दस मिनट से हूँ...कम से कम...मामा...मिया...” उसने खांस कर गला साफ़ किया.

अन्द्रेई अन्द्रेयेविच ने सांस ली, मगर कुछ न कहा, बल्कि गहरी नज़र से उसे देखा. खींची हुई सांस का इस्तेमाल उसने चिल्लाने में किया:

“अनावश्यक लोगों को स्टेज छोड़ने की विनती करता हूँ! शुरू करते हैं!”

सब कुछ ठीक हो गया, प्रॉप्स चले गए, कलाकार अपनी-अपनी जगह चले गए. रमानस ने विंग में फुसफुसाकर पत्रिकेएव को बधाई दी कि उसने कैसे बहादुरी से और सच्चाई से व्लदीचिन्स्की का विरोध किया, जिसे रोकने का समय कब से आ चुका है.

सोमवार, 17 मार्च 2025

Theatrical Novel - 14

 

अध्याय 14

रहस्यमय चमत्कारकर्ता

 

 मनुष्य की स्मरणशक्ति आश्चर्यजनक रूप से बनी है. जैसे, शायद, लगता है कि ये सब अभी हाल में हुआ है, मगर, फिर भी घटनाओं को सुसंगत और क्रमबद्ध तरीके से पुनर्स्थापित करने की कोई संभावना नहीं है. शृंखला से कड़ियां बिखर गईं! कुछेक घटनाएं याद आती हैं, जैसे सीधे आंखों के सामने प्रकाशित हो रही हैं, और शेष बिखर गई हैं, टूट गई हैं, और सिर्फ एक धूल का कण और कोई बारिश ही स्मृति में बची है. हाँ, वैसे, धूल का कण तो है. बारिश? बारिश?      

तो, शायद उस नशे वाली रात के बाद शायद एक महीना बीता था, नवम्बर का महीना था. तो, बर्फ के साथ-साथ चिपचिपी बर्फ भी गिर रही थी. खैर, मैं समझता हूँ, कि आप मॉस्को को जानते हैं. शायद, उसका वर्णन करने के लिए कुछ भी नहीं है. नवम्बर में उसके रास्तों पर हालत बेहद खराब होती है. और बिल्डिंगों में भी अच्छा नहीं होता. मगर ये तो आधी ही मुसीबत होती, ज़्यादा बुरी हालत तब होती है, जब घर पर हालात ठीक न हों. आप मुझे बताइये, की कपड़ों से दाग कैसे हटाएँ? मैंने हर तरह से कोशिश कर ली, हर चीज़ का प्रयोग करके देख लिया. और आश्चर्यजनक बात : उदाहरण के लिए, कपड़े को बेंज़ीन में भिगोते हो, और आश्चर्यजनक परिणाम – धब्बा पिघल जाता है, पिघल जाता है और गायब हो जाता है. आदमी खुश है, क्योंकि कपड़े पर दाग़ जितनी पीड़ा कोई और चीज़ नहीं देती. गंदी चीज़ है, बुरी चीज़ है, दिमाग़ खराब कर देती है. कोट खूंटी पर लटकाते हो, सुबह उठते हो - धब्बा अपनी पहले वाली जगह पर ही है, और उसमें से थोड़ी-थोड़ी बेंज़ीन की गंध आ रही है. ठीक यही बात चाय पीने के बाद बचे डिकाक्शन के साथ भी है, यूडीकलोन के साथ भी. क्या शैतानियत है! गुस्सा करना शुरू करते हो, अपने आप को चिकोटी काटते हो, मगर कुछ नहीं कर सकते. नहीँ, जिसने कपड़े पर दाग लगाया है, वह उसके साथ ही तब तक घूमता रहेगा, जब तक कि कपड़ा ख़ुद ही सड़ न जाए और उसे हमेशा के लिए फेंक न दिया जाए. मुझे तो अब कोई फर्क नहीं पड़ता – मगर औरों के लिए दुआ करता हूँ, कि उनके साथ ऐसा कम से कम हो.   

तो, मैं धब्बा हटा रहा था और उसे नहीं हटाया, फिर, याद आता है, कि मेरे जूतों के फीते टूटते रहे, मैं खांसता रहा और हर रोज़ ‘बुलेटिन के दफ़्तर में जाता रहा, नमी और अनिद्रा से परेशान था, और भगवान जाने, जो भी मिलता, पढ़ता रहता. परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनीं, कि मेरे निकट कोई लोग ही नहीं बचे. लिकास्पास्तव किसी कारण से कॉकेशस चला गया, मेरे दोस्त का, जिसका रिवॉल्वर मैंने चुरा लिया था, तबादला लेनिनग्राद कर दिया गया, और बम्बार्दव गुर्दों की सूजन से बीमार हो गया और उसे अस्पताल में दाख़िल कर दिया गया. कभी कभी मैं उससे मिलने चला जाता, मगर उसे थियेटर के बारे में कोई दिलचस्पी नहीं थी. और वह समझ रहा था, कि ‘ब्लैक स्नो वाली घटना के बाद इस विषय को छूना ठीक नहीं है, मगर गुर्दों के बारे में बात की जा सकती है, क्योंकि यहाँ हर तरह की सांत्वना की गुंजाइश है. इसीलिये हम गुर्दों के ही बारे में बात करते, यहाँ तक कि क्ली को भी मज़ाक में याद करते, मगर फिर भी यह अप्रिय था.

मगर, हर बार, जब मैं बम्बार्दव से मिलता, मैं थियेटर को याद करता, मगर उससे इस बारे में कुछ भी न पूछने की पर्याप्त इच्छाशक्ति मुझमें थी. मैंने अपने आप से कसम खाई थी कि थियेटर के बारे में कुछ भी नहीं सोचूंगा, मगर यह कसम हास्यास्पद थी. सोचने पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता. मगर थियेटर के बारे में जानकारी प्राप्त करने पर प्रतिबन्ध लगाना संभव है. और इसी पर मैंने प्रतिबन्ध लगाया था.                 

और थियेटर तो जैसे मर गया था और अपने बारे में कोई भी जानकारी नहीं दे रहा था. मैं, फ़िर से दुहराता हूँ, कि मैं लोगों से अलग-थलग पड़ गया था. मैं पुरानी किताबों की दुकानों में जाता और कभी-कभी उकडूं बैठ जाता, आधे अँधेरे में, धूल भरी पत्रिकाएँ छानता रहता और, मुझे याद है, कि मैंने एक अद्भुत तस्वीर देखी...आर्क डी ट्रायम्फ...

इस बीच बारिश रुक गई, और एकदम अप्रत्याशित रूप से पाला गिरने लगा. मेरी अटारी में खिड़की पर एक डिजाईन बन गया, और, खिड़की के पास बैठे-बैठे और दो कोपेक के सिक्के पर सांस छोड़ते हुए, और उसकी बर्फ बन चुकी सतह पर अंकित करते हुए, मैं समझ गया, कि नाटक लिखना और उसका मंचन न करना – असंभव है.

मगर शामों को फर्श के नीचे से वाल्ट्ज़ सुनाई देता, एक ही और वो ही (कोई उसे याद कर रहा था), और यह वाल्ट्ज़ डिब्बे में तस्वीरें पैदा कर रहा था, काफ़ी अजीब और दुर्लभ. जैसे, मिसाल के तौर पर, मुझे ऐसा प्रतीत हुआ की नीचे अफ़ीमचियों का अड्डा था, और कुछ और भी हो रहा था, जिसे मैंने खयालों में नाम दिया – ‘तीसरा अंक”. ठीक वही भूरा धुँआ, असममित चेहरे वाली महिला, कोई एक फ्रॉक-कोट वाला आदमी, धुँए के ज़हर से प्रभावित, और उसकी तरफ़ चोरी-छुपे बढ़ता हुआ, तेज़ धार वाला फिनिश चाकू हाथ में लिए, नींबू जैसे चेहरे और तिरछी आँखों वाला आदमी.    

चाकू का वार, खून की धार. बकवास, जैसा कि आप देख रहे हैं! बकवास! और ऐसे नाटक को कहाँ ले जाऊं, जिसमें तीसरा अंक इसी तरह का है?

हाँ, मैंने सोची हुई बात नहीं लिखी. सवाल ये उठता है, बेशक, और सबसे पहले वह मेरे दिमाग़ में ही उठता है – किसी आदमी ने, जिसने खुद को अटारी में दफ़न कर दिया हो, जिसने एक बड़ी विफ़लता का सामना किया हो, और जो उदास प्रवृत्ति का भी हो (ये तो मैं समझता हूँ, परेशान न हों), आत्महत्या करने का दूसरा प्रयत्न न किया हो?

सीधे-सीधे स्वीकार करता हूँ: पहले अनुभव ने इस हिंसक कृत्य के प्रति घृणा उत्पन्न कर दी. ये, अगर मेरे बारे में कहा जाए तो. मगर वास्तविक कारण, बेशक, ये नहीं है. हर चीज़ का अपना समय होता है. खैर इस विषय पर विस्तार से विचार नहीं करेंगे.

जहाँ तक बाहरी दुनिया का सवाल है, तो उससे स्वयँ को पूरी तरह अलग-थलग करना असंभव था, और वह अपने होने का एहसास दे रही थी, क्योंकि उस काल-खंड में, जब मैं गवरीला स्तिपानविच से कभी पचास, तो कभी सौ रुबल्स प्राप्त कर रहा था, मैंने तीन थियेटर की पत्रिकाओं और ‘ईवनिंग मॉस्को’ की सदस्यता ली थी.

और इन पत्रिकाओं के अंक काफ़ी नियमित रूप से आते थे. “थियेटर न्यूज़” विभाग देखते हुए मैं अपने परिचितों के बारे में समाचारों से रूबरू हो जाता था.

तो, पंद्रह दिसंबर को मैंने पढ़ा:

“सुप्रसिद्ध लेखक इस्माईल अलेक्सान्द्रविच बोन्दरेवस्की उत्प्रवासन के जीवन पर आधारित नाटक “मोन्मार्त्र के चाकू” समाप्त कर रहे हैं. सूत्रों के अनुसार, ये नाटक लेखक द्वारा ‘पुराने थियेटर को दिया जाएगा.”

सत्रह तारीख को मैंने अखबार खोला और इस खबर से टकराया:

“प्रसिद्ध लेखक ई. अगाप्योनव ‘मित्र-समूह थियेटर’ के आदेश से कॉमेडी ‘देवर’ पर कड़ी मेहनत कर रहे हैं.”

बाईस तारीख को छपा था: “नाटककार क्लिन्केर ने हमारे सहयोगी के साथ बातचीत में नाटक के बारे में समाचार दिया, जिसे वह “स्वतन्त्र थियेटर” को देना चाहते हैं. अल्बेर्त अल्बेर्तोविच ने सूचित किया, कि उनका नाटक कसीमव के नेतृत्व में गृह युद्ध का व्यापक चित्रण है. नाटक का शीर्षक मोटे तौर पर होगा “हमला”. 

और फिर आगे तो जैसे सैलाब ही आ गया: इक्कीस को, और चौबीस को, और छब्बीस को. अखबार – और उसमें तीसरे पृष्ठ पर एक जवान आदमी की धुंधली तस्वीर, असाधारण उदास सिर वाला और जैसे किसी को टक्कर मार रहा हो, और सूचना कि यह ई. एस. प्रोक का नाटक है जो तीसरा अंक समाप्त कर रहा है.

झ्वेन्का अनीसिम, अन्बाकोमव. चौथा, पांचवां अंक. दो जनवरी को और मैं नाराज़ हो गया. वहां यह छपा था: “सलाहकार एम. पानिन ने ‘स्वतन्त्र थियेटर में नाटककारों के समूह की मीटिंग आयोजित की है. विषय है – ‘स्वतन्त्र थियेटर के लिए आधुनिक नाटक की रचना.” इस ‘नोट का शीर्षक था: ‘वक्त आ गया है, कब से वक्त आ गया है!”, और उसमें ‘स्वतन्त्र थियेटर के प्रति इस बात पर खेद और तिरस्कार व्यक्त किया था, कि वह सभी थियेटरों में अकेला ऐसा थियेटर है जिसने अभी तक एक भी आधुनिक नाटक का मंचन नहीं किया है, जो हमारे युग पर प्रकाश डाल सके. “मगर फिर भी,” अखबार ने आगे लिखा था, - “सिर्फ वही और प्रमुख रूप से वही, कोई और नहीं, समुचित रूप से आधुनिक नाटककार की रचना को प्रस्तुत कर सकता है, अगर इस प्रस्तुति की ज़िम्मेदारी ऐसे महारथी लेते हैं, जैसे इवान वसिल्येविच और अरिस्तार्ख प्लतोनविच.”

आगे नाटककारों की निष्पक्ष रूप से निंदा की गयी थी, जिन्होंने अब तक ‘स्वतन्त्र थियेटर के लिए योग्य नाटक की रचना नहीं की थी.    

मैंने अपने आप से बोलने की आदत डाल ली थी.

“माफ़ कीजिये,” अपमान से होंठ फुलाते हुए मैं बड़बड़ाया, - “ऐसा कैसे किसी ने नाटक नहीं लिखा? और पुल? और हारमोनियम? कुचली हुई बर्फ पर खून?

खिड़की से बाहर बवंडर चिंघाड़ रहा था, मुझे ऐसा प्रतीत हुआ,कि खिड़की के पीछे वही नासपीटा पुल है, कि हार्मिनियम गा रहा है और सूखी गोलीबारी सुनाई दे रही थी.

गिलास में चाय ठंडी हो रही थी, अखबार के पृष्ठ से मेरी ओर गलमुच्छों वाला चेहरा देख रहा था. नीचे अरिस्तार्ख प्लतोनविच द्वारा मीटिंग के लिए भेजा गया टेलीग्राम था:

“शरीर से कलकत्ते में, मन से आपके साथ.”    

देख रहे हो, वहां ज़िंदगी जीवन कैसे उबल रही है, खदखदा रही है, जैसे किसी बांध में,” मैं उबासी लेते हुए फुसफुसाया, “और मुझे जैसे दफ़न कर दिया गया है.”

रात फिसलते हुए दूर जा रही है, कल का दिन भी फिसल जाएगा, जितने दिन छोड़े जायेंगे, वे सब फिसलते हुए चले जायेंगे, और कुछ भी नहीं बचेगा, सिवाय असफ़लता के.

लंगडाते हुए, दुखते हुए घुटने को सहलाते हुए, मैं घिसटते हुए दीवान तक गया, ठण्ड से कंपकंपाते हुए, घड़ी को चाभी दी.

इस तरह कई रातें गुज़र गईं, उनकी मुझे याद है, मगर सामूहिक रूप से – सोने में ठण्ड लग रही थी. दिन तो जैसे स्मृति से धुल गए थे – कुछ भी याद नहीं है.

इस तरह मामला जनवरी के अंत तक खीच गया, और मुझे एक सपना स्पष्ट रूप से याद है, जो मुझे बीस जनवरी से इक्कीस जनवरी वाली रात को आया था.

महल में एक विशाल हॉल है, और जैसे मैं इस हॉल में चल रहा हूँ. शमादानों में धुआँ छोड़ते हुए मोमबत्तियां जल रही थीं, भारी, चिकनी, सुनहरी. मैंने अजीब तरह के कपड़े पहने हैं, पैर कसी हुई पतलून से ढंके हैं, संक्षेप में, मैं अपनी शताब्दी में नहीं हूँ, बल्कि पंद्रहवीं शताब्दी में हूँ. मैं हॉल में चल रहा हूँ, और मेरी बेल्ट पर एक खंजर है. सपने की सुन्दरता इस बात में नहीं थी, कि मैं स्पष्ट रूप से शासक था, बल्कि वह थी इस खंजर में, जिससे दरवाजों पर खड़े दरबारी डर रहे थे. शराब भी इतना नशा नहीं दे सकती, जैसे यह खंजर दे रहा था, और, मुस्कुराते हुए, नहीं, सपने में हंसते हुए, मैं चुपचाप दरवाज़े की तरफ़ जा रहा था.   

सपना इतना आकर्षक था, कि जागने के बाद भी मैं कुछ देर तक हंसता रहा.

तभी दरवाज़े पर टकटक हुई, और मैं फ़टे हुए जूते घसीटते हुए कंबल की तरफ़ बढ़ा, और पड़ोसन के हाथ ने झिरी के भीतर घुसकर मुझे एक लिफ़ाफ़ा थमा दिया. उसके ऊपर “स्वतन्त्र थियेटर” के  सुनहरे अक्षर चमक रहे थे.

मैंने उसे फाड़ा, वह अभी भी, मेरे सामने तिरछा पड़ा है (और मैं उसे अपने साथ ले जाऊंगा!). लिफ़ाफ़े में एक कागज़ था, फिर से सुनहरे गोथिक अक्षरों वाला, जिस पर फ़ोमा स्त्रिझ के बड़े-बड़े, दमदार अक्षरों में लिखा हुआ था:

“प्रिय सिर्गेई लिओन्तेविच!

फ़ौरन थियेटर में आ जाईये! कल दोपहर को बारह बजे “काली बर्फ” की रिहर्सल आरंभ कर रहा हूँ.

आपका

फ़ोमा स्त्रिझ”

कुटिलता से मुस्कुराते हुए मैं सोफ़े पर बैठ गया, बेतहाशा कागज़ को देखते हुए और खंजर के बारे में सोचते हुए, फिर न जाने क्यों, अपने नंगे घुटनों को देखते हुए ल्युद्मिला सिल्वेस्त्रव्ना के बारे में.

इस बीच दरवाज़े पर दमदार और प्रसन्न दस्तक होने लगी.

“आ जाओ,” मैंने कहा. कमरे में बम्बार्दव ने प्रवेश किया. पीला और फ़ीका, बीमारी के बाद अपनी ऊंचाई से लंबा दिखाई दे रहा, और उसी के कारण बदल गई आवाज़ में उसने कहा:

“पता चल गया? मैं जानबूझ कर आपके पास आया था.

और अपनी समूची नग्नता और दरिद्रता में, पुराने कंबल को फ़र्श पर घसीटते हुए, मैंने कागज़ गिराकर उसे चूम लिया.

“ये कैसे संभव हुआ?” मैंने फर्श पर झुकते हुए पूछा.
“ये मैं भी समझ नहीं पा रहा हूँ,” मेरे प्यारे मेहमान ने जवाब दिया
, “कोई भी समझ नहीं पायेगा और कभी भी नहीं जान पायेगा. मेरा ख़याल है की ये पानिन और स्त्रिझ ने मिलकर किया है. मगर उन्होंने ये कैसे किया – पता नहीं है, क्योंकि यह मानवीय शक्ति से परे है. संक्षेप में : यह चमत्कार है.”