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शनिवार, 8 अगस्त 2015

Reading Master and Margarita (Hindi) - 04

अध्याय -4

पीछा


हम कह सकते हैं कि अध्याय 4 से मॉस्को में शैतान की गतिविधियों का आरंभ हो जाता है.

जैसे ही बेज़्दोम्नी ने पहली चीख सुनी, वह निर्गम द्वार की ओर भागा और उसने पत्रियार्शी पार्क की जाली के पास बेर्लिओज़ के कटे हुए सिर को लुढ़कते हुए देखा.

उसे मानो पक्षाघात जैसी कोई चीज़ हो गई और वह वहीं पड़ी एक बेंच पर लुढ़क गया. वह हिल नहीं पा रहा था. जैसे ही पहली चीखें कुछ थमीं, उसने निकट ही दो औरतों को इस दुर्घटना के बारे में बात करते सुना:

 अप्रत्याशित रूप से दो औरतों की उसके सामने भिड़ंत हो गई और उनमें से एक, तीखी नाक वाली और सीधे बालों वाली, कवि के बिल्कुल कान में दूसरी औरत पर चिल्लाई, अन्नूश्का, हमारी अन्नूश्का! सादोवाया सड़क से! यह उसी का काम है! उसने किराने की दुकान से सूरजमुखी का तेल खरीदा, एक लिटर, मगर शीशी घुमौने दरवाज़े से टकराकर टूट गई, पूरी स्कर्ट तेल में भीग गई...ओफ़, कितना चिल्ला रही थी, चिल्लाए जा रही थी. और वह गरीब, शायद उस तेल पर फिसलकर गिर पड़ा और रेल की पटरियों पर जा गिरा...

बेज़्दोम्नी के दिमाग में मानो घण्टियाँ बजने लगीं! अन्नूश्का! सूरजमुखी का तेल! मीटिंग! पोन्ती पिलात! प्रोफेसर!

 औरत की इस उत्तेजित चिल्लाहट में से इवान निकोलायेविच का अस्त-व्यस्त दिमाग सिर्फ एक शब्द पकड़ पाया : अन्नूश्का...
 अन्नूश्का...अन्नूश्का? वह अपने आप से बड़बड़ाया, और उन्मादित होकर इधर-उधर देखने लगा, कुछ याद आ रहा है, क्या है? क्या है?...
 अन्नूश्का शब्द के साथ सूरजमुखी का तेल शब्द भी जुड़ गए, और फिर न जाने क्यों पोंती पिलात. पिलात को उसने दिमाग से झटक दिया और अन्नूश्का से प्रारम्भ हुई कड़ी को आगे बढ़ाने की कोशिश करने लगा. यह कड़ी अतिशीघ्र पूर्ण हो गई और उसका दूसरा सिरा पागल प्रोफेसर से जा मिला.

इवान बेज़्दोम्नी इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि प्रोफेसर को बेर्लिओज़ की मृत्यु के बारे में सब कुछ पता था....शायद उसीने तो इस दुर्घटना की प्लानिंग नहीं की!!??

ओह, गलती हो गई! उसने ठीक ही कहा था, कि मीटिंग होगी ही नहीं, क्योंकि अन्नूश्का ने तेल गिरा दिया है. और देखिए, अब मीटिंग हो ही नहीं सकती! यह तो कुछ भी नहीं : उसने साफ-साफ कहा था कि एक औरत बेर्लिओज़ का गला काटेगी! हाँ, हाँ! ट्राम औरत ही तो चला रही थी! यह सब क्या है? आँ?

इस बात में कोई सन्देह नहीं रह गया कि वह रहस्यमय परामर्शदाता बेर्लिओज़ की हृदयविदारक मृत्यु का पूरा विवरण अच्छी तरह जानता था. कवि के दिमाग में दो विचार कौंध गए. पहला : वह बेवकूफ़ कदापि नहीं! यह सब बकवास है! और दूसरा : कहीं यह सब उसी का पूर्वनियोजित षड्यंत्र तो नहीं था!

मगर किस तरह!
 कोई बात नहीं! यह हम जान लेंगे!

 वह उस बेंच की ओर आया जिस पर कुछ देर पहले प्रोफेसर के साथ बैठा था, और उसने उसी लम्बे, पतले, चौखाने की कमीज़ वाले आदमी को प्रोफेसर के साथ बैठे देखा, जिसने बेर्लिओज़ को बाहर का रास्ता बताया था. अब उसने ऐनक पहन रखी थी जिसका एक काँच टूटा हुआ था!

 कॉयर मास्टर, चौख़ाने वाला लम्बू, प्रोफेसर की बगल में उस जगह पर बैठा था जहाँ कुछ देर पहले इवान निकोलायेविच बैठा था. अब उसकी नाक पर अनावश्यक चश्मा था जिसकी एक आँख में काँच ही नहीं था और दूसरा तड़का हुआ था. इसके कारण चौख़ाने वाले महाशय अब और ज़्तादा घिनौने प्रतीत हो रहे थे. उससे भी ज़्यादा, जब उन्होंने बेर्लिओज़ को रेल की पटरियों का रास्ता दिखाया था.
ठण्डे पड़ते हुए दिल से इवान प्रोफेसर के पास पहुँचा और उसके चेहरे को ध्यान से देखने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि इस चेहरे पर पागलपन का कोई लक्षण न पहले था और न अब है.
 बताइए, सही-सही, आप कौन हैं इवान ने डूबती हुई आवाज़ में पूछा.
विदेशी मुड़ा और उसने कवि की ओर ऐसी दृष्टि डाली मानो वह उसे पहली बार देख रहा हो. फिर बुरा-सा मुँह बनाकर बोला, समझा नई...रूसी बोलना...
 ये समझ नहीं रहे हैं. उसके पास ही बैठे कॉयर मास्टर ने बीच में टपकते हुए कहा, हालाँकि उससे किसी ने भी प्रोफेसर के शब्दों को समझाने के लिए नहीं कहा था.
 बनिए मत! इवान ने गरजते हुए कहा और उसे अपने तालू में ठण्डक महसूस होने लगी, अभी-अभी तो आप इतनी अच्छी तरह से रूसी में बातें कर रहे थे. आप न तो जर्मन हैं और न ही प्रोफेसर! आप एक कातिल और जासूस हैं! दस्तावेज़! तैश में आकर इवान चिल्ला पड़ा.
रहस्यमय प्रोफेसर ने अपने टेढ़े मुँह को और भी टेढ़ा करके कन्धे उचकाए.
 महाशय! गन्दा लम्बू फिर बीच में टपक पड़ा, आप क्यों पर्यटक को तंग कर रहे हैं? इसके लिए आपको कड़ी सज़ा मिलेगी! और उस सन्देहास्पद प्रोफेसर ने भोला-सा चेहरा बनाया और मुड़कर इवान से दूर जाने लगा.
इवान को लगा जैसे वह अपना संयम खो रहा है, लम्बी साँस लेकर वह लम्बू से बोला, ऐ महाशय, इस अपराधी को पकड़ने में मेरी सहायता कीजिए! आपको यह करना ही होगा.
लम्बू तेज़ी से उठा और कूदकर दहाड़ा, कौन अपराधी? कहाँ है? विदेशी अपराधी? लम्बू की आँखें मानो खुशी से मटकने लगीं, यह? अगर यह अपराधी है, तो सबसे पहले हमें ज़ोर से चिल्लाना होगा : सिपाही! वर्ना वह भाग जाएगा. चलो, एक साथ चिल्लाएँ. एकदम! और लम्बू ने अपने जबड़े खोले.
परेशान इवान ने उस मसखरे लम्बू का कहना मानकर ज़ोर से आवाज़ लगाई सिपाही! मगर लम्बू ने सिर्फ मुँह खोले रखा, कोई आवाज़ नहीं निकाली.
इवान की अकेली, भर्राई हुई चीख का कोई ख़ास अच्छा परिणाम नहीं निकला. दो ख़ूबसूरत-सी लड़कियों का ध्यान अलबत्ता उसने आकर्षित किया, और इवान ने उनके मुख से सुना, शराबी!
 तो तुम उसके साथ मिले हुए हो? इवान तैश में आकर चिल्लाया, क्या तुम मेरा मज़ाक उड़ा रहे हो? छोड़ो मुझे!
इवान दाहिनी ओर झुका और लम्बू भी दाहिनी ओर, इवान बाएँ तो उस दुष्ट ने भी वैसा ही किया.
 तुम ज़बर्दस्ती मेरे पैरों में क्यों अड़मड़ा रहे हो? जानवरों की तरह चिल्लाया इवान, ठहरो, मैं तुम्हें ही पुलिस के हाथों में दे देता हूँ.
इवान ने उस दुरात्मा को कालर से पकड़ने की कोशिश की मगर वह झोंक में आगे चला गया. उसकी पकड़ में कुछ भी नहीं आया. लम्बू मानो पृथ्वी के भीतर गड़प हो गया.
इवान कराह उठा, उसने इधर-उधर दृष्टि दौड़ाई और कुछ दूरी पर घृणित विदेशी को पाया. वह पत्रियार्शी नुक्कड़ की ओर निकलते हुए दरवाज़े के पास पहुँच गया था. वह अकेला नहीं था, रहस्यमय और ख़तरनाक लम्बू भी उसके पास पहुँच गया था. इतना ही काफ़ी नहीं था : इस मण्डली में एक तीसरा भी था न जाने कहाँ से टपक पड़ा एक बिल्ला. सूअर की तरह विशाल, कौवे या काजल की तरह काला, अति साहसी घुड़सवार की मूँछों जैसी मूँछों वाला. ये तीनों कुटिल पत्रियार्शी की तरफ जा रहे थे. बिल्ला अपने पिछले पैरों पर चल रहा था.

यह व्यक्ति उपन्यास के महत्त्वपूर्ण पात्रों में से एक है.

 अब हम देखेंगे कि किस तरह इवान उनका पीछ करता है....

इवान इस त्रोयका का पीछा कर रहा है...प्रोफेसर, पतला लम्बू, और एक विशालकाय बिल्ला जो न जाने कब और कहाँ से आकर उनके साथ मिल गया था.

 इवान इन पापियों के पीछे लपका लेकिन वह समझ गया कि उन्हें पकड़ पाना असम्भव है.

तीनों कुटिल एक पल में नुक्कड़ पर पहुँचकर अगले ही पल स्पिरिदोनव में नज़र आए. चाहे जितनी तेज़ी से इवान अपनी रफ़्तार बढ़ा रहा था, मगर उनके बीच की दूरी कम नहीं हो रही थी. कवि समझ नहीं पाया कि कब वह स्पिरिदोनव रास्ते से निकीत्स्की दरवाज़े तक पहुँच गया. यहाँ आकर हालत और भी ख़राब हो गई. यहाँ बड़ी भीड़ थी. उनके धोखे में इवान किसी और व्यक्ति पर झपट पड़ा जिसके कारण उसे काफ़ी डाँट पड़ी. दुष्टों ने अब डाकुओं जैसी चाल चली वे यहाँ-वहाँ तितर-बितर हो गए.

लम्बू बड़ी सहजता से चलते-चलते अर्बात चौक की ओर जाती बस में चढ़ गया. इस तरह वह वहाँ से खिसक लिया. उनमें से एक को खो देने पर इवान ने बिल्ले पर अपना ध्यान केन्द्रित किया. देखा, वह विचित्र बिल्ला ट्राम-गाड़ी के फुटबोर्ड पर चढ़ गया और निर्लज्ज की भाँति धक्का मारकर एक चिल्लाती हुई औरत को अपने स्थान से हटाकर उसने डण्डे को पकड़ लिया, और महिला कण्डक्टर को उमस के कारण खुली खिड़की में से दस कोपेक का सिक्का देने लगा.
बिल्ले के ऐसे व्यवहार को देखकर इवान इतने सकते में आ गया कि पास ही एक किराने की दुकान से मानो वह चिपक गया और महिला कण्डक्टर का बर्ताव देख उसकी हालत पहले से भी ज़्यादा खस्ता हो गई.
उसने बिल्ले की ओर सिर्फ देखा जो ट्राम में चढ़ा चला आ रहा था और क्रोध में काँपती हुई बोली, बिल्लियाँ नहीं! बिल्लियों के साथ नहीं! नीचे उतरो, वर्ना पुलिस को बुलाऊँगी!
आश्चर्य की बात यह थी कि न महिला कण्डक्टर को, न ही मुसाफिरों को वास्तविकता समझ में आ रही थी : बिल्ला ट्राम गाड़ी में घुस गया यह तो आधी ही विपदा वाली बात थी, विचित्र बात तो यह थी कि बिल्ला टिकिट के पैसे दे रहा था! यह बिल्ला न केवल पैसे वाला बल्कि अनुशासनप्रिय भी प्रतीत हो रहा था. महिला कण्डक्टर की पहली ही चीख सुनकर उसने आगे बढ़ना बन्द कर दिया और फुटबोर्ड से उतरकर ट्राम के स्टॉप पर बैठ गया. वह अपनी मूँछों को इस दस कोपेक वाले सिक्के से साफ करता रहा, लेकिन जैसे ही कण्डक्टर के घंटी बजाते ही ट्राम चली, बिल्ले ने तत्क्षण वही किया, जो ट्राम से नीचे उतारा गया आदमी करता है, जिसे उसी ट्राम में जाना अत्यावश्यक होता है. बिल्ले ने ट्राम के तीनों डिब्बों को गुज़र जाने दिया. फिर आख़िरी डिब्बे की पिछली कमान पर कूदकर अपने पंजों से बाहर निकली हुई एक नली को पकड़ लिया और चल पड़ा ट्राम के साथ, इस तरह उसने पैसे भी बचा लिए.

कुछ छोटी-छोटी बातों की ओर ध्यान दीजिए...

बिल्ला ट्राम में घुसकर कण्डक्टर को टिकट के पैसे दे रहा है; कण्डक्टर ने सिर्फ इतना ही कहा कि बिल्लियों को ट्राम में सफर करने की इजाज़त नहीं है, मगर किसी ने भी...किसी ने भी इस बात की ओर ध्यान नहीं दिया कि यह बिल्ला कण्डक्टर को पैसे दे रहा था!

प्रोफेसर का पीछा करते-करते इवान ने न जाने क्यों सोच लिया कि हो न हो प्रोफेसर बिल्डिंग नं. 13 के फ्लैट नं. 47 में है. यह एक ऐसी बिल्डिंग थी जो क्रांति से पहले कुलीन वर्ग के व्यक्ति की थी और जिसे क्रांति के बाद सार्वजनिक आवास में बदल दिया गया था. बिल्डिंग के भीतर की गई तोड़-फोड़, धूल, गन्दगी, आम-रसोईघर जिसमें ईसा की एक कागज़ की तस्वीर और एक मोमबत्ती लटक रही थी,..गुसलखाने में साबुन के फेन में लिपटी नहाती हुई औरत जो गलती से भीतर घुस आए इवान को अपना प्रेमी समझ बैठी और उसे झिड़कते हुए बाहर जाने के लिए कहने लगी, क्योंकि उसके पति के घर लौटने का समय हो चुका था... सभी खिड़कियों से झाँकते एक से नारंगी शेड वाले लैम्प, एक ही तरह का संगीत, एक चिल्लाती हुई, गुस्से भरी आवाज़ जो ‘एव्गेनी अनेगिन’ से एक प्रेम गीत गा रही है (यह गुसैल, चीखती हुई आवाज़ उपन्यास में कई बार, अनेक जगहों पर सुनाई देती है!)...आपको 20 के दशक के मॉस्को के दर्शन हो जाते हैं!          

फिर होती है एक दिलचस्प बात...

जब इवान यह सोचकर मॉस्को नदी में छलांग लगाता है कि प्रोफेसर उसीमें है...

 अत्यंत अल्प समय में ही इवान निकोलायेविच को मॉस्को नदी तक जाती हुई पत्थर की सीढ़ियों के पास देखा जा सकता था. इवान ने अपने कपड़ॆ उतार दिए और उन्हें एक भले से दाढ़ी वाले को थमा दिया. सफ़ेद ढीले-ढाले फटे कुरते में अपने मुड़े-तुड़े जूते के पास बैठा वह अपनी ही बनाई सिगरेट पी रहा था. हाथों को हिलाकर, जिससे कुछ ठण्डक महसूस हो, इवान एक पंछी की तरह पानी में घुस गया. पानी इतना ठंडा था कि उसकी साँस रुकने लगी. उसके दिमाग में यह ख़याल कौंधा कि शायद वह पानी की सतह पर कभी वापस लौट ही नहीं सकेगा. मगर वह उछलकर ऊपर आ गया और हाँफ़ते हुए और भय से गोल हो गई आँखों से इवान निकोलायेविच ने नदी किनारे पर लगे फानूसों की टेढ़ी-मेढ़ी, टूटी-फूटी रोशनी में पेट्रोल की गन्ध वाले पानी में तैरना आरम्भ किया.
 जब गीले बदन से इवान सीढ़ियों पर चढ़ते हुए उस जगह पहुँचा, जहाँ उसने दाढ़ी वाले को अपने कपड़े थमाए थे, तो देखा कि उसके कपड़ों के साथ दाढ़ी वाला भी गायब है. ठीक उस जगह, जहाँ उसके कपड़े रखे थे, केवल धारियों वाला लम्बा कच्छा, फटा कुरता, मोमबत्ती, ईसा की प्रतिमा और दियासलाई की डिबिया पड़ी है. क्षीण क्रोध से, दूर किसी को अपनी मुट्ठियों से धमकाते हुए, इवान ने वह सब उठा लिया.
अब उसे दो प्रकार के विचारों ने परेशान करना शुरू किया : पहला यह कि उसका मॉसोलित का पहचान-पत्र गायब हो गया था, जिसे वह कभी अपने से अलग नहीं करता था; और दूसरा यह कि इस अवस्था में वह कैसे बेरोकटोक मॉस्को की सड़कों पर घूम सकेगा? ख़ैर, कच्छा तो है...किसी को इससे भला क्या मतलब हो सकता है, मगर कहीं कोई बाधा न खड़ी हो जाए.
उसने लम्बे कच्छे की मोरी से बटन तोड़ दिए, यह सोचकर कि ऐसा करने से कच्छा गर्मियों में पहनने वाली पैंट जैसा दिखने लगेगा, फिर उसने ईसा की प्रतिमा, मोमबत्ती और दियासलाई की डिबिया उठाई और अपने आप से यह कहते हुए चल पड़ा, ग्रिबोयेदोव चलूँ! इसमें कोई सन्देह नहीं, कि वह वहीं पर होगा.

पानी बेहद ठण्डा था, नदी के पानी में आने जाने वाले स्टीमरों के कारण तेल बिखरा हुआ है, इवान के कपड़े चोरी हो जाते हैं, सिर्फ वह मोमबत्ती और ईसा की तस्वीर वहाँ छोड़ दी जाती है, और वह किसान, जिसे इवान ने अपने कपड़े थमाए थे, अपना ढीला ढाला कुर्ता और ऊँची-ऊँची पतलून वहाँ छोड़ जाता है. इवान के सामने इन कपड़ों को पहनने के अलावा कोई और चारा नहीं था. वह कमीज़ पर सामने की ओर पिन से ईसा की तस्वीर टाँक लेता है और दूसरे हाथ में मोमबत्ती पकड़ लेता है. इस वेशभूषा में वह चल पड़ता है ग्रिबोयेदोव भवन की ओर रहस्यमय प्रोफेसर की तलाश में.

क्या हम ऐसा समझ सकते हैं कि तेल मिश्रित पानी में नहाने के बाद इवान का शुद्धीकरण हो गया है? उसने ईसा की तस्वीर को अपना लिया है, क्या उसका बाप्तिज़्मा हो गया है? कुछ लोग इस बात पर विचार कर सकते हैं, मगर हम सिर्फ इस बात पर गौर करेंगे कि इवान की सोच में, उसके नज़रिए में परिवर्तन आ गया है. अब वह काफी चीज़ों को जानने लगता है जिन पर पहले उसका ध्यान नहीं जाता है, जिन्हें वह कोई महत्त्व नहीं देता था.

अगले अध्याय में मॉस्को के साहित्यिक जीवन के बारे में काफी कुछ जानकारी दी गई है.

बुधवार, 5 अगस्त 2015

Reading Master and Margarita (Hindi) - 03

अध्याय – 3

सातवाँ प्रमाण


हमने देखा कि अध्याय 2 में विदेशी पत्रियार्शी पार्क में येशुआ-हा-नोस्त्री और पोंती पिलात का प्रसंग सुनाता है, जिसमें येशुआ को फाँसी की सज़ा सुनाई जाती है. और जब तक अभियुक्तों को गंजे पहाड़ पर ले जाया जाता है सुबह के दस बज जाते हैं.

अध्याय 2 का घटनाक्रम घटित होता है येरूशलम में.

अध्याय 3 उसी वाक्य से आरम्भ होता है जिससे अध्याय 2 समाप्त हुआ था.  दुबारा यह कहकर कि   ‘सुबह के दस बजे थे, आदरणीय इवान निकोलायेविच... ’ बुल्गाकोव पाठकों को उस स्थान एवम् समय पर वापस ले आता है जब बेर्लिओज़ और बेज़्दोम्नी ईसा के बारे में चर्चा कर रहे थे. इस विधा का प्रयोग बुल्गाकोव स्थान एवम् समय में मानो छलाँग लगाने के लिए करते हैं.

इस समय तक पत्रियार्शी पर शाम हो चुकी है और आसमान में चाँद निकल आया है. बेर्लिओज़ इस ‘सिरफिरे’ जर्मन को गुस्सा नहीं दिलाना चाहता मगर फिर भी वह कह देता है कि प्रोफेसर की कहानी है तो बड़ी दिलचस्प मगर वह बाइबल की कहानियों से मेल नहीं खाती.

आपकी कहानी बहुत रोचक थी प्रोफेसर, हालाँकि वह बाइबिल की कहानियों से ज़रा भी मेल नहीं खाती.
 माफ कीजिए, प्रोफेसर शिष्ठतापूर्वक हँसकर बोला, आप तो जानते ही होंगे कि बाइबिल में जो कुछ लिखा है, वैसा वास्तव में कभी हुआ नहीं. और यदि हम बाइबिल को ऐतिहासिक प्रमाण मानें... वह फिर हँसा. बेर्लिओज़ सिटपिटा गया, क्योंकि ठीक यही बात उसने बेज़्दोम्नी से कही थी, जब वह ब्रोन्नाया सड़क से पत्रियार्शी तालाब की तरफ आ रहे थे.
 बेर्लिओज़ ने कहा, बात यह है कि...मुझे डर है कि कोई भी इस बात का प्रमाण नहीं दे सकता कि जो कुछ आपने कहा, वह भी वास्तव में घटित हुआ हो.
 ओह, नहीं! कोई भी इस बात को सत्य सिद्ध कर सकेगा! प्रोफेसर ने बड़े अन्दाज़ से दृढ़ स्वर में कहा

 प्रोफेसर बेर्लिओज़ द्वारा ही कुछ समय पहले कहे गए शब्दों को दुहरा देता है कि बाइबिल में वर्णित घटनाएँ असल में कभी हुई ही नहीं. बेर्लिओज़ भौंचक्का रह जाता है.

गौर कीजिए कि इस बात को कहकर बुल्गाकोव इस बात की ओर इशारा कर देते हैं कि पाठक येशुआ-पोंती पिलात के प्रसंग को वाक़ई में ईसा की कहानी न समझ बैठें.....ये तो कोई और ही बात है!

आगे के अध्यायों में भी आप देखेंगे कि बुल्गाकोव किसी घटना का वर्णन बड़े विस्तार से करते हैं और फिर एकदम यह कहकर उसे खारिज कर देते हैं कि ‘हमें कुछ मालूम ही नहीं है’, या ‘ऐसा हुआ ही नहीं था.’

बेर्लिओज़ प्रोफेसर से पूछता है कि वह मॉस्को में रुका कहाँ है, और प्रोफेसर जवाब देता है कि वह बेर्लिओज़ के ही फ्लैट में पूरे तीन दिनों तक रहने वाला है!

बेर्लिओज़ बेज़्दोम्नी को इशारे से प्रोफ़ेसर पर नज़र रखने के लिए कहकर फ़ोन करने के लिए उठता है:

आप यहाँ मेरे मित्र बेज़्दोम्नी के साथ एक मिनट बैठिए, और मैं नुक्कड़ पर जाकर एक टेलिफोन करके आता हूँ, फिर हम आपको जहाँ चाहें वहाँ छोड़ आएँगे. आप तो इस शहर में नए हैं न...
                                                               
देखा जाए तो बेर्लिओज़ का सोचा हुआ प्लान बिल्कुल सही था : निकट के टेलिफोन बूथ में जाकर विदेशियों से सम्बन्धित दफ़्तर में इस बात की सूचना देना था कि यह, विदेश से आया हुआ सलाहकार पत्रियार्शी तालाब वाले पार्क में बैठा है और उसकी दिमागी हालत बिल्कुल ठीक नहीं है. इसलिए कुछ ज़रूरी उपाय किए जाएँ, नहीं तो यहाँ कोई नाखुशगावार हादसा हो सकता है.
 फोन करना है? कीजिए, मनोरुग्ण ने उदासी से कहा और अचानक भावावेश से मिन्नत की, मगर जाते-जाते आपसे निवेदन करूँगा कि शैतान के अस्तित्व में विश्वास कीजिए! मैं आपसे कोई बड़ी चीज़ नहीं माँग रहा हूँ. याद रखिए कि शैतान की उपस्थिति के बारे में सातवाँ प्रमाण मौजूद है, यह बड़ा आशाजनक प्रमाण है! अभी-अभी आपको भी इस बारे में पता चल जाएगा.
 अच्छा, अच्छा... झूठ-मूठ प्यार से बेर्लिओज़ ने कहा और चिढ़े हुए कवि की ओर देखकर उसने आँख मारी, जिसे इस पागल जर्मन की चौकीदारी करने का ख़्याल बिल्कुल नहीं आया था. फिर वह ब्रोन्नाया रास्ते और एरमालायेव गली के चौराहे की तरफ वाले निकास द्वार की ओर बढ़ा. उसकी जाते ही प्रोफेसर मानो स्वस्थ हो गया और उसके चेहरे पर चमक आ गई.
 मिखाइल अलेक्सान्द्रोविच! उसने जाते हुए बेर्लिओज़ से चिल्लाकर कहा.
वह कँपकँपाया, फिर उसने पीछे मुड़कर देखा और स्वयँ को ढाढस बँधाया कि उसका नाम भी प्रोफेसर ने कहीं अख़बारों में पढ़ा होगा. और प्रोफेसर दोनों हाथ बाँधे चिल्लाता जा रहा था, क्या मैं आपके चाचा को कीएव में तार भेज दूँ?

वह विचित्र, पारदर्शी आदमी जिसे बेर्लोओज़ ने पार्क में हवा से बनते देखा था, दुबारा प्रकट होता है. अब वह साधारण इंसान की तरह प्रतीत हो रहा है.

ब्रोन्नाया वाले निर्गम द्वार के पास बेंच से उठकर सम्पादक के पास वही व्यक्ति आया जो तब सूरज की धूप में गरम हवा से बनता नज़र आया था. फर्क इतना था कि अब वह हवा से बना हुआ प्रतीत नहीं होता था, बल्कि साधारण व्यक्तियों की भाँति ठोस नज़र आ रहा था. घिरते हुए अँधेरे में बेर्लिओज़ ने साफ-साफ देखा कि उसकी मूँछें मुर्गी के पंखों जैसी थीं, आँख़ें छोटी-छोटी, व्यंग्य से भरपूर, आधी नशीली, और चौख़ाने वाली पतलून इतनी ऊँची थी कि अन्दर से गन्दे मोज़े नज़र आ रहे थे.

मिखाइल अलेक्सान्द्रोविच वहीं ठिठक गया, मगर उसने यह सोचकर अपने आपको समझाया कि यह केवल एक विचित्र संयोग है और इस समय उसके बारे में सोचना मूर्खता है.

 घुमौना दरवाज़ा ढूँढ रहे हैं साहब? कड़कते स्वर में लम्बू ने पूछा, इधर आइए! सीधे, और जहाँ चाहे निकल जाइए. बताने के लिए आपसे एक चौथाई लिटर के लिए...हिसाब बराबर...भूतपूर्व कॉयर मास्टर के नाम! शरीर को झुकाते हुए इस प्राणी ने अभिवादन के तौर पर अपनी जॉकियों जैसी टोपी हाथ में ले ली.

इस तरह हमें दो बातों का पता चलता है : वह स्थान जहाँ विदेशी रुकने वाला है; और यह कि बेर्लिओज़ का एक चाचा है जो कीएव में रहता है.

बेर्लिओज़ अन्नूश्का द्वारा गिराए गए तेल पर फिसल कर रेल की पटरियों पर गिर जाता है और फौरन तेज़ी से आती हुई ट्राम द्वारा कुचल दिया जाता है. ट्राम एक महिला द्वारा चलाई जा रही थी.
इस प्रकार प्रोफेसर की भविष्यवाणी सही साबित होती है: मासोलित की मीटिंग जिसकी अध्यक्षता बेर्लिओज़ करने वाला था हो ही नहीं सकती; बेर्लिओज़ का सिर काट दिया जाता है, एक महिला द्वारा.

अगले ही पल लोगों की भीड़ जमा हो गई जो बेर्लिओज़ के कटे हुए सिर को देखकर सकते में आ गए थे.

हम कह सकते हैं कि यह अध्याय आगे होने वाली घटनाओं की प्रस्तावना है.

यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रोफेसर भविष्यवेत्ता है, यह भी यक़ीन हो जाता है कि मनुष्य का अपने भविष्य पर कोई नियंत्रण नहीं है, वह तो यह भी नहीं जानता है कि अगले पल उसके साथ क्या होने वाला है.

बेज़्दोम्नी की क्या प्रतिक्रिया होगी?

अगले अध्याय में....

सोमवार, 3 अगस्त 2015

Reading Master and Margarita (Hindi) - 02

अध्याय -2

पोंती पिलात


पहले अध्याय में हमने देखा कि इवान बेज़्दोम्नी और बेर्लिओज़ पत्रियार्शी तालाब वाले पार्क में इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि येशू का अस्तित्व था या नहीं. बेर्लिओज़ का मत था कि उनका अस्तित्व कभी था ही नहीं. अचानक वहाँ एक अजनबी आता है जो स्वयँ को काले जादू का विशेषज्ञ बताता है. वह इस बात पर ज़ोर देता है कि ईसा थे, और उनके अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए किसी परिणाम की आवश्यकता नहीं है. वह बेज़्दोम्नी और बेर्लिओज़ को प्राचीन येरूशलम ले जाता है जहाँ ईसा पर मुकदमा चलाया जा रहा है. इस स्थान एवम् समय परिवर्तन को बड़ी खूबी से बुल्गाकोव ने उसी वाक्य से अंजाम दिया है, जिससे पहला अध्याय समाप्त किया गया है. आगे के अध्यायों में भी इस विधा का प्रयोग किया गया है.

तो, प्राचीन येरूशलम में रोम का न्यायाधीश पोंती पिलात ईसा से प्रश्न पूछ रहा है.

दूसरा अध्याय पढ़ते समय बड़ी सावधानी से इस वार्तालाप पर ध्यान दीजिए. अध्याय के आरंभ में गुलाब के फूलों की सुगन्ध, पिलात की मनोदशा और उसके स्वास्थ्य पर गौर कीजिए.

न्यायाधीश माइग्रेन से पीडित है. माइग्रेन ही क्यों? गुलाब के फूलों की सुगन्ध के कारण. माइग्रेन ही क्यों? जिससे उसका सिर्फ आधा मस्तिष्क ही दर्द से सुलगता रहे और वह उसका इस्तेमाल न कर पाए. गुलाब ही के फूल इसलिए क्योंकि उनका रंग लाल होता है.

हमने देखा कि पोंती पिलात सिर दर्द से परेशान है. इस सिर दर्द की वजह है लाल गुलाबों से आती हुई सुगन्ध जो हर तरफ व्याप्त थी.

”मास्टर और मार्गारीटा “ में आप कई बार देखेंगे कि बुल्गाकोव सिर की ओर – याने विचार प्रक्रिया की ओर ध्यान नहीं देना चाहते और अनेकों बार आपको ऐसे वाक्य पढ़ने को मिलेंगे, जैसे : ‘सिर क्यों?’,    ‘सिर का यहाँ क्या काम?’, ‘सिर की यहाँ कोई ज़रूरत नहीं है!’   

व्लादीमिर मायाकोव्स्की ने भी अपने नाटक ‘खटमल’ में एक दृश्य लिखा है जिसमें बाज़ार में मछली बेचे जाने का दृश्य है. दो दुकानदार एक ही तरह की मछली अलग-अलग दामों पर बेच रहे हैं. पूछताछ करने से पता लगता है कि सस्ती मछली लम्बी भी है. दुकानदार द्वारा अपनी सफ़ाई में यह कहा जाता है कि मछली का सिर काट दो, लम्बाई बराबर हो जाएगी. सिर की ज़रूरत ही क्या है?

तात्पर्य यह कि तत्कालीन सोवियत संघ में किसी भी प्रकार के बौद्धिक कार्यकलापों का स्वागत नहीं होता था . सिर्फ संख्या की, सिर्फ हुक्म का पालन करने वाले रोबो की ज़रूरत थी?

चलिए, अब अध्याय 2 के दो अन्य पात्रों की ओर चलें. इस अध्याय में जो व्यक्ति हमारा ध्यान आकर्षित करता है वह है मार्क क्रिसोबोय. मार्क क्रिसोबोय पर ध्यान दीजिए. उसके नाम का अंग्रेज़ी अनुवाद होगा Ratslayer और हिन्दी अनुवाद – चूहामार.

उन दिनों एक अभियान चला था खेतों से चूहों को, याने समाज से घातक तत्वों को ख़त्म करने का. क्रिसोबोय उसी विभाग से था जो समाज के लिए ख़तरनाक समझे जाने व्यक्तियों का सफ़ाया करता था.

क्रिसोबोय के डील डौल पर ज़रा नज़र डालिए....

हम देख चुके हैं कि मार्क क्रिसोबोय सुरक्षा प्रमुख है. देखिए, उसका वर्णन किस प्रकार किया गया है:

क्रिसोबोय बड़ा हट्टा-कट्टा, अत्यंत शक्तिशाली व्यक्ति था. उसका चेहरा विद्रूप था. जैसे ही वह बाल्कनी में आया, ऐसा लगा, मानो अँधेरा छा गया हो. क्रिसोबोय अपनी सैन्य टुकड़ी के सबसे ऊँचे सैनिक से भी लगभग एक सिर के बराबर ऊँचे थे. उनके कन्धे इतने चौड़े थे कि उन्होंने अभी-अभी उदित हुए सूर्य को पूरी तरह ढँक लिया था.

इसी अध्याय में हम सूर्य को क्रमश: प्रखर होते देखेंगे...बाद के अध्यायों में भी सूर्य की निर्ममता का वर्णन है. मगर अध्याय 2 के आरम्भ में क्रिसोबोय सूर्य से अधिक ताकतवर है, क्योंकि सूर्य अभी ऊपर नहीं आया है! इसका तात्पर्य यह हुआ कि सुरक्षा तंत्र बहुत शक्तिशाली था और उन्होंने सूर्य द्वारा प्रदर्शित शक्तिशाली व्यक्तियों को भी ग्रहण लगा दिया था...धीरे-धीरे हम जानेंगे कि मिखाइल बुल्गाकोव का इशारा किस ओर है.

अब आइए, येशुआ की ओर. पूरा नाम, जो उन्हें दिया गया है, वह है येशुआ-हा-नोस्त्री.  उसे लाया जाता है येरूशलम के न्यायाधीश के सम्मुख. आसपास का परिवेष यह सुझाता है कि यह ईसा मसीह पर चलाया जा रहा मुकदमा है...मगर...यही तो है बुल्गाकोव का कमाल! वे यत्र-तत्र कुछ ऐसी बातों की ओर इशारा कर देते हैं कि हमें यकीन होने लगता है कि ये वास्तव में वो नहीं है.

येशू की ओर ध्यान दीजिए...उसकी उम्र, जो बुल्गाकोव द्वारा बताई जाती है, उसकी वेशभूषा, पोन्ती पिलात द्वारा उससे पूछे गए प्रश्न और येशू द्वारा दिए गए जवाब. यह जानने की कोशिश कीजिए कि वे पवित्र बाइबल में दिए गए वर्णन से किस तरह भिन्न हैं.
  
 ‘तभी शस्त्रधारी सैनिक लगभग 27 वर्ष के नवयुवक को पकड़ कर लाए. उसने फटा-पुराना लम्बा नीला चोगा पहना था, सिर पर सफ़ेद रूमाल बन्धा था...’

तो, येशुआ-हा-नोस्त्री की आयु 27 वर्ष बताई गई है...पवित्र बाइबल में ईसा की आयु बताई गई है 33 वर्ष ...

येशुआ नीले रंग की पोषाक में है, पवित्र बाइबल के अनुसार उनकी पोषाक का रंग था काला...येशुआ कहता है कि उसे अपने माता-पिता की याद नहीं, कहता है कि वे सीरियाई थे...यह भी बाइबल की कथा से दूर हट गया है.

हा-नोस्त्री पर आरोप लगाया गया है कि उसने येरूशलम में लोगों को मन्दिर नष्ट करने के लिए उकसाया...येशुआ जवाब देता है कि उसने किसी को इस काम के लिए नहीं उकसाया. उसने यह भी कहा कि पुराने विश्वासों का मन्दिर एक दिन ढह जाएगा और इसके स्थान पर सत्य का एक नया मन्दिर बनेगा.

यह सब स्थानीय वैचारिक/ धार्मिक व्यवस्था के, जिसका नेतृत्व कैफ करता था, विरुद्ध जा रहा था.
कैफ और पोंती पिलात के बीच किस प्रकार के सम्बन्ध हैं उन पर ध्यान दीजिए...

वे एक दूसरे से घृणा करते हैं. कैफ ने सम्राट से पिलात के विरुद्ध शिकायत की थी. अध्याय 2 में यह बताया गया है कि असल में पिलात येशुआ को बचाना चाहता था. वह उसे येरूशलम से दूर ले जाकर अपने साथ रखना चाहता था. मगर कैफ ज़िद पर अड़ा था कि येशुआ को फाँसी पर लटकाया जाए.

येशुआ को मृत्यु दण्ड सुनाकर पिलात अपने हाथ मलता है जैसे उन्हें धो रहा हो. यही प्रक्रिया आगे के एक और अध्याय में भी दोहराई जाएगी.

हम देखते हैं कि इस अध्याय में 4 प्रमुख पात्र हैं:

पोन्ती पिलात, जो येरूशलम में सम्राट सीज़र का प्रतिनिधि है;

येशुआ-हा-नोस्त्री जिस पर यह इल्ज़ाम लगाया गया है कि उसने लोगों को येरूशलम का मन्दिर नष्ट करने के लिए उकसाया है;

मार्क क्रिसोबोय, सुरक्षा बलों का प्रमुख जो सबसे ऊँचे सैनिक से भी ऊँचा है;

कैफ, जो धर्म गुरू है.

मगर  दो अन्य पात्र भी हैं, जिन के बारे में कुछ वर्णन इस अध्याय में मिलता है:

सीज़र और काला टोप पहना आदमी, जिससे पिलात कुछ क्षणों के लिए अन्धेरे कमरे में मिलता है.
सीज़र येरूशलम में उपस्थित नहीं है, मगर उनकी उपस्थिति का आभास सदैव होता रहता है.

इसीलिए जब येशुआ पर दूसरा इल्ज़ाम लगाया जाता है – महान सम्राट के प्रति अनादर प्रदर्शित करने का – तो पिलात समझ जात हि कि वह हा-नोस्त्री को अवश्यंभावी मृत्यु से नहीं बचा पाएगा. वह येशुआ को इशारों से बताने की कोशिश करता हि कि वह इस इलज़ाम से इनकार कर दे, मगर येशुआ स्वीकार करता है कि उसने लोगों को राजाओं के शासन के बारे में बताया है :

 सरकार लोगों पर ज़्यादती करने का साधन ही तो है...और एक ऐसा समय आएगा जब धरती पर कोई शासक नहीं बचेगा और विश्व सत्य और न्याय के साम्राज्य में प्रवेश कर जाएगा.
बस, यहीं सब कुछ समाप्त हो गया.

पिलात निचली अदालत द्वारा येशुआ को दिए गए मृत्यु दण्ड की पुष्टि करता है और अपने हाथ मलता है, जैसे उन्हें धो रहा हो.

पिलात सीज़र से डरता है, जबकि कैफ सीज़र से पिलात की शिकायत करने का कोई मौका नहीं छोड़ता. पिलात जो प्रशासनिक प्रमुख है, और कैफ, जो सैद्धांतिक/राजनैतिक प्रमुख है, एक दूसरे से बेहद घृणा करते हैं. मगर साथ ही, वे सावधान भी हैं कि कोई उनकी बातें न सुन ले. कैफ चाहता है कि येशुआ को मौत की सज़ा दे दी जाए, जबकि पिलात उसे बचाना चाहता हि, मगर उसे एहसास हो जाता है कि वह ऐसा नहीं कर पाएगा.

पवित्र बाइबल में इस बात का उल्लेख नहीं है कि पिलात के मन में येशुआ के प्रति किन्हीं कोमल भावनाओं का जन्म हुआ था.

सीज़र के चित्रण पर ध्यान दीजिए. उसके माथे के फोड़े पर...


इन बिन्दुओं पर हम अध्याय 16, 25 और 26 के बारे में चर्चा करते समय सोचेंगे.

Reading Master and Margarita (Hindi) - 01

अध्याय 1

कभी भी अनजान व्यक्तियों से बात मत करो


- आ. चारुमति  रामदास 


आइए, अब मिखाइल बुल्गाकोव के उपन्यास ‘मास्टर और मार्गारीटा’ पर कुछ चर्चा करें.

हम हर अध्याय की विशेष बातों की ओर ध्यान देंगे.

“मास्टर और मार्गारीटा’ के पहले अध्याय में हम देखते हैं कि दो साहित्यकार – मिखाइल अलेक्सान्द्रोविच बेर्लिओज़ तथा इवान निकोलायेविच पनीरेव पत्रियार्शी तालाब के किनारे बने पार्क में चर्चा कर रहे हैं.

लेखक ने इन दोनों का वर्णन इस प्रकार किया है:

बसंत ऋतु की एक गर्म शाम को मॉस्को के पत्रियार्शी तालाब के किनारे बने पार्क में दो व्यक्ति दिखाई दिए. पहला, जो छोटे क़द का था, धूसर रंग का गर्मियों का सूट पहने था. गठीला बदन, गंजा सिर, अपने ख़ूबसूरत, सलीकेदार हैट को केक-पेस्ट्री के समान हाथ में लिए, चमकदार चिकने चेहरे पर सींगों वाली काली फ्रेम का बहुत बड़ा चश्मा पहने अपने दूसरे साथी के साथ प्रकट हुआ. दूसरा, चौड़े कंधों और लाल बालों वाला, जिनकी उद्दाम लटें उसकी पीछे सरकी हुई चौख़ाने की टोपी में से निकली पड़ रही थीं, चौख़ाने की ही कमीज़ और मुड़ी-तुड़ी सफ़ेद पैंट पहने था. पैरों में काली चप्पलें थीं.
पहला कोई और नहीं, बल्कि मिखाइल अलेक्सान्द्रोविच बेर्लिओज़ था, मॉस्को के एक प्रख्यात साहित्यिक संगठन का अध्यक्ष. इस साहित्यिक संगठन को मासोलित कह सकते हैं. बेर्लिओज़ एक मोटी मासिक पत्रिका का सम्पादक भी था. उसका नौजवान साथी था कवि इवान निकोलायेविच पनीरेव जो बेज़्दोम्नी (बेघर) उपनाम से कविताएँ लिखता था.

यहाँ कुछ बातों पर ध्यान दीजिए:

घटनाक्रम का आरम्भ हो रहा है मई की एक बेहद गरम शाम को, मॉस्को में.

 ‘मॉसोलित’ एक काल्पनिक नाम है. इस प्रकार के अनेक साहित्यिक संगठन पिछली शताब्दी के बीसवें दशक के आरम्भ में सोवियत रूस में रोज़ ही बनते थे, और कभी कभी तो शाम तक बिखर भी जाते थे.  

MASSOLIT से हम अनेक तात्पर्य निकाल सकते हैं जैसे मासोवाया लितेरातूरा, या मॉस्को असोसियेशन ऑफ लिटरेचर, या फिर मास्तेर्स्काया सवेत्स्कोय लितेरातूरी. इन संगठनों को शासकीय संरक्षण प्राप्त था एवम् वे काफी प्रभावशाली थे, अतः यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि बेर्लिओज़ काफी प्रभावशाली व्यक्ति है, उसने काफी कुछ पढ़ भी रखा है, और वह काफी चालाक भी है.

कवि ‘बेज़्दोम्नी’ नौजवान है. तत्कालीन सोवियत रूस में इस प्रकार के उपनामों से अनेक साहित्यकार रचनाएँ किया करते थे. दिलचस्प बात ये है, जिसका ज़िक्र उपन्यास में कई बार आता है, कि उस समय आवास-समस्या बड़ी विकट थी. स्वयँ बुल्गाकोव भी इस समस्या से जूझ चुके थे, इसीलिए शायद उन्होंने यह उपनाम रख दिया हो.

कवि इवान बेज़्दोम्नी ने कविता तो लिख दी थी, उसमें ईसा को काले रंगों में चित्रित कर दिया था, पर बेर्लिओज़ ऐसी कविता चाहता था जिसमें ईसा के अवतरण को ही नकार दिया जाए. वह यही बात बेज़्दोम्नी को समझा रहा था कि बाइबल में जो लिखा है, ज़रूरी नहीं कि वह सत्य ही हो.

बुल्गाकोव की शैली की यह एक ख़ासियत है. वे किसी घटना का वर्णन करते जाते हैं, करते जाते हैं और फिर एकदम उसे नकार कर यह भी तुक्का जोड़ देते हैं कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था. यह विशेषता  उपन्यास का विश्लेषण करने में सहायक होगी.

अभी दोनों साहित्यकार अपनी चर्चा में मगन ही थे कि तभी वहाँ एक तीसरा, रहस्यमय व्यक्ति प्रकट हुआ. उसके रूप-रंग, चाल – ढाल के बारे में गौर से पढ़िए; वह बेर्लिओज़ के बारे में क्या भविष्यवाणी करता है और कैसे करता है इस पर ध्यान दीजिए फिर हम आगे बढेंगे.

बाद में, जब यदि स्पष्ट कहा जाए तो, जब बहुत देर चुकी थी, अनेक संस्थाओं ने इस व्यक्ति का वर्णन जारी किया. यदि इन सभी जारी किए गए वर्णनों को मिलाकर देखा जाए तो आश्चर्य होगा, क्योंकि पहले वर्णन के अनुसार यह व्यक्ति छोटे कद का था, उसके दाँत सुनहरे थे और वह दाएँ पैर से लंगड़ाता था; जबकि दूसरे वर्णन में यही व्यक्ति असाधारण ऊँचा, प्लेटिनम के दाँतों वाला और बाएँ पैर से लँगड़ाने वाला बताया जाता था. तीसरे वर्णन में इस व्यक्ति की किसी ख़ास बात का ज़िक्र नहीं किया गया था.

मतलब ये हुआ कि इनमें से एक भी वर्णन उस व्यक्ति तक पहुँचाने में सफ़ल नहीं हुआ.

सबसे पहले, वह व्यक्ति किसी भी पैर से लँगड़ाता नहीं था. न उसका कद छोटा था, न असाधारण रूप से ऊँचा; बल्कि सिर्फ ऊँचा था. जहाँ तक दाँतों का सवाल है, उसके दाँत दाईं ओर से प्लेटिनम के और बाईं ओर से सोने के थे. उसने हल्के धूसर रंग का भारी सूट पहन रखा था. सूट के ही रंग के विदेशी जूते थे. उसी रंग की टोपी कान पर झुकी हुई, और बगल में एक छड़ी दबाए था, जिसकी मूठ कुत्ते के सिर की शक्ल की थी. देखने में क़रीब चालीस वर्ष का, मुँह कुछ टेढ़ा-सा, दाढ़ी-मूँछ सफाचट, बाल काले, दाईं आँख काली, बाईं न जाने क्यों हरी, भँवें काली, मगर एक दूसरी से कुछ ऊपर. संक्षेप में विदेशी.

अजनबी उनकी रोचक बहस को सुनकर उनके निकट आया और उन्हींकी बेंच पर उनके बीच बैठ गया. अजनबी को वे बताते हैं कि वे नास्तिक हैं और इस बात को बिना डरे, आज़ादी से कह सकते हैं (स्पष्ट है कि अन्य बातों को कहने से पहले हज़ार बार सोचना पड़ता था, इस तरह कहना पड़ता था कि कोई सुन न ले).

अजनबी दो बातों की भविष्यवाणी करता है: पहली यह कि उस शाम को होने वाली मॉसोलित की मीटिंग होगी नहीं, जिसकी अध्यक्षता बेर्लिओज़ करने वाला था; और दूसरी यह कि बेर्लिओज़ की मृत्यु एक महिला द्वारा गला काटने से होगी.

जिस तरह अजनबी ये दो बातें कहता है उस पर ग़ौर कीजिए, “एक, दो...बुध दूसरे घर में...चन्द्रमा अस्त हो गया...छह – दुर्भाग्य...शाम – सात...” ज्योतिष शास्त्र में वाक़ई में ग्रहों की यह स्थिति दुर्भाग्य एवम् मृत्यु को दर्शाती है:

 बेर्लिओज़ ने सोचा और वह बोला, आप तो बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कह रहे हैं. जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मुझे आज की अपनी शाम के बारे में सब कुछ मालूम है. हाँ, अगर ब्रोन्नाया सड़क पर मेरे सिर पर कोई ईंट आकर गिर जाए तो...
 ईंट का कोई काम नहीं है, अजनबी ने सोद्देश्य कहा, वह किसी पर भी कभी भी यूँ ही नहीं गिर जाती. आप पर तो वह गिरेगी नहीं. आप तो किसी और ही तरीके से मरने वाले हैं.
शायद आप जानते हैं कि किस तरह से? तीखे व्यंग्य से बेर्लिओज़ ने पूछा, और अनजाने ही इस बेतुकी बातचीत में शामिल हो गया और मुझे बताएँगे?
 शौक से! अजनबी बोला. वह बेर्लिओज़ को नज़रों से तौलता रहा, मानो उसके लिए सूट सीने जा रहा हो, और होठों ही होठों में बुदबुदाता रहा: एक, दो...बुध दूसरे घर में...चन्द्रमा अस्त हो गया...छह दुर्भाग्य...शाम सात और फिर खुशी में आकर ज़ोर से बोला, आपका सिर काटा जाएगा!
बेज़्दोम्नी खूँखार नज़रों से इस हाथ-पैर फैलाने वाले अजनबी को देखता रहा और बेर्लिओज़ ने मख़ौल उड़ाने के अंदाज़ में पूछा, कौन काटेगा? दुश्मन? आततायी?
 नहीं, विदेशी बोला, रूसी महिला, कम्सोमोल्का.

कहने का तात्पर्य यह है कि बुल्गाकोव ने जो भी लिखा है वह गहन अध्ययन के बाद ही लिखा है, चाहे वह ऐतिहासिक घटनाओं के बारे में हो, या फिर भौगोलिक स्थितियों के बारे में हो, या उनके समकालीन मॉस्को के जीवन के बारे में हो. यदि आपको इसमें कहीं विरोधाभास नज़र आए (जैसा कि आना चाहिए), तो समझ लीजिए कि बुल्गाकोव ने ऐसा जानबूझकर किया है, उनका इशारा किसी और बात की ओर है. ऐसे ही उदाहरणों का उपयोग हमें करना है उपन्यास को समझने के लिए.

आगे बढ़ते हुए हम पिछले अध्यायों का संदर्भ देते रहेंगे, अतः बेहतर होगा यदि आप हर अध्याय को ध्यान से पढ़ें.

पहला अध्याय समाप्त करके दूसरे अध्याय की ओर जाते जाते इस बात पर ध्यान देना न भूलें कि पहले अध्याय का अंतिम वाक्य और दूसरे अध्याय का पहला वाक्य बिल्कुल एक ही है. सोचिए कि ऐसा क्यों किया गया होगा?