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सोमवार, 27 जनवरी 2014

The Fateful Eggs - 12

अध्याय 12     
हिम-देवता गाड़ी पर

19 से 20 अगस्त, 1928 की रात को ऐसी अभूतपूर्व बर्फबारी हुई जिसके बारे में बूढ़े लोगों ने कभी देखा या सुना भी नहीं था. बर्फ गिरने लगी और पूरे दो दिनों तक लगातार गिरती रही, तापमान को शून्य से 18 डिग्री नीचे ले गई. किंकर्तव्यविमूढ मॉस्को ने सारी खिड़कियाँ , सारे दरवाज़े बन्द कर लिए. सिर्फ तीसरे दिन के अंत में जनता समझ पाई कि इस बर्फबारी ने मॉस्को और उसके अंतर्गत उन असीम प्रदेशों को बचा लिया है, जिन पर सन् 1928 का महान संकट आया था. मोझाइस्क के निकट का घुड़सवार दस्ता, जो अपना तीन चौथाई हिस्सा खो चुका था, पूरी तरह थक चुका था, ज़हरीली गैस के हवाई दस्ते रेंगते हुए घृणित जीवों को आगे बढ़ने से न रोक सके, जो अर्धगोल बनाते हुए पश्चिम, दक्षिण –पश्चिम और दक्षिण दिशाओं से मॉस्को की ओर बढ़े चले आ रहे थे.
मगर बर्फ ने उन्हें दबा कर मार डाला. घृणित जीव दो दिनों तक -18 डिग्री तापमान बर्दाश्त न कर पाए, और अगस्त की बीस तारीख़ आते-आते जब बर्फ़ ग़ायब हो गई, सिर्फ नमी और गीलापन छोड़कर, हवा में नमी छोड़ते हुए, वृक्षों पर अप्रत्याशित ठण्ड से मर चुकी हरियाली को छोड़ते हुए, तो युद्ध जारी रखने के लिए कोई बचा ही नहीं था. दुर्भाग्य समाप्त हो गया था. जंगल, खेत, और असीम दलदल अभी तक रंगबिरंगे अण्डों से अटे पड़े थे, कभी-कभार विचित्र, विदेशी, अनदेखे चित्रों से ढँके, जिसे लापता रोक्क गन्दगी समझ बैठा था, मगर ये अण्डे अब पूरी तरह नुक्सान-रहित थे. वे मृत थे, उनके भीतर के भ्रूण ख़त्म हो चुके थे.
धरती के विस्तीर्ण प्रदेश काफ़ी समय तक सड़ते रहे मगरमच्छों और साँपों के मृत शरीरों के कारण, जिन्हें जन्म दिया था एक रहस्यमय, गेर्त्सेन स्ट्रीट पर वैज्ञानिक आँखों के नीचे उत्पन्न हुई किरण ने, मगर अब वे बिल्कुल भी ख़तरनाक नहीं थे, दुर्गन्धयुक्त, उष्णप्रदेशीय दलदल के ये ख़तरनाक जीव तीनों प्रदेशों की ज़मीन पर भयानक दुर्गन्ध और सड़ान छोड़कर दो दिनों में ही मर गए.
लम्बी महामारियाँ फैलीं, लोगों और साँपों के मृत शरीरों के कारण कई तरह की संसर्गजन्य बीमारियाँ फैलीं, और सेना काफ़ी समय तक कार्यरत रही, मगर अब ज़हरीली गैस छिड़कने के लिए नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग उपकरणों से, कैरोसीन के कनस्तरों से और होज़ पाईप से लैस, वह ज़मीन की सफ़ाई कर रही थी. सफ़ाई कर दी गई, और सन् ’29 के बसंत तक सब ख़त्म हो गया.
और सन् ’29 के बसंत में मॉस्को फिर से रोशनियों से थिरकने लगा, गर्मी बिखेरने लगा, घूमने लगा, और फिर से पहले ही की तरह यांत्रिक गाड़ियों की घर-घर सुनाई देने लगी, और क्राईस्ट-चर्च के गुम्बद के ऊपर मानो धागे से लटकता, चाँद का हंसिया नज़र आने लगा, और अगस्त ’28 में पूरी तरह जल चुकी दो मंज़िला इन्स्टिट्यूट की जगह पर एक नया प्राणि-विज्ञान महल बनाया गया, और उसका डाइरेक्टर बना असिस्टेंट-प्रोफेसर इवानोव, मगर अब पेर्सिकोव नहीं था. लोगों की आँखों के सामने फिर कभी ऊँगली का मुड़ा हुआ, यक़ीन दिलाता, हुक नहीं प्रकट हुआ और फिर कभी किसी ने कर्कश टर्राहट नहीं सुनी. किरण के बारे में और सन् ’28 के विनाश के बारे में पूरी दुनिया लम्बे समय तक बहस करती रही, लिखती रही, मगर फिर प्रोफेसर व्लादीमिर इपातिच पेर्सिकोव का नाम कोहरे में ढँक गया, बुझ गया वैसे ही जैसे अप्रैल की रात में उसके द्वारा खोजी गई लाल किरण बुझ गई थी. इस किरण को फिर से प्राप्त करना संभव न हो सका, हाँलाकि कभी कभी बेहद सज्जन, और अब प्रोफेसर बन चुके प्योत्र स्तेपानोविच इवानोव ने कोशिश तो की थी. पहले चैम्बर को तो पेर्सिकोव की मौत की रात को उत्तेजित भीड़ ने नष्ट कर दिया था. तीन अन्य चैम्बर्स ज़हरीली गैस के स्क्वाड्रन की साँपों के साथ पहली लड़ाई में निकोल्स्कोए के सोव्खोज़ ‘लाल-किरण’ में जल गए थे, और उन्हें फिर से बनाना संभव नहीं हुआ. शीशों और लैन्सों की संरचना एवम् उनका संयोग चाहे कितना ही सरल क्यों न रहा हो, इवानोव की लाख कोशिशों के बावजूद उनका पुनर्निमाण नहीं कर सके. ज़ाहिर है, ज्ञान के अलावा, इसके लिए किसी विशेष चीज़ की ज़रूरत थी, जो पूरी दुनिया में सिर्फ एक व्यक्ति के पास थी – स्वर्गीय प्रोफेसर व्लादीमिर इपातिच पेर्सिकोव के पास.

                                     समाप्त

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