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मंगलवार, 3 सितंबर 2013

The Fateful Eggs - 4

अध्याय 4
प्रीस्ट की विधवा, द्रोज़्दोवा

भगवान ही जानता है कि इसमें इवानोव का दोष था, या फिर ये बात थी कि सनसनीखेज़ समाचार आग की तरह फैलते हैं, मगर अचानक खदबदाते, अजस्त्र मॉस्को में लोग अचानक किरण के बारे में और प्रोफेसर पेर्सिकोव के बारे में बातें करने लगे.. बस यूँ ही, काफ़ी अस्पष्ट सी. जुलै के मध्य तक, जगमगाते मॉस्को में इस आश्चर्यजनक आविष्कार के बारे में समाचार किसी तीर लगे पंछी की तरह उछलता रहा, कभी ग़ायब हो जाता, कभी फिर से प्रकट हो जाता. तभी ‘इज़्वेस्तिया’ अख़बार के पृष्ठ नं. 20 पर ‘विज्ञान और टेक्नोलॉजी के समाचार’ शीर्षक के नीचे एक छोटी सी टिप्पणी प्रकाशित हुई, जिसमें किरण के बारे में कुछ जानकारी दी गई थी. इसमें दबे-छुपे कहा गया था कि IV स्टेट युनिवर्सिटी के जाने माने प्रोफेसर ने एक किरण का आविष्कार किया है, जो निचले प्राणियों की जीवन-क्षमता को अविश्वसनीय रूप से बढ़ाती है, और इस किरण का परीक्षण करना आवश्यक है. प्रोफेसर का नाम, बेशक, गलत लिखा गया था और वहाँ छपा था: ‘पेव्सिकोव’.
 
इवानोव ने अख़बार लाकर प्रोफेसर को टिप्पणी दिखाई.
 “पेव्सिकोव,” अपनी कैबिनेट में चैम्बर पर व्यस्त पेर्सिकोव बुदबुदाया, “इन व्हिसल-ब्लोवर्स को कैसे सब कुछ पता चल जाता है?”
मगर अफ़सोस, गलत नाम भी प्रोफेसर पेर्सिकोव को उन घटनाओं से न बचा सका जो दूसरे ही दिन शुरू गईं, और जिन्होंने पेर्सिकोव का पूरा जीवन ही उलट-पुलट कर डाला.
दरवाज़ा खटखटाकर पन्क्रात कैबिनेट में आया और उसने पेर्सिकोव के हाथ में एक बेहद शानदार विज़िटिंग कार्ड थमा दिया. 
 “वो यहीं है,” पन्क्रात ने अदब से कहा.
कार्ड पर बेहद नफ़ासत से छपा था:

अल्फ्रेद अर्कादेविच
ब्रोन्स्की
संवाददाता, मॉस्को के समाचारपत्र – ‘लाल रोशनी’, ‘लाल मिर्च’, ‘लाल मैगज़ीन’,  ‘लाल प्रोजेक्टर’, ‘लाल मॉस्को ईवनिंग न्यूज़’. 
“उसे जहन्नुम में भेज दे,” पेर्सिकोव ने एकसुर में कहा और कार्ड मेज़ के नीचे फेंक दिया.
पन्क्रात मुड़ा, बाहर गया और पांच ही मिनट बाद पीड़ित चेहरे और उसी कार्ड की दूसरी कॉपी के साथ वापस लौटा.
 “तू, क्या मज़ाक कर रहा है?” चिरचिरी आवाज़ में पेर्सिकोव चीखा और उसका चेहरा भयानक हो गया.
  “गेपेऊ (शासकीय सुरक्षा एजेंसी से तात्पर्य है – अनु.) से हैं, ऐसा कह रहे हैं,” पन्क्रात ने जवाब दिया, उसका चेहरे का रंग उड़ चुका था.
पेर्सिकोव ने एक हाथ से कार्ड झपट लिया, उसे लगभग दो हिस्सों में फाड़ ही दिया और दूसरे हाथ से चिमटी मेज़ पर फेंक दी. कार्ड पर लहरियेदार अक्षरों में लिखा था: “परम आदरणीय प्रोफेसर, माफ़ी चाहता हूँ, और विनती करता हूँ कि प्रकाशन के सामाजिक कार्य के लिए मुझे केवल तीन मिनट का समय दें. कॉरेस्पोंडेंट, व्यंग्य-पत्रिका ‘लाल-कौआ’, गेपेऊ-प्रकाशन”. 
“बुला उसे,” पेर्सिकोव ने कहा और गहरी साँस ली.
फ़ौरन पन्क्रात की पीठ के पीछे से चिकने, सफ़ाचट चेहरे वाले एक नौजवान का सिर बाहर निकला. चीनियों की तरह सदा ऊपर उठी उसकी भौंहों और सामने वाले व्यक्ति की आँखों में एक भी पल को न झाँकने वाली उसकी भूरी-भूरी आँखें विस्मित कर रही थीं. नौजवान ने बड़े सलीके से नए फ़ैशन के कपडे पहने थे. घुटनों तक पहुँचता हुआ तंग कोट, बेल बॉटम टाइप की पतलून, चमचमाते खूब चौड़े बूट जिनकी नोक खुरों जैसी थी. नौजवान के हाथों में थी एक छड़ी, नुकीले सिरे वाली हैट और एक नोट-पैड.
 “क्या चाहते हैं, आप?” प्रोफेसर ने ऐसी आवाज़ में पूछा कि पन्क्रात फ़ौरन दरवाज़े के पीछे छिप गया. “आपसे कह तो दिया गया था कि मैं व्यस्त हूँ?”
जवाब के बदले नौजवान ने दाँए-बाएँ झुककर प्रोफेसर का अभिवादन किया, इसके बाद उसकी आँखें पहियों की तरह पूरी कैबिनेट में घूम गईं और नौजवान ने फ़ौरन अपने नोट-पैड में कोई निशान बनाया.
 “मैं व्यस्त हूँ,” प्रोफेसर ने तिरस्कार से मेहमान की आँखों में देखते हुए कहा, मगर वहाँ उसे कोई भी प्रतिक्रिया नहीं मिली, क्योंकि आँखें उसकी पहुँच से बाहर थीं.
 “हज़ार बार माफ़ी चाहता हूँ, परम आदरणीय प्रोफेसर,” नौजवान ने पतली आवाज़ में बोलना शुरू किया, “कि मैं इस तरह आपके पास घुस आया और आपका कीमती समय नष्ट कर रहा हूँ, मगर आपकी विश्वस्तरीय खोज की ख़बर ने, जो पूरी दुनिया में फैल चुकी है, हमारे मैगज़ीन को मजबूर कर दिया है कि आपसे कुछ स्पष्टीकरण प्राप्त किए जाएँ.”
 “कैसे स्पष्टीकरण पूरी दुनिया के लिए?” पेर्सिकोव पीड़ा से चिंघाड़ा और पीला पड़ गया, “ मुझे आपको कोई स्पष्टीकरण वगैरह देने की ज़रूरत नहीं है...मैं व्यस्त हूँ....भयानक व्यस्त हूँ.”
 “आप किस चीज़ पर काम कर रहे हैं?” बड़ी मिठास से नौजवान ने पूछा और नोट-पैड में दूसरा निशान बनाया.
 “हाँ, मैं...आप क्या कर रहे हैं? कुछ छापना चाहते हैं?”
 “हाँ,” नौजवान ने जवाब दिया और अचानक नोट-पैड में कुछ लिख लिया.
 “पहली बात, जब तक मैं अपना काम पूरा नहीं कर लेता, मेरा कुछ भी छपवाने का इरादा नहीं है...ऊपर से आपके इन अख़बारों में तो बिल्कुल नहीं...दूसरी बात, ये सब आपको मालूम कैसे हुआ?” और पेर्सिकोव को अचानक महसूस हुआ कि वह शिथिल पड़ता जा रहा है.
 “क्या ये ख़बर सही है कि आपने ‘नए जीवन की किरण’ का आविष्कार किया है?”
 “कैसा नया जीवन?” प्रोफेसर फट पड़ा, “क्या बकवास कर रहे हैं आप! उस किरण की , जिस पर मैं काम कर रहा हूँ, अभी पूरी तरह से खोज नहीं हुई है, और असल में तो अभी तक कुछ भी पता नहीं है! हो सकता है कि वह प्रोटोप्लाज़्म के क्रियाकलापों को कुछ बढ़ाए...”
 “कितने गुना?” जल्दी से नौजवान ने पूछा.
पेर्सिकोव पूरी तरह पस्त हो गया. ...’नमूना है. शैतान ही जाने कि ये क्या है!’
 “ये कैसे बेवकूफ़ी भरे सवाल पूछ रहे हैं आप? ...मान लो, अगर मैं कहूँ कि, अं, हज़ार गुना!...”
नौजवान की आँखों में एक वहशियत भरी खुशी तैर गई. 
“क्या बहुत भारी-भरकम प्राणियों का जन्म होगा?”
 “नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है! हाँ, ये सच है कि मेरे द्वारा प्राप्त किए गए प्राणी , साधारण प्राणियों की तुलना में बड़े होंगे...हुँ, कुछ नए गुण भी उनमें होंगे...असल में, ख़ास बात यहाँ आकार नहीं, बल्कि उत्पत्ति के अविश्वसनीय वेग से है,” मुसीबत के मारे पेर्सिकोव ने कह दिया और फ़ौरन डर गया. नौजवान ने एक पूरा पृष्ठ लिख डाला था, और उसे पलट कर आगे लिखने लगा.
 “आप लिखिए नहीं!” हार मानते हुए और ये महसूस करते हुए कि वह अब पूरी तरह से नौजवान के हाथों में है, पेर्सिकोव ने बदहवासी से पूछा: “आप लिख क्या रहे हैं?”
 “क्या ये सच है कि दो दिनों में अण्डसमूह से मेंढ़कों के 2 मिलियन डिम्ब प्राप्त हो सकते हैं?”
 “ कितने अण्डसमूह से?” फिर से बिफ़रते हुए पेर्सिकोव चीखा, “क्या आपने कभी अण्डसमूह देखा है...अं, कम से कम, पेड़ों वाले मेंढ़कों का?”
 “आधे पाऊण्ड से?” बगैर झेंपे नौजवान ने पूछा.
पेर्सिकोव लाल हो गया.
 “ऐसे कौन नापता है? छिः! आप ये कह क्या रहे हैं? अं, बेशक, अगर मेंढकों का आधा पाऊण्ड अण्डसमूह लिया जाए...तब, लीजिए...भाड़ में जाओ, अं, क़रीब-क़रीब इतनी ही मात्रा में, या, हो सकता है, काफ़ी ज़्यादा भी!”
नौजवान की आँखों में हीरे जगमगा उठे, और उसने एक ही दम में और एक पृष्ठ रंग दिया.
 “क्या ये सच है कि इससे पूरी दुनिया में पशुपालन के क्षेत्र में क्रांति आएगी?”
 “ये कैसा अख़बारी सवाल है,” पेर्सिकोव चीखा, “ और, वैसे भी मैं आपको बकवास लिखने की इजाज़त नहीं देता. आपके चेहरे से मैं समझ रहा हूँ कि आप कोई घटिया चीज़ लिख रहे हैं!”
 “आपका एक फोटो, प्रोफेसर, पूरी संजीदगी से रेक्वेस्ट करता हूँ,” नौजवान ने विनती की और झटके से अपनी नोट-पैड बन्द की.
 “क्या? मेरा फोटो? आपकी मैगज़ीन्स में? इस बकवास के साथ जो आप वहाँ लिखेंगे. नहीं, नहीं, नहीं...और मैं व्यस्त हूँ...प्रार्थना करता हूँ!...”
 “कम से कम पुराना ही दे दीजिए. हम उसे फ़ौरन वापस कर देंगे.”
 “ पन्क्रात!” प्रोफेसर बदहवासी से चीखा.
  “आप का अभिवादन करता हूँ,” नौजवान ने कहा और वह गायब हो गया.

पन्क्रात के स्थान पर दरवाज़े के पीछे एक अजीब सी, किसी धातु की एक लय में सरसराहट सुनाई दी, फर्श पर लोहे की खटखट, और कैबिनेट में एक असामान्य मोटा प्रविष्ट हुआ, जिसने ढीला-ढाला कुर्ता और ऊनी कपड़े की पतलून पहनी थी. उसका बायाँ नकली पैर खटखट कर रहा था, और हाथों में उसने ब्रीफकेस पकड़ रखी थी. फिश जैली जैसे चमकते उसके पीले, गोल सफ़ाचट चेहरे पर प्यारी मुस्कान थी. वह फ़ौजियों वाले अंदाज़ में प्रोफेसर के सामने झुका और फिर सीधा खड़ा हो गया, जिससे उसके पैर की स्प्रिंग में सरसराहट हुई. पेर्सिकोव की बोलती बन्द हो गई.
”प्रोफेसर महाशय,” अनजान व्यक्ति ने बड़ी प्यारी, भर्राई आवाज़ में कहा, “इस नाचीज़ इन्सान को माफ़ कीजिए, जिसने आपकी तनहाई में ख़लल डाला है.”
 “क्या आप रिपोर्टर हैं?” पेर्सिकोव ने पूछा. “पन्क्रात!!”
”बिल्कुल नहीं, प्रोफेसर महाशय,” मोटे ने जवाब दिया, “अपना तआर्रुफ़ कराने की इजाज़त दें – मर्चेंट नेवी का कप्तान और पीपल्स कमिसारों की कौंसिल के अख़बार “ हेराल्ड ऑफ इण्डस्ट्री” का सहकारी.”
 “पन्क्रात !!” पेर्सिकोव वहशी की तरह चीखा, और तभी कोने में एक लाल सिग्नल चमका और हौले से टेलिफोन बजने लगा. “पन्क्रात!” प्रोफेसर फिर से चिल्लाया, “मैं सुन रहा हूँ.”
 “माफ़ कीजिए, प्रोफेसर महाशय, आपको तकलीफ़ दे रहा हूँ, ” टेलिफोन जर्मन में भर्राने लगा, “मैं ‘बर्लिन तागेब्लात्स का कर्मचारी...”       
 “पन्क्रात!” प्रोफेसर टेलिफोन के चोंगे में चीखा, “इस समय मैं बहुत व्यस्त हूँ और आपसे नहीं मिल सकता!...पन्क्रात!!”
और इसी समय इंस्टीट्यूट के मुख्य द्वार की घण्टियाँ बजने लगी.
***
 “ब्रोन्नाया स्ट्रीट पर भयानक मर्डर!!” जून की गरम सड़क पर पहियों और गाडियों की फ्लैश लाइट्स के बीच भर्राई हुई कृत्रिम आवाज़ें चिल्लाने लगीं. “मुर्गियों की ख़तरनाक बीमारी...प्रीस्ट की विधवा द्रोज़्दोवा की तस्वीर के साथ!...प्रोफेसर पेर्सिकोव की ख़तरनाक खोज ...जीवन की किरण!!”
पेर्सिकोव ऐसे झूलने लगा कि बस, मोखोवाया पर बस के नीचे गिरते गिरते बचा, उसने तैश में आकर अख़बार झपट लिया.
 “3 कोपेक, नागरिक!” छोकरा चिल्लाया और फुटपाथ की भीड़ में सिकुड़ते हुए फिर से चीखा, “ ‘रेड ईवनिंग न्यूज़’ – एक्स-किरण की खोज!!”
हैरान पेर्सिकोव ने अख़बार खोला और लैम्प पोस्ट से चिपक कर खड़ा हो गया. दूसरे पृष्ठ पर दाएँ कोने में एक अस्पष्ट फ्रेम से उसकी ओर देख रहा था गंजा, लटकते हुए निचले जबड़े वाला आदमी, वहशी और मृतप्राय आँखों से, जो था अल्फ्रेड ब्रोन्स्की की रचना का नमूना. उस तस्वीर के नीचे लिखा था : ‘वी.ई.पेर्सिकोव, रहस्यमय लाल किरण के खोजकर्ता’. नीचे शीर्षक था ‘वैश्विक पहेली’ जिसके नीचे शुरू हो रहा था उसका लेख इन शब्दों के साथ:
 “बैठिये,” बड़े प्यार से महान वैज्ञानिक पेर्सिकोव ने हमसे कहा....”
लेख के नीचे हस्ताक्षर थे : “अल्फ्रेड ब्रोन्स्की (अलोंज़ो)”.
 युनिवर्सिटी की छत पर हरी-सी रोशनी फैल गई, आसमान में “टाकिंग न्यूज़पेपर” ये अक्षर दिखाए दिए और फ़ौरन भीड़ के सैलाब ने मोखोवाया को लबालब भर दिया.
 “बैठिये!!!” अचानक छत पर लगे लाउडस्पीकर से एक अप्रिय, चिरचिरी आवाज़ सुनाई दी, जो अल्फ्रेड ब्रोन्स्की की हज़ार गुना बढ़ी हुई आवाज़ थी, “ – बड़ी आवभगत से महान वैज्ञानिक पेर्सिकोव ने हमसे कहा. ‘मैं मॉस्को के सर्वहारा वर्ग को अपनी खोज के परिणामों से अवगत कराना चाहता था...”
पेर्सिकोव की पीठ के पीछे हल्की सी धातु की सरसराहट सुनाई दी, और किसी ने उसे आस्तीन पकड़ कर खींचा. मुड़कर देखा तो उसे कृत्रिम धातुई पैर के मालिक का पीला गोल चेहरा नज़र आया. उसकी आँखें आँसुओं से नम थीं, और होंठ थरथरा रहे थे.
 “मुझे, प्रोफेसर, आपने अपनी आश्चर्यजनक खोज के परिणामों के बारे में बताने से इनकार कर दिया,” उसने बड़े अफ़सोस से कहा और गहरी साँस ली, “मेरे पन्द्रह रूबल्स डूब गए.”
उसने बड़ी निराशा से  युनिवर्सिटी की छत की ओर देखा, जहाँ काले जबड़े से अदृश्य अल्फ्रेड ब्रोन्स्की चीखे जा रहा था. पेर्सिकोव को न जाने क्यों मोटे पर दया आ गई.
 “मैंने,” बड़ी नफ़रत से आकाश से आ रहे शब्दों को पकड़ते हुए वह बड़बड़ाया, “ उसे कोई ‘बैठिये-वैठिए’ नहीं कहा! ये एक अजीब सी किस्म का बेशर्म इन्सान है! आप मुझे माफ़ कीजिए, प्लीज़, - मगर, वाक़ई में, जब कोई काम कर रहा हो और लोग घुसे चले आते हैं...मैं, बेशक, आपके बारे में नहीं कह रहा हूँ...”
 “शायद, प्रोफेसर महाशय, आप मुझे अपने चैम्बर का ही वर्णन दे सकते हैं?” प्रोफेसर को ताड़ते हुए नम्रता से धातुई पैर वाले आदमी ने कहा.  “आपको तो अब कोई फ़रक पड़ने वाला नहीं है...”
 “आधे पाऊंड अण्ड समूह से तीन दिनों में इतने डिम्बों का निर्माण होगा कि उन्हें गिनना मुश्किल हो जाएगा,” अदृश्य आदमी लाउडस्पीकर में गरज रहा था.
 “टी-टी,” मोखोवाया पर कारों के हॉर्न्स बज रहे थे.
 “ओ-ओ-ओ... आह, क्या बात है, ओ-ओ-ओ,” भीड़ सिर हिलाते हुए फुसफुसा रही थी.
 “कैसा नीच है? हाँ?” क्रोध से थरथराते हुए पेर्सिकोव धातुई पैर वाले पर फुफकारा, “ये सब कैसा लग रहा है आपको? मैं उसकी शिकायत करूँगा!”
”बड़ा भद्दा है!” मोटे ने सहमत होते हुए कहा.
प्रोफेसर की आँखों से एक चकाचौंध करने वाली बैंगनी रोशनी टकराई, और चारों ओर की हर चीज़ रोशनी में नहा गई – लैम्प-पोस्ट, सड़क का एक टुकड़ा, पीली दीवार, उत्सुक चेहरे.
 “ये, प्रोफेसर महाशय,” उत्तेजित होते हुए मोटा फुसफुसाया, “आपकी फोटो ले रहे हैं,” और प्रोफेसर की बाँह से यूँ लटक गया, जैसे कोई वज़न हो.
हवा में किसी चीज़ ने ‘टक्’ किया.
 “जहन्नुम में जाएँ सब के सब!” वज़न के साथ भीड़ से निकलते हुए पीड़ा से प्रोफेसर चीख़ा. “ऐ, टैक्सी. प्रेचिस्तेन्का चलो!”
पुरानी खटारा गाड़ी, सन् ’24 का मॉडेल, खड़खड़ाती हुई फुटपाथ के पास रुकी और मोटे से अपने आप को छुड़ाने की कोशिश करते हुए प्रोफेसर पीछे की सीट पर बैठ गया.
 “आप मुझे परेशान कर रहे हैं,” वह फुफकारा और बैंगनी रोशनी से बचने के लिए हथेलियों से अपना चेहरा ढाँक लिया. 
“पढ़ा?! क्या चिल्ला रहे हैं?...प्रोफेसर पेर्सिकोव की बाल-बच्चों समेत मालाया ब्रोन्नाया पर हत्या कर दी गई!...” भीड़ में लोग चीख रहे थे.
“मेरे कोई बच्चे-वच्चे नहीं हैं, सुअर की औलाद...” पेर्सिकोव दहाड़ा और अचानक काले यंत्र के फोकस में पकड़ा गया, जो उसके खुले मुँह और वहशी नज़रों पर निशाना साधे था.
“ क्र्याख...तु...क्र्याख ...तु...” टैक्सी चीखी और भीड़ में लपकी.


मोटा पहले ही टैक्सी में प्रोफेसर की बगल में बैठ चुका था.

बुधवार, 21 अगस्त 2013

The Fateful Eggs-3

अध्याय 3
पेर्सिकोव ने पकड़ लिया
   
मामला कुछ यूँ था. जब प्रोफेसर ने अपनी पैनी आँख आई-पीस से लगाई तो उसने अपने जीवन में पहली बार इस बात पर ग़ौर किया कि उस रंगबिरंगी लहर में ख़ास तौर से स्पष्ट रूप से एक विशेष रंग की काफ़ी मोटी किरण अलग से दिखाई दे रही है. ये किरण लाल-चटख़ रंग की थी और लहर में से एक छोटी सी नुकीली चीज़ की तरह बाहर निकल रही थी, जैसे कोई सुई होती है.
बस, दुर्भाग्यवश, कुछ पलों तक इस किरण ने महान वैज्ञानिक की आँख को उलझाए रखा.
इसमें, इस किरण में, प्रोफेसर ने वो देखा जो ख़ुद किरण से हज़ार गुना महत्वपूर्ण था - एक अस्पष्ट, अस्थिर जीव, जो माइक्रोस्कोप के लैन्सों और शीशों की एक असावधान हरकत के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ था. असिस्टेंट द्वारा प्रोफेसर को बुलाकर ले जाने की बदौलत, अमीबा इस किरण के प्रभाव तले डेढ़ घंटे पड़े रहे, और इस कारण ये हुआ : उस समय, जब डिश पर किरण से बाहर के क्षेत्र में दानेदार अमीबा सुस्त और असहाय अवस्था में पड़े रहे; उस जगह, जहाँ ये लाल, नुकीली तलवार पड़ रही थी, विचित्र घटनाएँ होने लगीं. लाल गोलाकार हिस्से में जीवन खदखदा रहा था. भूरे अमीबा अपने नकली पैरों को बाहर निकाले पूरी ताकत से लाल गोले की तरफ़ बढ़ रहे थे और उसमें घुसकर (जैसे कोई जादू हो गया हो) जीवित हो रहे थे. कोई ताकत उनमें ज़िन्दगी भर रही थी. वे झुण्डों में रेंग रेंग कर जा रहे थे और लाल गोले में जगह पाने के लिए एक दूसरे से लड़ रहे थे. उसमें जारी था एक बदहवास, कोई दूसरा शब्द नहीं मिल सकता, जनन चक्र. सभी नियमों को, जो पेर्सिकोव को अपनी पांच उँगलियों की भाँति ज्ञात थे, तोड़ कर और उनका उल्लंघन करते हुए वे उसकी आँखों के सामने विद्युत की गति से दुगुने होते जा रहे थे. किरण में उनका विघटन हो रहा था, और हर भाग सिर्फ 2 सेकंड के भीतर नए और ताज़े जीव में परिवर्तित हो रहा था. ये जीव कुछ ही पलों में अपने आकार-प्रकार और परिपक्वता को प्राप्त करके तुरंत ही नई पीढ़ी को उत्पन्न कर देते. लाल गोले में, और इसके बाद समूची डिस्क में जगह की काफ़ी तंगी होने लगी, और एक अवश्यंभावी संघर्ष आरंभ हो गया. नवजात अमीबा तैश में एक दूसरे पर झपटते, टुकड़े टुकड़े कर देते और निगल लेते. नवजात अमीबा के बीच में ही अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हुए शहीद हो गए अमीबा के शव पड़े थे. सर्वोत्तम और शक्तिशाली ही जीत रहे थे. और ये ‘सर्वोत्तम’ – भयानक थे. पहली बात: अपने आकार-प्रकार में वे साधारण अमीबा से दुगुने थे; और दूसरी बात : उनमें एक ख़ास तरह का जुनून और फुर्ती थी. उनकी गतिविधियाँ केन्द्रित थीं, उनके नकली पैर आम अमीबा के पैरों से काफ़ी लंबे थे और वे उनका, बिना अतिशयोक्ति के, ऑक्टोपस के तंतुओं की तरह उपयोग कर रहे थे.             
अगली शाम को प्रोफेसर ने , जिसका खाना न खाने के कारण रंग पीला पड़ गया था और गाल पिचक गए थे, सिर्फ ख़ुद बनाई हुई मोटी मोटी सिगरेट्स के सहारे, अमीबा की नई पीढ़ी का अध्ययन किया, और तीसरे दिन वह उद्गम स्त्रोत, अर्थात् लाल किरण की ओर बढ़ा.   
लैम्प में गैस हौले हौले फुसफुसा रही थी, रास्ते पर फिर से यातायात बढ़ गया था, और प्रोफेसर, सौंवी सिगरेट के ज़हर से बाधित, आँखें आधी मूंदे रिवॉल्विंग चेयर की पीठ से टिक गया.
 “हाँ, अब सब स्पष्ट है. उनमें जान फूंकी किरण ने. ये नई, अब तक किसी के भी द्वारा न खोजी गई, किरण है जिसका अब तक किसी के भी द्वारा अध्ययन नहीं किया गया है. पहली बात, जो स्पष्ट करनी होगी वो ये है -  क्या यह सिर्फ बिजली से प्राप्त की जाती है या  फिर इसे सूरज से भी प्राप्त किया जा सकता है,” पेर्सिकोव अपने आप से बड़बड़ा रहा था.
और एक और रात में यह भी स्पष्ट हो गया. तीन माइक्रोस्कोपों में पेर्सिकोव ने तीन किरणों को कैद किया, सूरज से उसे कुछ भी हासिल न हुआ और उसने इस तरह से स्पष्टीकरण दिया:
 “ये अनुमान लगाना होगा कि सूरज के स्पेक्ट्रम में वो नहीं है....हुम्...तो, एक लब्ज़ में, ये अनुमान लगाना होगा कि उसे केवल कृत्रिम प्रकाश से प्राप्त किया जा सकता है.” उसने ऊपर लगे मटमैले गोले की ओर प्यार से देखा, उत्साहपूर्वक कुछ सोचा और इवानोव को अपनी कैबिनेट में बुलाया. उसने उसे सब कुछ बताया और अमीबा भी दिखाए.
प्राइवेट- सहायक प्रोफेसर इवानोव भौंचक्का रह गया, पूरी तरह किंकर्तव्यविमूढ़ रह गया: इतनी मामूली सी चीज़, इस महीन तीर को अब तक किसीने कभी देखा क्यों नहीं, शैतान ले जाए! हाँ, किसी ने भी, और कम से कम उसने, इवानोव ने भी... और है तो यह बड़ी आश्चर्यजनक बात! आप ग़ौर तो कीजिए...
 “आप देखिए तो सही, व्लादीमिर इपातिच!” आँख आई-पीस से सटाए इवानोव ने ख़ौफ़ से कहा, - ये क्या हो रहा है?! वे बढ़ रहे हैं, मेरी आँखों के सामने बढ़ रहे हैं...देखिए, देखिए...”
 “मैं तीन दिनों से उन्हें देख रहा हूँ,” पेर्सिकोव ने जोश से कहा.
इसके बाद दोनों वैज्ञानिकों के बीच बातचीत हुई, जिसका सार इस प्रकार था: प्राइवेट-सहायक प्रोफेसर लैंसों और शीशों की सहायता से चैम्बर बनाएगा जिसमें इस किरण को मैग्निफाइड रूप में और माइक्रोस्कोप से बाहर प्राप्त किया जा सकेगा. इवानोव को उम्मीद है, बल्कि पूरा पूरा यक़ीन है, कि ये काफ़ी आसान काम है. व्लादीमिर इपातिच फ़िक्र न करें, किरण वह प्राप्त कर ही लेगा. यहाँ थोड़ी सी रुकावट महसूस हुई.
 “मैं, प्योत्र स्तेपानोविच, जब इस शोध को प्रकाशित करूंगा , तो इस बात का ज़रूर उल्लेख करूंगा कि चैम्बर्स को आपने सुसज्जित किया था,” पेर्सिकोव ने पुश्ती जोड़ी, ये महसूस करते हुए कि रुकावट को दूर करना चाहिए.
 “ओह, ये ज़रूरी नहीं है. ..मगर, बेशक...”
और रुकावट फ़ौरन दूर हो गई. इस पल से किरण ने इवानोव को भी पूरी तरह अपनी गिरफ़्त में ले लिया. जब क्षीण और थकावट से चूर पेर्सिकोव पूरा दिन और आधी रात माइक्रोस्कोप के पास बैठा रहता, इवानोव रोशनी से जगमगाती फिज़िक्स-लेबोरेटरी में व्यस्त रहता – लैंसों और शीशों के संयोजन में. मैकेनिक उसकी सहायता करता.
शिक्षा कमिश्नर के माध्यम से भेजे गए अनुरोध के बाद पेर्सिकोव को जर्मनी से तीन पार्सल प्राप्त हुए जिनमें विभिन्न प्रकार के लैंस थे – डबल कॉन्वेक्स,  डबल कॉन्केव, और कुछ पॉलिश किए हुए कॉन्वेक्सो-कॉन्केव मिरर्स. इस सबका परिणाम ये हुआ कि इवानोव ने चैम्बर पूरी तरह सुसज्जित कर लिया और उसमें वाक़ई में लाल किरण को कैद कर लिया. उसकी तारीफ़ करनी होगी कि उसने ये काम बड़ी ही क़ाबिलियत से किया : किरण काफ़ी मोटी थी, चार सेंटीमीटर मोटी, नुकीली और सशक्त.
पहली जून को इस चैम्बर को पेर्सिकोव की कैबिनेट में फिट कर दिया गया और उसने बड़ी उत्सुकता से किरण द्वारा प्रकाशित मेंढकों के अण्डसमूहों पर प्रयोग करना आरंभ कर दिया. इन प्रयोगों के परिणाम चौंकाने वाले थे. दो दिनों में इन अंडसमूहों से मेंढकों के हज़ारों डिम्ब बाहर निकले. मगर यह तो कम ही था, और चौबीस घंटों में डिम्ब असाधारण मेंढकों में परिवर्तित हो गए, जो इतने दुष्ट और लालची थे कि उनमें से आधों को तो फ़ौरन बाकी के आधे खा गए. इसके बाद, जीवित मेंढक तुरंत अंडसमूह उत्पन्न करने लगे, और दो ही दिनों में बिना किसी किरण-विरण के उन्होंने नई पीढ़ी उत्पन्न कर दी, और वह भी अपार, अनगिनत मेंढकों की. वैज्ञानिक की कैबिनेट में शैतान ही जाने क्या हो रहा था : डिम्ब कैबिनेट से निकल निकल कर पूरे इंस्टिट्यूट में, पिंजरों में, और फर्श पर भी रेंग रहे थे, सभी ओनों-कोनों में टर्राहट सुनाई दे रही थी जैसी दलदल में सुनाई देती है. पन्क्रात, जो पेर्सिकोव से ऐसे ख़ौफ़ खाता था मानो वह आग हो, अब उससे यूँ डरने लगा जैसे कोई मौत से डरता है. एक हफ़्ते बाद वैज्ञानिक ने ख़ुद भी महसूस किया कि वह पगला रहा है. इंस्टीट्यूट ईथर और पोटेशियम सायनाइड की गंध से भर गई थी, जिसका ज़हर पन्क्रात को ख़तम ही कर देता जिसने समय से पूर्व अपना मास्क निकाल दिया था. इस भयानक रूप से बढ़ती हुई दलदली आबादी को अनेक प्रकार के ज़हर से ख़तम कर दिया गया, सारी कैबिनेट्स में शुद्ध हवा प्रवाहित की गई.
पेर्सिकोव इवानोव से कह रहा था,
“ जानते हो, प्योत्र स्तेपानोविच, इस किरण की ड्यूटेरोप्लाज़्म और अण्डकोश पर प्रतिक्रिया चौंकाने वाली है.”
इवानोव ने, जो काफ़ी शांत और संयत स्वभाव का व्यक्ति था, असाधारण स्वर में प्रोफेसर की बात काटी:
 “ व्लादीमिर इपातिच, आप ड्यूटेरोप्लाज़्म जैसे इन छोटे छोटे विवरणों के बारे में क्या सोच रहे हैं. साफ़ साफ़ कहेंगे : आपने ऐसी चीज़ का आविष्कार किया है जिसके बारे में आज तक किसी ने सुना नहीं है.” ज़ाहिर है, काफ़ी प्रयत्नपूर्वक उसने ये शब्द कहे: - “प्रोफेसर पेर्सिकोव, आपने जीवन की किरण की खोज की है!”     
पेर्सिकोव के  बदरंग, बिना दाढ़ी किए गालों पर हल्की सी रंगत तैर गई.
 “ओह, ओह, ओह,” वह बुदबुदाया.
 “आप,” इवानोव कहता रहा, “इतना नाम कमाएँगे...मेरा तो सिर घूम रहा है. आप, समझ रहे हैं,” वह जोश में कहता रहा, “व्लादीमिर इपातिच, वेल्स के नायक तो आपके मुक़ाबले में बिल्कुल कचरा हैं...और मैं तो सोचता था कि ये सिर्फ कहानियाँ हैं...आपको उसका ‘ देवों का भोजन’ याद है?”
 “आह, ये उपन्यास है,” पेर्सिकोव ने जवाब दिया.
 “हाँ, ख़ैर, थैन्क्स गॉड, बहुत मशहूर है!...”
 “मैं भूल गया,” पेर्सिकोव ने कहा, “याद तो है कि पढ़ा था, मगर भूल गया.”

 “ऐसे कैसे याद नहीं है, हाँ, इसे देखिए,” इवानोव ने काँच की मेज़ से टांग पकड़ कर मरे हुए अकराल-विकराल मेंढक को उठाया जिसका पेट फूला हुआ था. उसके थोबड़े पर मरने के बाद भी दुष्ट भाव थे – “वाक़ई में, ये अजूबा है!”

मंगलवार, 13 अगस्त 2013

The Fateful Eggs - 2

अध्याय 2
रंगीन लहर

तो, प्रोफेसर ने बिजली का गोला जलाया और चारों ओर नज़र डाली. प्रयोग वाली लम्बी मेज़ पर रेफ्लेक्टर जलाया, सफ़ेद एप्रन पहना, मेज़ पर पड़े किन्हीं उपकरणों को खनखनाया...
सन् ’28 में मॉस्को की सड़कों पर दौड़ रहे 30 हज़ार स्वचालित वाहनों में से अधिकांश, लकड़ी के पुलों पर खड़खड़ाते हुए, गेर्त्सेन रोड़ से ही गुज़रते थे, और शोर और कर्कशता के साथ हर मिनट गेर्त्सेन से मोखोवाया जाने वाली 16, 22, 48 या 53 नंबर के रूट वाली ट्राम गाड़ी गुज़रती. अध्ययन कक्ष के आईनों में रंगबिरंगी रोशनियों की चमक बिखेरता, दूर, ऊँचाई पर क्राईस्ट-चर्च की अंधेरी और भारी-भरकम गुम्बद की बगल में कोहरे से ढंका, बदरंग चांद का हंसिया नज़र आ रहा था.
मगर न तो वो, न ही बसंत के मॉस्को का शोरगुल प्रोफेसर पेर्सिकोव का ध्यान अपनी ओर खींच रहे थे. वह तीन टांगों वाले रिवॉल्विंग स्टूल पर बैठा था और तम्बाकू के कारण भूरी हो गईं उँगलियों से शानदार ज़ैस माईक्रोस्कोप का स्क्रू घुमा रहा था, माइक्रोस्कोप के नीचे डिस्क में ताज़े अमीबा का रंगहीन प्रिपैरटिव रखा था. उस क्षण, जब पेर्सिकोव ने मैग्नोफिकेशन को 5 से बढ़ाकर 10 हज़ार किया, दरवाज़ा थोड़ा सा खुला, नुकीली दाढ़ी और चमड़े का जैकेट दिखाई दिया , और असिस्टेंट ने पुकारा:
 “व्लादीमिर इपातिच, मैंने आन्त्रयोजनी (आंत के कुछ हिस्से और उदर की थैली के बीच की झिल्ली– अनु.) खोल दी है, देखना चाहेंगे?”
अपने स्क्रू और प्रिपैरेटिव को आधे में ही छोड़कर पेर्सिकोव फुर्ती से तिपाई से उतरा और हाथों में धीरे धीरे सिगरेट घुमाते हुए असिस्टेंट की कैबिनेट में घुसा. वहाँ काँच की मेज़ पर प्रयोग वाले तख़्ते पर एक मेंढकी तनी हुई पड़ी थी, आधा दम घुटी, दर्द और डर से अधमरी; और खून से लथपथ पेट से निकाले हुए उसके पारदर्शक, चिपचिपे आंतरिक अवयव माइक्रोस्कोप के नीचे रखे थे.
 “बहुत अच्छे,” पेर्सिकोव ने कहा और अपनी आँख माइक्रोस्कोप की आईपीस पर गड़ा दी.
ज़ाहिर है कि मेंढकी की आन्त्रयोजनी में कोई बहुत ही दिलचस्प चीज़ इतनी स्पष्ट दिखाई दे रही थी, मानो सब कुछ हथेली पर रखा हो: उसकी रक्तवाहिनियों की नदियों में खून के गोले ग़ज़ब की तेज़ी से बह रहे थे. पेर्सिकोव अपने अमीबा के बारे में भूल गया और अगले डेढ़ घंटे तक बारी बारी से अपने असिस्टेंट के साथ माइक्रोस्कोप में नज़र गड़ाता रहा. इस दौरान दोनों वैज्ञानिक बड़े जोश में अपनी वैज्ञानिक भाषा में बातें भी कर रहे थे जो हम साधारण लोगों को समझ में नहीं आएंगी.
आख़िरकार पेर्सिकोव माइक्रोस्कोप से दूर हटा और उसने घोषणा कर दी:
 “खून जम रहा है, कुछ नहीं किया जा सकता.”
मेंढकी ने मुश्किल से अपना सिर हिलाया, उसकी बुझती हुई आँखों में ये शब्द स्पष्ट थे : “पूरे सुअर हो तुम, और कोई नहीं...”
अपने सुन्न हो गए पैरों को तान कर ठीक करते हुए पेर्सिकोव उठा, अपनी कैबिनेट में आया, एक जमुहाई ली, सदा सूजी रहने वाली पलकों पर उँगलियाँ फेरीं और, तिपाई पर बैठकर, माइक्रोस्कोप में देखा, उँगलियाँ उसने स्क्रू पर रखीं और उसे घुमाने ही वाला था, मगर नहीं घुमाया. अपनी दाहिनी आँख से पेर्सिकोव ने धुंधली सफ़ेद डिस्क देखी और उसमें रखे धुंधले सफ़ेद अमीबा, मगर डिस्क के बीचोंबीच विराजमान थी एक रंगीन लहर, किसी औरत के घुंघराले बाल जैसी. इस लहर को स्वयँ पेर्सिकोव और उसके सैंकडों विद्यार्थी अनेकों बार देख चुके थे, और किसी को भी उसमें कभी कोई दिलचस्पी महसूस नहीं हुई, ज़रूरत ही नहीं थी. रंगीन लहर सिर्फ़ निरीक्षण में बाधा डालती थी और यह दर्शाती थी कि प्रेपैरटिव फोकस में नहीं है. इसलिए स्क्रू के एक घुमाव से उस हिस्से को सफ़ेद रंग के प्रकाश से आलोकित करके उसे बेदर्दी से मिटा देते थे. प्राणी-शास्त्रज्ञ की लंबी लंबी उँगलियाँ स्क्रू की नॉब पर जमी हुई थीं, मगर वे एकदम थरथराईं और नीचे गिर गईं. इसकी वजह थी पेर्सिकोव की दाहिनी आँख. वह अचानक सतर्क हो गया, विस्मित हो गया, उत्तेजना से सराबोर भी हो गया. माइक्रोस्कोप के पास ये कोई मामूली हस्ती नहीं थी, जो प्रांत को मुसीबत में डालती. नहीं, ये बैठा था प्रोफेसर पेर्सिकोव! उसकी पूरी ज़िन्दगी, सारे विचार दाहिनी आँख पर केन्द्रित हो गए. पाँच मिनट तक स्तब्ध ख़ामोशी में फोकस के बाहर वाले प्रेपैरेटिव पर आँख फाड़े, उसे यातना देते हुए ऊपर का बेहतरीन जीव नीचे के निकृष्ट जीवों को देखता रहा. चारों ओर की हर चीज़ ख़ामोश थी. पन्क्रात वेस्टीब्यूल के अपने कमरे में सो चुका था, और सिर्फ एक बार दूर दरवाज़े के काँचों की हल्की सी, संगीतमय आवाज़ सुनाई दी – ये इवानोव था जो जाते हुए अपनी कैबिनेट बन्द कर रहा था. उसके पीछे प्रवेश द्वार कराहा. फिर सुनाई दी प्रोफेसर की आवाज़. वह किससे पूछ रहा था – पता नहीं:
 “ये क्या माजरा है? कुछ भी समझ नहीं पा रहा हूँ...”
देर से लौटता हुआ एक ट्रक गेर्त्सेन स्ट्रीट से गुज़रा और इंस्टीट्यूट की पुरानी दीवारों को हिला गया. मेज़ पर रखा चपटे पेंदे वाला कांच का प्याला अपने उपकरणों समेत खनखनाया. प्रोफ़ेसर का मुख पीला पड़ गया और वह माइक्रोस्कोप पर अपने हाथ ले गया, ठीक उसी तरह जैसे एक माँ अपने बच्चे के ऊपर हाथ रखती है जिस पर ख़तरा मंडरा रहा हो. अब इस बात का सवाल ही नहीं था कि प्रोफेसर स्क्रू घुमाए, ओह, नहीं, बल्कि अब वह डर रहा था कि कोई बाहरी ताक़त नज़र के दायरे से उसे हटा न दे जिसे उसने देखा था.   .                      
जब प्रोफेसर माइक्रोस्कोप के पास से हटा, और अपने सुन्न पड़ चुके पैरों पर खिड़की की ओर गया तो साफ़, सफ़ेद झक् सुबह हो चुकी थी, जो इंस्टीट्यूट की दूधिया रंग की ड्योढ़ी पर सुनहरी रोशनी का पट्टा बिखेर रही थी. उसने थरथराती उँगलियों से बटन दबाया, और काले मोटे परदों ने सुबह को ढाँक दिया, और कैबिनेट में फिर से बुद्धिमान वैज्ञानिक रात सजीव हो उठी. पीले और उत्तेजित प्रोफेसर ने अपने पैर सीधे किए और पनीली आखों को फर्श पर गड़ाते हुए बोला:
 “मगर, ये कैसे संभव है? ये तो अजूबा है!... ये अजूबा है, महाशयों,” पिंजरों में बन्द अपने टोड्स से मुख़ातिब होते हुए उसने दुहराया, मगर टोड्स सो रहे थे और उन्होंने उसे कोई जवाब नहीं दिया.
वह कुछ देर ख़ामोश रहा, फिर बिजली के स्विच की ओर गया, परदे उठा दिए, सारे लाइट्स बुझा दिए और माइक्रोस्कोप में देखा. उसके चेहरे पर तनाव के लक्षण थे, उसने अपनी कंटीली पीली भौंहों को हिलाया.
 “ऊ-हू, ऊ-हू,” वह बुदबुदाया, “गायब हो गया. समझ गया. स-S-म—झ गया,” अपने सिर के ऊपर बुझ गए बिजली के गोले की ओर देखते हुए पागल की तरह और अत्यंत उत्तेजित स्वर में शब्दों को खींचते हुए वह बोला, “बड़ा आसान है.”
और उसने फिर से सनसनाते हुए परदे गिराए, और फिर से बिजली का गोला जलाया. माइक्रोस्कोप में देखा, और खुशी से और कुछ हिंस्त्र भाव से दाँत निकाल दिए.
 “मैं उसे पकड़ लूँगा,” उँगली ऊपर उठाते हुए बड़े शानदार अंदाज़ में उसने कहा, “ पकड़ लूँगा. हो सकता कि सूरज से भी पकड़ लूँ.”
परदे फिर से शोर मचाते हुए हट गए. सूरज अब सामने था. अब उसने इन्स्टिट्यूट की दीवारों को धूप में नहला दिया और गेर्त्सेन रोड के तख़्तों पर तिरछी रोशनी बिखेरने लगा. प्रोफेसर ने खिड़की में देखा, इस बात का अंदाज़ लगाते हुए कि दिन में सूरज की स्थिति क्या होगी. वह कभी खिड़की के पास आता, कभी उससे दूर हटता, अंत में वह खिड़की की सिल पर पेट के बल लेट गया.
उसने अपने महत्वपूर्ण और गुप्त कार्य का आरंभ किया. काँच के टोप से माइक्रोस्कोप को ढाँक दिया. लैम्प की नीली लौ पर मोम पिघलाई और टोप के किनारों को मेज़ से चिपका दिया, और मोम के धब्बों को अपनी बड़ी उँगली से दबा दिया. गैस बन्द कर दी, बाहर निकला और अंग्रेज़ी ताले से कैबिनेट का दरवाज़ा बन्द कर दिया.
इन्स्टीट्यूट के कॉरीडोर्स में आधी रोशनी हो रही थी. प्रोफेसर पन्क्रात के कमरे तक पहुँचा और बड़ी देर तक उसे खटखटाता रहा. आख़िरकार दरवाज़े के पीछे से ज़ंजीर से बंधे कुत्ते जैसी गुरगुराहट, खकारने की आवाज़ और बड़बड़ाहट सुनाई दी, और टखनों पर टंके धारियों वाले नाइट पजामे में रोशनी के धब्बे में पन्क्रात प्रकट हुआ. उसकी आँखें जंगलीपन से प्रोफेसर पर टिक गईं, वह अभी तक नींद में झूम रहा था.
 “पन्क्रात,” चश्मे के ऊपर से उसकी ओर देखते हुए प्रोफेसर ने कहा, “माफ़ करना कि मैंने तुम्हें उठा दिया. बात ये है, दोस्त, कि मेरी कैबिनेट में कल सुबह कोई न जाने पाए. मैंने वहाँ अपना प्रयोग अधूरा छोड़ा है, जिसे हिलाया नहीं जा सकता. समझ गए?”
 “ऊ-ऊ-ऊ, स-स-समझ गया,” कुछ भी न समझते हुए पन्क्रात ने जवाब दिया. वह लड़खड़ा रहा था और गुरगुरा रहा था.
 “नहीं, सुन, तू जाग, पन्क्रात,” प्राणी-वैज्ञानिक ने उसे मनाते हुए कहा और हौले से पन्क्रात की पसलियों को गुदगुदा दिया, जिससे उसके चेहरे पर डर की लकीर दौड़ गई और आँखों में कुछ समझदारी का भाव आ गया.. “कैबिनेट मैंने बन्द कर दी है,” पेर्सिकोव कहता रहा, “तो, मेरे आने तक उसमें सफ़ाई करने की कोई ज़रूरत नहीं है. समझ गया?”
 “सुन रहा हूँ,” पन्क्रात भर्राई आवाज़ में बोला.
 “बढ़िया, अब जाकर सो जा.”
पन्क्रात मुड़ा, दरवाज़े में गायब हो गया और फ़ौरन पलंग पर लुढ़क गया, और प्रोफेसर वेस्टिब्यूल में अपने गरम कपड़े पहनने लगा. उसने भूरा गर्मियों वाला कोट और नरम हैट पहनी, इसके बाद, माइक्रोस्कोप वाले दृश्य को याद करके, वह अपने गलोश (ऊपरी जूता – अनु.) पहनने लगा, उसने कुछ सेकंड उनकी ओर देखा, मानो उन्हें पहली बार देख रहा हो. फिर बाँई गलोश पहनी और बाँई की ऊपर ही दाईं भी पहनने लगा, मगर वह जूते पर घुसी ही नहीं.
 “कैसा अजीब इत्तेफ़ाक है कि उसने मुझे बुलाया,” वैज्ञानिक ने कहा, “ वर्ना तो मैं इस पर ग़ौर ही नहीं करता. मगर ये किस बात का इशारा है? शैतान ही जाने कि ये इशारा किस तरफ़ है!...”
प्रोफ़ेसर मुस्कुराया, उसने अपने गलोशों की तरफ़ आँखें सिकोड़ कर देखा, और बाईं निकाल दी, और दाईं पहन ली.
 “माय गॉड! इसके परिणामों के बारे में कल्पना भी नहीं की जा सकती...” प्रोफेसर ने नफ़रत से अपनी बाईं गलोश निकाल फेंकी, जो दाएं गलोश पर चढ़ने से इनकार करके उसे गुस्सा दिला रही थी, और एक ही गलोश में बाहर के दरवाज़े की तरफ़ आया. यहाँ उसने अपना रूमाल खो दिया, और वह भारी दरवाज़े को धक्का देकर बाहर निकला. ड्योढ़ी में वह बड़ी देर तक अपनी जेबों को थपथपाकर माचिस ढूँढ़ता रहा, और उसे ढूँढ़ कर मुँह में बिना सुलगाई सिगरेट दबाए सड़क पर निकल पड़ा.
चर्च तक वैज्ञानिक को रास्ते में एक भी आदमी नहीं मिला. वहाँ प्रोफेसर ने सिर को झटका देकर, सुनहरे गुम्बद पर आँखें गड़ा दीं. सूरज बड़े प्यार से एक तरफ़ से उसे चूम रहा था.
 “मैंने उसे पहले कैसे नहीं देखा, कैसा इत्तेफ़ाक है?...फू, बेवकूफ़,” अपने अलग अलग तरह के जूतों की ओर देखते हुए प्रोफेसर झुका और सोचने लगा. “...हुँ...अब क्या करें? पन्क्रात के पास वापस लौट जाऊँ? नहीं, उसे उठाना संभव नहीं है. इस कमीनी को फेंकने में अफ़सोस हो रहा है. हाथों में ले जाना पड़ेगा.” उसने गलोश उतारी और कुछ असंतोष से उसे हाथ में ले लिया.
एक पुरानी कार में प्रेचिस्तेन्को की ओर से तीन व्यक्ति आ रहे थे. दो नशे में धुत थे, और उनके घुटनों पर बैठी थी सन् ’28 की फ़ैशन के अनुरूप सिल्क की सलवार पहनी चटकदार मेकअप में एक जवान औरत.
 “ऐख़, पापा!” वह अपनी नीची भारी आवाज़ में चिल्लाई, “क्या दूसरी गलोश बेचकर पी गए?”
 “ज़ाहिर है कि बूढ़ा ‘अल्काज़ार’ गया था,” बाईं ओर वाला शराबी चीख़ा, दाईं ओर वाले ने गाड़ी से सिर बाहर निकाला और चिल्लाया, “बाप, क्या वोल्खोन्का का नाईटक्लब खुला है? हम वहीं जा रहे हैं!”
प्रोफेसर ने चश्मे के ऊपर से उनकी ओर कड़ाई से देखा, मुँह से सिगरेट गिरा दिया और फ़ौरन उनके बारे में भूल भी गया. प्रेचिस्तेन्स्की एवेन्यू पर धूप झाँकने लगी थी, और क्राईस्ट-चर्च मानों लपटों में घिर गया हो. सूरज निकल आया था.

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

The Fateful Eggs - 1

विनाशकारी अंडे
(लघु उपन्यास)
लेखक : मिखाइल बुल्गाकोव
अनुवाद : आ. चारुमति रामदास

अध्याय 1
प्रोफेसर पेर्सिकोव का जीवन-सार

16 अप्रैल 1928 की शाम को IV स्टेट युनिवर्सिटी में प्राणि-शास्त्र के प्रोफेसर और मॉस्को की प्राणि-संस्था के डाइरेक्टर पेर्सिकोव गेर्त्सेन रोड पर स्थित प्राणि-संस्था के अपने कक्ष में प्रविष्ठ हुए. प्रोफेसर ने ऊपर वाला धुँधला गोल बल्ब जलाया और देखने लगे.
भयानक हादसे का आरम्भ इसी मनहूस शाम में छुपा हुआ समझा जा सकता है; उसी तरह, इस हादसे का मूल कारण माना जा सकता है प्रोफेसर व्लादीमिर इपात्येविच पेर्सिकोव को.
उनकी उम्र ठीक 58 साल थी. सिर बड़ा लाजवाब, प्रेरणादायक, गंजा, किनारों से झाँकते पीले-पीले बालों के गुच्छों वाला. चेहरा सफ़ाचट, निचला होंठ आगे को निकला हुआ. इसके कारण पेर्सिकोव का चेहरा थोड़ा सनकी दिखाई देता था. लाल नाक पर पुरानी फ़ैशन का चांदी की फ्रेम वाला छोटा-सा चश्मा, आँखें चमकीली, छोटी-छोटी , ऊँचा कद, कन्धे झुके हुए. अपनी पतली, तीखी, चीं-चीं करती आवाज़ में बोलते और अन्य अजीब आदतों में से एक ये थी : जब अधिकारपूर्वक और विश्वासपूर्वक कुछ कहते तो सीधे हाथ की तर्जनी का एक हुक बना लेते और आँखें सिकोड़ लेते. और चूँकि वह हमेशा विश्वासपूर्वक ही बात किया करते, क्योंकि अपने क्षेत्र में उन्होंने अभूतपूर्व महारथ प्राप्त कर ली थी, तो ये हुक प्रोफेसर पेर्सिकोव से वार्तालाप करने वालों की आँखों के सामने अक्सर प्रकट होता. और अपने क्षेत्र, याने प्राणि- शास्त्र, एम्ब्रियोलॉजी, एनाटोमी, बॉटनी और जॉग्रफ़ी के अलावा प्रोफ़ेसर कुछ और बात नहीं करते थे.
अख़बार प्रोफ़ेसर कभी नहीं पढ़ते थे, थियेटर कभी नहीं जाते थे, और प्रोफ़ेसर की पत्नी सन् 1913 में ज़ीमिन ऑपेरा के गायक के साथ प्रोफ़ेसर के नाम यह चिट्ठी छोड़कर भाग गई:
“तुम्हारे मेंढक मेरे दिल में बेतहाशा नफ़रत भर देते हैं. उनके कारण मैं सारी ज़िन्दगी दुःखी ही रहूँगी.”
प्रोफ़ेसर ने दूसरी शादी नहीं की और उनके कोई बच्चे भी नहीं थे. बड़े गुस्सैल स्वभाव के थे, मगर जल्दी ही भूल भी जाते थे, क्लाउडबेरीज़ के साथ चाय पीना पसन्द करते थे, प्रेचिस्तेन्को में रहते थे, पाँच कमरों वाले फ्लैट में, जिनमें से एक में रहती थी सूखी-सपाट बुढ़िया केयरटेकर मारिया स्तेपानोव्ना, जो प्रोफ़ेसर की बड़े ध्यान से देखभाल करती थी.
सन् 1919 में प्रोफ़ेसर के पाँच कमरों में से तीन छीन लिए गए. तब उन्होंने मारिया स्तेपानोव्ना से साफ़-साफ़ कह दिया: अगर उन्होंने ये बेहूदगी बन्द नहीं की, तो मैं, मारिया स्तेपानोव्ना, विदेश चला जाऊँगा.
इसमें कोई शक नहीं है कि अगर प्रोफ़ेसर ने अपने इस प्लान पर अमल किया होता तो उनके लिए दुनिया के किसी भी विश्वविद्यालय के प्राणि-शास्त्र विभाग में पैर जमा लेना बड़ा आसान होता, क्योंकि वह पहले दर्जे के वैज्ञानिक थे, और उस क्षेत्र में जिसका संबंध उभयचर प्राणियों या चिकने रेंगने वाले प्राणियों से था, उनके जैसा कोई न था सिवाय कैम्ब्रिज के प्रोफ़ेसर विलियम वेक्केल और रोम के जियाकोमो बार्तालोमियो बेक्कारी के. प्रोफ़ेसर रूसी के अलावा चार अन्य भाषाओं में पढ़ सकते थे; और फ्रांसीसी तथा जर्मन में रूसी जैसी सहजता से बोल सकते थे. अपना विदेश वाला प्लान प्रोफ़ेसर पूरा नहीं कर पाए और सन् 20 सन् 19 से भी बुरा निकला. एक के बाद एक घटनाएँ होती रहीं. बोल्शाया निकीत्स्काया स्ट्रीट का नाम बदल कर गेर्त्सेन स्ट्रीट कर दिया गया. इसके पश्चात् गेर्त्सेन और मोखोवाया स्ट्रीट्स के नुक्कड़ पर स्थित घर की दीवार में लगी घड़ी 11.15 बजे रुक गई, और अंत में प्राणि-संस्था के विशेष पिंजरों में, इस महान वर्ष की उथल-पुथल को बरदाश्त न कर पाने के कारण टर्राने वाली किस्म के 8 शानदार नमूने और 15 साधारण टोड्स ( विशेष प्रकार के मेंढक जैसे जंतु) मर गए और अंत में टोड्स की अतिविशिष्ठ किस्म सूरिनाम का इकलौता नमूना भी भगवान को प्यारा हो गया.               
टोड्स के फ़ौरन बाद, जिन्होंने चिकने, रेंगने वाले प्राणियों की उस पहली पंक्ति को सूना कर दिया था जिसे न्यायोचित ढंग से बिना पूँछ के रेंगने वाले प्राणी कहा जाता है, संस्था का चौकीदार बूढ़ा व्लास, जिसकी जगह कोई और नहीं ले सकता था, और जो रेंगने वाले प्राणियों की श्रेणी में नहीं आता था, दूसरी दुनिया में रहने चला गया. उसकी मृत्यु का कारण भी वही था जिसकी वजह से बेचारे रेंगने वाले प्राणी चल बसे थे, और प्रोफ़ेसर पेर्सिकोव ने जिसका फ़ौरन निदान कर दिया था:
 “खाने का अभाव!”
 वैज्ञानिक बिल्कुल सही था. व्लास को आटा खिलाना चाहिए था, और टोड्स को आटे में पाए जाने वाले कीड़े, मगर चूँकि पहली चीज़ ग़ायब हो गई थी, इसलिए दूसरी का भी नामोनिशान नहीं बचा. टर्राने वाली किस्म के बचे हुए 20 नमूनों को पेर्सिकोव ने तिलचट्टे खिलाने की कोशिश की, मगर वार-टाइम-कम्युनिज़्म (युद्ध कालीन कम्युनिज़्म) के प्रति अपनी अप्रसन्नता दर्शाते हुए तिलचट्टे भी न जाने कहाँ लुप्त हो गए. इस तरह बचे खुचे नमूनों को भी संस्था के आंगन में खुदे गड्ढों में दफ़न कर देना पड़ा.
इन मौतों का, और विशेषकर सूरिनाम टोड की मौत का पेर्सिकोव पर जो असर हुआ उसका वर्णन करना मुश्किल है. इन मौतों के लिए वह न जाने क्यों तत्कालीन शिक्षा- विभाग के जनकमिश्नर को दोषी ठहराता था.
टोपी और गलॉश पहने, ठण्ड से जम चुकी संस्था के कोरीडोर में खड़े होकर पेर्सिकोव अपने असिस्टेंट,  नुकीली सफ़ेद दाढ़ी वाले सलीकापसन्द जेंटलमेन से कह रहा था, “ इसके लिए तो उसे, प्योत्र स्तेपानोविच, मार डालना भी कम है! कर क्या रहे हैं ये लोग? संस्था को मारे डाल रहे हैं! हाँ? बेमिसाल टोड, पीपा अमेरिकाना का लाजवाब नमूना, 13 सेंटीमीटर लम्बा...”
आगे तो और भी बदतर दिन आ गए. व्लास की मृत्यु के कारण संस्था की खिड़कियाँ आर-पार पूरी तरह से जम गईं, जिससे काँचों की भीतरी सतह पर फूलों जैसी बर्फ बैठ गई. ख़रगोश, लोमड़ियाँ, भेड़िए, मछलियाँ और सारे घास के साँप मर गए. पेर्सिकोव पूरे-पूरे दिन ख़ामोश रहता, फिर उसे निमोनिया हो गया, मगर वह मरा नहीं. जब ठीक हो गया तो हफ़्ते में दो दिन संस्था में आता और गोल हॉल में, जहाँ न जाने क्यों हमेशा -50 तापमान रहता, चाहे बाहर का तापमान कितना ही क्यों न हो, गलोश पहने, लम्बे कानों वाली टोपी लगाए और मफ़लर बाँधे, मुँह से सफ़ेद भाप छोड़ते हुए, 8 विद्यार्थियों को “ ऊष्ण कटिबन्ध के रेंगने वाले जंतु ” विषय पर लेक्चर देता. बाकी बचे समय में पेर्सिकोव प्रेचिस्तेन्को में फर्श तक किताबों से अटे पड़े कमरे में रज़ाई में दुबक कर दीवान पर पड़ा रहता, खाँसता रहता और छोटी सी भट्टी के जबड़े की ओर देखता रहता जिसे मारिया स्तेपानोव्ना ने सुनहरी कुर्सियाँ तोड़-तोड़कर गर्माया था, सूरिनाम टोड को याद करता रहता.
मगर दुनिया में हर चीज़ का अंत होता ही है. सन् 20 और 21 गुज़र गए और सन् 22 से गाड़ी वापस पटरी पर चल पड़ी. सबसे पहले : स्वर्गीय व्लास की जगह पर आया प्राणि-संस्था का नौजवान चौकीदार पन्क्रात, जिससे काफ़ी उम्मीदें थीं, संस्था को थोड़ा-थोड़ा गर्माया जाने लगा. और गर्मियों में पेर्सिकोव ने क्ल्याज़्मा में पन्क्रात की सहायता से 14 साधारण टोड्स पकड़े. प्राणियों के पिंजरों में फिर से ज़िन्दगी सुगबुगाने लगी... सन् 23 में पेर्सिकोव हफ़्ते में 8 बार लेक्चर्स देते थे – 3 बार संस्था में और 5 बार विश्वविद्यालय में; सन् 24 में हफ़्ते में 13 बार, और इसके अलावा राबफाक (वर्कर्स फैकल्टी ) में, और सन् 25 के बसंत में, वह इस बात के लिए मशहूर हो गए कि परीक्षाओं में 76 विद्यार्थियों की चीर-फ़ाड़ कर डाली, और सभी की चिकने रेंगने वाले प्राणियों के कारण.
 “क्या, आप इतना भी नहीं जानते कि चिकने रेंगने वाले प्राणियों और अन्य साँपों में क्या फर्क होता है?” पेर्सिकोव पूछता. “ बड़ी अजीब बात है, नौजवान. चिकने रेंगने वाले प्राणियों में पेल्विक-किडनीज़ नहीं होती. वे अनुपस्थित होती हैं. च् च् च्... शरम आनी चाहिए. आप, शायद, मार्क्सिस्ट हैं?”
 “मार्क्सिस्ट,” बुझते हुए चीरा-फ़ाड़ा गया परीक्षार्थी जवाब देता.         
 “ठीक है, प्लीज़, पतझड़ में,” बड़े सौजन्य से पेर्सिकोव कहता और जोश में आकर पान्क्रात से चिल्लाकर कहता, “अगले को भेजो!”
 जैसे लम्बे सूखे के बाद पहली ज़ोरदार बारिश में उभयचर प्राणी जी उठते हैं उसी तरह प्रोफ़ेसर पेर्सिकोव भी सन् 1926 में मानो पुनर्जीवित हो उठा जब रूसो-अमेरिकन जॉइन्ट कम्पनी ने गज़ेत्नी चौराहे और त्वेर्स्काया से आरम्भ करके, मॉस्को के सेंटर में 15-15 मंज़िलों वाली पन्द्रह बिल्डिंगें बनाईं, और सीमावर्ती क्षेत्रों में आठ-आठ फ्लैट्स वाली 300 वर्कर्स-कॉटेजेस बनाईं और रिहायश की उस भयानक और हास्यास्पद समस्या को समाप्त कर दिया, जिसने मॉस्कोवासियों को सन् 1919-1925 में इतना परेशान कर दिया था.
आम तौर से ये पेर्सिकोव की ज़िन्दगी की बेहतरीन गर्मियाँ थीं, और कभी-कभार वह हल्की और ख़ुशनुमा हँसी के साथ अपने हाथ मलता , ये याद करके कि वह कैसे मारिया स्तेपानोव्ना के साथ दो कमरों में सिकुड़ गया था. अब प्रोफ़ेसर को पाँचों कमरे वापस मिल गए थे, अब वह फैल गया था - अपनी 2 1/2 हज़ार किताबें, भूसा भरे जानवर, डाइग्राम्स, अपने प्लान्स सजा कर रख दिए, अध्ययन-कक्ष में मेज़ पर हरा लैम्प जला लिया.
संस्था को पहचानना भी मुश्किल हो रहा था : उसे क्रीम कलर से रंग दिया गया, ख़ास तरह के नलों से रेंगने वाले प्राणियों के कमरे में पानी का इंतज़ाम किया गया, सभी काँचों को आईनों से बदल दिया गया, पाँच नए माइक्रोस्कोप्स भेजे गए, लेक्चर के प्लान्स के लिए काँच की मेज़ें भेजी गईं, म्यूज़ियम में परावर्तित प्रकाश वाले 2000 लैम्पों के गोल बल्ब भेजे गए, रेफ्लेक्टर्स, शो-केसेस भेजे गए.
पेर्सिकोव जी उठा, और जैसे ही सन् 1926 में ब्रोश्यूर - “ डिज़ाइनदार , या लहरियेदार प्राणियों के विस्तार के प्रश्न पर”. पृ.127. “ IV स्टेट युनिवर्सिटी के समाचार” - प्रकाशित हुआ, सारी दुनिया को अकस्मात् ही इस बारे में पता चला.
और सन् 1927 में, पतझड़ में उनका 350 पृष्ठों का महत्त्वपूर्ण ग्रंथ प्रकाशित हुआ, जिसे जापानी सहित छह भाषाओं में अनुवादित किया गया: “मेंढकों की एम्ब्रियोलॉजी के बारे में”. मूल्य 3 रूबल्स. गोसिज़्दात.
और सन् 1928 की गर्मियों में हुई वह अविश्वसनीय, भयानक, दिल दहलाने वाली घटना...