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शनिवार, 16 नवंबर 2013

The Fateful Eggs - 5

अध्याय 5
मुर्गियों का किस्सा

कोस्त्रोम्स्काया प्रांत के स्तेक्लोव्स्क कस्बे के छोटे से कस्बाई शहर, भूतपूर्व त्रोइत्स्क और आज के स्तेक्लोव्स्क में, भूतपूर्व सोबोर्नाया, और वर्तमान में कार्लारादेकोव्स्काया स्ट्रीट के छोटे से घर की ड्योढ़ी में भूरे रंग की फूल फूल वाली ड्रेस पहने, सिर पर रूमाल बांधे एक औरत निकली और बिसूरने लगी. ये औरत, भूतपूर्व चर्च के भूतपूर्व प्रीस्ट द्रोज़्दोव की विधवा, इतने ज़ोर से गला फाड़ कर रोने लगी कि सड़क के उस पार वाले घर की खिड़की से रोएँदार रूमाल में एक औरत का सिर बाहर निकला और चहका:
 “क्या बात है स्तेपानोव्ना, क्या फिर से?”
 “सत्रहवीं!” हिचकियाँ ले लेकर भूतपूर्व द्रोज़्दोवा ने जवाब दिया.
 “आह-हा-आह- आह,” रिरियाते हुए रूमाल वाली औरत ने सिर हिलाया, “ ये आख़िर क्या बात है? ख़ुदा नाराज़ हो गया है, सच कहती हूँ! क्या मर गई?”
 “हाँ, तू देख, देख, मात्र्योना,” ज़ोर ज़ोर से और मुश्किल से सिसकियाँ लेते हुए प्रीस्ट की विधवा बुदबुदाई. “तू देख, इसे क्या हुआ है!”
भूरे रंग का ख़स्ताहाल फाटक बजा, औरत के नंगे पैर धूल भरी सड़क पर छप-छप करते हुए आए और आँसुओं से भीगी प्रीस्ट की विधवा मात्र्योना को अपने मुर्गियों के दड़बे में ले गई.
ये बताना होगा कि फ़ादर सव्वाती द्रोज़्दोव की विधवा ने, जो सन् ’26 में धर्मविरोधी आन्दोलन के कारण मर गया था, हिम्मत नहीं हारी और ये बेहतरीन मुर्गीपालन का काम शुरू कर दिया. जैसे ही विधवा का काम तरक्की करने लगा, उस पर इतने टैक्स लगाए गए कि मुर्गीपालन क़रीब-क़रीब बन्द ही हो गया होता, अगर कुछ भले आदमियों ने सहायता न की होती. उन्होंने विधवा को सलाह दी, स्थानीय अधिकारियों को एक दरख़्वास्त देने की, कि वो, विधवा, मुर्गीपालन श्रमिक को-ऑपरेटिव शुरू कर रही है. को-ऑपरेटिव में शामिल हुई – स्वयँ द्रोज़्दोवा, उसकी विश्वासपात्र नौकरानी मात्र्योश्का, और विधवा की बहरी भांजी. विधवा का टैक्स माफ़ कर दिया गया, और उसका मुर्गीपालन इस क़दर बढ़ गया कि सन् ’28 आते-आते मुर्गियों के दड़बों से अटे उस धूल भरे आँगन में लगभग 250 मुर्गियाँ दौड़ती थीं, जिनमें कुछ कोख़िनखिन भी थीं. विधवा के अंडे हर इतवार को स्तेक्लोव्स्क के बाज़ार में पहुँचते, विधवा के अंडों का ताम्बोव में व्यापार होता था, और ऐसा भी होता कि वे उस दुकान की कांच की शो-केसेस में भी देखे जाते थे जिसे पहले ‘मॉस्को स्थित चिच्कोव का मक्खन और चीज़’ के नाम से जाना जाता था.
और अब ये – सुबह से सत्रहवीं ब्रह्मपुत्रा, प्यारी कलगी वाली , आँगन में घूम रही थी, और उसे उलटियाँ होने लगीं. “एर्...र् र्...उ र् ल् ... उ र् ल्...ग़ो-ग़ो-ग़ो,”  कलगीवाली उलटियाँ किए जा रही थी, और उसने अपनी उदास आँखें सूरज पर इस तरह टिका दीं, मानो उसे आख़िरी बार देख रही हो. मुर्गी की नाक के सामने हाथों में पानी का कप पकड़े को-ऑपरेटिव की मेम्बर मात्र्योश्का उकडूँ बैठे नाच रही थी.
 “कलगी वाली, प्यारी-प्यारी...त्सीप्-त्सीप्- त्सीप्... पानी पी ले,” मात्र्योश्का उसे मना रही थी और कलगीवाली की चोंच के पीछे-पीछे कप घुमाती जा रही थी, मगर कलगीवाली का पीने का मन ही नहीं हो रहा था. उसने चोंच चौड़ी खोली, सिर को ऊपर की ओर उठाया. इसके बाद वह खून उगलने लगी.
 “लॉर्ड जीज़स! ” अपने कूल्हों पर हाथ मारते हुए मेहमान चीख़ी, “ये क्या हो रहा है? बस खून के थक्के! अपनी ज़िन्दगी में मैंने किसी मुर्गी को इंसान की तरह ऐसे तड़पते हुए नहीं देखा.”
ये आख़िरी शब्द थे जो अंतिम यात्रा पर निकली ग़रीब मुर्गी के लिए कहे गए थे. वह अचानक एक ओर को पलटी, असहायता से धूल में चोंच मारी और आँखें घुमा दीं. फिर वह पीठ के बल मुड़ी, दोनों टाँगें ऊपर उठा दीं और निश्चल पड़ी रही. मात्र्योश्का पानी छलकाते हुए दहाड़ मार कर रो पड़ी, और प्रीस्ट की विधवा – कोऑपरेटिव की प्रेसिडेंट भी रो पड़ी, और मेहमान झुककर उसके कानों में फुसफुसाई:
 “स्तेपानोव्ना, मैं मिट्टी खाऊँ, अगर ये गलत निकले कि तेरी मुर्गियों पर किसी ने टोना कर दिया है. ऐसा कहीं देखा है! मुर्गियों की तो ऐसी कोई बीमारी है ही नहीं! तेरी मुर्गियों पर किसी ने जादू-टोना कर दिया है.”
 “मेरी जान के दुश्मन!” आसमान की ओर देखते हुए प्रीस्ट की विधवा चहकी, “ वे क्या मुझे दुनिया से मिटा देना चाहते हैं?”
उसकी बात का जवाब दिया मुर्गे की ज़ोरदार चीख़ ने, और इसके बाद मुर्गियों के दड़बे से तिरछे-तिरछे , शराबख़ाने से किसी पियक्कड़ की तरह निकला नुचे हुए पंखों वाला मरियल मुर्गा. उसने किसी जानवर की तरह उन पर भयानक नज़र डाली, वहीं लड़खड़ाया, बाज़ की तरह पंख फैलाए, मगर उड़ा कहीं भी नहीं, बल्कि आंगन में ही दौड़ लगाने लगा, गोल चक्कर में, जैसे रस्सी से बंधा कोई घोड़ा लगाता है. तीसरे चक्कर पे वह रुक गया, और उसे उल्टी हो गई, फिर वह खाँसने लगा, गला साफ़ करने लगा, भर्राने लगा, अपने चारों ओर खून के धब्बे थूकने लगा, उलटा हो गया और उसके पंजे मस्तूलों की तरह सूरज की ओर उठ गए. औरतों का विलाप आंगन में छा गया. और मुर्गियों के दड़बे से इसके जवाब में सुनाई दी बेचैन कट्कट् , पंखों की फ़ड़फ़ड़ाहट और हलचल.
 “क्या कहा था मैंने, है न टोना?” विजयी मुद्रा में मेहमान ने पूछा, “फ़ादर को बुलाओ, प्रेयर करके     पवित्र जल छिड़क देगा.”
शाम को छह बजे, जब सूरज अपना आग जैसा लाल मुख लिए, जवान सूरजमुखी के चेहरों के बीच नीचे-नीचे जा रहा था, मुर्गी-पालन वाले आंगन में फादर सेर्गेइ, चर्च के चीफ़ प्रीस्ट ने प्रेयर पूरी की और अपना स्टोल हटाया. लोगों के उत्सुक चेहरे लकड़ी की बागड़ के ऊपर और उसकी झिरियों में झाँक रहे थे. प्रीस्ट की शोकमग्न विधवा ने सलीब को चूमा और आँसुओं से भीगा फटा हुआ एक रूबल का नोट फ़ादर सेर्गेइ को दिया, जिस पर उसने गहरी साँस लेते हुए कुछ इस तरह कहा कि जैसे ख़ुदा हम पर नाराज़ हो गया है. फ़ादर सेर्गेइ के चेहरे के भाव कुछ इस तरह के थे, मानो वह अच्छी तरह जानता है कि ख़ुदा किसलिए नाराज़ हो गया है, बस सिर्फ बताएगा नहीं.
इसके बाद भीड़ बिखर गई, और चूँकि मुर्गियाँ जल्दी सो जाती हैं, इसलिए किसी को पता नहीं चला कि प्रीस्ट की विधवा द्रोज़्दोवा के पड़ोसी के मुर्गीख़ाने में एकदम तीन मुर्गियाँ और एक मुर्गे ने प्राण त्याग दिए. उन्हें भी उसी तरह से उल्टियाँ हुईं, जैसे द्रोज़्दोवा की मुर्गियों को हुई थीं, बस फ़र्क इतना था कि ये मौतें बन्द मुर्गीख़ाने में और ख़ामोशी से हुई. मुर्गा अपनी जगह से औंधे मुँह गिरा, और उसी दशा में मर गया. जहाँ तक विधवा की मुर्गियों का सवाल है, तो वे प्रार्थना के फ़ौरन बाद मर गईं, और शाम होते होते मुर्गियों के दड़बे में मौत का सन्नाटा फैल गया, मरे हुए पक्षियों ढेर लग गए.
सुबह शहर ऐसे जागा मानो उस पर बिजली गिर गई हो, क्योंकि इस घटना ने अजीब, रौद्र रूप धारण कर लिया था. कार्लारादेकोव्स्काया स्ट्रीट पर दोपहर तक सिर्फ़ तीन ज़िन्दा मुर्गियाँ बची थीं, सबसे कोने वाले घर में, जिसे प्रदेश के टैक्स- इन्स्पेक्टर ने किराए पर लिया था, मगर वे भी एक बजते-बजते मर गईं. और शाम तक तो कस्बाई शहर स्तेक्लोव्स्क मधुमक्खियों के छत्ते के समान भिनभिनाने लगा, और उस पर दौड़ने लगा भयानक शब्द  ‘ प्लेग’. स्थानीय अख़बार ‘लाल योद्धा’ में छपे लेख , ‘कहीं ये मुर्गियों का प्लेग तो नहीं?’ नामक लेख में द्रोज़्दोवा का नाम छपा और वहाँ से मॉस्को पहुँचा.

* * *

प्रोफ़ेसर पेर्सिकोव की ज़िंदगी बड़ी अजीब, बदहवास और परेशान हो चली थी. संक्षेप में, ऐसी परिस्थितियों में काम करना बेहद मुश्किल हो चला था. जब उसने अल्फ्रेड ब्रोन्स्की से पीछा छुड़ाया था, उसके दूसरे दिन उसे इन्स्टिट्यूट में अपने कैबिन का फ़ोन रिसीवर हटा कर बन्द कर देना पड़ा, और शाम को जब वह ट्राम से ओखोत्नी लाइन्स से गुज़र रहा था तो प्रोफेसर ने स्वयम् को एक विशाल भवन की छत पर देखा जिस पर काले अक्षरों में लिखा था - ‘वर्कर्स न्यूज़पेपर’. वह, याने प्रोफेसर पेर्सिकोव बिफ़रते हुए, कटुता से, आँखें मिचकाते हुए टैक्सी में बैठ रहा था, और उसके पीछे-पीछे, उसकी आस्तीन पकड़े कम्बल जैसे सूट में नकली, यांत्रिक पैर वाला मोटा घुसा. छत पर प्रोफेसर, सफ़ेद परदे पर, हथेलियाँ चेहरे पर रखे बैंगनी रंग की रोशनी से अपने आप को बचा रहा था. इसके साथ चमकदार इबारत दिखाई दी: ‘टैक्सी में जाते हुए प्रोफेसर पेर्सिकोव हमारे जाने माने संवाददाता कैप्टेन स्तेपानोव को समझा रहे हैं.’ और वाक़ई में : वोल्खोन्का स्ट्रीट पर स्थित चर्च के सामने से गुज़रते हुए खटारा कार उछली, उसमें बैठा प्रोफेसर ऊपर-नीचे हिचकोले खा रहा था, और उसकी हालत किसी मार खाए भेड़िए जैसी हो रही थी.
 “ये इन्सान नहीं बल्कि शैतान हैं,” दाँतों के बीच प्राणि-शास्त्रज्ञ बुदबुदाया और आगे बढ़ गया.
उसी शाम को प्रेचिस्तेन्को के अपने घर लौटने पर प्राणि-शास्त्रज्ञ को केयर-टेकर मारिया स्तेपानोव्ना से  टेलिफ़ोन नंबरों समेत 17 चिट्ठियाँ प्राप्त हुईं, जिन्होंने प्रोफेसर की अनुपस्थिति में उसे फोन किये थे; और मारिया स्तेपानोव्ना का अल्टिमेटम भी कि वह तंग आ चुकी है. प्रोफ़ेसर चिट्ठियाँ फाड़ देना चाहते थे, मगर रुक गए, क्योंकि एक नम्बर के सामने कुछ इबारत लिखी थी: ‘पीपल्स कमिश्नर – स्वास्थ्य विभाग’.
 “क्या बात है?” सनकी वैज्ञानिक वाक़ई में हैरान रह गया, “इनको क्या हुआ है?”
उसी शाम 10.15 बजे घण्टी बजी, और प्रोफेसर को मजबूरन एक चमकते-दमकते नागरिक के साथ बात करनी ही पड़ी. प्रोफेसर को उसके विज़िटिंग कार्ड की ख़ातिर ही उसे बुलाना पड़ा, जिस पर छपा था (बिना नाम और उपनाम के) ‘सोवियत संघ में विदेशी फर्मों के व्यापार-विभागों का आधिकारिक प्रमुख’.
 “शैतान ले जाए,” हरे टेबल-क्लॉथ पर मैग्निफ़ाइंग-ग्लास और कुछ डायग्राम्स फेंक कर पेर्सिकोव गुर्राया,  और उसने मारिया स्तेपानोव्ना से कहा, “बुलाइए उसे यहाँ, कैबिन में, इस आधिकारिक को या जो कोई भी है.”
 “कहिए, मैं आपकी क्या ख़िदमत कर सकता हूँ?” पेर्सिकोव ने ऐसे लहजे में पूछा कि वह प्रमुख कुछ सिहर गया. पेर्सिकोव ने अपना चश्मा नाक से हटाकर माथे पर चढ़ा लिया, और आगंतुक की ओर ध्यान से देखा. वो क्रीम और बहुमूल्य पत्थरों से चमचमा रहा था, और दाईं आँख पर उसने एक काँच वाला चश्मा लगाया था.
‘कैसा घिनौना चेहरा है,’ न जाने क्यों पेर्सिकोव ने सोचा.
मेहमान ने बड़े दूर से बात शुरू की, पहले उसने पेर्सिकोव से पूछा कि क्या वह सिगार पी सकता है, इस कारण बड़ी अनिच्छा से पेर्सिकोव को उसे बैठने के लिए कहना पड़ा. फिर मेहमान इतनी देर से आने के लिए बड़ी लम्बी-चौड़ी माफ़ी मांगने लगा: “ मगर...प्रोफेसर महाशय को दिन में पकड़...खी-खी...माफ़ कीजिए, पाना असंभव है.” (मेहमान, हँसते हुए, लकड़बग्घे के समान सिसकियाँ ले रहा था.)
 “हाँ, मैं बहुत व्यस्त हूँ!” पेर्सिकोव ने इतना संक्षिप्त उत्तर दिया कि मेहमान दुबारा सिहर गया.
मगर फिर भी उसने मशहूर वैज्ञानिक को परेशान करने की आज़ादी ले ही ली.
“समय – बहुत क़ीमती है, जैसा कि कहते हैं...सिगार से प्रोफेसर को परेशानी तो नहीं ना हो रही है?”
 “बुर्-बुर्-बुर्,”प्रोफेसर ने जवाब दिया. उसने इजाज़त दे दी.
”प्रोफेसर ने जीवन की किरण की खोज की है?”
“माफ़ कीजिए, कैसे जीवन की?! ये बस अख़बार वालों की कल्पना है!” पेर्सिकोव ज़िन्दादिली से बोला.
 “आह, नहीं, खी-खी-खी...” – वह उस नम्रता से अच्छी तरह वाक़िफ़ है जो सभी असली वैज्ञानिकों का गुण है...इसके बारे में क्या कहा जाए...आज कितने सारे टेलिग्राम्स आए...दुनिया भर के शहरों में : वारसा में , और रीगा में तो इस किरण के बारे में सब कुछ पता है. पूरी दुनिया बस प्रोफेसर पेर्सिकोव का ही नाम लिए जा रही है...पूरी दुनिया साँस रोके प्रोफेसर पेर्सिकोव के काम पर नज़र गड़ाए हुए है...मगर सबको अच्छी तरह मालूम है कि सोवियत रूस में वैज्ञानिकों की हालत कितनी बुरी है. आपस की बात कहता हूँ...यहाँ कोई बाहर का आदमी तो नहीं है?...अफ़सोस, यहाँ वैज्ञानिक कार्यों का उचित मूल्यांकन नहीं होता, इसलिए वह प्रोफ़ेसर से कुछ बात करना चाहता है...एक विदेशी सरकार बिना किसी स्वार्थ के प्रोफेसर पेर्सिकोव के प्रायोगिक कामों के लिए मदद करना चाहती है. जैसा कि पवित्र ग्रंथ में कहा गया है, यहाँ अपने मोती क्यों बिखेरे जाएँ. सरकार को मालूम है कि सन् ’19 और ’20 में , इस खी-खी...क्रांति के दौरान प्रोफ़ेसर को कितनी तकलीफ़ उठानी पड़ी थी. बेशक, हर चीज़ पूरी तरह गुप्त रहेगी...प्रोफ़ेसर अपनी खोजों के परिणामों से सरकार को अवगत कराएगा, और वो इसके लिए प्रोफ़ेसर की आर्थिक सहायता करेगी. आख़िर उसने ये चैम्बर बनाया है, इस चैम्बर के डिज़ाइन को जानना दिलचस्प होगा...
यहाँ मेहमान ने अपने कोट की भीतरी जेब से एकदम कोरे नोटों की गड्डी निकाली.
एक छोटा-सी रकम, 5000 रुबल्स, मिसाल के तौर पर, एडवान्स, प्रोफ़ेसर को अभी, इसी पल दी जा सकती है...और किसी रसीद वगैरह की भी ज़रूरत नहीं है...प्रोफ़ेसर अगर रसीद का ज़िक्र भी करेंगे तो वह इस आधिकारिक-प्रमुख का अपमान होगा.
 “गेट-आऊट!!!” अचानक प्रोफ़ेसर इतनी भयानक आवाज़ में चीख़ा कि ड्राइंग रूम में रखे पियानों की तार-सप्तक की पट्टियाँ थरथरा उठीं.
मेहमान ऐसे ग़ायब हुआ कि गुस्से से थरथराते पेर्सिकोव को एक मिनट बाद यह शक होने लगा कि वह आया भी था कि या उसे भ्रम हुआ था.
 “उसके गलोश?!” – एक मिनट बाद पेर्सिकोव प्रवेश-कक्ष में चिंघाड़ा.
 “वो भूल गए,” थरथराती हुई मारिया स्तेपानोव्ना ने जवाब दिया.
”बाहर फेंक दो!”
 “कहाँ फेंकूंगी. वो आएगा उन्हें लेने के लिए.”
”हाउसिंग कमिटी में दे दो. रसीद ले लेना. जिससे कि इन गलोशों का नामो-निशान न रहे! कमिटी में! उन्हें ही रखने दो जासूस के गलोश!...”
मारिया स्तेपानोव्ना ने सलीब का निशान बनाते हुए भारी-भरकम, चमड़े के गलोश उठाए और उन्हें चोर-दरवाज़े से ले गई. वहाँ वह कुछ देर दरवाज़े के पीछे खड़ी रही, और फिर गलोशों को गोदाम में छुपा दिया.
 “दे दिए?”
 “दे दिए.”
 “रसीद मुझे दो.”
 “ कैसे दूँ, व्लादीमिर इपातिच. प्रेसिडेंट तो अनपढ़ है!...”
 “फ़ौरन! इसी पल. चाहिए. रसीद. उसके बदले किसी पढ़े-लिखे सुअर के बच्चे को हस्ताक्षर करने दो!”
मारिया स्तेपानोव्ना ने केवल सिर हिलाया, फिर वह चली गई और पन्द्रह मिनट बाद एक पुर्जे के साथ लौटी:
 “’स्टॉक के लिए प्रोफ़ेसर पेर्सिकोव की ओर से प्राप्त हुई 1 (एक) जो. गलो. कोलेसोव’.
 “और ये क्या है?”
 “ बैगेज कूपन है.”
प्रोफ़ेसर ने कूपन को पैरों से कुचल दिया, और रसीद ब्लॉटिंग पैड के नीचे छुपा दी. फिर न जाने किस ख़याल से उसके उभरे माथे पर कालिमा छा गई. वह टेलिफ़ोन की ओर लपका, पन्क्रात को इन्स्टिट्यूट में फोन किया और उससे पूछा: “सब कुछ ठीक-ठाक तो है?” पन्क्रात रिसीवर में कुछ बुदबुदाया, जिससे यह समझ में आ रहा था, कि उसकी राय में, सब कुछ ठीक-ठाक है. मगर पेर्सिकोव का सुकून सिर्फ एक ही मिनट रहा. नाक-भौंह चढ़ाए वह फिर टेलिफोन से चिपक गया और उसने चोंगे में कहा:
 “मुझे उसका, क्या कहते हैं, लुब्यान्का का, नम्बर दीजिए. धन्यवाद...आपमें से किसे मैं ये बात बताऊँ...मेरे यहाँ कुछ सन्दिग्ध व्यक्ति गलोशों में घूमते हैं, हाँ...प्रोफ़ेसर IV विश्वविद्यालय का, पेर्सिकोव...”
रिसीवर ने झटके से बातचीत बीच ही में तोड़ दी. दांत पीसकर गालियाँ देते हुए पेर्सिकोव टेलिफोन से दूर हटा.
 “चाय पिएँगे, व्लादीमिर इपातिच?” कैबिनेट में झाँक कर झिझकते हुए मारिया स्तेपानोव्ना ने पूछा.
 “कोई चाय-वाय नहीं पिऊँगा...बुर्-बुर्-बुर्, शैतान ले जाए उन सबको...वहशियत सवार थी उन पर .”
ठीक दस मिनट बाद प्रोफ़ेसर अपनी कैबिनेट में नए मेहमानों का स्वागत कर रहा था. उनमें से एक, जो काफ़ी ख़ुशमिजाज़, गोल-मटोल और बड़ा शरीफ़ था, साधारण-सा मिलिट्री-कोट और बिरजिस पहने था.   उसकी नाक पर काँच की तितली के समान नाक-पकड़ चश्मा विराजमान था. वह चमचमाते जूतों वाले किसी फ़रिश्ते की याद दिला रहा था. दूसरा छोटे कद का, भयानक उदास, सिविलियन ड्रेस में था, मगर सिविलियन ड्रेस उस पर काफ़ी तंग प्रतीत हो रही थी. तीसरा मेहमान कुछ अजीब ही तरह से पेश आ रहा था, उसने प्रोफ़ेसर की कैबिनेट में प्रवेश नहीं किया, बल्कि आधे-अंधेरे प्रवेश कक्ष में ही रहा. मगर तम्बाकू के धुँए से भरी, प्रकाशित कैबिनेट उसे साफ़-साफ़ नज़र आ रही थी. इस तीसरे वाले के चेहरे पर, जो सिविलियन ड्रेस में ही था, धुंधले काँच वाला नाक-पकड़ चश्मा विराजमान था.
कैबिनेट वाले दोनों ने प्रोफ़ेसर पेर्सिकोव को बुरी तरह परेशान कर दिया : उन्होंने अच्छी तरह विज़िटिंग-कार्ड देखा, पाँच हज़ार के बारे में कई सवाल पूछे और मेहमान के नाक-नक्श के बारे में बताने पर मजबूर किया.
 “ शैतान ही जाने,” पेर्सिकोव बुदबुदाया, “बड़ी घिनौनी शक्ल थी. चरित्रहीन.”
 “कहीं उसकी एक आँख काँच की तो नहीं थी?” छोटे कद वाले ने भर्राई आवाज़ में पूछा.          
  “शैतान ही जाने. नहीं, इत्तेफ़ाक से, काँच की नहीं थी, आँखें लगातार घूम रही थीं.”
 “रूबिन्स्टैन?” फ़रिश्ते ने सिविलियन ड्रेस वाले से धीमी आवाज़ में सवाल किया. मगर उसने त्योरी चढ़ाते हुए इनकार में सिर हिला दिया.
 “रुबिन्स्टैन बिना रसीद के नहीं देगा, किसी हालत में नहीं,” वह बुदबुदाया, “ये रुबिन्स्टैन का काम नहीं है. यहाँ कोई बड़ी हस्ती शामिल है.”
गलोशों के बारे में मेहमानों ने बड़ी दिलचस्पी से सुना. फ़रिश्ते ने हाऊसिंग सोसाइटी के टेलिफोन पर केवल कुछ शब्द कहे : “गेपेऊ (शासकीय सुरक्षा एजेंसी) हाऊसिंग सोसाइटी के सेक्रेटरी कोलेसोव को फ़ौरन गलोशों के साथ प्रोफेसर पेर्सिकोव के फ्लैट में आने की आज्ञा देती है,”– और बदरंग कोलेसोव फ़ौरन हाथों में गलोश पकड़े कैबिनेट में हाज़िर हो गया.
 “वासेन्का!” फ़रिश्ते ने प्रवेश-कक्ष में बैठे हुए व्यक्ति को हौले से पुकारा. वह बड़ी सुस्ती से उठा और पाँव घसीटते हुए कैबिनेट में आया. धुँधले शीशों ने उसकी आँखों को पूरी तरह ढाँक दिया था.
 “क्या?” उसने उनींदे सुर में संक्षिप्त सा प्रश्न किया.
 “गलोश.”
 धुँधली आँखें गलोशों पर फिसलने लगीं, और इस समय पेर्सिकोव को ऐसा प्रतीत हुआ कि शीशों के नीचे, किनारे से, एक पल को चमकीं उनींदी नहीं, बल्कि आश्चर्यजनक रूप से चुभती हुई आँखें. मगर वे फ़ौरन बुझ गईं.
 “तो, वासेन्का?”
 वह, जिसे वासेन्का के नाम से पुकार रहे थे, अलसाए सुर में बोला:
 “ तो, इसमें क्या ‘तो’ है. पेलेन्झ्कोव्स्की के गलोश हैं.”
फ़ौरन स्टॉक में से प्रोफेसर पेर्सिकोव की भेंट छीन ली गई. गलोश अख़बारी कागज़ में गायब हो गए.
मिलिट्री कोट वाला फ़रिश्ता अति प्रसन्नता से उठकर खड़ा हो गया और प्रोफेसर से हाथ मिलाने लगा, उसने एक छोटा सा भाषण भी दिया जिसका सार ये था : ये काम प्रोफेसर को सम्मानित करता है... प्रोफ़ेसर इत्मीनान रखें...आगे से उन्हें कोई परेशान नहीं करेगा, न तो इंस्टीट्यूट में और न ही घर पे. ..सही उपाय किए जाएँगे, उनके चैम्बर्स पूरी सुरक्षित रहेंगे...”
 “और, क्या ऐसा हो सकता है कि रिपोर्टर्स को गोली से उड़ा दिया जाए?” प्रोफेसर ने चश्मे के ऊपर से देखते हुए कहा.
इस सवाल ने तो मेहमानों को बहुत ज़्यादा ख़ुश कर दिया. न केवल चढ़ी हुई नाक-भौंह वाला छोटा आदमी, बल्कि धुँधली आँखों वाला भी बाहर प्रवेश-कक्ष में मुस्कुरा दिया. फ़रिश्ते ने ख़ुशी से दाँत दिखाते हुए समझाया...कि अभी तो, हुम्...बेशक, ये बड़ा ही अच्छा होता...मगर, वो...देखिए...फिर भी प्रेस...हाँलाकि सोवियत में ऐसे प्रस्ताव पर चर्चा ज़रूर हो रही है...अभिवादन करता हूँ.
 “मगर मेरे पास ये कौन बदमाश आया था?”
अब सबने मुस्कुराना बन्द कर दिया, और फ़रिश्ते ने टालमटोल करते हुए जवाब दिया, कि वो तो बस, कोई छोटा-मोटा धोखेबाज़ था, उसकी ओर ध्यान देने की कोई ज़रूरत नहीं है.....मगर, फिर भी वह नागरिक प्रोफ़ेसर से विनती करता है कि वह आज शाम की घटना के बारे में किसी से कुछ न कहे, और मेहमान चले गए.
पेर्सिकोव अपनी कैबिनेट में, डायग्राम्स के पास लौटा, मगर कुछ भी काम नहीं हो सका. टेलिफोन से लाल-लाल रोशनी निकली और एक महिला की आवाज़ ने प्रोफेसर के सामने प्रस्ताव रखा कि अगर वह सात कमरों के फ्लैट वाली एक दिलचस्प और उत्साही विधवा से शादी करना चाहता है... पेर्सिकोव चोंगे में चिंघाड़ा:
 “मैं आपको सलाह दूँगा कि प्रोफ़ेसर रोस्सोलिमो...से अपना इलाज करवा लें...” और तभी दूसरी बार घंटी बजी.
इस बार प्रोफ़ेसर कुछ नरम पड़ गया, क्योंकि, एक काफ़ी मशहूर हस्ती, क्रेमलिन से फोन कर रही थी. उसने पेर्सिकोव से बड़ी देर तक, सहानुभूति से उसके काम के बारे में पूछा और उसकी लैबोरेटरी को देखने की इच्छा भी प्रकट की. टेलिफोन से हट कर पेर्सिकोव ने अपना माथा पोंछा और रिसीवर निकाल कर रख दिया. तब ऊपर वाले फ्लैट में भयानक तुरही की आवाज़ें गरजने लगीं और वाल्किरी की चीख़ें गूँजने लगीं, - कपड़ा-मिल के डाइरेक्टर का रेडियो बोल्शोय थियेटर से वाग्नेर की कॉन्सर्ट का प्रसारण कर रहा था. छत से आती इस चीख़-चिल्लाहट के बीच पेर्सिकोव ने मारिया स्तेपानोव्ना से कह दिया कि वह इस डाइरेक्टर पर मुकदमा ठोंक देगा, उसका रेडियो तोड़ देगा, मॉस्को से दूर शैतान की ख़ाला के पास चला जाएगा, क्योंकि, ज़ाहिर है, कि उसे यहाँ से भगाने की कोशिश की जा रही है. उसने अपना मैग्निफ़ाइंग ग्लास तोड़ दिया और कैबिनेट में ही दीवान पर लेट गया और बोल्शोय थियेटर से आती सुप्रसिद्ध पियानो वादक की नाज़ुक स्वर लहरियों के बीच सो गया.                  
आश्चर्यजनक घटनाएँ अगले दिन भी होती रहीं. ट्राम से इन्स्टीट्यूट पहुँचने पर पेर्सिकोव ने पोर्च में हरी, फ़ैशनेबल हैट वाले एक अपरिचित को देखा. उसने ग़ौर से पेर्सिकोव को देखा, मगर उससे कुछ भी नहीं पूछा, इसलिए पेर्सिकोव ने उसे बर्दाश्त कर लिया. मगर इन्स्टीट्यूट के प्रवेश-कक्ष में बदहवास पन्क्रात के अलावा पेर्सिकोव का स्वागत करने के लिए एक दूसरी हैट उठी और गर्मजोशी से उसका स्वागत करने लगी:
 “नमस्ते, नागरिक प्रोफ़ेसर.”
 “आपको क्या चाहिए?” पन्क्रात की सहायता से अपना ओवर-कोट उतारते हुए ख़ौफ़नाक ढंग से पेर्सिकोव ने पूछा, मगर हैट ने फ़ौरन पेर्सिकोव को शांत कर दिया, बड़ी नज़ाकत से फुसफुसाते हुए कि प्रोफ़ेसर बेकार ही में परेशान हो रहे हैं. वो, हैट, यहाँ इसलिए मौजूद है ताकि प्रोफ़ेसर को हर तरह के ज़िद्दी मेहमानों से बचा सके...और प्रोफेसर न केवल अपनी कैबिनेट के दरवाज़े के, बल्कि खिड़की के भी पीछे चैन से रह सके. इतना कहकर अपरिचित ने एक पल के लिए अपने कोट का पल्ला हटाया और प्रोफ़ेसर को कोई बैज दिखाया.
 “हुम्... इंतज़ाम तो आपने बढ़िया किया है,” पेर्सिकोव बुदबुदाया और फिर भोलेपन से पूछने लगा : “और आप खायेंगे क्या?”
इस पर हैट हँस पड़ी और उसने समझाया कि उसके बदले कोई और आ जाएगा.
इसके बाद तीन दिन बड़े सुकून से बीते. दो बार क्रेमलिन से मेहमान आए, और हाँ, एक बार स्टूडेन्ट्स भी आए, जिनका पेर्सिकोव इम्तेहान ले रहा था. सारे के सारे स्टूडेन्ट्स फ़ेल हो गए, और उनके चेहरों से साफ़ दिखाई दे रहा था कि अब पेर्सिकोव उनके भीतर एक अंधविश्वासी भय पैदा कर रहा है.
 “जाओ, कंडक्टर बन जाओ! तुम प्राणि-शास्त्र नहीं पढ़ सकते,” कैबिनेट से सुनाई दे रहा था.
“क्या बहुत सख़्त है?” हैट ने पन्क्रात से पूछा.
 “ऊ S S S, भगवान बचाए,” पन्क्रात ने जवाब दिया, “ अगर कोई आख़िर तक टिक भी जाता है, तो वह कैबिनेट से बाहर आता है और लड़खड़ाने लगता है. सात मन वज़न कम हो जाता है उसका. और फ़ौरन शराबख़ाने की ओर बढ़ जाता है.”
इस भागदौड़ में तीन दिन कैसे बीत गए, प्रोफेसर को पता ही नहीं चला, मगर चौथा दिन उसे ज़िन्दगी की वास्तविकता में वापस ले आया, और इसका कारण थी सड़क से आती पतली और तीखी आवाज़.    “व्लादीमिर इपातिच!” कैबिनेट की गेर्त्सेन रोड वाली खुली खिड़की से वह आवाज़ चीख़ी. आवाज़ क़ामयाब हो गई: पिछले कुछ दिनों में पेर्सिकोव बेहद थक गया था. इस समय वह आराम कर रहा था, निढ़ाल होकर, सुस्ती से आराम-कुर्सी में बैठा हुआ, लाल फ्रेम में क़ैद आँखों से यूँ ही देखते हुए कश लगा रहा था. वह ज़्यादा देर तक ऐसा नहीं कर सका. और इसलिए कुछ उत्सुकता से उसने खिड़की से बाहर झाँका और फुटपाथ पर अल्फ्रेड ब्रोन्स्की को देखा. नुकीली कैप और नोट-पैड के कारण प्रोफेसर ने शानदार कार्ड के धारक को पहचान लिया.
ब्रोन्स्की बड़ी नज़ाक़त से और आदर से खिड़की के सामने झुका.
 “ओह, ये आप हैं?” प्रोफेसर ने पूछा. उसके पास गुस्सा होने की ताक़त भी नहीं बची थी, और फिर उत्सुकता भी खाए जा रही थी कि आगे क्या होगा? खिड़की के पीछे वह स्वयँ को अल्फ्रेड से सुरक्षित महसूस कर रहा था. रास्ते पर मौजूद हैट ने फ़ौरन अपना कान ब्रोन्स्की की ओर मोड़ दिया. उसके चेहरे पर अत्यधिक प्यारी मुस्कुराहट छा गई.
 “बस, मिनट की एक जोड़ी, प्रिय प्रोफ़ेसर,” फुटपाथ से अपनी आवाज़ पर ज़ोर देते हुए ब्रोन्स्की ने शुरूआत की, “बस एक छोटा सा सवाल, वो भी प्राणी-शास्त्र से संबंधित. क्या पूछ सकता हूँ?”
 “पूछिए,” संक्षेप में और व्यंग्य से पेर्सिकोव ने कहा और सोचने लगा : ‘फिर भी, इस बदमाश में कुछ अमेरिकन जैसा तो है.’
 “मुर्गियों के लिए आप क्या कहेंगे, प्रिय प्रोफेसर?” होंठों पर दोनों हाथों का गोल बनाकर ब्रोन्स्की चिल्लाया.
पेर्सिकोव हैरान रह गया. वह खिड़की की सिल पर बैठ गया, फिर नीचे उतरा, घंटी बजाई और खिड़की में उँगली से इशारा करते हुए चीख़ा:
 “पन्क्रात, इस फुटपाथ वाले को अन्दर आने दो.”
 जब ब्रोन्स्की कैबिनेट में आया, तो पेर्सिकोव ने बस इतनी ही मोहब्बत दिखाई कि गुर्राते हुए उससे कह दिया:
 “बैठिए!”
और ब्रोन्स्की, प्रसन्नता से मुस्कुराते हुए, रिवॉल्विंग स्टूल पर बैठ गया.
 “मुझे बताइए, प्लीज़,” पेर्सिकोव ने शुरूआत की, “आप वहाँ लिखते हैं, अपने इन अख़बारों में?”
 “सही फ़रमाया,” ब्रोन्स्की ने आदर से जवाब दिया.
 “और मुझे ये समझ में नहीं आता कि आप लिख कैसे सकते हैं, जबकि आपको रूसी बोलना भी नहीं आता है. ये ‘’मिनट की एक जोड़ी’ और ‘मुर्गियों के लिए’ क्या होता है? आप, शायद कहना चाहते थे, ‘मुर्गियों के बारे में’?”
ब्रोन्स्की सम्मानपूर्वक हल्के से मुस्कुराया:
 “वालेन्तिन पेत्रोविच सुधार देते हैं.”
 “ये कौन है – वालेन्तिन पेत्रोविच?”
 “साहित्य-विभाग के प्रमुख.”
 “अच्छा, ठीक है. मैं, वैसे भी, भाषाविद् नहीं हूँ. आपके पेत्रोविच को बाज़ू में हटाते हैं. मुर्गियों के बारे में आप क्या जानना चाहते हैं?”
 “सब कुछ, जो आप बतायेंगे, प्रोफेसर.”
अब ब्रोन्स्की ने हाथ में पेन्सिल पकड़ ली. पेर्सिकोव की आँखों में जीत की चमक दिखाई दी.
 “आप बेकार ही मेरे पास आए हैं, मैं पंखों वाले दोस्तों का विशेषज्ञ नहीं हूँ. आपको I युनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमेल्यान इवानोविच पोर्तुगालोव के पास जाना चाहिए था. व्यक्तिगत रूप से मैं बहुत कम जानता हूँ...
ब्रोन्स्की नम्रतापूर्वक मुस्कुराया, यह दिखाते हुए कि वह प्रिय प्रोफेसर के मज़ाक को समझ गया है.  ‘मज़ाक – थोड़ा सा’ उसने नोट-पैड में लिखा.
 “मगर, यदि आपको दिलचस्पी है तो मुलाहिज़ा फ़रमाइए. मुर्गियाँ या कलगी वाले ...मुर्गियों की किस्म के पक्षी होते हैं. कुक्कुट जाति के....” पेर्सिकोव ने ऊँची आवाज़ में बोलना शुरू किया, उसकी नज़रें ब्रोन्स्की पर नहीं बल्कि कहीं दूर टिकी हुई थीं, जहाँ उसके सामने हज़ारों व्यक्तियों का समूह तैर रहा था...”कुक्कुट जाति के...फ़ज़ाइनस. ये ऐसे पक्षी होते हैं जिनकी कलगी मोटी चमड़ी की होती है और निचले जबड़े के नीचे दो गलफ़ड़े होते हैं...ह्म्... हालाँकि कभी कभी एक भी होता है, बीच में, चोंच के नीचे. ...तो, और क्या. पंख छोटे-छोटे और गोलाई लिए होते हैं...पूँछ मध्यम लम्बाई की, कुछ-कुछ सीढ़ियों जैसी और, मैं कहूँगा, कि छत जैसी, बीच के पंख हँसिये के आकार में मुड़े होते हैं... पन्क्रात, मॉडेल वाली कैबिनेट से 705 नं. का मॉडेल लाओ, पालतू मुर्गे का मॉडेल...मगर, शायद, आपको इसकी ज़रूरत नहीं है?...पन्क्रात, मॉडेल मत लाओ...मैं फिर से दुहराता हूँ, मैं विशेषज्ञ नहीं हूँ, पोर्तुगालोव के पास जाइए. ख़ैर, व्यक्तिगत तौर पर मुझे जंगली मुर्गों की छह किस्मों के बारे में पता है..ह्म् पोर्तुगालोव को और भी ज़्यादा मालूम है...इंडिया में और मलय द्वीपसमूह में...मिसाल के तौर पर, बान्किव मुर्गा या काज़िन्ता, वो हिमालय की तराई वाले भाग में पाया जाता है, पूरे इंडिया में, आसाम में, बर्मा में, ... जावा मुर्गे, या गालुस वारिउस, लोम्बोक में, सुम्बावा में और फ्लोरेस में. और जावा द्वीप पर पाया जाता है शानदार मुर्गा गाल्युस एनेउस, इंडिया के दक्षिण-पश्चिम में एक बेहद ख़ूबसूरत मुर्गा सोनेराटी पाया जाता हि...मैं बाद में आपको तस्वीरें दिखाऊँगा. जहाँ तक सीलोन का सवाल है, तो वहाँ हमें स्टेन्ली मुर्गा दिखाई देता है, वो और कहीं नहीं पाया जाता.
ब्रोन्स्की आँखें फाड़े बैठा था और दनाद्न् नोट्स लिखे जा रहा था.
 “कुछ और जानना चाहते हैं?”
 “मैं मुर्गों की बीमारियों के बारे में कुछ जानना चाहूँगा,” अल्फ्रेड हौले से फुसफुसाया.
  “ह्म्, मैं विशेषज्ञ नहीं हूँ...आप पोर्तुगालोव से पूछिए...मगर...ठीक है, टेप-वर्म्स, लीचेज़, खाज, पक्षियों वाले बैक्टेरिया, मुर्गियों वाली जूं, पिस्सू, मुर्गियों का हैजा, लार-ग्रंथियों की सूजन , निमोनिया...कई सारी हैं...(पेर्सिकोव की आँखों में चिनगारियाँ चमक रही थीं)...ज़हर का असर, मिसाल के तौर पर, ट्यूमर्स, रिकेट्स, जॉंडिस, र्‍य़ूमेटिज़्म, अखोरियोन शेंल्याइनी... बड़ी दिलचस्प बीमारी है. इसके कारण कलगी पर छोटे-छोटे धब्बे निकल आते हैं...
ब्रोन्स्की ने फूलदार रूमाल से माथे का पसीना पोंछा.
 “और, आपकी राय में, प्रोफेसर, वर्तमान विपत्ति का क्या कारण है?”
 “कैसी विपत्ति?”
 “क्या! क्या, आपने सचमुच में पढ़ा नहीं है, प्रोफेसर?” ब्रोन्स्की को आश्चर्य हुआ और उसने अपनी बैग से ‘इज़्वेस्तिया’ अख़बार की मुड़ी-तुड़ी प्रति निकाली.
 “मैं अख़बार नहीं पढ़ता,” पेर्सिकोव ने जवाब दिया और भौंहे चढ़ा लीं.
 “मगर क्यों, प्रोफेसर?” अल्फ्रेड ने नज़ाकत से पूछा.
 “क्योंकि वे हर तरह की बकवास लिखते हैं,” बिना सोचे प्रोफेसर ने जवाब दिया.
 “ये क्या बात हुई, प्रोफेसर?” ब्रोन्स्की हौले से फुसफुसाया और उसने पन्ना खोल दिया.
 “क्या बात है?” पेर्सिकोव ने पूछा और वह अपनी कुर्सी से कुछ उठा. अब ब्रोन्स्की की आँखें चमक रही थीं. उसने अपनी नेल पॉलिश वाली उँगली से पूरे पृष्ठ पर फैली, असाधारण रूप से बड़ी हेडलाइन को रेखांकित किया :   ‘’रिपब्लिक में मुर्गियों की प्लेग’.

 “कैसे?” माथे पर चश्मा सरकाते हुए पेर्सिकोव ने पूछा...

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

The Fateful Eggs - 4

अध्याय 4
प्रीस्ट की विधवा, द्रोज़्दोवा

भगवान ही जानता है कि इसमें इवानोव का दोष था, या फिर ये बात थी कि सनसनीखेज़ समाचार आग की तरह फैलते हैं, मगर अचानक खदबदाते, अजस्त्र मॉस्को में लोग अचानक किरण के बारे में और प्रोफेसर पेर्सिकोव के बारे में बातें करने लगे.. बस यूँ ही, काफ़ी अस्पष्ट सी. जुलै के मध्य तक, जगमगाते मॉस्को में इस आश्चर्यजनक आविष्कार के बारे में समाचार किसी तीर लगे पंछी की तरह उछलता रहा, कभी ग़ायब हो जाता, कभी फिर से प्रकट हो जाता. तभी ‘इज़्वेस्तिया’ अख़बार के पृष्ठ नं. 20 पर ‘विज्ञान और टेक्नोलॉजी के समाचार’ शीर्षक के नीचे एक छोटी सी टिप्पणी प्रकाशित हुई, जिसमें किरण के बारे में कुछ जानकारी दी गई थी. इसमें दबे-छुपे कहा गया था कि IV स्टेट युनिवर्सिटी के जाने माने प्रोफेसर ने एक किरण का आविष्कार किया है, जो निचले प्राणियों की जीवन-क्षमता को अविश्वसनीय रूप से बढ़ाती है, और इस किरण का परीक्षण करना आवश्यक है. प्रोफेसर का नाम, बेशक, गलत लिखा गया था और वहाँ छपा था: ‘पेव्सिकोव’.
 
इवानोव ने अख़बार लाकर प्रोफेसर को टिप्पणी दिखाई.
 “पेव्सिकोव,” अपनी कैबिनेट में चैम्बर पर व्यस्त पेर्सिकोव बुदबुदाया, “इन व्हिसल-ब्लोवर्स को कैसे सब कुछ पता चल जाता है?”
मगर अफ़सोस, गलत नाम भी प्रोफेसर पेर्सिकोव को उन घटनाओं से न बचा सका जो दूसरे ही दिन शुरू गईं, और जिन्होंने पेर्सिकोव का पूरा जीवन ही उलट-पुलट कर डाला.
दरवाज़ा खटखटाकर पन्क्रात कैबिनेट में आया और उसने पेर्सिकोव के हाथ में एक बेहद शानदार विज़िटिंग कार्ड थमा दिया. 
 “वो यहीं है,” पन्क्रात ने अदब से कहा.
कार्ड पर बेहद नफ़ासत से छपा था:

अल्फ्रेद अर्कादेविच
ब्रोन्स्की
संवाददाता, मॉस्को के समाचारपत्र – ‘लाल रोशनी’, ‘लाल मिर्च’, ‘लाल मैगज़ीन’,  ‘लाल प्रोजेक्टर’, ‘लाल मॉस्को ईवनिंग न्यूज़’. 
“उसे जहन्नुम में भेज दे,” पेर्सिकोव ने एकसुर में कहा और कार्ड मेज़ के नीचे फेंक दिया.
पन्क्रात मुड़ा, बाहर गया और पांच ही मिनट बाद पीड़ित चेहरे और उसी कार्ड की दूसरी कॉपी के साथ वापस लौटा.
 “तू, क्या मज़ाक कर रहा है?” चिरचिरी आवाज़ में पेर्सिकोव चीखा और उसका चेहरा भयानक हो गया.
  “गेपेऊ (शासकीय सुरक्षा एजेंसी से तात्पर्य है – अनु.) से हैं, ऐसा कह रहे हैं,” पन्क्रात ने जवाब दिया, उसका चेहरे का रंग उड़ चुका था.
पेर्सिकोव ने एक हाथ से कार्ड झपट लिया, उसे लगभग दो हिस्सों में फाड़ ही दिया और दूसरे हाथ से चिमटी मेज़ पर फेंक दी. कार्ड पर लहरियेदार अक्षरों में लिखा था: “परम आदरणीय प्रोफेसर, माफ़ी चाहता हूँ, और विनती करता हूँ कि प्रकाशन के सामाजिक कार्य के लिए मुझे केवल तीन मिनट का समय दें. कॉरेस्पोंडेंट, व्यंग्य-पत्रिका ‘लाल-कौआ’, गेपेऊ-प्रकाशन”. 
“बुला उसे,” पेर्सिकोव ने कहा और गहरी साँस ली.
फ़ौरन पन्क्रात की पीठ के पीछे से चिकने, सफ़ाचट चेहरे वाले एक नौजवान का सिर बाहर निकला. चीनियों की तरह सदा ऊपर उठी उसकी भौंहों और सामने वाले व्यक्ति की आँखों में एक भी पल को न झाँकने वाली उसकी भूरी-भूरी आँखें विस्मित कर रही थीं. नौजवान ने बड़े सलीके से नए फ़ैशन के कपडे पहने थे. घुटनों तक पहुँचता हुआ तंग कोट, बेल बॉटम टाइप की पतलून, चमचमाते खूब चौड़े बूट जिनकी नोक खुरों जैसी थी. नौजवान के हाथों में थी एक छड़ी, नुकीले सिरे वाली हैट और एक नोट-पैड.
 “क्या चाहते हैं, आप?” प्रोफेसर ने ऐसी आवाज़ में पूछा कि पन्क्रात फ़ौरन दरवाज़े के पीछे छिप गया. “आपसे कह तो दिया गया था कि मैं व्यस्त हूँ?”
जवाब के बदले नौजवान ने दाँए-बाएँ झुककर प्रोफेसर का अभिवादन किया, इसके बाद उसकी आँखें पहियों की तरह पूरी कैबिनेट में घूम गईं और नौजवान ने फ़ौरन अपने नोट-पैड में कोई निशान बनाया.
 “मैं व्यस्त हूँ,” प्रोफेसर ने तिरस्कार से मेहमान की आँखों में देखते हुए कहा, मगर वहाँ उसे कोई भी प्रतिक्रिया नहीं मिली, क्योंकि आँखें उसकी पहुँच से बाहर थीं.
 “हज़ार बार माफ़ी चाहता हूँ, परम आदरणीय प्रोफेसर,” नौजवान ने पतली आवाज़ में बोलना शुरू किया, “कि मैं इस तरह आपके पास घुस आया और आपका कीमती समय नष्ट कर रहा हूँ, मगर आपकी विश्वस्तरीय खोज की ख़बर ने, जो पूरी दुनिया में फैल चुकी है, हमारे मैगज़ीन को मजबूर कर दिया है कि आपसे कुछ स्पष्टीकरण प्राप्त किए जाएँ.”
 “कैसे स्पष्टीकरण पूरी दुनिया के लिए?” पेर्सिकोव पीड़ा से चिंघाड़ा और पीला पड़ गया, “ मुझे आपको कोई स्पष्टीकरण वगैरह देने की ज़रूरत नहीं है...मैं व्यस्त हूँ....भयानक व्यस्त हूँ.”
 “आप किस चीज़ पर काम कर रहे हैं?” बड़ी मिठास से नौजवान ने पूछा और नोट-पैड में दूसरा निशान बनाया.
 “हाँ, मैं...आप क्या कर रहे हैं? कुछ छापना चाहते हैं?”
 “हाँ,” नौजवान ने जवाब दिया और अचानक नोट-पैड में कुछ लिख लिया.
 “पहली बात, जब तक मैं अपना काम पूरा नहीं कर लेता, मेरा कुछ भी छपवाने का इरादा नहीं है...ऊपर से आपके इन अख़बारों में तो बिल्कुल नहीं...दूसरी बात, ये सब आपको मालूम कैसे हुआ?” और पेर्सिकोव को अचानक महसूस हुआ कि वह शिथिल पड़ता जा रहा है.
 “क्या ये ख़बर सही है कि आपने ‘नए जीवन की किरण’ का आविष्कार किया है?”
 “कैसा नया जीवन?” प्रोफेसर फट पड़ा, “क्या बकवास कर रहे हैं आप! उस किरण की , जिस पर मैं काम कर रहा हूँ, अभी पूरी तरह से खोज नहीं हुई है, और असल में तो अभी तक कुछ भी पता नहीं है! हो सकता है कि वह प्रोटोप्लाज़्म के क्रियाकलापों को कुछ बढ़ाए...”
 “कितने गुना?” जल्दी से नौजवान ने पूछा.
पेर्सिकोव पूरी तरह पस्त हो गया. ...’नमूना है. शैतान ही जाने कि ये क्या है!’
 “ये कैसे बेवकूफ़ी भरे सवाल पूछ रहे हैं आप? ...मान लो, अगर मैं कहूँ कि, अं, हज़ार गुना!...”
नौजवान की आँखों में एक वहशियत भरी खुशी तैर गई. 
“क्या बहुत भारी-भरकम प्राणियों का जन्म होगा?”
 “नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है! हाँ, ये सच है कि मेरे द्वारा प्राप्त किए गए प्राणी , साधारण प्राणियों की तुलना में बड़े होंगे...हुँ, कुछ नए गुण भी उनमें होंगे...असल में, ख़ास बात यहाँ आकार नहीं, बल्कि उत्पत्ति के अविश्वसनीय वेग से है,” मुसीबत के मारे पेर्सिकोव ने कह दिया और फ़ौरन डर गया. नौजवान ने एक पूरा पृष्ठ लिख डाला था, और उसे पलट कर आगे लिखने लगा.
 “आप लिखिए नहीं!” हार मानते हुए और ये महसूस करते हुए कि वह अब पूरी तरह से नौजवान के हाथों में है, पेर्सिकोव ने बदहवासी से पूछा: “आप लिख क्या रहे हैं?”
 “क्या ये सच है कि दो दिनों में अण्डसमूह से मेंढ़कों के 2 मिलियन डिम्ब प्राप्त हो सकते हैं?”
 “ कितने अण्डसमूह से?” फिर से बिफ़रते हुए पेर्सिकोव चीखा, “क्या आपने कभी अण्डसमूह देखा है...अं, कम से कम, पेड़ों वाले मेंढ़कों का?”
 “आधे पाऊण्ड से?” बगैर झेंपे नौजवान ने पूछा.
पेर्सिकोव लाल हो गया.
 “ऐसे कौन नापता है? छिः! आप ये कह क्या रहे हैं? अं, बेशक, अगर मेंढकों का आधा पाऊण्ड अण्डसमूह लिया जाए...तब, लीजिए...भाड़ में जाओ, अं, क़रीब-क़रीब इतनी ही मात्रा में, या, हो सकता है, काफ़ी ज़्यादा भी!”
नौजवान की आँखों में हीरे जगमगा उठे, और उसने एक ही दम में और एक पृष्ठ रंग दिया.
 “क्या ये सच है कि इससे पूरी दुनिया में पशुपालन के क्षेत्र में क्रांति आएगी?”
 “ये कैसा अख़बारी सवाल है,” पेर्सिकोव चीखा, “ और, वैसे भी मैं आपको बकवास लिखने की इजाज़त नहीं देता. आपके चेहरे से मैं समझ रहा हूँ कि आप कोई घटिया चीज़ लिख रहे हैं!”
 “आपका एक फोटो, प्रोफेसर, पूरी संजीदगी से रेक्वेस्ट करता हूँ,” नौजवान ने विनती की और झटके से अपनी नोट-पैड बन्द की.
 “क्या? मेरा फोटो? आपकी मैगज़ीन्स में? इस बकवास के साथ जो आप वहाँ लिखेंगे. नहीं, नहीं, नहीं...और मैं व्यस्त हूँ...प्रार्थना करता हूँ!...”
 “कम से कम पुराना ही दे दीजिए. हम उसे फ़ौरन वापस कर देंगे.”
 “ पन्क्रात!” प्रोफेसर बदहवासी से चीखा.
  “आप का अभिवादन करता हूँ,” नौजवान ने कहा और वह गायब हो गया.

पन्क्रात के स्थान पर दरवाज़े के पीछे एक अजीब सी, किसी धातु की एक लय में सरसराहट सुनाई दी, फर्श पर लोहे की खटखट, और कैबिनेट में एक असामान्य मोटा प्रविष्ट हुआ, जिसने ढीला-ढाला कुर्ता और ऊनी कपड़े की पतलून पहनी थी. उसका बायाँ नकली पैर खटखट कर रहा था, और हाथों में उसने ब्रीफकेस पकड़ रखी थी. फिश जैली जैसे चमकते उसके पीले, गोल सफ़ाचट चेहरे पर प्यारी मुस्कान थी. वह फ़ौजियों वाले अंदाज़ में प्रोफेसर के सामने झुका और फिर सीधा खड़ा हो गया, जिससे उसके पैर की स्प्रिंग में सरसराहट हुई. पेर्सिकोव की बोलती बन्द हो गई.
”प्रोफेसर महाशय,” अनजान व्यक्ति ने बड़ी प्यारी, भर्राई आवाज़ में कहा, “इस नाचीज़ इन्सान को माफ़ कीजिए, जिसने आपकी तनहाई में ख़लल डाला है.”
 “क्या आप रिपोर्टर हैं?” पेर्सिकोव ने पूछा. “पन्क्रात!!”
”बिल्कुल नहीं, प्रोफेसर महाशय,” मोटे ने जवाब दिया, “अपना तआर्रुफ़ कराने की इजाज़त दें – मर्चेंट नेवी का कप्तान और पीपल्स कमिसारों की कौंसिल के अख़बार “ हेराल्ड ऑफ इण्डस्ट्री” का सहकारी.”
 “पन्क्रात !!” पेर्सिकोव वहशी की तरह चीखा, और तभी कोने में एक लाल सिग्नल चमका और हौले से टेलिफोन बजने लगा. “पन्क्रात!” प्रोफेसर फिर से चिल्लाया, “मैं सुन रहा हूँ.”
 “माफ़ कीजिए, प्रोफेसर महाशय, आपको तकलीफ़ दे रहा हूँ, ” टेलिफोन जर्मन में भर्राने लगा, “मैं ‘बर्लिन तागेब्लात्स का कर्मचारी...”       
 “पन्क्रात!” प्रोफेसर टेलिफोन के चोंगे में चीखा, “इस समय मैं बहुत व्यस्त हूँ और आपसे नहीं मिल सकता!...पन्क्रात!!”
और इसी समय इंस्टीट्यूट के मुख्य द्वार की घण्टियाँ बजने लगी.
***
 “ब्रोन्नाया स्ट्रीट पर भयानक मर्डर!!” जून की गरम सड़क पर पहियों और गाडियों की फ्लैश लाइट्स के बीच भर्राई हुई कृत्रिम आवाज़ें चिल्लाने लगीं. “मुर्गियों की ख़तरनाक बीमारी...प्रीस्ट की विधवा द्रोज़्दोवा की तस्वीर के साथ!...प्रोफेसर पेर्सिकोव की ख़तरनाक खोज ...जीवन की किरण!!”
पेर्सिकोव ऐसे झूलने लगा कि बस, मोखोवाया पर बस के नीचे गिरते गिरते बचा, उसने तैश में आकर अख़बार झपट लिया.
 “3 कोपेक, नागरिक!” छोकरा चिल्लाया और फुटपाथ की भीड़ में सिकुड़ते हुए फिर से चीखा, “ ‘रेड ईवनिंग न्यूज़’ – एक्स-किरण की खोज!!”
हैरान पेर्सिकोव ने अख़बार खोला और लैम्प पोस्ट से चिपक कर खड़ा हो गया. दूसरे पृष्ठ पर दाएँ कोने में एक अस्पष्ट फ्रेम से उसकी ओर देख रहा था गंजा, लटकते हुए निचले जबड़े वाला आदमी, वहशी और मृतप्राय आँखों से, जो था अल्फ्रेड ब्रोन्स्की की रचना का नमूना. उस तस्वीर के नीचे लिखा था : ‘वी.ई.पेर्सिकोव, रहस्यमय लाल किरण के खोजकर्ता’. नीचे शीर्षक था ‘वैश्विक पहेली’ जिसके नीचे शुरू हो रहा था उसका लेख इन शब्दों के साथ:
 “बैठिये,” बड़े प्यार से महान वैज्ञानिक पेर्सिकोव ने हमसे कहा....”
लेख के नीचे हस्ताक्षर थे : “अल्फ्रेड ब्रोन्स्की (अलोंज़ो)”.
 युनिवर्सिटी की छत पर हरी-सी रोशनी फैल गई, आसमान में “टाकिंग न्यूज़पेपर” ये अक्षर दिखाए दिए और फ़ौरन भीड़ के सैलाब ने मोखोवाया को लबालब भर दिया.
 “बैठिये!!!” अचानक छत पर लगे लाउडस्पीकर से एक अप्रिय, चिरचिरी आवाज़ सुनाई दी, जो अल्फ्रेड ब्रोन्स्की की हज़ार गुना बढ़ी हुई आवाज़ थी, “ – बड़ी आवभगत से महान वैज्ञानिक पेर्सिकोव ने हमसे कहा. ‘मैं मॉस्को के सर्वहारा वर्ग को अपनी खोज के परिणामों से अवगत कराना चाहता था...”
पेर्सिकोव की पीठ के पीछे हल्की सी धातु की सरसराहट सुनाई दी, और किसी ने उसे आस्तीन पकड़ कर खींचा. मुड़कर देखा तो उसे कृत्रिम धातुई पैर के मालिक का पीला गोल चेहरा नज़र आया. उसकी आँखें आँसुओं से नम थीं, और होंठ थरथरा रहे थे.
 “मुझे, प्रोफेसर, आपने अपनी आश्चर्यजनक खोज के परिणामों के बारे में बताने से इनकार कर दिया,” उसने बड़े अफ़सोस से कहा और गहरी साँस ली, “मेरे पन्द्रह रूबल्स डूब गए.”
उसने बड़ी निराशा से  युनिवर्सिटी की छत की ओर देखा, जहाँ काले जबड़े से अदृश्य अल्फ्रेड ब्रोन्स्की चीखे जा रहा था. पेर्सिकोव को न जाने क्यों मोटे पर दया आ गई.
 “मैंने,” बड़ी नफ़रत से आकाश से आ रहे शब्दों को पकड़ते हुए वह बड़बड़ाया, “ उसे कोई ‘बैठिये-वैठिए’ नहीं कहा! ये एक अजीब सी किस्म का बेशर्म इन्सान है! आप मुझे माफ़ कीजिए, प्लीज़, - मगर, वाक़ई में, जब कोई काम कर रहा हो और लोग घुसे चले आते हैं...मैं, बेशक, आपके बारे में नहीं कह रहा हूँ...”
 “शायद, प्रोफेसर महाशय, आप मुझे अपने चैम्बर का ही वर्णन दे सकते हैं?” प्रोफेसर को ताड़ते हुए नम्रता से धातुई पैर वाले आदमी ने कहा.  “आपको तो अब कोई फ़रक पड़ने वाला नहीं है...”
 “आधे पाऊंड अण्ड समूह से तीन दिनों में इतने डिम्बों का निर्माण होगा कि उन्हें गिनना मुश्किल हो जाएगा,” अदृश्य आदमी लाउडस्पीकर में गरज रहा था.
 “टी-टी,” मोखोवाया पर कारों के हॉर्न्स बज रहे थे.
 “ओ-ओ-ओ... आह, क्या बात है, ओ-ओ-ओ,” भीड़ सिर हिलाते हुए फुसफुसा रही थी.
 “कैसा नीच है? हाँ?” क्रोध से थरथराते हुए पेर्सिकोव धातुई पैर वाले पर फुफकारा, “ये सब कैसा लग रहा है आपको? मैं उसकी शिकायत करूँगा!”
”बड़ा भद्दा है!” मोटे ने सहमत होते हुए कहा.
प्रोफेसर की आँखों से एक चकाचौंध करने वाली बैंगनी रोशनी टकराई, और चारों ओर की हर चीज़ रोशनी में नहा गई – लैम्प-पोस्ट, सड़क का एक टुकड़ा, पीली दीवार, उत्सुक चेहरे.
 “ये, प्रोफेसर महाशय,” उत्तेजित होते हुए मोटा फुसफुसाया, “आपकी फोटो ले रहे हैं,” और प्रोफेसर की बाँह से यूँ लटक गया, जैसे कोई वज़न हो.
हवा में किसी चीज़ ने ‘टक्’ किया.
 “जहन्नुम में जाएँ सब के सब!” वज़न के साथ भीड़ से निकलते हुए पीड़ा से प्रोफेसर चीख़ा. “ऐ, टैक्सी. प्रेचिस्तेन्का चलो!”
पुरानी खटारा गाड़ी, सन् ’24 का मॉडेल, खड़खड़ाती हुई फुटपाथ के पास रुकी और मोटे से अपने आप को छुड़ाने की कोशिश करते हुए प्रोफेसर पीछे की सीट पर बैठ गया.
 “आप मुझे परेशान कर रहे हैं,” वह फुफकारा और बैंगनी रोशनी से बचने के लिए हथेलियों से अपना चेहरा ढाँक लिया. 
“पढ़ा?! क्या चिल्ला रहे हैं?...प्रोफेसर पेर्सिकोव की बाल-बच्चों समेत मालाया ब्रोन्नाया पर हत्या कर दी गई!...” भीड़ में लोग चीख रहे थे.
“मेरे कोई बच्चे-वच्चे नहीं हैं, सुअर की औलाद...” पेर्सिकोव दहाड़ा और अचानक काले यंत्र के फोकस में पकड़ा गया, जो उसके खुले मुँह और वहशी नज़रों पर निशाना साधे था.
“ क्र्याख...तु...क्र्याख ...तु...” टैक्सी चीखी और भीड़ में लपकी.


मोटा पहले ही टैक्सी में प्रोफेसर की बगल में बैठ चुका था.

बुधवार, 21 अगस्त 2013

The Fateful Eggs-3

अध्याय 3
पेर्सिकोव ने पकड़ लिया
   
मामला कुछ यूँ था. जब प्रोफेसर ने अपनी पैनी आँख आई-पीस से लगाई तो उसने अपने जीवन में पहली बार इस बात पर ग़ौर किया कि उस रंगबिरंगी लहर में ख़ास तौर से स्पष्ट रूप से एक विशेष रंग की काफ़ी मोटी किरण अलग से दिखाई दे रही है. ये किरण लाल-चटख़ रंग की थी और लहर में से एक छोटी सी नुकीली चीज़ की तरह बाहर निकल रही थी, जैसे कोई सुई होती है.
बस, दुर्भाग्यवश, कुछ पलों तक इस किरण ने महान वैज्ञानिक की आँख को उलझाए रखा.
इसमें, इस किरण में, प्रोफेसर ने वो देखा जो ख़ुद किरण से हज़ार गुना महत्वपूर्ण था - एक अस्पष्ट, अस्थिर जीव, जो माइक्रोस्कोप के लैन्सों और शीशों की एक असावधान हरकत के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ था. असिस्टेंट द्वारा प्रोफेसर को बुलाकर ले जाने की बदौलत, अमीबा इस किरण के प्रभाव तले डेढ़ घंटे पड़े रहे, और इस कारण ये हुआ : उस समय, जब डिश पर किरण से बाहर के क्षेत्र में दानेदार अमीबा सुस्त और असहाय अवस्था में पड़े रहे; उस जगह, जहाँ ये लाल, नुकीली तलवार पड़ रही थी, विचित्र घटनाएँ होने लगीं. लाल गोलाकार हिस्से में जीवन खदखदा रहा था. भूरे अमीबा अपने नकली पैरों को बाहर निकाले पूरी ताकत से लाल गोले की तरफ़ बढ़ रहे थे और उसमें घुसकर (जैसे कोई जादू हो गया हो) जीवित हो रहे थे. कोई ताकत उनमें ज़िन्दगी भर रही थी. वे झुण्डों में रेंग रेंग कर जा रहे थे और लाल गोले में जगह पाने के लिए एक दूसरे से लड़ रहे थे. उसमें जारी था एक बदहवास, कोई दूसरा शब्द नहीं मिल सकता, जनन चक्र. सभी नियमों को, जो पेर्सिकोव को अपनी पांच उँगलियों की भाँति ज्ञात थे, तोड़ कर और उनका उल्लंघन करते हुए वे उसकी आँखों के सामने विद्युत की गति से दुगुने होते जा रहे थे. किरण में उनका विघटन हो रहा था, और हर भाग सिर्फ 2 सेकंड के भीतर नए और ताज़े जीव में परिवर्तित हो रहा था. ये जीव कुछ ही पलों में अपने आकार-प्रकार और परिपक्वता को प्राप्त करके तुरंत ही नई पीढ़ी को उत्पन्न कर देते. लाल गोले में, और इसके बाद समूची डिस्क में जगह की काफ़ी तंगी होने लगी, और एक अवश्यंभावी संघर्ष आरंभ हो गया. नवजात अमीबा तैश में एक दूसरे पर झपटते, टुकड़े टुकड़े कर देते और निगल लेते. नवजात अमीबा के बीच में ही अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हुए शहीद हो गए अमीबा के शव पड़े थे. सर्वोत्तम और शक्तिशाली ही जीत रहे थे. और ये ‘सर्वोत्तम’ – भयानक थे. पहली बात: अपने आकार-प्रकार में वे साधारण अमीबा से दुगुने थे; और दूसरी बात : उनमें एक ख़ास तरह का जुनून और फुर्ती थी. उनकी गतिविधियाँ केन्द्रित थीं, उनके नकली पैर आम अमीबा के पैरों से काफ़ी लंबे थे और वे उनका, बिना अतिशयोक्ति के, ऑक्टोपस के तंतुओं की तरह उपयोग कर रहे थे.             
अगली शाम को प्रोफेसर ने , जिसका खाना न खाने के कारण रंग पीला पड़ गया था और गाल पिचक गए थे, सिर्फ ख़ुद बनाई हुई मोटी मोटी सिगरेट्स के सहारे, अमीबा की नई पीढ़ी का अध्ययन किया, और तीसरे दिन वह उद्गम स्त्रोत, अर्थात् लाल किरण की ओर बढ़ा.   
लैम्प में गैस हौले हौले फुसफुसा रही थी, रास्ते पर फिर से यातायात बढ़ गया था, और प्रोफेसर, सौंवी सिगरेट के ज़हर से बाधित, आँखें आधी मूंदे रिवॉल्विंग चेयर की पीठ से टिक गया.
 “हाँ, अब सब स्पष्ट है. उनमें जान फूंकी किरण ने. ये नई, अब तक किसी के भी द्वारा न खोजी गई, किरण है जिसका अब तक किसी के भी द्वारा अध्ययन नहीं किया गया है. पहली बात, जो स्पष्ट करनी होगी वो ये है -  क्या यह सिर्फ बिजली से प्राप्त की जाती है या  फिर इसे सूरज से भी प्राप्त किया जा सकता है,” पेर्सिकोव अपने आप से बड़बड़ा रहा था.
और एक और रात में यह भी स्पष्ट हो गया. तीन माइक्रोस्कोपों में पेर्सिकोव ने तीन किरणों को कैद किया, सूरज से उसे कुछ भी हासिल न हुआ और उसने इस तरह से स्पष्टीकरण दिया:
 “ये अनुमान लगाना होगा कि सूरज के स्पेक्ट्रम में वो नहीं है....हुम्...तो, एक लब्ज़ में, ये अनुमान लगाना होगा कि उसे केवल कृत्रिम प्रकाश से प्राप्त किया जा सकता है.” उसने ऊपर लगे मटमैले गोले की ओर प्यार से देखा, उत्साहपूर्वक कुछ सोचा और इवानोव को अपनी कैबिनेट में बुलाया. उसने उसे सब कुछ बताया और अमीबा भी दिखाए.
प्राइवेट- सहायक प्रोफेसर इवानोव भौंचक्का रह गया, पूरी तरह किंकर्तव्यविमूढ़ रह गया: इतनी मामूली सी चीज़, इस महीन तीर को अब तक किसीने कभी देखा क्यों नहीं, शैतान ले जाए! हाँ, किसी ने भी, और कम से कम उसने, इवानोव ने भी... और है तो यह बड़ी आश्चर्यजनक बात! आप ग़ौर तो कीजिए...
 “आप देखिए तो सही, व्लादीमिर इपातिच!” आँख आई-पीस से सटाए इवानोव ने ख़ौफ़ से कहा, - ये क्या हो रहा है?! वे बढ़ रहे हैं, मेरी आँखों के सामने बढ़ रहे हैं...देखिए, देखिए...”
 “मैं तीन दिनों से उन्हें देख रहा हूँ,” पेर्सिकोव ने जोश से कहा.
इसके बाद दोनों वैज्ञानिकों के बीच बातचीत हुई, जिसका सार इस प्रकार था: प्राइवेट-सहायक प्रोफेसर लैंसों और शीशों की सहायता से चैम्बर बनाएगा जिसमें इस किरण को मैग्निफाइड रूप में और माइक्रोस्कोप से बाहर प्राप्त किया जा सकेगा. इवानोव को उम्मीद है, बल्कि पूरा पूरा यक़ीन है, कि ये काफ़ी आसान काम है. व्लादीमिर इपातिच फ़िक्र न करें, किरण वह प्राप्त कर ही लेगा. यहाँ थोड़ी सी रुकावट महसूस हुई.
 “मैं, प्योत्र स्तेपानोविच, जब इस शोध को प्रकाशित करूंगा , तो इस बात का ज़रूर उल्लेख करूंगा कि चैम्बर्स को आपने सुसज्जित किया था,” पेर्सिकोव ने पुश्ती जोड़ी, ये महसूस करते हुए कि रुकावट को दूर करना चाहिए.
 “ओह, ये ज़रूरी नहीं है. ..मगर, बेशक...”
और रुकावट फ़ौरन दूर हो गई. इस पल से किरण ने इवानोव को भी पूरी तरह अपनी गिरफ़्त में ले लिया. जब क्षीण और थकावट से चूर पेर्सिकोव पूरा दिन और आधी रात माइक्रोस्कोप के पास बैठा रहता, इवानोव रोशनी से जगमगाती फिज़िक्स-लेबोरेटरी में व्यस्त रहता – लैंसों और शीशों के संयोजन में. मैकेनिक उसकी सहायता करता.
शिक्षा कमिश्नर के माध्यम से भेजे गए अनुरोध के बाद पेर्सिकोव को जर्मनी से तीन पार्सल प्राप्त हुए जिनमें विभिन्न प्रकार के लैंस थे – डबल कॉन्वेक्स,  डबल कॉन्केव, और कुछ पॉलिश किए हुए कॉन्वेक्सो-कॉन्केव मिरर्स. इस सबका परिणाम ये हुआ कि इवानोव ने चैम्बर पूरी तरह सुसज्जित कर लिया और उसमें वाक़ई में लाल किरण को कैद कर लिया. उसकी तारीफ़ करनी होगी कि उसने ये काम बड़ी ही क़ाबिलियत से किया : किरण काफ़ी मोटी थी, चार सेंटीमीटर मोटी, नुकीली और सशक्त.
पहली जून को इस चैम्बर को पेर्सिकोव की कैबिनेट में फिट कर दिया गया और उसने बड़ी उत्सुकता से किरण द्वारा प्रकाशित मेंढकों के अण्डसमूहों पर प्रयोग करना आरंभ कर दिया. इन प्रयोगों के परिणाम चौंकाने वाले थे. दो दिनों में इन अंडसमूहों से मेंढकों के हज़ारों डिम्ब बाहर निकले. मगर यह तो कम ही था, और चौबीस घंटों में डिम्ब असाधारण मेंढकों में परिवर्तित हो गए, जो इतने दुष्ट और लालची थे कि उनमें से आधों को तो फ़ौरन बाकी के आधे खा गए. इसके बाद, जीवित मेंढक तुरंत अंडसमूह उत्पन्न करने लगे, और दो ही दिनों में बिना किसी किरण-विरण के उन्होंने नई पीढ़ी उत्पन्न कर दी, और वह भी अपार, अनगिनत मेंढकों की. वैज्ञानिक की कैबिनेट में शैतान ही जाने क्या हो रहा था : डिम्ब कैबिनेट से निकल निकल कर पूरे इंस्टिट्यूट में, पिंजरों में, और फर्श पर भी रेंग रहे थे, सभी ओनों-कोनों में टर्राहट सुनाई दे रही थी जैसी दलदल में सुनाई देती है. पन्क्रात, जो पेर्सिकोव से ऐसे ख़ौफ़ खाता था मानो वह आग हो, अब उससे यूँ डरने लगा जैसे कोई मौत से डरता है. एक हफ़्ते बाद वैज्ञानिक ने ख़ुद भी महसूस किया कि वह पगला रहा है. इंस्टीट्यूट ईथर और पोटेशियम सायनाइड की गंध से भर गई थी, जिसका ज़हर पन्क्रात को ख़तम ही कर देता जिसने समय से पूर्व अपना मास्क निकाल दिया था. इस भयानक रूप से बढ़ती हुई दलदली आबादी को अनेक प्रकार के ज़हर से ख़तम कर दिया गया, सारी कैबिनेट्स में शुद्ध हवा प्रवाहित की गई.
पेर्सिकोव इवानोव से कह रहा था,
“ जानते हो, प्योत्र स्तेपानोविच, इस किरण की ड्यूटेरोप्लाज़्म और अण्डकोश पर प्रतिक्रिया चौंकाने वाली है.”
इवानोव ने, जो काफ़ी शांत और संयत स्वभाव का व्यक्ति था, असाधारण स्वर में प्रोफेसर की बात काटी:
 “ व्लादीमिर इपातिच, आप ड्यूटेरोप्लाज़्म जैसे इन छोटे छोटे विवरणों के बारे में क्या सोच रहे हैं. साफ़ साफ़ कहेंगे : आपने ऐसी चीज़ का आविष्कार किया है जिसके बारे में आज तक किसी ने सुना नहीं है.” ज़ाहिर है, काफ़ी प्रयत्नपूर्वक उसने ये शब्द कहे: - “प्रोफेसर पेर्सिकोव, आपने जीवन की किरण की खोज की है!”     
पेर्सिकोव के  बदरंग, बिना दाढ़ी किए गालों पर हल्की सी रंगत तैर गई.
 “ओह, ओह, ओह,” वह बुदबुदाया.
 “आप,” इवानोव कहता रहा, “इतना नाम कमाएँगे...मेरा तो सिर घूम रहा है. आप, समझ रहे हैं,” वह जोश में कहता रहा, “व्लादीमिर इपातिच, वेल्स के नायक तो आपके मुक़ाबले में बिल्कुल कचरा हैं...और मैं तो सोचता था कि ये सिर्फ कहानियाँ हैं...आपको उसका ‘ देवों का भोजन’ याद है?”
 “आह, ये उपन्यास है,” पेर्सिकोव ने जवाब दिया.
 “हाँ, ख़ैर, थैन्क्स गॉड, बहुत मशहूर है!...”
 “मैं भूल गया,” पेर्सिकोव ने कहा, “याद तो है कि पढ़ा था, मगर भूल गया.”

 “ऐसे कैसे याद नहीं है, हाँ, इसे देखिए,” इवानोव ने काँच की मेज़ से टांग पकड़ कर मरे हुए अकराल-विकराल मेंढक को उठाया जिसका पेट फूला हुआ था. उसके थोबड़े पर मरने के बाद भी दुष्ट भाव थे – “वाक़ई में, ये अजूबा है!”

मंगलवार, 13 अगस्त 2013

The Fateful Eggs - 2

अध्याय 2
रंगीन लहर

तो, प्रोफेसर ने बिजली का गोला जलाया और चारों ओर नज़र डाली. प्रयोग वाली लम्बी मेज़ पर रेफ्लेक्टर जलाया, सफ़ेद एप्रन पहना, मेज़ पर पड़े किन्हीं उपकरणों को खनखनाया...
सन् ’28 में मॉस्को की सड़कों पर दौड़ रहे 30 हज़ार स्वचालित वाहनों में से अधिकांश, लकड़ी के पुलों पर खड़खड़ाते हुए, गेर्त्सेन रोड़ से ही गुज़रते थे, और शोर और कर्कशता के साथ हर मिनट गेर्त्सेन से मोखोवाया जाने वाली 16, 22, 48 या 53 नंबर के रूट वाली ट्राम गाड़ी गुज़रती. अध्ययन कक्ष के आईनों में रंगबिरंगी रोशनियों की चमक बिखेरता, दूर, ऊँचाई पर क्राईस्ट-चर्च की अंधेरी और भारी-भरकम गुम्बद की बगल में कोहरे से ढंका, बदरंग चांद का हंसिया नज़र आ रहा था.
मगर न तो वो, न ही बसंत के मॉस्को का शोरगुल प्रोफेसर पेर्सिकोव का ध्यान अपनी ओर खींच रहे थे. वह तीन टांगों वाले रिवॉल्विंग स्टूल पर बैठा था और तम्बाकू के कारण भूरी हो गईं उँगलियों से शानदार ज़ैस माईक्रोस्कोप का स्क्रू घुमा रहा था, माइक्रोस्कोप के नीचे डिस्क में ताज़े अमीबा का रंगहीन प्रिपैरटिव रखा था. उस क्षण, जब पेर्सिकोव ने मैग्नोफिकेशन को 5 से बढ़ाकर 10 हज़ार किया, दरवाज़ा थोड़ा सा खुला, नुकीली दाढ़ी और चमड़े का जैकेट दिखाई दिया , और असिस्टेंट ने पुकारा:
 “व्लादीमिर इपातिच, मैंने आन्त्रयोजनी (आंत के कुछ हिस्से और उदर की थैली के बीच की झिल्ली– अनु.) खोल दी है, देखना चाहेंगे?”
अपने स्क्रू और प्रिपैरेटिव को आधे में ही छोड़कर पेर्सिकोव फुर्ती से तिपाई से उतरा और हाथों में धीरे धीरे सिगरेट घुमाते हुए असिस्टेंट की कैबिनेट में घुसा. वहाँ काँच की मेज़ पर प्रयोग वाले तख़्ते पर एक मेंढकी तनी हुई पड़ी थी, आधा दम घुटी, दर्द और डर से अधमरी; और खून से लथपथ पेट से निकाले हुए उसके पारदर्शक, चिपचिपे आंतरिक अवयव माइक्रोस्कोप के नीचे रखे थे.
 “बहुत अच्छे,” पेर्सिकोव ने कहा और अपनी आँख माइक्रोस्कोप की आईपीस पर गड़ा दी.
ज़ाहिर है कि मेंढकी की आन्त्रयोजनी में कोई बहुत ही दिलचस्प चीज़ इतनी स्पष्ट दिखाई दे रही थी, मानो सब कुछ हथेली पर रखा हो: उसकी रक्तवाहिनियों की नदियों में खून के गोले ग़ज़ब की तेज़ी से बह रहे थे. पेर्सिकोव अपने अमीबा के बारे में भूल गया और अगले डेढ़ घंटे तक बारी बारी से अपने असिस्टेंट के साथ माइक्रोस्कोप में नज़र गड़ाता रहा. इस दौरान दोनों वैज्ञानिक बड़े जोश में अपनी वैज्ञानिक भाषा में बातें भी कर रहे थे जो हम साधारण लोगों को समझ में नहीं आएंगी.
आख़िरकार पेर्सिकोव माइक्रोस्कोप से दूर हटा और उसने घोषणा कर दी:
 “खून जम रहा है, कुछ नहीं किया जा सकता.”
मेंढकी ने मुश्किल से अपना सिर हिलाया, उसकी बुझती हुई आँखों में ये शब्द स्पष्ट थे : “पूरे सुअर हो तुम, और कोई नहीं...”
अपने सुन्न हो गए पैरों को तान कर ठीक करते हुए पेर्सिकोव उठा, अपनी कैबिनेट में आया, एक जमुहाई ली, सदा सूजी रहने वाली पलकों पर उँगलियाँ फेरीं और, तिपाई पर बैठकर, माइक्रोस्कोप में देखा, उँगलियाँ उसने स्क्रू पर रखीं और उसे घुमाने ही वाला था, मगर नहीं घुमाया. अपनी दाहिनी आँख से पेर्सिकोव ने धुंधली सफ़ेद डिस्क देखी और उसमें रखे धुंधले सफ़ेद अमीबा, मगर डिस्क के बीचोंबीच विराजमान थी एक रंगीन लहर, किसी औरत के घुंघराले बाल जैसी. इस लहर को स्वयँ पेर्सिकोव और उसके सैंकडों विद्यार्थी अनेकों बार देख चुके थे, और किसी को भी उसमें कभी कोई दिलचस्पी महसूस नहीं हुई, ज़रूरत ही नहीं थी. रंगीन लहर सिर्फ़ निरीक्षण में बाधा डालती थी और यह दर्शाती थी कि प्रेपैरटिव फोकस में नहीं है. इसलिए स्क्रू के एक घुमाव से उस हिस्से को सफ़ेद रंग के प्रकाश से आलोकित करके उसे बेदर्दी से मिटा देते थे. प्राणी-शास्त्रज्ञ की लंबी लंबी उँगलियाँ स्क्रू की नॉब पर जमी हुई थीं, मगर वे एकदम थरथराईं और नीचे गिर गईं. इसकी वजह थी पेर्सिकोव की दाहिनी आँख. वह अचानक सतर्क हो गया, विस्मित हो गया, उत्तेजना से सराबोर भी हो गया. माइक्रोस्कोप के पास ये कोई मामूली हस्ती नहीं थी, जो प्रांत को मुसीबत में डालती. नहीं, ये बैठा था प्रोफेसर पेर्सिकोव! उसकी पूरी ज़िन्दगी, सारे विचार दाहिनी आँख पर केन्द्रित हो गए. पाँच मिनट तक स्तब्ध ख़ामोशी में फोकस के बाहर वाले प्रेपैरेटिव पर आँख फाड़े, उसे यातना देते हुए ऊपर का बेहतरीन जीव नीचे के निकृष्ट जीवों को देखता रहा. चारों ओर की हर चीज़ ख़ामोश थी. पन्क्रात वेस्टीब्यूल के अपने कमरे में सो चुका था, और सिर्फ एक बार दूर दरवाज़े के काँचों की हल्की सी, संगीतमय आवाज़ सुनाई दी – ये इवानोव था जो जाते हुए अपनी कैबिनेट बन्द कर रहा था. उसके पीछे प्रवेश द्वार कराहा. फिर सुनाई दी प्रोफेसर की आवाज़. वह किससे पूछ रहा था – पता नहीं:
 “ये क्या माजरा है? कुछ भी समझ नहीं पा रहा हूँ...”
देर से लौटता हुआ एक ट्रक गेर्त्सेन स्ट्रीट से गुज़रा और इंस्टीट्यूट की पुरानी दीवारों को हिला गया. मेज़ पर रखा चपटे पेंदे वाला कांच का प्याला अपने उपकरणों समेत खनखनाया. प्रोफ़ेसर का मुख पीला पड़ गया और वह माइक्रोस्कोप पर अपने हाथ ले गया, ठीक उसी तरह जैसे एक माँ अपने बच्चे के ऊपर हाथ रखती है जिस पर ख़तरा मंडरा रहा हो. अब इस बात का सवाल ही नहीं था कि प्रोफेसर स्क्रू घुमाए, ओह, नहीं, बल्कि अब वह डर रहा था कि कोई बाहरी ताक़त नज़र के दायरे से उसे हटा न दे जिसे उसने देखा था.   .                      
जब प्रोफेसर माइक्रोस्कोप के पास से हटा, और अपने सुन्न पड़ चुके पैरों पर खिड़की की ओर गया तो साफ़, सफ़ेद झक् सुबह हो चुकी थी, जो इंस्टीट्यूट की दूधिया रंग की ड्योढ़ी पर सुनहरी रोशनी का पट्टा बिखेर रही थी. उसने थरथराती उँगलियों से बटन दबाया, और काले मोटे परदों ने सुबह को ढाँक दिया, और कैबिनेट में फिर से बुद्धिमान वैज्ञानिक रात सजीव हो उठी. पीले और उत्तेजित प्रोफेसर ने अपने पैर सीधे किए और पनीली आखों को फर्श पर गड़ाते हुए बोला:
 “मगर, ये कैसे संभव है? ये तो अजूबा है!... ये अजूबा है, महाशयों,” पिंजरों में बन्द अपने टोड्स से मुख़ातिब होते हुए उसने दुहराया, मगर टोड्स सो रहे थे और उन्होंने उसे कोई जवाब नहीं दिया.
वह कुछ देर ख़ामोश रहा, फिर बिजली के स्विच की ओर गया, परदे उठा दिए, सारे लाइट्स बुझा दिए और माइक्रोस्कोप में देखा. उसके चेहरे पर तनाव के लक्षण थे, उसने अपनी कंटीली पीली भौंहों को हिलाया.
 “ऊ-हू, ऊ-हू,” वह बुदबुदाया, “गायब हो गया. समझ गया. स-S-म—झ गया,” अपने सिर के ऊपर बुझ गए बिजली के गोले की ओर देखते हुए पागल की तरह और अत्यंत उत्तेजित स्वर में शब्दों को खींचते हुए वह बोला, “बड़ा आसान है.”
और उसने फिर से सनसनाते हुए परदे गिराए, और फिर से बिजली का गोला जलाया. माइक्रोस्कोप में देखा, और खुशी से और कुछ हिंस्त्र भाव से दाँत निकाल दिए.
 “मैं उसे पकड़ लूँगा,” उँगली ऊपर उठाते हुए बड़े शानदार अंदाज़ में उसने कहा, “ पकड़ लूँगा. हो सकता कि सूरज से भी पकड़ लूँ.”
परदे फिर से शोर मचाते हुए हट गए. सूरज अब सामने था. अब उसने इन्स्टिट्यूट की दीवारों को धूप में नहला दिया और गेर्त्सेन रोड के तख़्तों पर तिरछी रोशनी बिखेरने लगा. प्रोफेसर ने खिड़की में देखा, इस बात का अंदाज़ लगाते हुए कि दिन में सूरज की स्थिति क्या होगी. वह कभी खिड़की के पास आता, कभी उससे दूर हटता, अंत में वह खिड़की की सिल पर पेट के बल लेट गया.
उसने अपने महत्वपूर्ण और गुप्त कार्य का आरंभ किया. काँच के टोप से माइक्रोस्कोप को ढाँक दिया. लैम्प की नीली लौ पर मोम पिघलाई और टोप के किनारों को मेज़ से चिपका दिया, और मोम के धब्बों को अपनी बड़ी उँगली से दबा दिया. गैस बन्द कर दी, बाहर निकला और अंग्रेज़ी ताले से कैबिनेट का दरवाज़ा बन्द कर दिया.
इन्स्टीट्यूट के कॉरीडोर्स में आधी रोशनी हो रही थी. प्रोफेसर पन्क्रात के कमरे तक पहुँचा और बड़ी देर तक उसे खटखटाता रहा. आख़िरकार दरवाज़े के पीछे से ज़ंजीर से बंधे कुत्ते जैसी गुरगुराहट, खकारने की आवाज़ और बड़बड़ाहट सुनाई दी, और टखनों पर टंके धारियों वाले नाइट पजामे में रोशनी के धब्बे में पन्क्रात प्रकट हुआ. उसकी आँखें जंगलीपन से प्रोफेसर पर टिक गईं, वह अभी तक नींद में झूम रहा था.
 “पन्क्रात,” चश्मे के ऊपर से उसकी ओर देखते हुए प्रोफेसर ने कहा, “माफ़ करना कि मैंने तुम्हें उठा दिया. बात ये है, दोस्त, कि मेरी कैबिनेट में कल सुबह कोई न जाने पाए. मैंने वहाँ अपना प्रयोग अधूरा छोड़ा है, जिसे हिलाया नहीं जा सकता. समझ गए?”
 “ऊ-ऊ-ऊ, स-स-समझ गया,” कुछ भी न समझते हुए पन्क्रात ने जवाब दिया. वह लड़खड़ा रहा था और गुरगुरा रहा था.
 “नहीं, सुन, तू जाग, पन्क्रात,” प्राणी-वैज्ञानिक ने उसे मनाते हुए कहा और हौले से पन्क्रात की पसलियों को गुदगुदा दिया, जिससे उसके चेहरे पर डर की लकीर दौड़ गई और आँखों में कुछ समझदारी का भाव आ गया.. “कैबिनेट मैंने बन्द कर दी है,” पेर्सिकोव कहता रहा, “तो, मेरे आने तक उसमें सफ़ाई करने की कोई ज़रूरत नहीं है. समझ गया?”
 “सुन रहा हूँ,” पन्क्रात भर्राई आवाज़ में बोला.
 “बढ़िया, अब जाकर सो जा.”
पन्क्रात मुड़ा, दरवाज़े में गायब हो गया और फ़ौरन पलंग पर लुढ़क गया, और प्रोफेसर वेस्टिब्यूल में अपने गरम कपड़े पहनने लगा. उसने भूरा गर्मियों वाला कोट और नरम हैट पहनी, इसके बाद, माइक्रोस्कोप वाले दृश्य को याद करके, वह अपने गलोश (ऊपरी जूता – अनु.) पहनने लगा, उसने कुछ सेकंड उनकी ओर देखा, मानो उन्हें पहली बार देख रहा हो. फिर बाँई गलोश पहनी और बाँई की ऊपर ही दाईं भी पहनने लगा, मगर वह जूते पर घुसी ही नहीं.
 “कैसा अजीब इत्तेफ़ाक है कि उसने मुझे बुलाया,” वैज्ञानिक ने कहा, “ वर्ना तो मैं इस पर ग़ौर ही नहीं करता. मगर ये किस बात का इशारा है? शैतान ही जाने कि ये इशारा किस तरफ़ है!...”
प्रोफ़ेसर मुस्कुराया, उसने अपने गलोशों की तरफ़ आँखें सिकोड़ कर देखा, और बाईं निकाल दी, और दाईं पहन ली.
 “माय गॉड! इसके परिणामों के बारे में कल्पना भी नहीं की जा सकती...” प्रोफेसर ने नफ़रत से अपनी बाईं गलोश निकाल फेंकी, जो दाएं गलोश पर चढ़ने से इनकार करके उसे गुस्सा दिला रही थी, और एक ही गलोश में बाहर के दरवाज़े की तरफ़ आया. यहाँ उसने अपना रूमाल खो दिया, और वह भारी दरवाज़े को धक्का देकर बाहर निकला. ड्योढ़ी में वह बड़ी देर तक अपनी जेबों को थपथपाकर माचिस ढूँढ़ता रहा, और उसे ढूँढ़ कर मुँह में बिना सुलगाई सिगरेट दबाए सड़क पर निकल पड़ा.
चर्च तक वैज्ञानिक को रास्ते में एक भी आदमी नहीं मिला. वहाँ प्रोफेसर ने सिर को झटका देकर, सुनहरे गुम्बद पर आँखें गड़ा दीं. सूरज बड़े प्यार से एक तरफ़ से उसे चूम रहा था.
 “मैंने उसे पहले कैसे नहीं देखा, कैसा इत्तेफ़ाक है?...फू, बेवकूफ़,” अपने अलग अलग तरह के जूतों की ओर देखते हुए प्रोफेसर झुका और सोचने लगा. “...हुँ...अब क्या करें? पन्क्रात के पास वापस लौट जाऊँ? नहीं, उसे उठाना संभव नहीं है. इस कमीनी को फेंकने में अफ़सोस हो रहा है. हाथों में ले जाना पड़ेगा.” उसने गलोश उतारी और कुछ असंतोष से उसे हाथ में ले लिया.
एक पुरानी कार में प्रेचिस्तेन्को की ओर से तीन व्यक्ति आ रहे थे. दो नशे में धुत थे, और उनके घुटनों पर बैठी थी सन् ’28 की फ़ैशन के अनुरूप सिल्क की सलवार पहनी चटकदार मेकअप में एक जवान औरत.
 “ऐख़, पापा!” वह अपनी नीची भारी आवाज़ में चिल्लाई, “क्या दूसरी गलोश बेचकर पी गए?”
 “ज़ाहिर है कि बूढ़ा ‘अल्काज़ार’ गया था,” बाईं ओर वाला शराबी चीख़ा, दाईं ओर वाले ने गाड़ी से सिर बाहर निकाला और चिल्लाया, “बाप, क्या वोल्खोन्का का नाईटक्लब खुला है? हम वहीं जा रहे हैं!”
प्रोफेसर ने चश्मे के ऊपर से उनकी ओर कड़ाई से देखा, मुँह से सिगरेट गिरा दिया और फ़ौरन उनके बारे में भूल भी गया. प्रेचिस्तेन्स्की एवेन्यू पर धूप झाँकने लगी थी, और क्राईस्ट-चर्च मानों लपटों में घिर गया हो. सूरज निकल आया था.