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शनिवार, 17 मार्च 2012

Master aur Margarita - 26.6



मास्टर और मार्गारीटा - 26.6
ख़ामोशी  काफ़ी देर तक रही, जिसे पिलात के पास लाए गए उस व्यक्ति के विचित्र व्यवहार ने ही तोड़ा. उसके चेहरे का रंग बदल गया, वह लड़खड़ाया. यदि अपने गन्दे हाथ से उसने मेज़ के किनारे को न थामा होता,  तो वह गिर ही पड़ता.
 “क्या बात है?” पिलात ने उससे पूछा.
“कुछ नहीं,” लेवी मैथ्यू ने जवाब दिया और ऐसी मुद्रा बना ली मानो कुछ निगल रहा हो. उसकी कमज़ोर, नंगी, गन्दी गर्दन  कुछ फूलकर फिर सामान्य हो गई.
 “तुम्हें हुआ क्या है, जवाब दो,” पिलात ने दुहराया. “मैं थक गया हूँ,” लेवी ने जवाब दिया और निराशा से फर्श की ओर देखने लगा.
 “बैठो,” पिलात ने उसे विनती के भाव से देखकर कुर्सी की ओर इशारा कर दिया.
लेवी ने अविश्वास से पिलात की ओर देखा, वह कुर्सी की तरफ बढ़ा. डरते-डरते उसने सुनहरे हत्थों को छुआ और फिर कुर्सी के बजाय उसके निकट ही फर्श पर बैठ गया.
“बताओ, तुम कुर्सी पर क्यों नहीं बैठे?” पिलात ने पूछा.
 “मैं गन्दा हूँ, मेरे बैठने से कुर्सी गन्दी हो जाएगी.” लेवी ने ज़मीन की ओर देखते हुए जवाब दिया.
“अभी तुम्हें कुछ खाने को देंगे.”
 “मैं खाना नहीं चाहता,” लेवी ने जवाब दिया.
 “झूठ क्यों बोलते हो?” पिलात ने शांतिपूर्वक पूछा, “तुमने पूरे दिन कुछ नहीं खाया है, शायद और भी ज़्यादा. ठीक है, मत खाओ. मैंने तुम्हें इसलिए बुलाया कि तुम्हारा चाकू देख सकूँ.”
 “जब मुझे यहाँ ला रहे थे तो सिपाहियों ने उसे छीन लिया.” लेवी ने जवाब देकर निराशापूर्वक कहा, “आप मुझे वह वापस दे दीजिए. मुझे उसे उसके मालिक को लौटाना है. मैंने उसे चुराया था.”
“किसलिए?”
 “ताकि रस्सियाँ काट सकूँ,” लेवी ने जवाब दिया.
“मार्क!” न्यायाधीश चीखा, और सेनाध्यक्ष स्तम्भों के नीचे प्रकट हुआ, “इसका चाकू मुझे दो.”
सेनाध्यक्ष ने कमर में बँधी दो म्यानों में से एक से गन्दा ब्रेड काटने वाला चाकू निकाला और न्यायाधीश को दे दिया, और स्वयँ दूर हट गया.
“चाकू लिया कहाँ से था?”
 “खेव्रोन्स्की दरवाज़े के पास वाली ब्रेड की दुकान से, जैसे ही शहर में दाखिल होते हैं...दाहिनी ओर...”
पिलात ने चौड़े फल की ओर देखा. उँगली से उसकी धार आज़माई, न जाने क्यों, और कहा, “चाकू की फिक्र मत करो, वह दुकान में लौटा दिया जाएगा. अब मुझे दूसरी बात बताओ: मुझे तुम वह बस्ता दिखाओ जिसे तुम साथ लिए घूमते हो, और जिस पर येशू के शब्द लिखे हैं!”
लेवी ने घृणा से पिलात की ओर देखा और इतनी कड़वाहट से मुस्कुराया कि उसका चेहरा विकृत हो गया.
“सब कुछ छीन लोगे? उसकी आख़िरी निशानी भी, जो मेरे पास है?” उसने पूछा.
“मैंने तुमसे यह नहीं कहा कि ‘दो!’, पिलात ने उत्तर दिया, “मैंने कहा, ‘दिखाओ!’”
लेवी ने अपने झोले में हाथ डाला और ताड़पत्र का एक टुकड़ा निकाला. पिलात ने उसे लिया, खोला, लौ के सामने रखा और आँखें सिकोड़कर आड़े-तिरछे स्याही के निशानों को समझने की कोशिश करने लगा. इन बल खाती रेखाओं को समझना कठिन था, और पिलात आँखें सिकोड़े ताड़पत्र पर झुककर रेखाओं पर उँगली फिराने लगा. आख़िरकार वह समझ गया कि ताड़पत्र किन्हीं विचारों की, कहावतों की, किन्हीं तिथियों की, कुछ निष्कर्षों की, कविताओं की असम्बद्ध लड़ी है. कुछेक पिलात पढ़ पाया: ‘मृत्यु नहीं...कल हमने मीठे बसंती खजूर खाए...’तनाव से चेहरा विकृत बनाते हुए पिलात ने आँखें सिकोड़कर आगे पढ़ा: ‘हम जीवन की स्वच्छ नदी देखेंगे...मानवता पारदर्शी काँच से सूरज देखेगी...’
यहाँ पिलात काँप गया. ताड़पत्र की अंतिम पंक्तियों में उसने पढ़ा: ‘...महान पाप...कायरता.’पिलात ने ताड़पत्र लपेट दिया और झटके से लेवी की ओर बढ़ा दिया.
“लो,” उसने कहा और कुछ देर चुप रहकर आगे बोला, “जैसा कि मैं देख रहा हूँ, तुम पढ़े-लिखे मालूम होते हो. तुम्हें बिना घर के, फटे चीथड़ों में घूमने की कोई ज़रूरत नहीं है. केसारिया में मेरा एक बहुत बड़ा वाचनालय है, मैं बहुत अमीर हूँ, और तुम्हारी सेवाएँ लेना चाहता हूँ. तुम पुराने लेखों को पढ़ोगे, समझाओगे और सम्भालकर रखोगे. खाने-पहनने की कमी न होगी.”
लेवी उठकर खड़ा हो गया और बोला, “नहीं, मैं नहीं जाना चाहता.”
“क्यों?” न्यायाधीश ने पूछा. उसका चेहरा स्याह पड़ गया था, “तुम मुझसे नफ़रत करते हो? मुझसे डरते हो?”
वही कड़वी हँसी लेवी के मुख पर छा गई. वह बोला, “नहीं, क्योंकि तुम मुझसे डरते रहोगे. उसे मार डालने के बाद मेरी ओर देखना तुम्हारे लिए आसान नहीं होगा.”
“चुप रहो,” पिलात ने कहा, “पैसे ले लो.”
लेवी ने इनकार करते हुए सिर हिलाया.
न्यायाधीश ने फिर कहा, “मैं जानता हूँ, तुम अपने आपको येशू का शिष्य समझते हो. मगर मैं तुमसे कहता हूँ, कि उसकी शिक्षा को तुम ज़रा भी नहीं समझ पाए. अगर ऐसा होता तो तुम मुझसे ज़रूर कुछ न कुछ ले लेते. याद करो, मरने से पहले उसने क्या कहा था – कि वह किसी पर भी दोष नहीं लगा रहा है,” पिलात ने अर्थपूर्ण ढंग से उँगली ऊपर उठाई, उसका चेहरा थरथराने लगा, “और वह स्वयँ भी कुछ न कुछ ज़रूर ले लेता. तुम बहुत कठोर हो, मगर वह कठोर नहीं था. तुम जाओगे कहाँ?”
लेवी अचानक मेज़ के नज़दीक आ गया. उस पर दोनों हाथ जमाकर खड़ा हो गया और जलती हुई आँखों से न्यायाधीश की ओर देखकर फुसफुसाया, “न्यायाधीश, तुम जान लो कि मैं येरूशलम में एक आदमी की हत्या करने वाला हूँ. मैं तुम्हें यह इसलिए बता रहा हूँ, ताकि तुम जान लो कि खून की नदियाँ अभी और बहेंगी.”
“मुझे भी मालूम है, कि बहेंगी,” पिलात ने जवाब दिया, “तुमने अपनी बात से मुझे ज़रा भी विस्मित नहीं किया. बेशक तुम मुझे ही मारना चाहते हो?”
“तुम्हें मारना मेरे लिए सम्भव न होगा,” लेवी ने जवाब दिया. दाँत पीसकर मुस्कुराते हुए वह आगे बोला, “मैं इतना बेवकूफ नहीं हूँ कि मैं यह भी अपने मन में लाऊँ, मगर मैं किरियाफ के जूडा के टुकड़े कर दूँगा, मेरा शेष जीवन इसी कार्य को समर्पित होगा.”
न्यायाधीश की आँखों में संतोषभरी चमक दिखाई दी, और उसने उँगली के इशारे से लेवी मैथ्यू को अपने और नज़दीक बुलाते हुए कहा, “यह तुम नहीं कर पाओगे, तुम इसके लिए परेशान भी न होना. जूडा को आज ही रात को मार डाला गया है.”
लेवी उछल पड़ा. वहशीपन से देखते हुए वह चीख पड़ा, “किसने किया है यह?”
“जलो मत, “दाँत दिखाते हुए पिलात ने जवाब दिया और उसने अपने हाथ मले, “मुझे डर है, कि तुम्हारे अलावा भी उसके कई और प्रशंसक थे.”
“यह किसने किया है?” लेवी ने फुसफुसाकर अपना सवाल दुहराया.पिलात ने उसे जवाब दिया, “यह मैंने किया है.”
लेवी का मुँह खुला रह गया. उसने वहशीपन से न्यायाधीश की ओर देखा.पिलात ने कहा, “यह जो कुछ भी मैंने किया, बहुत कम है, मगर किया है यह मैंने...” और आगे बोला, “तो, अब कुछ लोगे या नहीं?”
लेवी ने कुछ सोचकर नरम पड़ते हुए कहा, “मुझे कुछ कोरे ताड़पत्र दो.”एक घण्टा बीता. लेवी महल में नहीं था. अब उषःकालीन स्तब्धता को केवल पहरेदार के कदमों की आवाज़ ही भंग कर रही थी. चाँद शीघ्रता से बेरंग होता जा रहा था, आकाश के दूसरे छोर पर सुबह का तारा चमक रहा था. दीप कभी के बुझ चुके थे. बिस्तर पर लेटा न्यायाधीश एक हाथ गाल के नीचे रखकर गहरी नींद सोया था, बेआवाज़ साँसें ले रहा था. उसके निकट सोया था बांगा.
इस तरह निसान माह की पन्द्रहवीं तिथि की सुबह का स्वागत किया जूडिया के पाँचवें न्यायाधीश पोंती पिलात ने.
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Master aur Margarita - 26.5

मास्टर और मार्गारीटा – 26.5
 “यह आप क्या कर रहे हैं, अफ्रानी, होश में आइए, मुहर तो शायद मन्दिर की है!”
 “न्यायाधीश, इस बात से परेशान न हों, अफ्रानी ने थैली बन्द करते हुए कहा.
 “क्या आपके पास सभी तरह की मुहरें हैं?" हँसते हुए पिलात ने पूछ लिया.

“और कोई चारा ही नहीं है, न्यायाधीश,” अफ्रानी ने बड़ी संजीदगी से जवाब दिया.
 “मैं कल्पना कर सकता हूँ कि कैफ के यहाँ का तमाशा हुआ होगा.”
“हाँ, न्यायाधीश, काफी बड़ा हंगामा हुआ. उन्होंने फौरन मुझे बुला भेजा.”
अँधेरे में भी साफ दिख रहा था कि पिलात की आँखें चमक रही हैं.
“यह बहुत दिलचस्प है, दिलचस्प...”
“मुझे डर है कि मैं आपका विरोध कर रहा हूँ, न्यायाधीश, यह ज़रा भी दिलचस्प नहीं था. सबसे ज़्यादा उकताने वाला और थका देने वाला काम था. मेरे इस प्रश्न के जवाब में कि कैफ के महल से किसी को पैसा तो नहीं दिया गया, उन्होंने दृढ़ता से कहा कि ऐसा नहीं हुआ."
 “ओह, यह बात है? हो सकता है, जब कह रहे हैं कि नहीं दिया, तो शायद नहीं दिया होगा. तब तो हत्यारों को ढूँढ़ना और भी मुश्किल हो जाएगा.”
“बिल्कुल ठीक कहते हैं, न्यायाधीश.”
“हाँ, अफ्रानी, अचानक मुझे ख़याल आया कि कहीं उसने आत्महत्या तो नहीं की?”
“ओह, नहीं, न्यायाधीश!” विस्मय से कुर्सी की पीठ से टिकते हुए अफ्रानी ने जवाब दिया, “माफ कीजिए, मगर यह बिल्कुल असम्भव है!”
“आह, इस शहर में सब सम्भव है! मैं बहस करने के लिए तैयार हूँ कि कुछ देर बाद यह अफ़वाह पूरे शहर में फैल जाएगी.”
अब अफ्रानी ने अपनी विशिष्ट नज़र से न्यायाधीश की ओर देखा और सोच कर बोला, “यह तो हो सकता है, न्यायाधीश.”

ज़ाहिर था, कि न्यायाधीश किरियाफ वाले इस आदमी की हत्या के प्रश्न से दूर नहीं हटना चाह रहा था, हालाँकि सब कुछ स्पष्ट हो चुका था, और उसने कुछ खयालों में खो जाने वाले अन्दाज़ में कहा, “मैं देखना चाहता था कि उसे किस तरह मारा गया.”
“उसे बड़ी नफ़ासत से मारा गया, न्यायाधीश,” अफ्रानी ने जवाब दिया और व्यंग्य से न्यायाधीश की ओर देखने लगा.

“आपको कैसे मालूम हुआ?”
“उस थैली की ओर गौर फ़रमाइए न्यायाधीश,” अफ्रानी ने जवाब दिया, “मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, कि जूडा का खून फव्वारे की तरह उछला, लहर की तरह बहा. मैं अपनी आँखों से हत्याएँ होते हुए देख चुका हूँ, न्यायाधीश.”
“तो, बेशक, वह उठेगा नहीं?”
“नहीं, न्यायाधीश, वह उठेगा,” अफ्रानी ने मुस्कुराते हुए दार्शनिक अन्दाज़ में कहा, “जब उसके ऊपर मसीहा का बिगुल बजेगा, जिसका यहाँ सबको इंतज़ार है, मगर उससे पहले वह नहीं उठेगा!”
“बस, अफ्रानी! यह बात अब मेरी समझ में आ गई . अब दफ़न वाली बात पर आएँ.”
“मृतकों को दफ़ना दिया गया है, न्यायाधीश.”
“ओह, अफ्रानी, आप पर मुकदमा चलाना अपने आप में एक गुनाह होगा. आपको सर्वोच्च पुरस्कार मिलना चाहिए. कैसी रही दफ़न-विधि?”
अफ्रानी ने कहना शुरू किया. उसने बताया कि जब वह जूडा मामले में व्यस्त था, गुप्तचर सैनिकों की टुकड़ी सहायक के नेत्रत्व में पहाड़ी पर पहुँची. शाम हो चुकी थी. पहाड़ी पर एक शरीर नहीं मिला.
पिलात काँप गया, और भर्राई हुई आवाज़ में बोला, “आह, मैंने इस बात का अनुमान कैसे नहीं लगाया!”
“चिंता करने की कोई बात नहीं न्यायाधीश,” अफ्रानी ने कहा और बताया, “दिसमास और गेस्तास के शरीर, जिनकी आँखें जंगली पक्षियों ने निकाल ली थीं, उठा लिए गए और फ़ौरन तीसरे शरीर की तलाश शुरू हो गई. उसे फ़ौरन ढूँढ़ लिया गया. कोई आदमी...”
 “लेवी मैथ्यू...” पिलात ने प्रश्नार्थक नहीं, अपितु पुष्टि करने के अन्दाज़ में कहा.
“हाँ, न्यायाधीश...”
लेवी मैथ्यू गंजे पहाड़ की उत्तरी ढलान में स्थित एक गुफा में छिपकर अँधेरा होने का इंतज़ार कर रहा था. येशू हा-नोस्त्री का नग्न शरीर उसके साथ था. जब मशाल लिये सैनिक गुफा में पहुँचे तो लेवी घबरा गया और तैश में आ गया. वह चिल्लाया कि उसने कोई अपराध नहीं किया है, और कानून के अनुसार, हर आदमी को, यदि वह चाहे तो, अभियुक्त मृतक को दफ़नाने का पूरा अधिकार है. लेवी मैथ्यू ने कहा कि वह इस शरीर को अलग नहीं करना चाहता. वह उत्तेजित था, असम्बद्ध बातें कर रहा था, चिल्ला रहा था, कभी विनती करता, कभी धमकी देता, कभी गालियाँ...
 “क्या उसे पकड़ना पड़ा?” पिलात ने निराशा से पूछा.
“नहीं, न्यायाधीश, नहीं,” अफ्रानी ने शांत भाव से उत्तर दिया, “उस ज़िद्दी सिरफिरे को हम यह समझाकर शांत कर सके कि यह शरीर दफ़नाया जाएगा. लेवी इस बात को समझ गया, शांत हो गया, मगर उसने यह कहा कि वह कहीं नहीं जाएगा और दफ़न विधि में भाग लेगा. उसने कहा कि वह यहाँ से कहीं नहीं जाएगा, चाहे उसे मार ही क्यों न डाला जाएगा. उसने अपनी जेब से ब्रेड वाला चाकू भी निकालकर सामने कर दिया.”
“क्या उसे भगा दिया?” दबी आवाज़ में पिलात ने पूछा.
“नहीं, न्यायाधीश, नहीं. मेरे सहायक ने उसे दफ़न विधि में शरीक होने की इजाज़त दे दी..”
 “आपके किस सहायक ने इसका संचालन किया?” पिलात ने पूछा. “तोलमाय,” अफ्रानी ने जवाब दिया और कुछ चिंता के भाव से पूछा, “कहीं उसने कोई गलती तो नहीं कर दी?”
“कहते रहिए,” पिलात बोला, “कोई गलती नहीं हुई. मैं कभी-कभी भटक जाता हूँ, अफ्रानी, मेरा शायद ऐसे व्यक्ति से पाला पड़ा है, जो कभी गलती करता ही नहीं. वह व्यक्ति हैं – आप!”
“लेवी मैथ्यू को मृतकों वाली गाड़ी के साथ ले जाया गया और करीब दो घण्टॆ बाद येरूशलम के उत्तर में एक रेगिस्तानी घाटी में पहुँचे. वहाँ इस टुकड़ी ने एक गहरा गड्ढा खोदा और उसमें तीनों मृतकों को दफन कर दिया.”
“बिना कफ़न के?”
“नहीं, न्यायाधीश, गुप्तचर टुकड़ी इस काम के लिए कपड़ा ले गई थी. मृतकों की उँगलियों में अँगूठियाँ भी पहनाई गईं. येशू को एक दाँते वाली, दिसमास को दो और गेस्तास को तीन दाँते वाली. गड्ढा बन्द कर दिया गया, उस पर पत्थर रख दिए गए. उस पर बनाए पहचान वाले चिह्न का तोलमाय को ज्ञान है.”
“आह, अगर मैं यह बात सोच सकता!” पिलात ने माथे पर बल डालते हुए कहा, “मुझे कम से कम इस लेवी मैथ्यू से तो मिलना ही चाहिए था...”
“वह यहीं है, न्यायाधीश!”
पिलात की आँखें विस्मय से फटी रह गईं. उसने कुछ देर तक अफ्रानी की ओर देखा और बोला, “इस घटना से सम्बन्धित तुमने जो कुछ भी किया, उसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद. कृपया तोलमाय को कल मेरे पास भेज दें, उसे पहले से ही बता दें कि मैं उसके काम से बहुत खुश हूँ, और आपको, अफ्रानी...” अब न्यायाधीश ने मेज़ पर पड़े पट्टे की जेब से हीरे की एक अँगूठी निकालकर गुप्तचर सेवा के प्रमुख की ओर बढ़ाते हुए कहा, “यह यादगार के तौर पर मेरी ओर से भेंट!”

अफ्रानी ने झुककर अभिवादन किया और विनयपूर्ण स्वर में कहा, “मैं बहुत सम्मानित हुआ, न्यायाधीश.”
“जिस टुकड़ी ने दफ़न-विधि को पूरा किया, उसे कृपया इनाम दें. जिन खोजी टुकड़ियों ने जूडा के मामले में लापरवाही की, उसे सज़ा दीजिए और लेवी मैथ्यू को फ़ौरन मेरे पास भेजिए. मुझे येशू वाले मामले में बहुत-सी बातें उससे पूछनी हैं.” “जैसी आज्ञा, न्यायाधीश,” अफ्रानी ने कहा और वह अभिवादन करते हुए पीछे हटने लगा.
न्यायाधीश ने तालियाँ बजाकर ज़ोर से कहा, “मेरे पास आओ! यहाँ दीप जलाओ!”अफ्रानी उद्यान में जा चुका था, और पिलात की पीठ के पीछे सेवक के हाथों में दिया टिमटिमा रहा था. न्यायाधीश के सामने मेज़ पर तीन दीप रख दिए गए और तभी चाँद की रात उद्यान में सरक गई, मानो अफ्रानी उसे अपने साथ ले गया हो. अफ्रानी के स्थान पर शक्तिशाली और विशाल सेनाध्यक्ष के साथ बालकनी से एक अपरिचित व्यक्ति प्रविष्ट हुआ – छोटा और कमज़ोर. न्यायाधीश की दृष्टि पढ़कर सेनाध्यक्ष फौरन ही उद्यान में गया और आँखों से ओझल हो गया.न्यायाधीश ने इस आगंतुक को कुछ भयभीत मगर ललचाई आँखों से परखा. ऐसी नज़रों से उसे देखते हैं, जिसके बारे में काफ़ी सुन रखा हो और मानो उसके बारे में स्वयँ भी सोचते रहे हों और आक़ःइरकार वह आ ही जाए.करीब चालीस वर्षीय आगंतुक काला, चीथड़ों में लिपटा था, बदन पर सूखा कीचड़ था. वह भेड़िए जैसा, कनखियों से देख रहा था. संक्षेप में वह बिल्कुल अप्रिय प्रतीत हो रहा था. उसे देखकर कहा जा सकता था, मानो वह शहर का कोई भिखारी हो, जैसे मन्दिर की छत पर या गन्दे निचले शहर के भीड़भाड़ वाले बाज़ार में बहुतायत से दिखाई देते हैं.
क्रमशः

गुरुवार, 15 मार्च 2012

Master aur Margarita - 26.4

मास्टर और मार्गारीटा – 26.4

मार्क ने हैरत से न्यायाधीश की ओर देखा तो वह सँभल गया. नींद में बोले गए बेकार के शब्दों पर लीपा-पोती करने के लिए न्यायाधीश ने कहा, “बुरा न मानना, अंगरक्षक, मैं फिर कहता हूँ, मेरी हालत तुमसे भी बुरी है. क्या चाहते हो?”
 “गुप्तचर सेवाओं का प्रमुख आने की आज्ञा चाहता है,” मार्क ने शांति से जवाब दिया.
 “बुलाइए, बुलाइए,” खाँसते हुए, गले को साफ करके न्यायाधीश ने आज्ञा दी और नंगे पैरों को घुमाते हुए अपनी चप्पलें ढूँढ़ने लगा. रोशनी स्तम्भों पर खेल रही थी. अंगरक्षक के जूतों की ठक-ठक फर्श पर सुनाई दे रही थी. अंगरक्षक उद्यान में निकल गया.
“चाँद की रोशनी में भी मुझे चैन नहीं,” दाँत पीसते हुए अपने आप से न्यायाधीश ने कहा.
बालकनी में अंगरक्षक के बदले टोपी वाला आदमी प्रकट हुआ.
 “बांगा, छूना मत,” न्यायाधीश ने हौले से कहा और कुत्ते का सिर दबाते हुए उसे बैठा दिया.
बोलने से पहले अपनी आदत के मुताबिक अफ्रानी ने चारों ओर नज़रें घुमाकर देखा, उसने छाया में जाकर यह विश्वास कर लिया कि वहाँ बांगा के अलावा बालकनी में कोई नहीं है, फिर हौले से बोला, “प्रार्थना करता हूँ, मुझ पर मुकदमा चलाइए, न्यायाधीश! आपने ठीक कहा था. मैं किरियाफ के जूडा की रक्षा नहीं कर सका, उसे मार डाला गया है. मैं विनती करता हूँ कि मुझ पर मुकदमा चलाएँ और मुझे बर्खास्त करें.”
अफ्रानी ने महसूस किया कि उसे चार आँखें घूर रही हैं, दो कुत्ते की और दो भेड़िए की.
अफ्रानी ने कोट के नीचे से दुहरी सील से बन्द की गई खून में लथपथ थैली निकाली.
 “यह पैसों वाली थैली हत्यारे धर्मगुरू के मकान पर फेंक कर चले गए. इस थैली पर लगा हुआ खून किरियाफ के जूडा का है.”
 “कितना पैसा है, मुझे दिलचस्पी है?” पिलात ने थैली की ओर झुकते हुए पूछा.
 “तीस टेट्राडाख्म.”
न्यायाधीश हँस पड़ा और बोला, “बहुत कम है.”
अफ्रानी चुप रहा.
 “मृतक कहाँ है?”
 “यह मुझे नहीं मालूम,” शांत सम्मानजनक भाव से उस आदमी ने जवाब दिया, जो कभी भी अपनी टोपी नहीं उतारता था, “सुबह उसकी तलाश शुरू करेंगे.”
न्यायाधीश काँप गया, उसने सैण्डिल का बन्द यूँ ही छोड़ दिया, जो बाँधे नहीं बँध रहा था.
 “मगर आपको शायद मालूम है कि वह मार डाला गया है?”
इसके जवाब में न्यायाधीश को रूखा-सा जवाब मिला, “न्यायाधीश, मैं पन्द्रह साल से जूडिया में काम कर रहा हूँ. मैंने अपनी सेवा का आरम्भ वालेरी ग्रांट के समय से किया था. मुझे यह देखने के लिए शव देखने की ज़रूरत नहीं है कि आदमी की हत्या हो गई है और मैं आपको सूचना दे रहा हूँ कि वह, जिसे किरियाफ शहर के जूडा के नाम से जाना जाता है, कुछ घण्टॉं पहले मार डाला गया है.”
 “माफ़ करना, अफ्रानी,” पिलात ने जवाब दिया, “मैं अभी ठीक से जागा नहीं हूँ, इसीलिए मैंने यह सब कहा. मैं ठीक से सो नहीं पा रहा हूँ,” न्यायाधीश मुस्कुराया, “और हमेशा सपने में चाँद की रोशनी देखा करता हूँ. कल्पना कीजिए, यह कितना हास्यास्पद है. ऐसा लगता है, मानो मैं इस रोशनी में घूम रहा हूँ. तो मैं इस घटना के बारे में आपकी राय जानना चाहता हूँ. आप उसे कहाँ ढूँढ़ेंगे? बैठिए, गुप्तचर सेवा प्रमुख.”
अफ्रानी झुककर अभिवादन करके, कुर्सी बिस्तर के निकट खिसकाकर, तलवार की झँकार करते हुए बैठ गया.
 “मैं उसे गेफसिमान उद्यान के तेलियों के कोल्हू के पास ढूँढ़ना चाहता हूँ.”
 “अच्छा, अच्छा, मगर वहीं क्यों?”
 “महाबली, मेरी सूचना के अनुसार जूडा की हत्या न तो येरूशलम में हुई है और न ही उससे बहुत दूर. वह येरूशलम के निकट ही मारा गया है.”
 “मैं आपको अपने काम में बहुत प्रवीण मानता हूँ. मालूम नहीं रोम में क्या स्थिति है, मगर उपनिवेशों में तो आप जैसा कोई नहीं है. समझाइए, क्यों?”
अफ्रानी ने हौले से कहा, “मैं यह बात सोच भी नहीं सकता कि जूडा शहर की सीमा में, चहल-पहल में किसी सन्देहास्पद व्यक्तियों के हाथों में पड़ेगा. सड़क पर छिपकर मारना सम्भव नहीं है. इसका मतलब है, उसे फुसलाकर किसी तहख़ाने में ले जाया गया. मगर मेरे सैनिकों ने उसे निचले शहर में ढूँढ़ा, और ढूँढ़ ही लिया होता. मगर वह शहर में नहीं है, इस बात की मैं हामी देता हूँ. अगर उसे शहर से दूर मारा जाता तो पैसों वाली यह थैली इतनी जल्दी धर्मगुरू के घर नहीं फेंकी जाती. वह शहर के नज़दीक ही मारा गया है. उसे शहर से बाहर ले जाने में वे कामयाब हो गए.”
 “मैं समझ नहीं पा रहा, यह कैसे हुआ होगा.”
 “हाँ, न्यायाधीश, पूरी घटना में यही सबसे कठिन प्रश्न है और मैं नहीं जानता कि मैं उसे सुलझा सकूँगा या नहीं.”
 “सचमुच, पहेली ही है! त्यौहार की रात को, एक ईश्वर में विश्वास रखने वाला प्रार्थना और दावत को छोड़कर न जाने क्यों शहर से बाहर जाता है, और वहाँ ख़त्म हो जाता है. उसे कौन, कैसे फुसला सका? कहीं यह किसी औरत का काम तो नहीं है?” न्यायाधीश ने अचानक जोश से पूछ लिया.
अफ्रानी ने शांति से ज़ोर देते हुए कहा, “किसी हालत में नहीं, न्यायाधीश. यह सम्भावना तो है ही नहीं. ज़रा तर्कसंगत ढँग से देखिए. जूडा को मारने में किसे दिलचस्पी थी? कोई आवारा स्वप्नदर्शी ही हो सकता है, कोई ऐसा समूह, जिसमें कोई औरत थी ही नहीं शादी करने के न्यायाधीश, चाहिए; मानव को पृथ्वी पर लाने के लिए उनकी ज़रूरत है; मगर एक औरत की सहायता से किसी आदमी की करने के लिएतो बहुत सारे धन की आवश्यकता होती है, और किसी भी घुमक्कड़ के पास इतना धन नहीं है. इस काम में औरत थी ही नहीं, न्यायाधीश, मैं तो यह भी कहूँगा कि इस दिशा में सोचने से मैं दिशा में चलकर भूलभुलैया में पड़ जाऊँगा.”
 “मैं देख रहा हूँ कि आप एकदम सही हैं, अफ्रानी,” पिलात ने कहा, “मैं तो सिर्फ मन की बात कह रहा था.”
 “मगर, अफ़सोस, यह बात गलत है, न्यायाधीश.”
 “तो फिर, तो फिर क्या...?” न्यायाधीश उत्सुकतावश अफ्रानी के चेहरे की ओर देखते हुए चहका.
 “मैं समझता हूँ कि वही धन ही इसका कारण है.”
 “बहुत अच्छा ख़याल है! मगर शहर के बाहर रात को उसे किसने पैसे देने की बात कही होगी?”
 “ओह नहीं, न्यायाधीश, ऐसा नहीं है. मेरा सिर्फ एक ही निष्कर्ष है और यदि वह गलत है तो और कोई निष्कर्ष मैं नहीं निकाल सकता,” न्यायाधीश के निकट झुककर फुसफुसाया, “जूडा अपने धन को किसी सुनसान जगह पर छिपाना चाहता था, जिससे सिर्फ वही परिचित था.”
 “बहुत बारीकी से समझा रहे हैं. शायद ऐसा ही हुआ होगा. अब समझ रहा हूँ: उसे लोगों ने नहीं, अपने ही ख़यालों ने फुसलाया. हाँ, ऐसा ही है.”
 “हाँ, जूडा किसी का विश्वास नहीं करता था. वह पैसे लोगों से छिपा रहा था.”
 “आप कह रहे थे गेफसिमान में. मगर आप उसे वहीं क्यों ढूँढ़ना चाहते हैं – मैं स्वीकार करता हूँ कि यह बात मैं समझ नहीं पा रहा हूँ.”
 “ओह, न्यायाधीश! यह बहुत आसान है. पैसे कोई रास्तों में खुली और खाली जगहों पर तो नहीं न छिपाएगा. जूडा न तो हेब्रोन वाले रास्ते पर था, न ही बेथनी वाले. वह वृक्षों से घिरे हुए सुरक्षित स्थान पर ही रहा होगा. यह इतना आसान है. और येरूशलम के पास, गेफसिमानिया के अलावा दूसरी ऐसी जगह है ही नहीं. दूर वह जा नहीं सकता था.”
 “आपने मेरा पूरी तरह समाधान कर दिया है. तो अब क्या करना है?”
 “मैं जल्दी ही उन हत्यारों को ढूँढ़ना शुरू करूँगा, जो जूडा को शहर से बाहर फुसलाकर ले गए, और साथ ही मैं अपने आपको न्यायदेवता के अधीन करता हूँ.”
 “किसलिए?”
 “जब वह कैफ के महल से वापस आ रहा था, मेरे सैनिकों ने उसे शाम को बाज़ार में खो दिया. यह कैसे हुआ, मैं समझ नहीं पा रहा. मेरे पूरे जीवन में ऐसा कभी नहीं हुआ था. हमारी बातचीत के फौरन बाद मैंने उसे अपनी  निगरानी में ले लिया था. मगर बाज़ार से वह कहीं खिसक गया, ऐसे कि उसका नामोनिशान ही खो गया.”
 “तो यह बात है! मैं आपको बता दूँ कि आप पर मुकदमा चलाने की मैं कोई ज़रूरत नहीं समझता. आपने वह सब किया जोसम्भव था,” न्यायाधीश मुस्कुराया, “और दुनिया में कोई भी इससे अधिक और कुछ कर नहीं सकता था! खोजी दल को ही सज़ा दीजिए, जो जूडा के पीछे थे. मगर मैं आपसे कहूँगा कि यह सज़ा कठोर नहीं होनी चाहिए. आक़ःइर हमने इस बदमाश को बचाने के लिए जो सम्भव था, सब किया! हाँ, मैं पूछना भूल गया...”न्यायाधीश ने माथा पोंछते हुए कहा, “उन्होंने कैफ का पैसा वापस कैसे फेंका?”
 “देखिए, न्यायाधीश...यह इतना कठिन नहीं है. बदला लेने वाले कैफ के महल के पिछवाड़े गए, जहाँ से एक गली निकलती है. वहीं उन्होंने चारदीवारी के ऊपर से थैली फेंक दी.”  
       “चिट्ठी के साथ?”

       “हाँ, ठीक वैसा ही जैसा आपने कहा था, न्यायाधीश. हाँ, देखिए,” अफ्रानी ने थैली पर लगी
       मुहर तोड़कर उसके अन्दर की चीज़ें पिलात को दिखाईं.

                                               क्रमशः

Master aur Margarita - 26.3

 



मास्टर और मार्गारीटा 26.3


जूड़ा पीछे की ओर लड़खड़ाया और क्षीण आवाज़ में बोला, “आह!”
दूसरे आदमी ने उसका रास्ता रोका.
पहले वाले ने, जो सामने था, जूडा से पूछा, “अभी कितना मिला है? बोलो, अगर जान बचाना चाहते हो!”
जूडा के दिल में आशा जाग उठी और वह बदहवासी से किल्लाया, “तीस टेट्राडाख्मा! तीस टेट्राडाख्मा! जो कुछ भी पाया, सब यही है. ये रही मुद्राएँ! ले लीजिए, मगर मेरी जान बख़्श दीजिए.”
सामने वाले आदमी ने जूडा के हाथ से झटके से थैली छीन ली. उसी क्षण जूडा की पीठ के पीछे बिजली की गति से चाकू चमका जिसने उस प्रेमी की पसलियों पर वार किया. जूडा आगे की ओर लड़खड़ाया, और अपनी टेढ़ी-मेढ़ी उँगलियों वाले हाथ उसने ऊपर उठा दिए. सामने वाले व्यक्ति के चाकू ने जूडा को थाम लिया और उसकी मूठ जूडा के दिल में उतर गई.
 “नी... ज़ा...,” अपनी ऊँची, साफ़, जवान आवाज़ के बदले जूडा के मुँह से इतने ही शब्द एक नीची, डरी, उलाहने भरी आवाज़ में निकले और आगे वह कुछ न बोल सका. उसका शरीर पृथ्वी पर इतनी शक्ति से गिरा, कि वह गूँज उठी.
अब रास्ते पर एक तीसरी आकृति दिखाई दी. यह तीसरा कोट और टोपी पहने था.
 “आलस मत करो,” तीसरे ने आज्ञा दी. हत्यारों ने फ़ौरन थैली के साथ वह कागज़ बाँध दिया, जो उन्हें तीसरे आदमी ने दिया था. वह सब एक चमड़े के टुकड़े में रखकर उस पर डोरी बाँध दी. दूसरे ने यह पैकेट अपनी कमीज़ में रख लिया. इसके बाद दोनों हत्यारे रास्ते से दूर हटकर चले गए और ज़ैतून के वृक्षों के बीच अँधेरा उन्हें खा गया. तीसरा, मृतक के पास उकडूँ बैठकर उसके चेहरे को देखता रहा. अँधेरे में वह चेहरा चूने की तरह सफ़ेद नज़र आ रहा था और बहुत सुन्दर लग रहा था. कुछ क्षणों पश्चात् रास्ते पर कोई भी जीवित व्यक्ति नहीं रहा. निर्जीव शरीर हाथ पसारे पड़ा रहा. बायाँ पैर चाँद की रोशनी में था, जिससे उसकी चप्पल का रहबन्द साफ़ दिखाई दे रहा था.
इस समय पूरा गेफ़सिमान उद्यान पंछियों के गीतों से गूँज उठा.
जूडा को मारने वाले दोनों हत्यारे कहाँ लुप्त हो गए, किसी को नहीं मालूम. मगर तीसरे, टोपी वाले के मार्ग के बारे में हम जानते हैं रास्ता छोड़कर वह ज़ैतून के वृक्षों के झुरमुट से होता हुआ दक्षिण की ओर बढ़ा. प्रमुख द्वार से कुछ पहले वह उद्यान की दीवार फाँद गया; उसके दक्षिणी कोने में, जहाँ बड़े-बड़े पत्थर पड़े थे. शीघ्र ही वह केद्रोन के किनारे पहुँचा. फिर पानी में उतरकर कुछ देर तक चलता रहा, जब तक कि उसे दो घोड़ों के साथ एक आदमी नहीं दिखाई दिया. घोड़े भी प्रवाह में ही खड़े थे. पानी उनके पैर धोते हुए बह रहा था. साईस एक घोड़े पर बैठा और टोपी वाला उछलकर दूसरे पर बैठ गया और वे धीरे-धीरे प्रवाह में ही चलते रहे. घोड़ों के खुरों के नीचे पत्थरों के चरमराने की आवाज़ आ रही थी. फिर घुड़सवार पानी से बाहर आए, येरूशलम के किनारे पर आए और शहर की दीवार के साथ-साथ चलते रहे. यहाँ साईस अलग हो गया और घोड़े को एड़ लगाकर आँखों से ओझल हो गया. टोपी वाला घोड़ा रोककर नीचे उतरा और उस निर्जन रास्ते पर उसने अपना कोट उतारा और उसे उलट दिया; कोट के नीचे से उसने एक चपटा, बिना परों वाला शिरस्त्राण निकाल कर पहन लिया. अब घोड़े पर उछल कर सवार हुआ, फौजी वेष में, कमर में तलवार लटकाए एक सैनिक. उसने रास खींची और फ़ौजी टुकड़ी का जोशीला घोड़ा तीर की तरह सवार को चिपकाए भागा. अब रास्ता थोड़ा सा ही था – घुड़सवार येरूशलम के दक्षिणी द्वार की ओर बढ़ रहा था.
प्रवेश द्वार की कमान पर मशालों की परेशान रोशनी नाच रही थी. बिजली की गति वाली दूसरी अंगरक्षक टुकड़ी के सिपाही पत्थर की बेंचों पर बैठे चौपड़ खेल रहे थे. तीर की तरह आते फ़ौजी को देखते ही वे अपनी-अपनी जगहों से उछल पड़े, फ़ौजी ने उनकी ओर हाथ हिलाया और शहर में घुस गया.
शहर त्यौहार की चकाचौंध में डूबा था. सभी खिड़कियों में रोशनी खेल रही थी. चारों ओर से प्रार्थनाएँ गूँज रही थीं. बाहर खुलती खिड़कियों में  देखते हुए घुड़सवार कभी-कभी लोगों को पकवानों से सजी खाने की मेज़ पर देख सकता था. पकवानों में था बकरी का माँस, शराब के प्याले और कड़वी घास वाली कुछ और चीज़ें. सीटी पर कोई शांत गीत गुनगुनाते हुए घुड़सवार धीमी चाल से निचले शहर की खाली सड़कों पर चलते-चलते अंतोनियो की मीनार की ओर बढ़ा, कभी मन्दिर के ऊपर के उन पंचकोणी दीपों की ओर देखते हुए, जैसे दुनिया में और कहीं नहीं थे; या फिर चाँद को देखते हुए, जो इन पंचकोणी दीपों के ऊपर लटक रहा था.
इस त्यौहार की रात के आयोजनों में हिरोद के प्रासाद ने कोई हिस्सा नहीं लिया. दक्षिण की ओर खुलने वाले निचले कमरों में जहाँ रोम की सेना के अफ़सर और अश्वारोही टुकड़ियों के प्रमुख रखे गए थे, दीप जल रहे थे. वहाँ कुछ हलचल और जीवन के चिह्न दृष्टिगोचर हो रहे थे. सामने वाले भाग में बेमन से रह रहा महल का निवासी न्यायाधीश था. यह पूरा भाग अपने स्तम्भों और सुनहरी प्रतिमाओं समेत मानो चाँद की चमक से अन्धा हो गया था. महल के अन्दर ख़ामोशी और अन्धेरे का साम्राज्य था.
और जैसा कि न्यायाधीश ने अफ्रानी से कहा था, वह अन्दर जाना नहीं चाहता था. उसने वहीं बालकनी में ही बिस्तर लगाने की आज्ञा दी, वहीं, जहाँ उसने भोजन किया था और सुबह मुकदमा सुना था. न्यायाधीश बिस्तर पर लेटा मगर उसकी आँखों से नींद दूर थी. नंगा चाँद ऊपर साफ़ आसमान में लटक रहा था और कई घण्टों तक न्यायाधीश उस पर से आँखें न हटा सका.
करीब आधी रात को निद्रादेवी ने महाबली पर दया कर ही दी. कँपकँपाते हुए एक लम्बी जम्हाई लेकर न्यायाधीश ने अपना कोट निकालकर फेंक दिया, कमर में बँधा पट्टा खोल दिया, जिसमें खोलबन्द स्टील का चाकू लटका था, उसे बिस्तर के पास वाले आसन पर रख दिया, चप्पलें उतारीं और लेट गया. बांगा फ़ौरन उसके बिस्तर पर चढ़कर सिर के पास सिर रखकर उसकी बगल में लेट गया; न्यायाधीश ने कुत्ते की गर्दन पर हाथ रखकर अपनी आँखें बन्द कर लीं. तभी कुत्ता भी सोया.
बिस्तर आधे अँधेरे में था, स्तम्भ के कारण चाँद का प्रकाश उस पर नहीं पड़ रहा था, मगर सीढ़ियों से बिस्तर तक चाँद की रोशनी का पट्टा आ रहा था. जैसे ही न्यायाधीश ने वास्तविक जीवन की गतिविधियों से सम्बन्ध तोड़ा, वह फ़ौरन उस चमकीले रास्ते पर सीधे चाँद की ओर चलने लगा. सपने में खुशी के कारण वह मुस्कुरा रहा था, क्योंकि इस नीले-नीले रास्ते पर सब कुछ इतना अद्भुत और सुन्दर था. वह बांगा के साथ-साथ चल रहा था, और उसके साथ था वह घुमक्कड़ दार्शनिक. वे किसी जटिल और महत्त्वपूर्ण विषय पर बहस कर रहे थे, मगर कोई भी दूसरे को हरा नहीं पा रहा था. वे किसी भी बात में एक दूसरे के समान नहीं थे और इसी कारण उनकी बहस काफ़ी दिलचस्प हो गई थी और ख़त्म नहीं हो पा रही थी. ज़ाहिर था कि आज का मृत्युदण्ड सरासर बेवकूफ़ी थी – यही दार्शनिक जो एक फ़ूहड़ ख़याल की हिमायत कर रहा था, कि सभी व्यक्ति दयालु होते हैं, उसके साथ-साथ चल रहा था, जिसका मतलब यह हुआ कि वह जीवित था. इस बात का ख़याल भी कितना भयानक है कि ऐसे व्यक्ति को सूली पर चढ़ाया जा सकता है. सूली दी ही नहीं गई! बिल्कुल नहीं दी गई! चाँद तक पहुँचने की यात्रा की यही सुखद अनुभूति है.
ख़ाली समय इतना था, जितना आवश्यक था, और तूफ़ान सिर्फ शाम को ही आएगा, और कायरता सबसे भयानक पापों में से एक है. यही कहा था येशू हा-नोस्त्री ने. नहीं दार्शनिक, मैं तुमसे सहमत नहीं हूँ: यह सर्वाधिक भयानक पाप है.
उदाहरण के लिए, जब देव घाटी में मदमस्त जर्मनों ने विशालकाय क्रिसोबोय को लगभग टुकड़े-टुकड़े कर दिया था, तब जूडिया के वर्तमान न्यायाधीश और घुड़सवार टुकड़ी के भूतपूर्व प्रमुख ने कायरता नहीं दिखाई थी. मगर, मुझ पर दया करो, दार्शनिक! क्या तुम, अपनी बुद्धिमत्ता से यह नहीं समझ सकते, कि सम्राट के विरुद्ध अपराध करने वाले व्यक्ति के कारण, जूडिया का न्यायाधीश अपनी नौकरी चौपट कर देता?
 “हाँ – हाँ,” नींद में ही पिलात कराहते और सिसकियाँ लेते हुए बोला. ज़ाहिर है, चौपट कर देता. दिन में शायद वह यह करता नहीं, मगर अब रात में, सब कुछ छोड़छाड़ कर, वह नौकरी चौपट करने की बात पर उतारू था, वह सब कुछ करने को तैयार था, जिससे इस सम्पूर्ण निरपराध व्यक्ति को, इस सिरफिरे दार्शनिक और चिकित्सक को मृत्यु से बचा सके.
 “अब हम हमेशा साथ-साथ रहेंगे,” सपने में उस घुमक्कड़ दार्शनिक ने उससे कहा. न जाने कैसे वह सुनहरे भाले वाले घुड़सवार के रास्ते में खड़ा था. “यदि एक है तो इसका मतलब है कि दूसरा भी वहीं है! मुझे याद करेंगे तो फ़ौरन तुम्हें भी याद करेंगे. मुझे लावारिस के, अनजान माता-पिता की संतान के रूप में, और तुम्हें – भविष्यवेत्ता राजा और चक्की वाले की पुत्री, सुन्दरी पिला के पुत्र के रूप में.”
 “हाँ, तुम भूल न जाना, मुझे याद रखना, भविष्यवेत्ता के बेटे को,” सपने में पिलात ने प्रार्थना की और सपने में अपने साथ-साथ चलने वाले एन सारीदा के निर्धन के सिर हिलाकर स्वीकृति देने पर जूडिया का निर्दयी न्यायाधीश खुशी के मारे रो पड़ा और सपने में मुस्कुराता रहा!

यह सब बहुत अच्छा लग रहा था मगर इसी कारण महाबली की नींद का टूटना बहुत भयानक था. बांगा चाँद की ओर देखकर चिल्लाया और फिसलन भरा नीला रास्ता न्यायाधीश की आँखों से ओझल हो गया. उसने आँखें खोलीं और पहली बात जो उसे याद आई, वह यह कि दार्शनिक सूली पर चढ़ाया जा चुका था. उठते ही न्यायाधीश ने आदत के अनुसार बांगा की गर्दन को हाथ से सहलाया, तत्पश्चात् बीमार आँखों से चाँद को ढूँढ़ने लगा तो पाया कि वह कुछ किनारे की ओर हट गया है और सफ़ेद पड़ गया है. उसके प्रकाश को काटती हुई एक अप्रिय, बेचैन-सी रोशनी न्यायाधीश की आँखों के ठीक सामने बालकनी में खेल रही थी. यह मशाल थी जो क्रिसोबोय के हाथों में फड़फड़ाते हुए धुआँ उगल रही थी. उसे पकड़ने वाला भय और घृणा से उस ख़तरनाक जानवर के नज़दीक आ रहा था, जो उस पर छलाँग लगाने ही वाला था.
 “छूना मत, बांगा,” न्यायाधीश ने बीमार आवाज़ में कहा और वह खाँसा. रोशनी से बचने के लिए हाथ ऊपर उठाते हुए उसने आगे कहा, “रात में भी, चाँद के नज़दीक भी मुझे चैन नहीं है. हे भगवान! तुम्हारा कर्त्तव्य भी बड़ा अप्रिय है, मार्क! सिपाहियों का तो तुम अंग-भंग कर देते हो...”

                                                        क्रमशः