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मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

Master aur Margarita-24.5


मास्टर और मार्गारीटा – 24.5
अब खुले दरवाज़े से भागती हुए नताशा अन्दर आई, वैसी ही वस्त्रहीन, हाथ नचाती; मार्गारीटा से चिल्लाकर बोली, “खुश रहिए, मार्गारीटा निकोलायेव्ना!” उसने सिर झुकाकर मास्टर का अभिवादन किया और फिर से मार्गारीटा की ओर देखकर बोली, “मुझे तो मालूम था कि आप कहाँ जाती हैं!”
 “नौकरानियाँ सब जानती हैं” बिल्ले ने फ़ब्ती कसी और अर्थपूर्ण ढंग से पंजा हिलाते हुए बोला, “यह सोचना गलत है वे अन्धी होती हैं.”
 “तुम क्या चाहती हो, नताशा?” मार्गारीटा ने पूछा, “उस आलीशान घर में वापस लौट जाओ.”
 “मेरी जान, मार्गारीटा निकोलायेव्ना,’ नताशा ने विनती करते हुए कहा और वह घुटनों पर खड़ी हो गई, “उनसे कहिए,” उसने वोलान्द की ओर कनखियों से देखा, “कि मुझे चुडैल ही रहने दें. मैं वापस वह आलीशान भवन नहीं चाहती. न तो मैं इंजीनियर से, न ही मेकैनिक से ब्याह करूँगी! कल श्रीमान जैक ने नृत्योत्सव में मेरे सामने शादी का प्रस्ताव रखा.” नताशा ने अपनी मुट्ठी खोलकर कुछ सोने के सिक्के दिखाए.
मार्गारीटा ने प्रश्नार्थक दृष्टि से वोलान्द की ओर देखा. उसने सिर हिलाया. तब नताशा मार्गारीटा के कन्धे पर झुकी, और ज़ोर से उसे चूमकर खुशी से चिल्लाते हुए खिड़की से बाहर उड़ गई.
नताशा के स्थान पर अब निकोलाय इवानोविच दिखाई दिया. वह अपने मानव रूप में वापस आ चुका था, मगर काफी दुःखी और निराश दिखाई देता था.
 “इन्हें तो मैं काफी खुशी से यहाँ से बिदा करूँगा,” वोलान्द ने घृणा से निकोलाय इवानोविच की ओर देखते हुए कहा, “बहुत ही खुशी से, क्योंकि इनकी यहाँ कोई ज़रूरत नहीं है.”
 “मैं आपसे विनती करता हूँ, कृपया मुझे एक सर्टिफिकेट दें,” गुस्से से इधर-उधर देखते हुए और उलाहने से निकोलाय इवानोविच बोला, “यह बताते हुए कि मैंने कल का दिन कहाँ गुज़ारा.”
 “किस उद्देश्य से?” बिल्ले ने गंभीरता से पूछा.
 “पुलिस वालों को और बीवी को दिखाने के लिए,” दृढ़तापूर्वक निकोलाय इवानोविच ने कहा.
 “आमतौर से हम सर्टिफिकेट देते नहीं हैं,” बिल्ला नाक-भौं चढ़ाते हुए बोला, “मगर आप के लिए दे देंगे.”
और इससे पहले कि निकोलाय इवानोविच सँभले, निर्वस्त्र हैला टाइपराइटर पर बैठ गई, और बिल्ला उसे इमला लिखवाने लगा, “प्रमाणित किया जाता है कि इस प्रमाण-पत्र के धारक निकोलाय इवानोविच ने उक्त रात शैतान के नृत्योत्सव में गुज़ारी, जहाँ उसे एक वाहन के रूप में ले जाया गया...हैला, ब्रेकेट लगाओ! ब्रेकेट में लिखो ‘सूअर’. हस्ताक्षर – बेगेमोत.”
 “और तारीख?” निकोलाय इवानोविच फिसफिसाया.
 “तारीख नहीं डालेंगे, तारीख डालने से प्रमाण-पत्र बेकार हो जाएगा,” बिला बोला. उसने कागज़ हिलाया, कहीं से सील लाया, उस पर कायदे से फूँक मारी, उसे कागज़ पर लगाया और कागज़ निकोलाय इवानोविच की ओर बढ़ा दिया. इसके बाद निकोलाय इवानोविच ऐसे गायब हुआ, जैसे गधे के सिर से सींग. उसकी जगह प्रकट हुआ एक नया, अप्रत्याशित व्यक्ति.
 “यह और कौन आया?” वोलान्द ने हाथ से मोमबत्ती की रोशनी से बचते हुए झटके से पूछा.
वारेनूखा ने सिर लटकाया, गहरी साँस लेकर धीरे से बोला, “मुझे वापस भेज दीजिए. मैं पिशाच नहीं बन सका. उस समय मैंने हैला के साथ मिलकर रीम्स्की को मौत के मुँह में करीब-करीब भेज ही दिया था! मगर मैं खून का प्यासा नहीं हूँ. मुझे छोड़ दीजिए.”
 “यह क्या बकवास है?” वोलान्द ने माथे पर बल डालते हुए पूछा, “यह रीम्स्की कौन है? क्या गड़बड़ है?”
 “आप परेशान न हों, मालिक,” अज़ाज़ेलो बोला और वारेनूखा से मुख़ातिब हुआ, “टेलिफोन पर गुण्डागर्दी मत करना. टेलिफोन पर झूठ मत बोलना. समझ में आया? फिर कभी ऐसा तो नहीं करोगे?”
खुशी के मारे वारेनूखा पगला गया. उसका चेहरा चमक उठा. बिना यह समझे कि क्या बोल रहा है, वह बड़बड़ाने लगा, “सच्ची में...मैं, यानी कि कहना चाहता हूँ, महा...अभी खाने के बाद...” वारेनूखा ने सीने पर हाथ रखकर याचना के भाव से अज़ाज़ेलो की ओर देखा.
 “ठीक है, घर जाओ!” उसने जवाब दिया और वारेनूखा हवा में पिघल गया.
 “अब मुझे इनके साथ अकेला छोड़ दो,” वोलान्द ने मास्टर और मार्गारीटा की ओर इशारा करते हुए आज्ञा दी.
वोलान्द की आज्ञा का तुरंत पालन किया गया. कुछ देर की खामोशी के बाद वोलान्द मास्टर से मुख़ातिब हुआ.
 “तो, अर्बात के तहखाने वाले कमरे में? और लिखेगा कौन? और सपने? प्रेरणा?”
 “मेरे पास अब कोई सपना नहीं है, प्रेरणा भी नहीं है.” मास्टर ने जवाब दिया, “मुझे अब किसी चीज़ में कोई दिलचस्पी नहीं है, सिर्फ इसे छोड़कर,” उसने फिर मार्गारीटा के सिर पर हाथ रखा, “मुझे उन्होंने तोड़ दिया है, मैं उकता गया हूँ और मैं वापस तहख़ाने में जाना चाहता हूँ.”
 “और आपका उपन्यास, पिलात?”
 “मुझे नफरत है उस उपन्यास से,” मास्टर ने जवाब दिया, “उसके कारण मुझे बहुत दुख झेलना पड़ा है.”
 “मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूँ,” मार्गारीटा ने दुखी होकर कहा, “ऐसा मत कहो. तुम मुझे क्यों सता रहे हो? तुम्हें अच्छी तरह मालूम है कि तुम्हारे इस काम में मैंने अपनी सारी ज़िन्दगी दाँव पर लगा दी है.” मार्गारीटा ने अब वोलान्द की ओर मुड़कर कहा, “आप इसकी बात न सुनिए, महाशय! यह बहुत दुखी है.”
 “मगर कुछ तो लिखना ही होगा न?” वोलान्द ने कहा, “अगर आप न्यायाधीश के बारे में लिख चुके हैं, तो कम से कम इस अलोइज़ी के बारे में ही लिख डालिए...”
मास्टर मुस्कुराया.
 “उसे तो लाप्शोन्निकोवा छापेगी नहीं और फिर वह दिलचस्प भी नहीं है.”
 “मगर आप ज़िन्दा कैसे रहेंगे? भीख माँगनी पड़ सकती है.”
 “खुशी से, खुशी से,” मास्टर ने कहा और मार्गारीटा को खींचकर अपने आलिंगन में ले लिता, “वह समझ जाएगी, मुझसे दूर चली जाएगी...”
 “मैं ऐसा नहीं सोचता,” वोलान्द मुँह ही मुँह में बुदबुदाया और आगे बोला, “पोंती पिलात का इतिहास लिखने वाला आदमी तहखाने में जाएगा, इस उद्देश्य से कि वह लैम्प के पास बैठा रहे और भूखा मरे.”
मास्टर से दूर हटकर मार्गारीटा गुस्से से बोली, “मैंने वह सब किया, जो कर सकती थी. और मैंने उसके कानों में सबसे अधिक आकर्षक चीज़ के बारे में भी कहा. मगर इसने इनकार कर दिया.”
 “जो आपने उसके कान में फुसफुसाकर कहा, वह मैं जानता हूँ,” वोलान्द ने प्रतिवाद करते हुए कहा, “मगर वह आपसे ज़्यादा आकर्षक तो नहीं है. मैं आपसे कहता हूँ...” मुस्कुराते हुए उसने मास्टर से कहा, “कि आपका यह उपन्यास आपके लिए अनेक आश्चर्य लायेगा.
 “यह तो बहुत दुःख की बात है,” मास्टर ने जवाब दिया.
 “नहीं, नहीं यह दुःख की बात नहीं है,” वोलान्द बोला, “अब कोई भी दुःखद घटना नहीं घटॆगी. तो...मार्गारीटा निकोलायेव्ना, सब कुछ किया जा चुका है. आपको मुझसे कोई शिकायत है?”
 “आप कैसी बात कर रहे हैं, महाशय!”
 “तो, यह लीजिए, मेरी ओर से यादगार के तौर पर...” वोलान्द ने कहा और तकिए के नीचे से एक छोटी-सी हीरे जड़ी सोने की नाल निकाली.
 “नहीं, नहीं, नहीं, यह किसलिए!”
 “आप मुझसे बहस करना चाहती हैं?” मुस्कुराते हुए वोलान्द ने पूछा.
मार्गारीटा ने इस भेंट को रूमाल में रखकर उसकी गाँठ बाँध ली, क्योंकि उसके कोट में कोई जेब नहीं थी. तब उसे एक बात का आश्चर्य हुआ. उसने खिड़की से बाहर चाँद की ओर देखा और कहा, “एक बात मुझे समझ में नहीं आ रही...रात वही आधी की आधी ही है. शायद काफी पहले सुबह हो जानी चाहिए थी?”
 “त्यौहार की रात को कुछ देर तक खींचे रखना अच्छा लगता है!” वोलान्द ने जवाब दिया, “तो, अब मैं आपको शुभकामनाएँ देता हूँ!”
मार्गारीटा ने दोनों हाथ प्रार्थना की मुद्रा में वोलान्द की ओर बढ़ा दिए, मगर उसके निकट जाने का साहस न कर पाई और हौले से बोली, “अलबिदा! अलबिदा!”
 “फिर मिलेंगे,” वोलान्द ने जवाब दिया.
और काला कोट पहने मार्गारीटा तथा अस्पताल के कपड़ों में मास्टर जौहरी की बीवी के फ्लैट के प्रवेश-कक्ष से निकले, जहाँ मोमबत्ती जल रही थी, और जहाँ वोलान्द की मण्डली उनका इंतज़ार कर रही थी. जब प्रवेश-कक्ष से बाहर निकलने लगे, तो हैला ने सूटकेस उठाया जिसमें उपन्यास था और मार्गारीटा निकोलायेव्ना की छोटी-सी दौलत थी. बिल्ला हैला की मदद कर रहा था. फ्लैट के दरवाज़े पर कोरोव्येव ने झुककर अभिवादन किया और वह गायब हो गया. बाकी लोग सीढ़ियों तक छोड़ने आए. सीढ़ियाँ खाली थीं. जब वे तीसरी मंज़िल का मोड़ पार कर रहे थे, तो हल्की-सी खट् की आवाज़ के साथ कुछ गिरा. मगर इस ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया. छठे नंबर के प्रवेश द्वार के पास आकर अज़ाज़ेलो ने फूँक मारी. जैसे ही वे बाहर आँगन में निकले, जहाँ चाँद की रोशनी नहीं आ रही थी, उन्होंने पोर्च में एक व्यक्ति को देखा. वह जूते और टोपी पहने घोड़े बेचकर सो रहा था. पास ही एक बड़ी काली कार खड़ी थी, जिसकी बत्तियाँ बुझी हुई थीं. सामने के शीशे में एक कौए की आकृति दिखाई दे रही थी.
वे कार में बैठने ही वाले थे, तभी मार्गारीटा ने घबराकर हौले से कहा, “हे भगवान, मैंने नाल खो दी!”
 “गाड़ी में बैठिए,” अज़ाज़ेलो ने कहा, “और मेरा इंतज़ार कीजिए. मैं अभी वापस आता हूँ. ज़रा देखूँ कि माजरा क्या है.” और वह प्रवेश-द्वार से अन्दर गया.
                                              क्रमशः

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

Master aur Margarita-24.4



मास्टर और मार्गारीटा – 24.4
वोलान्द ने उस पांडुलिपि को हाथ में लिया, पलटकर देखा, एक ओर उसे रख दिया और चुपचाप, बिना मुस्कुराए मास्टर की ओर देखने लगा. मगर वह न जाने क्यों दुःख और घबराहट में डूबकर कुर्सी से उठा, और दूर चाँद की ओर देखते हुए, उँगलियाँ नचाकर कँपकँपाते हुए बड़बड़ाने लगा, “रात को चाँद की रोशनी में भी मुझे चैन नहीं है. मुझे क्यों इतना सताया गया? हे भगवान, भगवान...”
मार्गारीटा मरीज़ के गाउन को पकड़ते हुए उससे लिपट गई. वह खुद भी गम में डूबकर आँसू भरी आवाज़ में बोली, “हे भगवान, तुम पर दवा का असर क्यों नहीं हो रहा है?”
 “कोई बात नहीं, कोई बात नहीं, कोई बात नहीं,” कोरोव्येव मास्टर के निकट जाते हुए फुसफुसाया, “कोई बात नहीं, कोई बात नहीं...एक और गिलास, और मैं भी आपके साथ पिऊँगा.”
और गिलास आँखमिचौली खेलते हुए चाँद की रोशनी में चमका और इस गिलास ने अपना काम कर दिया. मास्टर को वापस उसकी जगह पर बिठा दिया. मरीज़ का चेहरा शांत हो गया.
 “हुँ, अब सब समझ में आ गया,” वोलान्द ने कहा और अपनी बड़ी उँगली से पांडुलिपि पर टकटक करने लगा.
 “एकदम साफ़ है,” बिल्ले ने पुष्टि की, वह अपना खामोश भ्रम बने रहने का वादा भूल चुका था, “अब इस षड्यंत्र की मुख्य कड़ी मैं साफ-साफ देख सकता हूँ. तुम क्या कहते हो, अज़ाज़ेलो?” वह चुपचाप अज़ाज़ेलो की ओर मुखातिब हुआ.
 “मैं कहता हूँ,” वह दबी आवाज़ में बोला, “कि तुम्हें डुबो देना अच्छा रहेगा.”
 “दया करो, अज़ाज़ेलो,” बिल्ले ने उसे जवाब दिया, “मेरे मालिक को ऐसा करने का सुझाव न देना. विश्वास करो यदि मैं हर रात तुम्हारे पास वैसे ही चाँद के कपड़े पहनकर आता, जैसे कि इस बेचारे मास्टर ने पहन रखे हैं, तुम्हें इशारे करता, तुम्हें अपने पास बुलाता तो, हे अज़ाज़ेलो, तुम्हें कैसा लगता?”
 “तो, मार्गारीटा,” वोलान्द ने बातचीत का सूत्र अपने हाथ में लेते हुए पूछा, “बताइए तो सही, कि आप क्या चाहती हैं?”
मार्गारीटा की आँखें बड़ी-बड़ी हो गईं. वह विनती करते हुए वोलान्द से बोली, “मुझे उसके साथ बात करने देंगे?”
वोलान्द ने सिर हिलाकर ‘हाँ’ कहा, तो मार्गारीटा ने मास्टर के कान से लगकर फुसफुसाते हुए कुछ कहा. साफ सुनाई दिया कि मास्टर ने कहा, “नहीं, बहुत देर हो चुकी है. मुझे ज़िन्दगी में अब कुछ नहीं चाहिए. सिवाय इसके कि तुम मेरे सामने रहो. मगर तुम्हें मैं फिर सलाह दूँगा – मुझे छोड़ दो. मेरे साथ तुम्हारा भी नुकसान होगा.”
 “नहीं, नहीं छोडूँगी,” मार्गारीटा ने जवाब दिया और वह वोलान्द की तरफ मुड़ी, “मैं प्रार्थना करती हूँ कि हमें दुबारा अर्बात वाले उसी घर में भेज दिया जाए; टेबुल पर लैम्प जलता रहे और सब कुछ वैसा ही हो जाए जैसा पहले था.”
अब मास्टर हँस पड़ा और मार्गारीटा का घुँघराले बालों वाला मुख अपने हाथों में लेकर बोला, “ओह, इस गरीब औरत की बात न सुनिए, महोदय! उस घर में कब से कोई दूसरा आदमी रहता है, और ऐसा कभी होता नहीं है कि सब कुछ वैसा ही हो जाए, जैसा पहले था.” उसने अपना गाल मार्गारीटा के सिर से सटाकर मार्गारीटा को अपनी बाँहों में भर लिया, और बड़बड़ाने लगा, “बेचारी, बेचारी...”
 “आप कहते हैं कि नहीं हो सकता?” वोलान्द ने कहा, “यह सही है. मगर हम कोशिश करेंगे...” और उसने कहा, “अज़ाज़ेलो!”
उसी समय छत से अवतीर्ण हुआ घबराया हुआ और लगभग पगला गया एक नागरिक, जिसने सिर्फ कच्छा पहन रखा था, मगर न जाने क्यों उसके हाथ में एक सूटकेस था और सिर पर थी टोपी. डर के मारे वह आदमी काँप रहा था और वह धम् से नीचे बैठ गया.
 “मोगारिच?” अज़ाज़ेलो ने उस आसमान से टपके प्राणी से पूछा.
 “अलोइज़ी मोगारिच,” उसने काँपते हुए जवाब दिया.
 “आप वही हैं, जिसने इस आदमी के उपन्यास के बारे में लिखा लातून्स्की का लेख पढ़कर उसकी यह कहते हुए शिकायत की थी कि उसने गैरकानूनी साहित्य अपने घर में छिपा रखा है?” अज़ाज़ेलो ने पूछा.
 नए आए नागरिक का बदन नीला पड़ गया और उसकी आँखों से पश्चात्ताप के आँसू बहने लगे.
 “आप इसके कमरों को हथियाना चाहते थे?” अज़ाज़ेलो ने यथासम्भव सहृदयता दिखाते हुए पूछा.
क्रोधित बिल्ले की गुर्राहट कमरे में सुनाई दी और मार्गारीटा ने बिसूरते हुए कहा, “पहचानो! चुडैल को पहचानो!” और वह अलोइज़ी मोगारिच के चेहरे पर अपने नाखून गड़ाने लगी.
एक कोहराम मच गया.
 “क्या कर रही हो?” मास्टर पीड़ा एवम् दुःख से चीखा, “मार्गो, स्वयँ को लज्जित न करो!”
 “मैं विरोध करता हूँ, यह लज्जाजनक कृत्य नहीं है,” बिल्ला गरजा.
कोरोव्येव ने मार्गारीटा को खींचकर दूर हटाया.
 “मैंने गुसलखाना बनवाया,” दाँत किटकिटाते हुए लहूलुहान मोगारिच बोला और डर के मारे कुछ और ही बोलने लगा, “एक बार पुताई...गन्धक का तेज़ाब...”
 “चलो, अच्छा ही है कि गुसलखाना बनवाया,” अज़ाज़ेलो ने उसका समर्थन करते हुए कहा, “उसे स्नान करना ही चाहिए!” और चिल्लाया, “दफ़ा हो जाओ!”
तब मोगारिच सिर के बल लटकने लगा और एक झटके से वोलान्द के शयन-कक्ष की खुली खिड़की से बाहर फेंक दिया गया.
मास्टर की आँखें फटी रह गईं, वह बुदबुदाया, “मगर यह उस हरकत से कहीं ज़्यादा साफ-सुथरा कारनामा था, जिसके बारे में इवान ने बताया था!” बिल्कुल भौंचक्का वह इधर-उधर आँखें घुमा रहा था और आखिरकार उसने बिल्ले से कहा, “माफ कीजिए...यह तुम...यह आप...” वह ठिठक गया, यह न तय कर पाया कि बिल्ले को ‘तुम’ शब्द से सम्बोधित करना चाहिए या ‘आप’ से, “आप वही बिल्ला हैं, जो ट्रामगाड़ी में बैठे थे?”
 “मैं ही हूँ,” खुश होकर बिल्ले ने पुष्टि की, और आगे बोला, “मुझे यह सुनकर बहुत अच्छा लगा कि आप बिल्ले के साथ इतनी शिष्टता से पेश आते हैं. बिल्लों को न जाने क्यों हमेशा ‘तुम’ कहकर पुकारा जाता है, हालाँकि कभी भी किसी भी बिल्ले ने किसी के भी साथ बेतकल्लुफी से जाम टकराकर नहीं पिया है.”
 “मुझे न जाने क्यों ऐसा लगता है कि आप एकदम बिल्ले नहीं हैं,” मास्टर ने दुविधा में पड़ते हुए जवाब दिया; “मुझे अस्पताल वाले किसी भी हालत में पकड़कर ले ही जाएँगे,” उसने डरते हुए वोलान्द से कहा.
 “ऐसे कैसे पकड़कर ले जाएँगे!” कोरोव्येव ने उसे धीरज देते हुए कहा, और उसके हाथों में कुछ कागज़ और कुछ किताबें दिखाई देने लगीं, “यह आपकी बीमारी का इतिहास है?”
 “हाँ.”
कोरोव्येव ने बीमारी के ‘केस-पेपर्स’ अँगीठी में झोंक दिए.
 “कागज़ात नहीं, तो आदमी भी नहीं,” संतुष्ट होकर कोरोव्येव ने कहा, “और यह आपके मकान मालिक वाले कागज़ात हैं?”
 “हाँ...आँ...”
 “इनमें किसका नाम लिखा है? अलोइज़ी मोगारिच?” कोरोव्येव ने उस पुस्तिका के पन्ने पर फूँक मारी, “फू!...वह नहीं है, गौर कीजिए, -वह था भी नहीं. अगर मकान मालिक को ताज्जुब हो, तो उससे कहिए कि उसे अलोइज़ी का सपना आया था. मोगारिच? कौन है मोगारिच? कोई मोगारिच कभी था ही नहीं.” तब वह किताब धुँआ बनकर कोरोव्येव के हाथों से उड़ गई, “और अब वह किताब है मकान मालिक की मेज़ की दराज़ में.”
 “आप सही कह रहे हैं,” मास्टर ने कोरोव्येव की हाथ की सफाई से अचम्भित होते हुए कहा, “कि जब कागज़ात ही नहीं हैं, तो आदमी भी नहीं होगा. इसीलिए तो मैं भी नहीं हूँ, मेरे पास भी कोई परिचय-पत्र इत्यादि नहीं है.”
 “मैं माफी चाहता हूँ,” कोरोव्येव चिल्लाया, “यह वाक़ई में सम्मोहन है, यह रहे आपके कागज़ात,” और कोरोव्येव ने परिचय-पत्र मास्टर की ओर बढ़ा दिया. फिर उसने इधर-उधर नज़र दौड़ाई और बड़ी मिठास से मार्गारीटा से फुसफुसाकर कहा, “और यह रही आपकी दौलत, मार्गारीटा निकोलायेव्ना,” और उसने मार्गारीटा को किनारों पर झुलसी हुई पांडुलिपि, सूखा हुआ गुलाब, फोटो, और ख़ास एहतियात के साथ, बैंक की पासबुक दी, “दस हज़ार जो आपने जमा किए थे, मार्गारीटा निकोलायेव्ना! हमें पराई चीज़ नहीं चाहिए.”
 “मेरे पंजे झड़ जाएँ, अगर मैं पराई चीज़ को हाथ लगाऊँ,” बिल्ले ने सूटकेस पर नाचते हुए इठलाते हुए कहा. वह सूटकेस पर नाच रहा था, जिससे उस दुर्दैवी उपन्यास की पांडुलिपि की सारी प्रतियाँ अच्छी तरह सूटकेस में समा जाएँ.
 “और आपका परिचय-पत्र यह रहा, “कोरोव्येव ने मार्गारीटा को कागज़ात देते हुए कहा, और फिर वोलान्द की ओर मुड़कर आदर से बोला, “सब हो गया, मालिक!”
 “नहीं, सब नहीं हुआ,” वोलान्द ने अपने ग्लोब से ध्यान हटाते हुए कहा, “मेरी प्रिय महारानी, आपकी मण्डली को कहाँ भेजने की आज्ञा देंगी? मुझे तो उसकी ज़रूरत नहीं है.”

                                                 क्रमशः

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

Master aur Margarita-24.3


मास्टर और मार्गारीटा – 24.3
 “नहीं,” मार्गारीटा ने ज़ोर देकर कहा, “मुझे मालूम है कि आपसे बातें स्पष्ट रूप से ही कहनी चाहिए, और मैं आपसे साफ-साफ कहती हूँ: मैं एक उथले विचारों वाली, भटकी हुए स्त्री हूँ. मैंने आपसे फ्रीड़ा के बारे में सिर्फ इसीलिए प्रार्थना की थी क्योंकि मैं असावधानीवश उसे गहरी उम्मीद दे बैठी. वह इंतज़ार कर रही है, महाशय; उसे मेरी सामर्थ्य में विश्वास है. अगर उसे धोखा दिया गया, तो मैं बड़ी भयंकर परिस्थिति में पड़ जाऊँगी. मुझे पूरी ज़िन्दगी चैन नहीं मिलेगा. कुछ नहीं किया जा सकता! जो होना था, सो हो गया!”
 “आह!” वोलान्द ने कहा, “यह बात समझ में आ रही है.”
 “तो आप यह करेंगे?” मार्गारीटा ने हौले से पूछा.
 “किसी हालत में नहीं,” वोलान्द ने जवाब दिया, “बात यह है, प्रिय महारानी, कि यहाँ एक छोटी-सी गड़बड़ हो गई है. हर भूत या चुडैल को अपना-अपना काम करना पड़ता है. यह बात और है कि हमारी सामर्थ्य बहुत ज़्यादा है; कुछ जागरूक लोग जितना समझते हैं, उससे कई गुना अधिक...”
 “हाँ, बहुत-बहुत ज़्यादा,” बिल्ला अपने आप को रोक नहीं सका. उसे इस सामर्थ्य पर, ज़ाहिर है, गर्व था.
 “चुप, शैतान तुझे ले जाए!” वोलान्द ने उससे कहा और मार्गारीटा की ओर देखते हुए आगे बोला, “मगर वह करने से क्या फायदा जिसे किसी दूसरी ताकत को करना होता है? तो, मैं यह नहीं करूँगा, मगर आप खुद ही इसे करेंगी.”
 “और, क्या मुझसे यह हो सकेगा?”
अज़ाज़ेलो ने व्यंग्यपूर्वक अपनी टेढ़ी आँख मार्गारीटा पर गड़ा दी और चुपके से अपना लाल सिर झटक कर मुस्कुराया.
 “हाँ, कीजिए न, क्या मुसीबत है!” वोलान्द बड़बड़ाया और, ग्लोब को घुमाकर उसमें कुछ देखने लगा. ज़ाहिर है, वह मार्गारीटा से बातें करते वक़्त कुछ और भी कर रहा था.
 “तो, फ्रीडा,” कोरोव्येव कान में फुसफुसाया.
 “फ्रीडा!” पैनी आवाज़ में मार्गारीटा चीखी.
दरवाज़ा खुल गया और बदहवास, नग्न फ्रीडा फूली-फूली आँखों से कमरे में दौड़ती आई, उसका नशा अब उतर चुका था, उसने आते ही मार्गारीटा की ओर हाथ बढ़ाए. मार्गारीटा शाही अन्दाज़ में बोली, “तुम्हें माफ किया जाता है. अब तुम्हें वह रूमाल नहीं दिया जाएगा.”
फ्रीडा की हिचकी सुनाई दी, वह ज़मीन पर गिर पड़ी और सलीब जैसी अवस्था में मार्गारीटा के सामने बिछ गई. वोलान्द ने अपना हाथ झटका, और फ्रीडा आँखों से ओझल हो गई.
 “धन्यवाद, अलबिदा,” मार्गारीटा ने कहा और वह उठने लगी.
 “तो, बेगेमोत,” वोलान्द ने बोलना शुरू किया, “उत्सव की रात को एक नासमझ व्यक्ति के बर्ताव पर ध्यान नहीं देंगे,” वह मार्गारीटा की ओर मुड़ा, “तो इसकी गिनती नहीं होगी, क्योंकि मैंने कुछ भी नहीं किया है. आप अपने लिए क्या चाहती हैं?”
खामोशी छा गई जिसे मार्गारीटा के कान में फुसफुसाते हुए कोरोव्येव ने तोड़ा, “बहुमूल्य सम्राज्ञी, इस बार मैं सलाह दूँगा, कि आप अकल से काम लें! कहीं ऐसा न हो कि सुअवसर हाथ से निकल जाए!”
 “मैं चाहती हूँ कि इसी समय, इसी क्षण मेरा प्रियतम, मास्टर मुझे लौटा दिया जाए,” मर्गारीटा ने कहा और उसके चेहरे की रेखाएँ थरथराने लगीं.
 तभी कमरे में हवा घुस आई, जिससे मोमबत्तियों की लौ लेट गई, खिड़की का भारी परदा हट गया, खिड़की फट् से खुल गई और दूर ऊँचाई पर पूरा; प्रातःकालीन नहीं, बल्कि अर्धरात्रीय चन्द्रमा दिखाई दिया. खिड़की की सिल से होकर फर्श पर रात के प्रकाश का हरा-सा रूमाल अन्दर आया, उस प्रकाश में प्रकट हुआ इवानूश्का का रात का मेहमान, जो अपने आपको मास्टर कहता था. वह अस्पताल के मरीज़ों के कपड़े पहने था – गाउन, जूते और काली टोपी, जिसे वह अपने से दूर नहीं करता था. उसका दाढ़ी बढ़ा चेहरा विकृत हावभावों से काँप रहा था. उसने पागलों जैसी घबराहट से मोमबत्तियों की रोशनी को देखा. चाँद का प्रकाश उसके चारों ओर उबल रहा था.
मार्गारेटा ने उसे फौरन पहचान लिया, वह कराही और हाथ नचाती उसके पास भागी चली आई. उसने उसके माथे को चूमा, होठों को चूमा, उसके खुरदुरे गाल से अपना चेहरा सटाया, और इतनी देर तक रोके गए आँसुओं का बाँध टूटकर अगणित धाराओं से उसके चेहरे को भिगोने लगा. वह सिर्फ एक ही शब्द दुहराती जा रही थी: “तुम...तुम...तुम...”
मास्टर ने उसे दूर धकेलते हुए कहा, “मत रोओ, मार्गो, मुझे दुःखी न करो, मैं बहुत बीमार हूँ.” उसने खिड़की की चौखट को हाथों से पकड़ लिया, मानो अभी उसमें से कूदकर भाग जाना चाहता हो. बैठे हुए लोगों को देखकर उसने दाँत पीसे और चीखा, “मुझे डर लग रहा है, मार्गो! मुझे फिर भ्रम हो गया है!”
इन हिचकियों से मार्गारीटा का दम घुटने लगा, वह अपने शब्दों पर ज़ोर दे-देकर फुसफुसाई, “नहीं, नहीं, नहीं, किसी भी चीज़ से मत डरो! मैं तुम्हारे साथ हूँ न!”
कोरोव्येव ने हौले से, चुपके से मास्टर के निकट कुर्सी खिसका दी और वह उस पर बैठ गया, और मार्गारीटा घुटने टेककर मरीज़ से लिपटी रही और शांत हो गई. अपनी इस उत्तेजना में उसे पता ही नहीं चला कि कब उसके नग्न शरीर को काले रेशमी गाउन ने ढाँक लिया था. मरीज़ ने सिर झुकाया और बीमार, निराश आँखों से धरती की ओर देखने लगा.
 “हाँ,” कुछ खामोशी के बाद वोलान्द ने कहा, “इसकी हालत बुरी कर दी है.” उसने कोरोव्येव को आज्ञा दी, “मेरे सिपहसालार, इस आदमी को कुछ पीने के लिए दो.”
मार्गारीटा ने थरथराती आवाज़ में मास्टर को मनाया, “पी जाओ, पी जाओ! तुम डर रहे हो? नहीं, नहीं, मेरा विश्वास करो, ये तुम्हारी मदद करेंगे.”
मरीज़ ने ग्लास लिया और उसमें रखी चीज़ पी गया, मगर उसका हाथ काँप रहा था और खाली ग्लास उसके पैरों के पास गिरकर टूट गया.
 “अच्छा शगुन है! अच्छा शगुन है!” कोरोव्येव मार्गारीटा के कान में फुसफुसाया, “देखिए, इसके होश वापस आ रहे हैं!”
सचमुच, मरीज़ की नज़रों में अब उतना वहशीपन और भय नहीं था.
 “मार्गो, क्या यह तुम हो?” चाँद के मेहमान ने पूछा.
 “शक मत करो, यह मैं ही हूँ,” मार्गारीटा ने जवाब दिया.
 “और!” वोलान्द ने आज्ञा दी.
दूसरा गिलास पीने के बाद मास्टर की आँखों की चमक और बुद्धिमत्ता लौट आई.
 “अब, यह बात ही और है,” वोलान्द ने आँखें सिकोड़ते हुए कहा, “चलिए, अब बात करें. आप कौन हैं?”
 “अब मैं कोई नहीं हूँ,” मास्टर ने जवाब दिया और एक व्यंग्यपूर्ण मुस्कान उसके चेहरे पर छा गई.
 “आप अभी कहाँ से आए?”
 “पागलखाने से. मैं...दिमागी मरीज़ हूँ,” आगंतुक ने जवाब दिया.
मार्गारीटा इन शब्दों को न सह सकी और फिर से रो पड़ी. फिर आँसू पोंछकर वह चीखी, “कितने भयानक शब्द हैं! भयानक! वह मास्टर है, महाशय, मैं आपको बता देती हूँ. उसे ठीक कीजिए, वह इसके लिए लायक है.”
 “क्या आप जानते हैं, कि किससे बात कर रहे हैं?” वोलान्द ने आगंतुक से पूछा, “किसके पास आए हैं?”
 “जानता हूँ,” मास्टर ने जवाब दिया, “पागलखाने में मेरा पड़ोसी था वह बच्चा, इवान बेज़्दोम्नी. उसने मुझे आपके बारे में बताया था.”
 “क्या बात है, क्या बात है!” वोलान्द बोला, “मुझे इस युवक से पत्रियार्शी तालाब पर मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था. उसने मेरी मति ही फेर दी थी, यह कहकर कि मैं हूँ ही नहीं! मगर आपको तो विश्वास है न, कि यह वास्तव में मैं ही हूँ?”
 “विश्वास करना ही पड़ेगा,” आगंतुक ने कहा, “मगर ज़्यादा अच्छा यही होगा कि आपको दिवास्वप्न का, कल्पना का चमत्कार मान लिया जाए. मैं माफी चाहता हूँ,” मास्टर ने कुछ ठहरकर आगे कहा.
 “फिर क्या, अगर यह अच्छा है, तो ऐसा ही कीजिए,” वोलान्द ने सहृदयता से जवाब दिया.
 “नहीं, नहीं,” मार्गारीटा ने डरकर कहा और उसने मास्टर का कन्धा पकड़कर उसे झकझोर दिया, “होश में आओ! तुम्हारे सामने सचमुच वही है!”
बिल्ला यहाँ भी बीच में टपक पड़ा, “और, मैं तो सचमुच भ्रम जैसा ही हूँ. चाँदनी रात में मेरे आकार-प्रकार पर गौर कीजिए,” बिल्ला चाँद की रोशनी में सरक गया और वह कुछ बोलने ही वाला था, कि उसे चुप रहने को कह दिया गया और तब वह इतना कहकर कि, “अच्छा, अच्छा चुप रहूँगा! मैं खामोश भ्रम बन जाऊँगा!” चुप हो गया.
 “अच्छा, यह तो बताइए कि मार्गारीटा आपको मास्टर क्यों कहती है?” वोलान्द ने पूछ लिया.
वह हँस पड़ा और बोला, “इस कमज़ोरी को माफ़ किया जा सकता है. इसके उस उपन्यास के बारे में ऊँचे ख़याल हैं, जिसे मैंने लिखा था.
 “किस बारे में है उपन्यास?”
 “पोंती पिलात के बारे में.”
  तभी मोमबत्तियों की लौ फिर से उछल कर, फड़फड़ाकर, प्रखर हो गई, मेज़ पर रखे बर्तन हिलने लगे, वोलान्द गड़गड़ाते हुए हँसा, मगर उसने इस हँसी से न तो किसी को डराया, और न ही आश्चर्यचकित किया. बेगेमोत ने न जाने क्यों तालियाँ बजा दीं.
 “किस बारे में, किस बारे में? किसके बारे में?” वोलान्द ने हँसी रोककर पूछा, “तो अब? यह चौंकाने वाली बात है! आपको कोई और विषय नहीं मिला? लाइए, देखें,” वोलान्द ने अपने हाथ की हथेली ऊपर की ओर उठा दी.
 “मुझे अफ़सोस है, कि मैं ऐसा नहीं कर सकता,” मास्टर ने जवाब दिया, “क्योंकि मैंने उसे अँगीठी में जला दिया है.”
 “माफ़ कीजिए, मैं इस पर विश्वास नहीं करता,” वोलान्द बोला, “ऐसा हो ही नहीं सकता. पांडुलिपियाँ कभी जलती नहीं.” वह बेगेमोत की ओर मुड़ा और बोला, “अरे, बेगेमोत, उपन्यास इधर दो.”
बिल्ला फौरन कुर्सी से उछला, और सबने देखा कि वह पांडुलिपियों के एक ऊँचे ढेर पर बैठा है. सबसे ऊपर की पांडुलिपि उसने झुककर अभिवादन करते हुए वोलान्द की ओर बढ़ा दी. मार्गारीटा काँप गई और चीख पड़ी, घबराहट से उसकी आँखों में फिर से आँसू भर आए.
 “यही है, पांडुलिपि! यही है!”
वह वोलान्द के सामने झुकी और प्रसन्नता से बोली, “सर्व शक्तिमान! सर्व शक्तिमान!”
                                                 क्रमशः

Master aur Margarita-24.2


मास्टर और मार्गारीटा – 24.2
मार्गारीटा फौरन समझ नहीं पाई, मगर समझते ही आश्चर्य से चिल्लाई, “मगर वे तो सब बन्द होते हैं!”
 “प्रिय महारानी,” कोरोव्येव ने गरजते हुए कहा, “यही तो कमाल है कि वे बन्द हैं! यही तो खास बात है! खुली चीज़ पर तो कोई भी निशाना लगा सकता है!”
कोरोव्येव ने मेज़ की दराज़ से हुकुम की सत्ती निकाली, उसे मार्गारीटा के सामने ले जाकर उँगली से किसी एक निशान को चुनने के लिए कहा. मार्गारीटा ने दाहिनी ओर ऊपर के कोने वाले चिह्न पर उँगली रख दी. हैला ने ताश का पत्ता तकिए के नीचे छुपाया और चिल्लाकर कहा, “तैयार है!”
अज़ाज़ेलो ने, जो तकिए से मुँह घुमाकर बैठा था, अपनी फ्रॉक वाली पतलून की जेब से काली स्वचालित पिस्तौल निकाली, उसकी नली कन्धे पर रखी और बिना मुड़े गोली दाग दी, जिससे मार्गारीटा के दिल में भयमिश्रित प्रसन्नता की लहर दौड़ गई. गोली लगे तकिए के नीचे से सत्ती निकाली गई. मार्गारीटा द्वारा बताए गए निशान के आरपार गोली चली गई थी.
 “जब आपके हाथ में रिवॉल्वर हो, तब मैं आपसे कभी मिलना नहीं चाहूँगी,” अज़ाज़ेलो की ओर कनखियों से देखते हुए मार्गारीटा ने शोखी से कहा. वह उन सभी लोगों को पसन्द करती थी, जो कुछ बहुत अच्छा, अजब-सा कर जाते थे.
 “बहुमूल्य महारानी,” कोरोव्येव रिरियाया, “मैं किसी को भी उससे मिलने की सलाह नहीं दूँगा, चाहे उसके हाथ में रिवॉल्वर हो या न हो! भूतपूर्व कॉयर मास्टर और अग्र-गायक का वचन है ये, कि कोई भी उससे मिलकर नमस्ते तक नहीं कहेगा.”
इस गोली चलाने के प्रसंग के दौरान बिल्ला मुँह लटकाए बैठा था. अब उसने घोषणा कर दी, “मैं इस सत्ती वाले रेकॉर्ड को तोडूँगा!” इसके जवाब में अज़ाज़ेलो ने चीखकर कुछ कहा. मगर बिल्ला ज़िद्दी था और उसने एक नहीं, दो पिस्तौलों की माँग की. अज़ाज़ेलो ने पैण्ट की पिछली जेब से दूसरा रिवॉल्वर निकाला और उसे पहले पिस्तौल के साथ, सन्देहपूर्वक मुँह बनाते हुए, शेखीमार बिल्ले की ओर बढ़ा दिया. अब सत्ती पर दो निशान तय किए गए. बिल्ले ने तकिए की ओर से मुँह फेर लिया और बड़ी देर तक तैयारी करता रहा. मार्गारीटा कानों में उँगलियाँ डालकर बैठी उस उल्लू की ओर देखती रही जो फायरप्लेस के मेंटलपीस पर बैठा ऊँघ रहा था. बिल्ले ने दोनों रिवॉल्वरों से गोलियाँ दागीं, जिसके फौरन बाद हैला चीख पड़ी, मरा हुआ उल्लू फायरप्लेस से गिर पड़ा था और चूर-चूर हुई घड़ी रुक गई थी. हैला ने, जिसका एक हाथ लहूलुहान हो गया था चीखते हुए बिल्ले की खाल पकड़ ली और वह जवाब में उसके बाल खींचने लगा. वे दोनों मेज़ से टकराते हुए फर्श पर लुढ़क गए. मेज़ पर से एक प्याला गिरकर चूर-चूर हो गया.
 “इस पागल चुडैल को मुझसे दूर हटाओ!” बिल्ला रिरिया रहा था, और हैला से छूटने की कोशिश कर रहा था, जो उस पर चढ़ गई थी. लड़ने वालों को अलग किया गया. कोरोव्येव ने हैला की ज़ख़्मी उँगली पर फूँक मारी और वह तुरंत ठीक हो गई.
 “पास में लोग बातें कर रहे होते हैं तो मैं निशाना नहीं लगा सकता!” बिल्ला चिल्लाया और अपनी खाल को ठीक करने लगा, जिसमें से पीठ की तरफ एक बड़ा रोएँ वाला हिस्सा सरक गया था.
 “मैं शर्त लगाता हूँ,” वोलान्द ने मार्गारीटा से मुस्कुराते हुए कहा, “कि उसने यह हरकत जानबूझकर की है. उसका निशाना अच्छा ही है.”
हैला ने बिल्ले से समझौता कर लिया, जिसे प्रदर्शित करने के लिए उन्होंने एक-दूसरे का चुम्बन लिया. तकिए के नीचे से ताश का पत्ता निकाला गया. जाँच की गई. अज़ाज़ेलो द्वारा लगाए गए निशाने के अलावा और कहीं भी निशाना नहीं लगा था.
 “यह नहीं हो सकता,” बिल्ले ने ज़ोर देकर कहते हुए पत्ते को झुम्बर की रोशनी में गौर से देखा.
हँसी-मज़ाक के साथ भोजन चलता रहा. झुम्बरों में मोमबत्तियाँ पिघलती जा रही थीं. अँगीठी की सूखी सुगन्ध भरी गर्माहट कमरे में फैल रही थी. पेट भर खाना खाने के बाद मार्गारीटा को एक सुखद अनुभूति हो रही थी. वह देखती रही कि कैसे अज़ाज़ेलो के सिगार से धुएँ के छल्ले निकल रहे हैं, जिन्हें बिल्ला तलवार की नोक से पकड़ने की कोशिश कर रहा है. उसे कहीं जाने की इच्छा नहीं थी, हालाँकि उसे महसूस हो रहा था कि काफ़ी देर हो चुकी है. शायद सुबह के छह बज रहे होंगे.
इस ख़ामोशी का फायदा उठाते हुए मार्गारेटा ने नम्रतापूर्वक वोलान्द से कहा, “अब मुझे आज्ञा दीजिए, मेरा वक़्त हो गया है...देर हो गई.”
 “आपको कहाँ की जल्दी है?” वोलान्द ने प्यार से मगर कुछ रुखाई से पूछा. बाकी सब चुप रहे, यह दिखाते हुए कि वे सिगार के धुएँ के छल्लों वाले खेल में मगन हैं.
 “हाँ, समय हो गया है,” इस सबसे झेंपकर मार्गारीटा बोली और वह मुड़ी, मानो अपना लबादा या रेनकोट ढूँढ़ रही हो. अचानक अपनी नग्नता से वह सकुचा गई. वह मेज़ से उठी. वोलान्द ने चुपचाप अपना गन्दा, धब्बेदार हाउस कोट उठाया और कोरोव्येव ने उसे मार्गारीटा के कन्धों पर डाल दिया.
 “धन्यवाद, महोदय,” हौले से मार्गारीटा ने कहा और प्रश्नार्थक नज़रों से वोलान्द की ओर देखने लगी. वह जवाब में बड़ी शिष्टता और उदासीनता से मुस्कुराया. मार्गारीटा के दिल को गम की काली घटा ने ढाँक लिया. उसे लगा कि उसे धोखा दिया गया है. नृत्योत्सव के दौरान अर्पित की गई सेवाओं का उसे न तो कोई इनाम मिलने वाला था और न ही कोई उसे रोकना चाह रहा था. साथ ही उसे यह भी साफ तौर से पता था कि वह यहाँ से कहीं भी नहीं जा सकती. एक ख़याल उसके दिमाग को छू गया, कि कहीं वापस अपने आलीशान घर में न जाना पड़े. और, वह उदास हो गई. क्या खुद ही निर्लज्ज होकर उस बात के बारे में पूछ ले, जिसका वादा अज़ाज़ेलो ने अलेक्सान्द्रोव्स्की पार्क में किया था? नहीं, किसी कीमत पर नहीं – उसने अपने आप से कहा.
 “आपको शुभ कामनाएँ, महोदय,” वह प्रकट में बोली, और स्वयँ अपने आप में सोचने लगी, ‘बस, यहाँ से निकल जाऊँ, फिर तो नदी में जाकर डूब मरूँगी.”
  “बैठिए तो,” अचानक आज्ञा देते हुए वोलान्द ने कहा. मार्गारीटा के चेहरे का रंग बदल गया, और वह बैठ गई.
 “शायद जाते-जाते मुझसे कुछ कहना चाहती हैं?” वोलान्द ने पूछा.
 “नहीं, कुछ नहीं, महाशय,” मार्गारीटा ने स्वाभिमानपूर्वक कहा, “बस यही कि यदि आपको अब भी मेरी ज़रूरत हो तो मैं खुशी-ख्उशी आपकी इच्छा का पालन करूँगी. मैं नृत्योत्सव में ज़रा भी नहीं थकी और मुझे बहुत मज़ा आया. मतलब, यदि वह और भी चलता रहता तो मैं खुशी-खुशी अपना घुटना आगे करती, ताकि हज़ारों जल्लाद और खूनी उसे चूम सकें,” मार्गारीटा ने वोलान्द की ओर मानो झरोखे से देखा, उसकी आँखों में आँसू भर आए.
 “सही है! आप एकदम ठीक कह रही हैं!” भयानकता से वोलान्द चिल्लाया, “ऐसा ही होना चाहिए!”
 “ऐसा ही होना चाहिए!” उसने साथियों ने इस गूँज को दुहराया. “हम आपको परख रहे थे,” वोलान्द कहता रहा, “कभी भी, कुछ भी मत माँगिए! कभी भी नहीं, कुछ भी नहीं, खासतौर से उनसे जो आपसे शक्तिशाली हैं. वे खुद ही प्रस्ताव रखेंगे और खुद ही सब कुछ दे देंगे! बैठ जाओ, स्वाभिमानी महिला!” वोलान्द ने मार्गारीटा के कन्धों से भारी-भरकम हाउसकोट खींच लिया. वह फिर से उसके निकट पलंग पर बैठी नज़र आई, “तो, मार्गो,” वोलान्द ने अपनी आवाज़ को नर्म बनाते हुए कहा, “आज आपने मेरे लिए मेज़बान का काम किया, उसके लिए आपको क्या चाहिए? नग्नावस्था में नृत्योत्सव का संचालन करने के बदले में क्या चाहती हैं? अपने घुटने की क्या कीमत लगाती हैं? मेरे मेहमानों के कारण जिन्हें अभी-अभी आपने जल्लाद और खूनी कहा, आपको क्या हानि हुई? कहिए! अब बिल्कुल निःसंकोच होकर कहिए, क्योंकि प्रस्ताव मैंने रखा है.”
मार्गारीटा का दिल ज़ोर से धड़का, एक गहरी साँस लेकर वह कुछ सोचने लगी.
 “बोलिए, बेधड़क कहिए!” वोलान्द ने उसकी हिम्मत बढ़ाई, “अपनी विचारशक्ति पर, कल्पनाशक्ति पर ज़ोर डालिए, उसे पैना कीजिए! सिर्फ उस बेहूदे, इतिहास में जमा सामंत की हत्या के वक़्त उपस्थित रहने पर ही किसी भी आदमी को पुरस्कार मिलना चाहिए, यदि वह व्यक्ति औरत हो, तो फिर बात ही क्या है. तो?”
मार्गारीटा की ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की नीचे रह गई. वह मन में सोचे गए अच्छे, बढ़िया शब्दों से अपनी बात कहने जा रही थी कि अचानक वह पीली पड़ गई. उसका मुँह खुला रह गया. आँखें बाहर निकल आईं. “फ्रीड़ा! फ्रीड़ा! फ्रीड़ा!” – किसी की चिरौरी करती-सी आवाज़ उसके कानों में गूँजने लगी, “मेरा नाम फ्रीड़ा है!” और मार्गरीटा अटकते हुए बोली, “हाँ, क्या मैं एक चीज़ के लिए प्रार्थना कर सकती हूँ?”
 “माँगिए, माँगिए, मेरी जान,” वोलान्द ने जवाब दिया, वह मानो कुछ समझते हुए मुस्कुराया, “एक चीज़ की माँग कीजिए!”
ओह, कितनी सफ़ाई और स्पष्टता से वोलान्द ने ज़ोर देकर मार्गारीटा के ही शब्द दुहरा थे, “एक चीज़!” मार्गारीटा ने फिर साँस ली और कहा, “मैं चाहती हूँ कि फ्रीड़ा को वह रूमाल देना बन्द कर दिया जाए, जिससे उसने अपने बच्चे का दम घोंट दिया था.”
बिल्ले ने आकाश की ओर आँखें उठाईं और ज़ोर से साँस ली, मगर कहा कुछ नहीं. शायद उसे नृत्योत्सव के दौरान मरोड़े गए कान की याद आ गई थी.
 “इस बात पर गौर करते हुए,” वोलान्द ने मुस्कुराते हुए कहना शुरू किया, “कि उस बेवकूफ से आपको कोई रिश्वत नहीं मिल सकती है - हालाँकि यह आपके सम्राज्ञीपद की गरिमा के विरुद्ध है – मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या किया जाए. बस, एक ही बात की जा सकती है – मेरे शयनगृह की सभी दरारें और झरोखे चीथड़े ठूँस-ठूँस कर बन्द कर दिए जाएँ.”
 “आप किस बारे में कह रहे हैं, महाशय?” मार्गारीटा ने इन असम्बद्ध शब्दों को सुनकर विस्मय से पूछा.
  “मैं पूरी तरह आपसे सहमत हूँ, मालिक,” बिल्ला बीच में टपक पड़ा, “बिल्कुल चीथड़ों से,” और उत्तेजना से बिल्ले ने मेज़ पर पंजा मारा.
 “मैं सहृदयता के बारे में कह रहा हूँ,” वोलान्द ने अपनी लाल-लाल आँख मार्गारीटा पर से हटाए बिना, अपने शब्दों को समझाते हुए कहा, “कभी-कभी एकदम अप्रत्याशित रूप से और डरते-डरते वह किसी भी बारीक-सी दरार में घुस आती है, इसीलिए मैंने चीथड़ों की बात की थी.”
 “मैं भी उसी के बारे में कह रहा था,” बिल्ले ने मार्गारीटा से दूर झुककर अपने गुलाबी क्रीम लगे तीक्ष्ण कानों को पंजों से ढाँकते हुए फ़ब्ती कसी.
 “भागो यहाँ से,” वोलान्द ने उससे कहा.
 “मैंने अभी कॉफी नहीं पी है,” बिल्ले ने जवाब दिया, “फिर मैं कैसे जा सकता हूँ, मालिक, क्या उत्सव की रात को मेहमानों को दो किस्मों में बाँटा जा सकता है? पहले प्रथम श्रेणी के, और दूसरे, जैसा कि उस निराश, सिरफिरे रेस्तराँ वाले ने बताया, दूसरी श्रेणी का ताज़ापन?”
 “चुप रहो,” वोलान्द ने उसे आज्ञा दी और मार्गारीटा की ओर मुख़ातिब होकर पूछा, “आप, ऐसा लगता है, बहुत दयालु व्यक्ति हैं? ऊँचे सिद्धांतों वाली व्यक्ति?”
                                                   क्रमशः