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रविवार, 26 अगस्त 2012

Discussion on Master&Margarita(Hindi) - 17


अध्याय 17

आपको याद होगा कि वेरायटी में काले जादू के ‘शो’ के बाद सैकड़ों निर्वस्त्र महिलाएँ सादोवाया स्ट्रीट पर दौड़ती नज़र आई थीं – उनके कपड़े तो उन्होंने फागोत की फर्म को दे दिए थे और स्वयँ फर्म द्वारा दिए गए आधुनिक फैशन के कपड़े पहन लिए थे;

रीम्स्की की वारेनूखा से मुठभेड़ हो गई थी जो हरी आँखों वाली नग्न महिला के साथ मिलकर उसे मारने की कोशिश कर रहा था – वह मुर्गे की बदौलत ही बच पाया था!

चलिए, देखते हैं कि उन करेंसी नोटों का क्या हुआ जो हॉल में तैरते हुए आए थे और जिन्हें पब्लिक ने लपक लिया था.
जैसा कि पोस्टर्स में लिखा गया था, काले जादू का ‘शो’ दो दिनों तक होने वाला था, इसलिए वेरायटी के बाहर टिकट के लिए लम्बी लम्बी दो कतारें खड़ी थीं.
शुक्रवार का दिन था.
जैसा कि हम जानते हैं, वेरायटी के सारे अधिकारी ग़ायब हो गए थे...रीम्स्की, स्त्योपा लिखोदेयेव, वारेनूखा; और जो इकलौता अफ़सर वहाँ उपस्थित था वह था रोकड़िया वासिली स्तेपानोविच लास्तोच्किन.
वेरायटी के अन्दर परेशानी बढ़ती ही जा रही थी, लोग लगातार फोन करके पूछ रहे थे कि अधिकारी कहाँ हैं. रीम्स्की की पत्नी रोते-रोते तीर की तरह घुसी और विनती करने लगी कि उसके पति को ढूँढ़ निकाला जाए...
कोई अविश्वसनीय-सी चीज़ हो गई थी...पुलिस ने इस लफ़ड़े वाले ‘शो’ के बारे में पूछताछ आरम्भ कर दी...
जादूगर कौन था? कहाँ से आया था? उसका नाम क्या था? कोई नहीं जानता था. जब किसीने कहा कि उसका नाम वोलान्द या फोलान्द था, तो विदेशियों के ब्यूरो में पूछताछ की गई. उन्हें किसी वोलान्द या फिर फोलान्द के बारे में कोई जानकारी नहीं थी;
पोस्टर्स थे? थे तो सही, मगर रातों-रात उन पर नए पोस्टर्स चिपका दिए गए थे और अब दफ़्तर में एक भी पोस्टर उपलब्ध नहीं था;
इस ‘शो’ की इजाज़त किसने दी थी? जादूगर को अग्रिम राशि किसने दी थी? इस लेन-देन से सम्बन्धित कागज़ात कहाँ हैं? कुछ भी उपलब्ध नहीं था.
पत्रवाहक लड़के कार्पोव ने बताया कि जादूगर शायद स्त्योपा के फ्लैट में रुका था, वे वहाँ भी गए: स्त्योपा तो पहले ही गायब हो चुका था; उसकी नौकरानी ग्रून्या भी ग़ायब हो गई थी; और तो और हाऊसिंग सोसायटी के प्रमुख गायब हो गए थे; सेक्रेटरी भी ग़ायब हो गया था.
एक खोजी कुत्ते को रीम्स्की के कमरे में ले जाया गया...वह गुर्राने लगा, खिड़की पर चढ़ गया, वहशियाना ढंग से चिल्लाते हुए खिड़की से बाहर कूदने की कोशिश करने लगा...फिर वह टैक्सी स्टैण्ड की ओर भागा और वहाँ जाकर उसकी जाँच का सिरा टूट गया...
वेरायटी के गेट पर एक बड़ा-सा नोटिस लगा दिया गया कि कुछ दिनों तक कोई ‘शो’ नहीं होगा...भीड़ अप्रसन्नता से बिखर गई; फिर उन्होंने वासिली स्तेपानोविच को कल के ‘शो’ से प्राप्त 21,711 रुबल्स मनोरंजन कमिटी के दफ़्तर में जमा करने के लिए कहा.   

वासिली स्तेपानोविच ने उन नोटों को बैग में रखा और हिदायतों को ध्यान में रखते हुए टैक्सी से जाने का निश्चय किया. जैसे ही वहाँ खड़ी तीन टैक्सियों के चालकों ने हाथ में फूली हुई बैग लिए टैक्सी स्टैण्ड की ओर लपककर आते हुए मुसाफिर को देखा, तीनों के तीनों न जाने क्यों उसकी ओर गुस्से से देखते हुए अपनी गाड़ियों के साथ वहाँ से रफूचक्कर हो गए. एक टैक्सी ड्राइवर ने, जो कहीं से आ रही थी, मुसाफिर से गुस्से से पूछा कि उसके पास छुट्टे पैसे हैं या नहीं और जब वासिली स्तेपानोविच ने उसे 2-3 रुबल्स के नोट दिखाए तब कहीं जाकर वासिली स्तेपानोविच टैक्सी में बैठ सका.
 “क्या चिल्लर नहीं है?” रोकड़िए ने नर्मी से पूछा.
 “पूरी जेब भरी है चिल्लर से!” चालक दहाड़ा और सामने के नन्हे-से आईने में उसकी खून बरसाती आँखें दिखाई दीं, - “ये तीसरा हादसा हुआ आज मेरे साथ. औरों के साथ भी ऐसा ही हुआ. किसी एक सूअर के बच्चे ने दस का नोट दिया और मैंने उसे चिल्लर थमाई – साढ़े चार रूबल्स...उतर गया, बदमाश! पाँच मिनट बाद देखता क्या हूँ कि दस के नोट के बदले है, नरज़ान की बोतल का लेबल!” ड्राइवर ने कुछ न छापने योग्य शब्द कहे. दूसरी बार हुआ ज़ुब्बास्का के पास. दस का नोट! तीन रूबल्स की चिल्लर वापस की. चला गया! मैंने अपनी जेब में हाथ डाला, वहाँ एक बरैया ने मेरी उँगली में काट लिया! और दस का नोट नहीं है! ओ...ह!” चालक ने फिर कुछ न छापने योग्य गालियाँ दीं, “कल इस वेरायटी में (असभ्य शब्द) किसी एक गिरगिट के बच्चे ने दस के नोटों का करिश्मा दिखाया था (असभ्य गाली).”
रोकडिए को मानो साँप सूँघ गया. उसने ऐसा ज़ाहिर किया मानो ‘वेरायटी’ शब्द पहली बार सुन रहा हो, और सोचने लगा, ‘तो यह बात है, भुगतो...’
तो यह हश्र हुआ उन नोटों का जिनकी बरसात वेरायटी में हुई थी.
जब वासिली स्तेपानोविच मनोरंजन कमिटी के दफ़्तर में पहुँचा तो देखा कि वहाँ भगदड़ मची हुई थी.
मनोरंजन कमिटी के प्रमुख की सेक्रेटरी बिसूर रही थी; एक बड़ी लिखने की मेज़ के पीछे एक खाली सूट कुर्सी में बैठकर सूखी कलम से लगातार लिखे जा रहा था. कॉलर के ऊपर किसी की न तो गर्दन थी, न ही सिर; आस्तीनों से कलाइयाँ भी नहीं दिखाई दे रही थीं..
सेक्रेटरी ने उसे बताया:
    “ज़रा सोचिए, मैं बैठी हूँ,” परेशान अन्ना रिचार्दोव्ना रोकड़िए की बाँह पकड़कर सुनाने लगी, “और कमरे में घुसा बिल्ला, काला, हट्टा-कट्टा मानो बिल्ला नहीं हिप्पोपोटॆमस हो. मैंने उसे ‘शुक-शुक!’ कहा, वह बाहर भाग गया, फिर कमरे में घुसा बिल्ले जैसे मुँह वाला एक मोटा आदमी और बोला, “तो, मैडम, आप मेहमानों से ‘शुक-शुक!’ कहती हैं? वह बेशरम सीधा प्रोखोर पेत्रोविच के कमरे में घुसने लगा. मैं चिल्ला रही थी: ”क्या पागल हो गए हो?” और वह दुष्ट सीधा कमरे में घुसकर प्रोखोर पेत्रोविच के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया. और वह...सहृदय आदमी है, मगर जल्दी घबरा जाता है, भड़क उठा! मैं बहस नहीं करूँगा. भेड़िए की तरह काम करने वाला, कुछ जल्दी परेशान होने वाला, भड़क उठा: “आप ऐसे कैसे बिना सूचना दिए अन्दर घुस आए?” और वह ढीठ आदमी बेशरमी से मुस्कुराते हुए कुर्सी पर जम गया और बोला, “मैं आपसे काम के बारे में बात करने आया हूँ.” प्रोखोर पेत्रोविच ने गुस्से से कहा, “मैं व्यस्त हूँ!” और सोचो, वह बोला, “आप ज़रा भी व्यस्त नहीं हैं...” हाँ? अब प्रोखोर पेत्रोविच आपे से बाहर हो गया और चीखा, “ये क्या मुसीबत है? इसे यहाँ से ले जाओ, काश मुझे शैतान उठा लेता!” और वह बोला, “शैतान उठा ले? यह तो हो सकता है!” और झन् से हुआ, मैं चीख भी न सकी, देखती क्या हूँ: वह नहीं है...वह...बिल्ले से चेहरे वाला...और यह...सूट यहाँ बैठा है...हे-हे-हे!!!”
अन्ना रिचार्दोव्ना के होठ, दाँत सब गड्डमड्ड हो गए और वह भें...S...S...S--- करके रोने लगी.
वासिली स्तेपानोविच इस दफ़्तर से बाहर भागा और मनोरंजन कमिटी के दफ़्तर की शाखा में गया जो वहाँ से कुछ ही दूर स्थित थी.
वहाँ भी, पूरी तरह बदहवासी छाई थी...
लोग गाये जा रहे थे...बिना रुके...अपनी इच्छा के विरुद्ध...मगर एक अनुशासनबद्ध, सूत्रबद्ध तरीके से, मानो कोई उनका निर्देशन कर रहा हो. और रोकड़िए को पता चला कि ऐसा क्यों हो रहा है:
 “माफ़ करना, मैडम,” वासिली स्तेपानोविच अचानक लड़की से पूछ बैठा, “आपके पास काला बिल्ला तो नहीं आया?”
 “कैसा बिल्ला? कहाँ का बिल्ला?” गुस्से में लड़की चीखी, “गधा बैठा है हमारे ऑफिस में, गधा!” और उसने आगे पुश्ती जोड़ी, “सुनता है तो सुने! मैं सब कुछ बता दूँगी” – और उसने वास्तव में सब कुछ बता दिया.

बात यह थी कि शहर की इस मनोरंजन शाखा के प्रमुख को, जिसने सब कुछ गुड़-गोबर कर दिया था (लड़की के शब्दों में), शौक चर्राया अलग-अलग मनोरंजन कार्यक्रम सम्बन्धी गुट बनाने का.
 “प्रशासन की आँखों में धूल झोंकी!” लड़की दहाड़ी.
इस साल के दौरान उसने लेरमेन्तोव का अध्ययन करने के लिए, शतरंज, तलवार, पिंग-पांग और घुड़सवारी सीखने के लिए गुट बनाए. गर्मियों के आते-आते नौकाचलन और पर्वतारोहण के लिए भी गुट बनाने की धमकी दे दी. 
 “और आज, दोपहर की छुट्टी के समय वह अन्दर आया, और अपने साथ किसी घामड़ को हाथ पकड़कर लाया,” लड़की बताती रही, “न जाने वह कहाँ से आया था – चौख़ाने की पतलून पहने, टूटा चश्मा लगाए, और...थोबड़ा ऐसा जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता!”
और इस आगंतुक का, लड़की के अनुसार, सभी भोजन कर रहे कर्मचारियों से यह कहकर परिचय कराया गया कि वह कोरस आयोजन करने की कला का विशेषज्ञ है.
संभावित पर्वतारोहियों के चेहरे उदास हो गए, मगर प्रमुख ने तत्क्षण सभी को दिलासा दिया. इस दौरान वह विशेषज्ञ मज़ाक करता रहा, फ़िकरे कसता रहा और कसम खाकर विश्वास दिलाता रहा कि समूहगान में समय काफ़ी कम लगता है और उसके फ़ायदे अनगिनत हैं.
लड़की के अनुसार पहले उछले फानोव और कोसार्चुक, इस दफ़्तर के सबसे बड़े चमचे, यह कहकर कि वे पहले नाम लिखवा रहे हैं. अब बाकी लोग समझ गए कि इस ग्रुप को रोकना मुश्किल है, लिहाज़ा सभी ने अपने-अपने नाम लिखवा दिए. यह तय किया गया कि गाने की प्रैक्टिस दोपहर के भोजन की छुट्टी के समय की जाएगी, क्योंकि बाकी का सारा समय लेरमेन्तोव और तलवारों को समर्पित था. प्रमुख ने यह दिखाने के लिए कि उसे भी स्वर ज्ञान है, गाना शुरू किया और आगे सब कुछ मानो सपने में हुआ. चौखाने वाला समूहगान विशेषज्ञ दहाड़ा:
 “सा-रे-ग-म!” गाने से बचने के लिए अलमारियों के पीछे छिपे लोगों को खींच-खींचकर बाहर निकाला. कोसार्चुक से उसने कहा कि उसकी सुर की समझ बड़ी गहरी है; दाँत दिखाते हुए सबको बूढ़े संगीतज्ञ का आदर करने के लिए कहा, फिर उँगलियों पर ट्यूनिंग फोर्क से खट्-खट् करते हुए वायलिन वादक से ‘सुन्दर सागर’ बजाने के लिए कहा.
वायलिन झंकार कर उठा. सभी बाजे बजने लगे...खूबसूरती से. चौख़ाने वाला सचमुच अपनी कला में माहिर था. पहला पद पूरा हुआ. तब वह विशेषज्ञ एक मिनट के लिए क्षमा माँगकर जो गया...तो गायब हो गया. सबने सोचा कि वह सचमुच एक मिनट बाद वापस आएगा. मगर वह दस मिनट बाद भी वापस नहीं लौटा. सब खुश हो गए, यह सोचकर कि वह भाग गया.
और अचानक सबने दूसरा पद भी गाना शुरू कर दिया. कोसार्चुक सबका नेतृत्व कर रहा था, जिसको ज़रा भी स्वर ज्ञान नहीं था मगर जिसकी आवाज़ बड़ी ऊँची थी. सब गाते रहे. विशेषज्ञ का पता नहीं था! सब अपनी-अपनी जगह चले गए, मगर कोई भी बैठ नहीं सका, क्योंकि सभी अपनी इच्छा के विपरीत गाते ही रहे. रुकना हो ही नहीं पा रहा था! तीन मिनट चुप रहते, फिर गाने लगते! चुप रहते – गाने लगते! तब समझ गए कि गड़बड़ हो गई है. दफ़्तर का प्रमुख शर्म के मारे मुँह छिपाकर अपने कमरे में छिप गया.

डॉक्टर ने सबको दवा दी और कुछ देर बाद सभी गायकों को स्त्राविन्स्की के क्लिनिक ले जाया गया.
बुल्गाकोव ने स्पष्ट लिखा है कि मनोरंजन कमिटी के दफ़्तर में क्या क्या होता है.
ज़ाहिर है, यह सब हंगामा उस काले जादू वाले ‘शो’ के एक अन्य पात्र ने फागोत ने खड़ा किया था.
वासिली स्तेपानोविच कैश-सेक्शन पहुँचा और पैसे जमा करने के लिए उसने निर्धारित फॉर्म भरा. फॉर्म भर कर जैसे ही उसने अपना बैग खोला उसे आश्चर्य का धक्का लगा: बैग में रूबल्स नहीं थे बल्कि विभिन्न देशों की करेंसियों के नोट थे. ज़ाहिर है वासिली स्तेपानोविच को गिरफ़्तार कर लिया गया.
आप सोच रहे होंगे कि वासिली स्तेपानोविच का अपराध क्या था? उसे क्यों गिरफ़्तार किया गया? इसलिए कि वह अधिकारियों को काले जादू के बारे में रिपोर्ट जो पेश करने वाला था... वेरायटी का अंतिम अफसर भी गायब हो जाता है!

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

Discussion on Master&Margarita - Chapter 16


अध्याय 16

पोंती पिलात और येशुआ-हा-नोस्त्री से सम्बन्धित उपन्यास का यह दूसरा अध्याय है.

इस अध्याय में मृत्युदण्ड की सज़ा सुनाए गए कैदियों के गंजे पहाड़ पर लाए जाने का वर्णन है और इसके बाद वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति की उस सुलगती गर्मी में हो रही दुर्दशा का वर्णन है; कैदियों के पास हम अध्याय के अंत में ही पहुँचते हैं. एक नए पात्र लेवी मैथ्यू से भी पाठकों का परिचय होता है.

बुल्गाकोव ने इस अध्याय में जिन शब्दों का प्रमुखता से प्रयोग किया है वे हैं: सूरज, शैतानी गर्मी, झुलसाता सूरज. ये सब सैनिकों और उनके कमाण्डरों पर कैसा प्रभाव डालते हैं इसका सजीव वर्णन किया गया है.

साधारण सैनिकों को थोड़ी-थोड़ी देर बाद पानी पीने के लिए जाने दिया जा रहा था, उन्हें अपने सिर की पगड़ी गीला करने की इजाज़त भी दे दी गई थी, मगर कमाण्डर अपनी सहनशीलता और धैर्य की मानो मिसाल प्रस्तुत कर रहे थे. मार्क क्रिसोबोय का आचरण तो बड़ा ही शानदार था.

”सूरज सीधे क्रिसोबोय पर पड़ रहा था, उस पर तो कुछ असर नहीं हो रहा था, मगर तमगों के शेरों की ओर तो देखते नहीं बन रहा था, उनसे निकलती उबलती चाँदी की चमक आँखों को अन्धा किए दे रही थी.

क्रिसोबोय के विद्रूप चेहरे पर न तो थकान दिखाई दे रही थी, न ही अप्रसन्नता; और ऐसा लगता था मानो यह भीमकाय अंगरक्षक पूरा दिन, पूरी रात, और एक और दिन – यानी जितने दिन चाहो इसी तरह चल सकता है. उसी तरह चल सकता है ताँबा जड़े भारी-भरकम पट्टे पर हाथ रखे; उसी तरह गंभीरता से कभी वध-स्तम्भों पर लटक रहे कैदियों को या फिर श्रृंखलाबद्ध सिपाहियों को देखते हुए; उसी तरह उदासीनता से जूते की नोक से अपने पैरों के नीचे आई हुई, समय के साथ सफ़ेद पड़ चुकी मानवीय हड्डियों के टुकड़ों और छोटॆ-छोटे कंकर-पत्थरों को हटाते हुए.”    

ज़रा सोचिए कि बुल्गाकोव इतनी बारीकी से क्रिसोबोय की गतिविधियों का वर्णन क्यों कर रहे हैं:
अध्याय 2 में हमने देखा था कि क्रिसोबोय येरूशलम की सुरक्षा सेनाओं के प्रमुख थे. वह अपनी बटालियन के सबसे ऊँचे सैनिक से भी ज़्यादा ऊँचे थे. क्रिसोबोय इतने भारी-भरकम, इतने विशालकाय थे, उनके कन्धे इतने चौड़े थे कि उन्होंने अभी-अभी उदित हुए सूरज को पूरी तरह ढाँक लिया था.

इस अध्याय का घटनाक्रम दोपहर को घटित हो रहा है. सूरज हर चीज़ को मानो जला रहा है, मगर क्रिसोबोय उससे पूरी तरह उदासीन है. वह अपना काम किए जा रहा है, जैसे इस शैतानी सूरज का उन पर कोई असर ही न हो रहा हो, अपने हाथ ताँबे के पिघलते पट्टे पर रखे, समय के साथ सफ़ेद पड़ गईं मानवीय हड्डियों को ठोकर मारते...जैसे उसे मौत की, हड्डियों की, शैतानी सूरज की आदत हो; उसके पास जैसे दिल ही नहीं है, वह सिर्फ एक मशीन है जिसे लोगों को मौत के घाट उतारने के लिए बनाया गया हो!

बुल्गाकोव कहते हैं कि मृत्युदण्ड के बाद का चौथा घण्टा बीत रहा था...तीन घण्टे बीत चुके थे...अगर आप प्राचीन काल से बुल्गाकोव के समय को जोड़ना चाहें तो यह समझ सकते हैं कि सूरज उस व्यक्ति को दर्शाता है जो उस समय के लोकप्रिय नारे  - ‘स्टालिन-हमारा सूरज’ – से प्रदर्शित होता है...और अगर आप एक घण्टे को एक दशक मानें तो यह अंदाज़ लगा सकते हैं कि यह शताब्दी का चौथा दशक था, याने तीस का दशक जब सूरज ने वाक़ई में हर चीज़ को जलाना आरम्भ कर दिया था मगर इसका    क्रिसोबोय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था, वह सत्ता के हाथों में एक उपकरण की तरह था.

लेवी मैथ्यू की ओर देखिए. मैं पवित्र बाइबल में प्रयुक्त वास्तविक नाम का प्रयोग नहीं कर रही हूँ. उसके बारे में हमें क्या ज्ञात होता है?

 - कि वह एक टैक्स-कलेक्टर था;
 - कि वह अपने आपको येशू का इकलौता शिष्य कहता है;
 - कि वह येशू को सूली पर चढ़ाए जाने से पहले मार डालना चाहता था ताकि उसे सूली की यंत्रणाओं से मुक्ति दिला सके.

इन बातों का पवित्र बाइबल में दिए गए वर्णन से मिलान कीजिए.

एक और बात:

जिन्हें सूली पर चढ़ाया गया था उनकी नाभि में भाले की नोक चुभोकर उन्हें मार डालने से पहले उन्हें पानी दिया जाता है:

 “पियो!” जल्लद ने कहा और पानी में डूबा एक स्पंज का टुकड़ा भाले की नोक पर सवार होकर येशू के होठों के निकट पहुँचा. उसकी आँखों में कुछ चमक दिखाई दी, वह अत्यंत अधीरता से उस पानी को चूसने लगा.
पास के वध-स्तम्भ से दिसमास की आवाज़ सुनाई दी:
”यह अन्याय है! मैं भी वैसा ही डाकू हूँ, जैसा यह है!”
.....
दिसमास चुप हो गया. येशू जल में डूबे स्पंज से दूर होकर प्रयत्नपूर्वक मीटःई और विश्वासयुक्त आवाज़ में बोलने की कोशिश करने लगा, मगर आवाज़ भर्राई हुई ही निकली, उसने जल्लाद से कहा:
 “उसे भी पानी पिलाओ.”

हम पिलात - येशुआ-हा-नोस्त्री से सम्बन्धित अगले अध्याय में इस प्रसंग पर लौटेंगे, तब तक के लिए इसे दिमाग के किसी कोने में पड़ा रहने दें.

इस अध्याय के कुछ वाक्यों पर ध्यान दीजिए:

जब लेवी मैथ्यू येशू तक नहीं पहुँच पाया, तो वह गंजे पहाड़ की पिछली ओर चला गया...वह ईश्वर को कोस रहा है और उससे पूछ रहा है कि वह येशू को इतनी पीड़ा क्यों दे रहा है. फिर उसने अपनी आँखें बन्द कर लीं और भगवान को शाप देने लगा...कुछ देर बाद जब उसने आपनी आँखें खोलीं तो देखा कि सूरज समुन्दर तक पहुँचने से पहले ही लुप्त हो गया है, जहाँ वह हर शाम डूबा करता था. उसे निगलते हुए पश्चिम से आकाश पर भयानक बादल निडरता से बढ़ा चला आ रहा था. उसकी किनार सफ़ेद झाग जैसी थी, काले आवरण से पीली चमक बार-बार दिखाई देती थी. बादल दहाड़ा. उसमें से रह-रहकर अग्निशलाकाएँ निकलने लगीं.

कहीं बुल्गाकोव पश्चिम से हुए आक्रमण की ओर तो इशारा नहीं कर रहे हैं?

और जब बारिश के कोड़ों को सहने में असमर्थ सब लोग गंजे पहाड़ से चले गए तो वहाँ केवल लेवी मैथ्यू बचा था सूली पर लटके मृत शरीरों के साथ. वह गिरते पड़ते वध-स्तम्भों की ओर चला. पहले वह येशुआ वाले वध-स्तम्भ पर आया. उसने सभी रस्सियाँ काट दीं, नीचे वाले क्रॉस पर चढ़ा, येशुआ के शरीर का आलिंगन करते हुए उसके दोनों हाथ मुक्त कर दिए. गीला, नंगा येशू का बदन लेवी को साथ लिए भूमि पर गिरा.

लेवी उसे अपने कन्धों पर उठाना चाह रहा था, मगर तभी किसी ख़याल ने उसे रोक दिया. उसने वहीं, पानी में डूबी धरती पर उस शरीर को छोड़ दिया और लड़खड़ाते, फिसलते पैरों से अन्य दो वध-स्तम्भों की ओर बढ़ा. उसने उनकी भी रस्सियाँ काट दीं, और दो और मृत शरीर ज़मीन पर गिर पड़े.

कुछ और क्षणों बाद पहाड़ की चोटी पर बचे थे केवल वे ही दो मृत शरीर और तीन खाली वध-स्तम्भ. पानी के थपेड़े इन शरीरों को उलट-पुलट रहे थे.

इस समय पहाड़ी पर न तो लेवी था और न ही येशू का शरीर.

क्या यह सब वास्तव में हुआ था?

हम इस प्रसंग पर 25वें और 26वें अध्याय में लौटेंगे.

शनिवार, 18 अगस्त 2012

Discussion on Master&Margarita(Hindi) - 15



अध्याय – 15

गुरुवार की शाम को, जब निकानोर इवानोविच अपने फ्लैट में विदेशी मुद्रा छिपाने के जुर्म में गिरफ़्तार किया गया था, तो वह अंत में स्त्राविन्स्की के क्लिनिक में पहुँच गया.

मगर यहाँ उसे बिल्डिंग नं. 302 से सीधे नहीं लाया गया था. पहले उसे किसी और जगह  ले जाया गया था. बुल्गाकोव उस जगह का नाम नहीं बताते हैं, मगर यह स्पष्ट है कि यह ख़ुफ़िया पुलिस का दफ़्तर था. वे उससे सवाल पूछते हैं : पहले प्यार से और बाद में ऊँची आवाज़ में.
अचानक निकानोर इवानोविच को कमरे के एक कोने में अलमारी के पीछे कोरोव्येव दिखाई देता है जो उसे चिढ़ा रहा है.

निकानोर इवानोविच की मानसिक हालत इतनी ख़राब हो जाती है कि उसे सीधे स्त्राविन्स्की क्लिनिक ले जाना पड़ता है.

निकानोर इवानोविच को नींद का इंजेक्शन दिया जाता है और नींद में वह एक सपना देखता है...एक थियेटर में कोई मुकदमा चल रहा है...लोग अपनी छुपाई गई विदेशी मुद्रा ला-लाकर दे रहे हैं.

यहाँ हमें इस अध्याय की कुछ बातों पर गौर करना होगा:

 - पूछताछ करने वाले अधिकारी प्यार भरे और दहशत भरे तरीकों का इस्तेमाल करते हैं;
 - पूछताछ अक्सर खुले थियेटरों में होती थी और लोग अपने अपराध कबूल करते ही थे (स्टालिन के समय में ऐसा ही होता था);
 - बुल्गाकोव आँखों के महत्त्व पर प्रकाश डालते हैं, यह कहते हुए कि आँखें आत्मा का दर्पण होती हैं. कोई अपराधी चाहे कितना ही मंजा हुआ क्यों न हो, जैसे ही उससे कोई सवाल पूछा जाता है, उसकी आँखें उसके मन में हो रही उथल-पुथल का संकेत ज़रूर दे देती हैं, चाहे उसका चेहरा एकदम निर्विकार क्यों न रहे, और तब वह पकड़ा जाता है;
 - बुल्गाकोव विदेशी मुद्रा के प्रति बढ़ते हुए आकर्षण को, जमाखोरी की प्रवृत्ति को दर्शाते हुए कहते हैं कि विदेशी मुद्रा से उन्हें कोई लाभ नहीं होने वाला है, अतः उचित यही है कि उसे सरकार को सौंप दिया जाए.

निकानोर इवानोविच ने हालाँकि कोई विदेशी मुद्रा नहीं ली थी, मगर रिश्वत तो उसने ली ही थी – यह सुनिश्चित करने के बाद कि कोई गवाह तो नहीं हैं. इसके बाद उसने इस धन को शौचालय के वेंटीलेटर में छुपा दिया. लोगों में आसानी से पैसा कमाने के प्रति, रिश्वत लेने के प्रति रुझान तो था, मगर वे डरते भी थे कि कोई देख तो नहीं रहा है, कोई गवाह तो नहीं है.

इस अध्याय का अंतिम परिच्छेद बड़ा सुन्दर है. शुक्रवार की सुबह-सुबह निकानोर इवानोविच एक सपना देखता है कि सूरज गंजे पहाड़ के पीछे छुप रहा है और इस पहाड़ को दुहरी सुरक्षा-पंक्तियों ने घेर रखा है...

और बुल्गाकोव पाठकों को हौले से वर्तमान समय से प्राचीन युग की ओर ले जाते हैं...येरूशलम में...

रविवार, 12 अगस्त 2012

Discussion on M&M(Hindi) - 14


अध्याय – 14

काले जादू के ‘शो’ के बाद हम वेरायटी की तरफ गए ही नहीं हैं, चलिए, देखें कि वहाँ क्या हो रहा है.
वित्तीय डाइरेक्टर रीम्स्की काले जादू के जादूगर से और उसके ‘शो’ से बहुत अप्रसन्न है. सिप्म्लेयारोव का भण्डाफोड़ होने के बाद वह अपने तनाव पर काबू न कर सका और ‘शो’ के बाद की औपचारिकताएँ पूरी किए बगैर अपने कक्ष में लौट आया. मेज़ पर पड़े जादुई नोटों की ओर देखते हुए वह विचारमग्न हो गया.
अचानक उसे पुलिस की कर्कश सीटी की आवाज़ सुनाई दी जो किसी प्रसन्नता का प्रतीक नहीं होती.
वह सादोवाया की ओर खुलने वाली खिड़की की तरफ गया और सड़क पर झाँकने लगा...लोग थियेटर से निकल रहे थे...एक जगह कुछ मनचले सीटियाँ बजा रहे थे, ठहाके लगा रहे थे, ताने कस रहे थे और एक महिला को छेड़ रहे थे. महिला बिचारी, जिसने फागोत की दुकान से बढ़िया फैशनेबुल ड्रेस पाई थी, अपने आप को बचाने की भरसक कोशिश कर रही थी, उसकी ड्रेस गायब हो चुकी थी और वह केवल अंतर्वस्त्रों में थी. कुछ दूर पर एक और ऐसा ही नज़ारा दिखाई दिया. कुछ मनचले महिला को अपनी इच्छित जगह पर ले जाने के लिए तत्पर थे.
घृणा से थूकते हुए रीम्स्की खिड़की से दूर हट गया और वापस अपनी कुर्सी पर बैठ गया. ज़िम्मेदारी का कड़वा घूँट पीने का क्षण आ गया था. उसे उन्हें  सूचित करना था : स्त्योपा के गायब होने के बारे में, इसके तुरंत बाद वारेनूखा के लापता हो जाने के बारे में; करेंसी नोटों की बरसात के बारे में; बेंगाल्स्की के साथ हुए दर्दनाक हादसे के बारे में; और सिम्प्लेयारोव वाले लफ़ड़े के बारे में.
मगर जैसे ही उसने टेलिफोन की तरफ हाथ बढ़ाया, वह खुद ही बजने लगा और एक कामुक आवाज़ ने रीम्स्की को धमकी देते हुए कहा कि वह कहीं भी फोन न करे.
अब कहीं फोन करने का सवाल ही नहीं उठता था, वह बैठा रहा – मगर तभी की-होल में चाभी अपने आप घूमने लगी, दरवाज़ा खुला और वारेनूखा भीतर आया.  
ख़ैर, इसके बाद क्या हुआ यह तो आपने पढ़ ही लिया होगा: वारेनूखा ने, जो वाक़ई में वारेनूखा था ही नहीं, बल्कि वारेनूखा के भेस में कोई शैतानी रूह थी, रीम्स्की को मार डालने की कोशिश की; कैसे एक नग्न औरत वित्तीय डाइरेक्टर के कमरे में पिछली खिड़की से घुसने की कोशिश कर रही थी और कैसे उसे और वारेनूखा को, मुर्गे की बाँग सुनते ही हवा में तैरते हुए वहाँ से भाग जाना पड़ा...और कैसे रीम्स्की जो अचानक 80 साल के बूढे जैसा हो चुका था, अपने सफेद बालों वाले, हिलते हुए सिर को सम्भाले रेल्वे स्टेशन की ओर भागा और मॉस्को से गायब हो गया...
एक नज़र रीम्स्की के चरित्र पर डालें:
रीम्स्की बहुत अकलमन्द था. उसकी निरीक्षण शक्ति ग़ज़ब की थी; वह बेहद संवेदनशील था...बुल्गाकोव तो यहाँ तक कहते हैं कि उसकी संवेदनशीलता की विश्व के सर्वोतम सेस्मोग्राफ से तुलना की जा सकती है...उसे दरवाज़े के नीचे से कमरे में प्रवेश करती सड़ानयुक्त गंध का अनुभव हो रहा था; वह खिड़की से भीतर प्रवेश करने की कोशिश करती हुई नग्न महिला के सड़े हुए वक्ष को देख सकता था; उसे यह भी महसूस हो रहा था कि वह औरत भी सड़ानयुक्त गंध में लिपटी हुई है; उसने इस बात को भाँप लिया था कि कुर्सी में बैठे हुए वारेनूखा की परछाईं फर्श पर नहीं पड़ रही है और वह इस निष्कर्ष पर पहुँच चुका था कि यह वारेनूखा नहीं बल्कि कोई प्रेतात्मा है जो आधी रात के समय केवल स्त्योपा के दुःसाहस के किस्से सुनाने ही नहीं आया है, उसके दिमाग में ज़रूर कोई ख़तरनाक ख़याल है!
मैं फिर से दुहराऊँगी कि बुल्गाकोव एक बार फिर हमें मानो किसी 3D फिल्म में ले गए हैं, जहाँ हम सिर्फ पढ़ते ही नहीं हैं; केवल कल्पना ही नहीं करते हैं, बल्कि रीम्स्की के कमरे में हो रहे हर कार्यकलाप में भाग लेते हैं .
हम रीम्स्की के साथ-साथ एक जासूस की तरह विश्लेषण करते हैं कि वारेनूखा इतनी देर से, चोरों की तरह रीम्स्की के कमरे में क्यों घुसा जबकि वह यह सोच रहा था कि रीम्स्की घर जा चुका है? वह स्त्योपा लिखोदेयेव के बारे में झूठ पर झूठ क्यों बोले जा रहा था; वह टेबल लैम्प की छाँव से बाहर क्यों नहीं आ रहा था; वह रीम्स्की से अपना चेहरा क्यों छुपा रहा था; उसे चटखारे लेने और सिसकारियाँ भरने की गन्दी आदत कैसे पड़ गई थी; उसके गाल पर चोट का निशान कैसे आ गया था?
हम रीम्स्की के भीतर के मानसिक तनाव को, उसके भीतर हो रही  उथल-पुथल को महसूस करते हैं; हम महसूस करते हैं कि अपनी जान पर मंडलाते खतरे का अनुभव करते हुए उसके मस्तिष्क की नसें बस फटने ही वाली हैं; और हम राहत की साँस लेते हैं जब मुर्गा बाँग देता है और प्रेतात्माएं हवा में बिखर जाती हैं, घुल जाती हैं.
बुल्गाकोव ने इस उपन्यास ने कई बार कहा है कि पूरब से उजाला मॉस्को में आ रहा था...क्या ऐसा आभास नहीं होता कि पूरबी प्रज्ञा के बारे में उनकी कोई विशिष्ठ राय थी?
संक्षेप में यह एक अद्भुत अध्याय है, साँस रोके पढ़ता रहता है पाठक; अध्याय पूरा किए बिना उपन्यास छोड़ ही नहीं सकता!

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

Discussion on M&M (Hindi) - 13.3


अध्याय - 13.3

उपन्यास के एक बड़े अंश के एक पत्रिका में प्रकाशित होने के बाद विभिन्न अख़बारों में लेखक विरोधी लेखों की मानो बरसात होने लगी – वे सभी लेखक को कोस रहे थे जिसने येशू के औचित्य को सिद्ध करने की जुर्रत की थी.

दिन प्रतिदिन ऐसे लेखों की संख्या बढ़ती जाती थी और वे अधिकाधिक तीव्र निषेधात्मक, अधिकाधिक ज़हरीले, अधिकाधिक तीखे होते जाते थे...(अगर आपको बोरिस पास्तरनाक के उपन्यास  ‘डॉ. झिवागो’ से सम्बन्धित घटनाओं की याद है, तो आप शीघ्र ही इस प्रसंग को समझ जाएँगे).

पहले तो मास्टर इन लेखों पर हँस देता, उन्हें अनदेखा कर देता; मगर फिर उसे इन पर आश्चर्य होने लगा. वह समझ रहा था कि इन लेखों के लेखक वह नहीं कह रहे हैं जो वे कहना चाहते हैं. वे अधिकाधिक आक्रामक होते जा रहे थे, उनकी शैली अधिकाधिक धमकाने वाली होती जा रही थी; हर कोई मास्टर की कड़ी निन्दा कर रहा था.

तीसरी अवस्था थी भय की. मास्टर को हर चीज़ से डर लगने लगा. उसे अँधेरे से डर लगने लगा. उसे ऐसा लगता मानो अँधेरे में कोई ऑक्टोपस उसकी ओर बढ़ा आ रहा है जो अपने तंतुओं से उसे पकड़ने की कोशिश कर रहा है. संक्षेप में यह मानसिक रोगी की अवस्था थी.

मास्टर की प्रियतमा भी बहुत बदल गई थी; वह बड़ी दुखी थी – अपने आप को कोसती रहती कि न वह उपन्यास के एक अंश को छपवाने की ज़िद करती और न ही मास्टर पर यह कहर टूट पड़ता.
मानसिक हताशा की ऐसी स्थिति में मास्टर ने एक दिन अपने उपन्यास को अँगीठी में झोंक दिया...मगर अचानक उसकी प्रियतमा रात को आ गई और उसने कुछ पन्नों को जलने से बचा लिया. उसने कहा कि वह अगली सुबह को अपने पति को सूचित करके उसके पास हमेशा के लिए आ जाएगी. तब तक के लिए वह मास्टर से विनती करती है कि वह कोई दुःस्साहस भरा कदम न उठाए.

यह हुआ अक्टूबर के मध्य में.

उसके जाने के बाद दरवाज़े पर टकटक हुई.

इसके पश्चात् मास्टर ने इवान को जो भी बताया वह पाठकों तक नहीं पहुँचा. वह इवान के कान में फुसफुसाकर कह रहा था...भय से काँप रहा था; उसकी आँखों में दहशत थी...

और जनवरी के मध्य में वह फिर अपने घर के आँगन में था, उसी कोट में जिसके बटन अब टूट चुके थे, ठण्ड से काँपते हुए.

मगर उसके घर में कोई और रहने आ गया था. वह एक कुत्ते से डर गया जो उसके पैरों के बीच आ गया था; उसने ट्राम के नीचे अपनी जान दे देने का इरादा किया और ट्राम की पटरियों की ओर चल पड़ा. मगर वह निकट आती हुई ट्राम से भी डर गया और वहाँ से भाग निकला.

एक ट्रक ड्राइवर को, जो इसी तरफ आ रहा था, उस पर दया आ गई और वह उसे स्त्राविन्स्की क्लिनिक ले आया.

यहाँ उस पर उपचार किया गया, उसकी जमी हुई उँगलियों को ठीक कर दिया गया.

इस क्लिनिक में वह पिछले चार महीनों से है, और अब उसे यहाँ उतना बुरा नहीं लगता.

जब इवान ने पूछा कि उसने अपनी प्रियतमा को अपने बारे में खबर क्यों नहीं दी, तो मास्टर जवाब देता है कि वह उसे यह बताकर दुखी नहीं करना चाहता कि वह स्त्राविन्स्की के क्लिनिक में है और उस पर मानसिक उपचार किए जा रहे हैं.

अपने उपन्यास की याद से ही वह सिहर उठता है...

जब इवान उससे यह बताने की विनती करता है कि पोंती पिलात और येशुआ-हा-नोस्त्री का आगे क्या हुआ तो मास्टर जवाब देता है कि जो उसे पत्रियार्शी पार्क में मिला था वही इस सवाल का भली-भाँति जवाब दे सकता है.

जब वे बातें कर रहे थे तो अस्पताल के कॉरीडोर में दो बार गहमा-गहमी हुई. मास्टर जाकर देख आया और उसने बताया कि कमरा नं. 119 में एक लाल मोटे को लाया गया है जो रोशनदान में छुपाए गए किन्हीं नोटों के बारे में बात कर रहा है; और कमरा नं. 120 में एक व्यक्ति को लाया गया है जो अपना सिर लौटाने के बारे में प्रार्थना कर रहा है.

आधी रात गुज़र चुकी थी जब इवान को छोड़कर मास्टर वापस गया.

गुरुवार समाप्त हो गया है...मगर हमें अभी तक यह मालूम नहीं है कि उस रात मॉस्को में और क्या क्या हुआ.

जाते-जाते मास्टर ने यह कहा कि इन्सान को बड़ी बड़ी योजनाएँ नहीं बनानी चाहिए, “मैं पूरी दुनिया देखना चाहता था, मगर मैं यहाँ आ गया. दुनिया का यह हिस्सा बुरा तो नहीं है, मगर वह सबसे बेहतरीन भी नहीं है.”

असल में बुल्गाकोव स्वयँ सोवियत संघ से बाहर जाना चाहते थे, मगर उन्हें इसकी इजाज़त नहीं दी गई और उन्हें पूरी उम्र सोवियत संघ में ही रहना पड़ा.

बुधवार, 8 अगस्त 2012

Discussion on Master&Margarita - 13.2


    अध्याय -13.2

अजनबी अपनी कहानी इवान को सुनाता है जो किसी साधारण कहानी की तरह नहीं है.

इतिहास में शिक्षा पूरी करने के बाद उसने एक म्यूज़ियम में क़रीब दो वर्ष काम किया. वहाँ उसे एक लॉटरी का टिकट दिया गया, और संयोगवश इस टिकट पर उसने एक लाख रूबल्स जीत लिए. यह एक बहुत बड़ी धनराशि थी. एक लाख रूबल्स जीतने के बाद जो सबसे पहला काम उसने किया वो ये कि म्यास्नित्स्काया रास्ते वाला अपना कमरा छोड़ दिया और अर्बात पर एक मकान किराए पर लेकर रहने लगा.

यह एक बड़ा ख़ूबसूरत और आरामदेह मकान था. प्रवेश कक्ष, सिंक के साथ; एक छोटा कमरा जिसकी खिड़कियाँ बगीचे में खुलती थीं और एक बड़ा हॉल, फायरप्लेस के साथ. फायरप्लेस में हमेशा आग जलती रहती; घर में हमेशा गर्माहट रहती.

उसने कई सारी किताबें खरीद लीं और पोंती पिलात तथा येशुआ–हा-नोस्त्री के बारे में उपन्यास लिखने लगा (वही जो लाल किनारी वाले सफेद चोगे में पिलात के हिरोद के महल की छत पर प्रवेश से आरंभ होता है). उपन्यास तेज़ी से आगे बढ़ रहा था, पिलात अंत की ओर भाग रहा था...सर्दियाँ ख़त्म हो चुकी थीं; बहार के दिन आ गए और बगीचे में लिण्डन और लिली के वृक्षों ने हरियाली के वस्त्र पहन लिए.
लेखक ने (वह उपन्यास में कहीं भी अपना नाम अथवा उपनाम नहीं बताता) अपना नाम और उपनाम त्याग दिया है, ज़िन्दगी की और चीज़ों की तरह...अब वह है सिर्फ मास्टर  और उसके व्यक्तित्व की पहचान है काले रंग की वह टोपी जिस पर पीले रेशम से M अक्षर कढ़ा हुआ है. यह अक्षर उसकी प्रियतमा ने बनाया है. उसीने उसे यह नाम दिया था – मास्टर.

इस अध्याय में मास्टर की प्रियतमा का नाम भी नहीं बताया गया है. मास्टर उससे एक शाम को त्वेर्स्काया रास्ते पर मिला था जब वह हाथों में पीले घिनौने फूल लिए जा रही थी. यह घटना उसके लिए एक लाख रूबल्स का इनाम जीतने से भी बढ़कर थी.

इस पीले रंग के कारण वह उसके पीछे-पीछे चलने लगा. अचानक वह एक गली में मुड़ी और उसकी ओर देखा.

वह उसके पीछे-पीछे चलता रहा, अचानक वह रुकी और उससे पूछने लगी कि क्या उसे ये फूल पसन्द हैं. मास्टर के इनकार करने पर उसने वे फूल नाली में फेंक दिए. वे ख़ामोश चलते रहे, फिर उसने अपने खूबसूरत हाथ में मास्टर का हाथ ले लिया और वे साथ-साथ चलने लगे. ..क्रेमलिन की मॉस्को नदी वाली दीवार तक पहुँचे और दूसरे दिन फिर मिलने का वादा करके जुदा हुए.

शीघ्र ही वह औरत उसकी पत्नी बन गई, खुले आम नहीं बल्कि गुप्त रूप में. मास्टर को यकीन था कि उसके बारे में किसी को भी कुछ भी पता नहीं था.

वह  शादी-शुदा थी; मास्टर भी अपनी पत्नी से अलग हो गया था.

वह प्रतिदिन सुबह उसके पास आती, नाश्ता बना लेती; उसकी किताबों की धूल साफ करती; उसके लिखे पन्नों को पढ़ती रहती; ख़ाली समय में यह टोपी बनाती रहती. यह उपन्यास  उसे बहुत पसन्द था, इससे उसे बड़ी आशाएँ थीं. तभी से उसने उसे मास्टर कहना शुरू कर दिया.

उपन्यास पूरा हो चुका था. उसे टाइप कर दिया गया और वह उपन्यास को लेकर अपनी आरामगाह से निकल पड़ा, उसे किसी प्रकाशक को देने; और यही था उसकी ज़िन्दगी का अंत.

बुल्गाकोव प्रकाशन जगत की बड़ी घिनौनी तस्वीर प्रस्तुत करते हैं.

प्रकाशक उससे उसके पूर्वानुभव के बारे में पूछते; उसके परिवार के बारे में पूछते और अंत में यह पूछ लेते कि इस ख़तरनाक विषय पर उपन्यास लिखने के लिए उसे किसने उकसाया है.

वे उससे साफ़-साफ़ नहीं कहते कि उपन्यास नहीं छापा जा सकता; वे कोई न कोई बहाना बनाकर उसे बार-बार आने के लिए कहते. अंत में उससे कह दिया गया कि प्रकाशन गृह के पास दो वर्ष के लिए पर्याप्त सामग्री है अतः उसका उपन्यास प्रकाशित नहीं किया जा सकता.

किसी और सम्पादक ने उपन्यास का एक बड़ा अंश अपनी पत्रिका में छाप दिया और इसके पश्चात् पूरे साहित्य जगत में ऐसा हंगामा हुआ जिसने मास्टर को पूरी तरह नष्ट कर दिया.

यह इस तरह हुआ...