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मंगलवार, 27 मार्च 2012

Master aur Margarita - 33.1


मास्टर और मार्गारीटा 33.1

अध्याय – 33

उपसंहार

मगर शनिवार शाम को सूर्यास्त के समय वोरोब्योव पहाड़ से वोलान्द के अपनी मण्डली के साथ राजधानी छोड़कर जाने के बाद मॉस्को में और क्या-क्या हुआ?
एक लम्बे समय तक पूरी राजधानी में बिल्कुल अविश्वसनीय अफवाहें फैलती रहीं, जो शीघ्र ही प्रदेश के दूरदराज़ के और लगभग सुनसान इलाकों तक भी पहुँच गईं. इनके बारे में कुछ कहना बेकार है, उनके स्मरण मात्र से मितली आने लगती है.
इन सच्ची लाइनों को लिखने वाले ने स्वयँ फिओदोसिया जाते समय ट्रेन में यह कहानी सुनी कि कैसे मॉस्को में लगभग दो हज़ार व्यक्ति थियेटर से एकदम नग्नावस्था में निकले और उसी दशा में टैक्सियों में बैठकर अपने-अपने घर गए.
 “शैतानी, गन्दी ताकत...” ये फुसफुसाहट सुनाई देती थी दूध की दुकान के सामने, ट्राम में, दुकानों में, घरों में, रसोईघरों में, ट्रेनों में, समर क़ॉटॆजेस में, रेल्वे स्टेशनों पर, समुद्र किनारों पर...

ज़ाहिर है, उच्च शिक्षा प्राप्त एवँ सुसंस्कृत लोगों ने शैतानी ताकत से सम्बन्धित इन कहानियों में कोई हिस्सा नहीं लिया, बल्कि उन पर हँसते रहे और कहानियाँ सुनाने वालों को अपनी समझ देते रहे. मगर हकीकत तो हकीकत ही रहती है, और, जैसा कि सभी कहते हैं, बिना कोई वजह बताए उन्हें झटकना भी सम्भव नहीं होता : कोई राजधानी में मौजूद था, ग्रिबोयेदोव की खाक ही इस तथ्य की बढ़ा-चढ़ाकर पुष्टि कर रही थी, और अन्य कई घटनाएँ भी उसे नकार नहीं सकती थीं.
सुसंस्कृत लोग खोजबीन करने वालों की राय का समर्थन करते थे : कि सम्मोहित करने वालों और पेटबोलों का एक प्रवीण दल इस सबके लिए ज़िम्मेदार था.
इसे पकड़ने के लिए मॉस्को के अन्दर और उसके बाहर भी फौरन कई उपाय ज़ोर-शोर से किए गए, मगर दुर्भाग्यवश उनका कोई परिणाम नहीं निकला. स्वयँ को वोलान्द कहने वाला अपने सहयोगियों सहित गायब हो गया और न तो वह मॉस्को में और न ही कहीं और कभी प्रकट हुआ. ज़ाहिर है, सबने यह निष्कर्ष निकाला कि वह विदेश भाग गया, मगर वहाँ भी उसने अपने अस्तित्व का कोई संकेत नहीं दिया.
उसके मामले की छानबीन लम्बे समय तक चली. चाहे कैसा भी हो, मामला यह था बड़ा ही अजीबोगरीब! चार जले हुए मकानों और सैकड़ों पागल हो चुके लोगों के अलावा कुछ लोग मरे भी थे. कम से कम दो के बारे में तो निश्चयपूर्वक कहा ही जा सकता है : बेर्लिओज़ के बारे में और विदेशियों को मॉस्को के दर्शनीय स्थलों से परिचित करवाने वाले विभाग में काम कर रहे दुर्दैवी भूतपूर्व सामंत मायकेल के बारे में. उन्हें तो मार डाला गया था. दूसरे व्यक्ति की जली हुई हड्डियाँ सादोवाया के फ्लैट नं. 50 में पाई गई थीं, जब वहाँ लगी आग बुझाई गई. हाँ, कई व्यक्ति शिकार हुए थे, और ये शिकार जाँच की माँग कर रहे थे.
मगर वोलान्द के राजधानी छोड़कर जाने के बाद भी अन्य कई शिकार हुए, और चाहे आपको कितना ही दुःख हो, ये शिकार थे – बिल्लियाँ.
करीब सौ से ऊपर शांतिप्रिय, मानव के प्रति वफादार और उसके लिए लाभदायक ये पालतू प्राणी किसी न किसी तरीके से देश के अनेक भागों में मार डाले गए. 15 – 20 गम्भीर रूप से घायल बिल्लियाँ भिन्न-भिन्न शहरों के पुलिस थानों में लाई गईं. उदाहरण के लिए आर्मावीर में एक निर्दोष प्राणी के अगले पंजों को बाँधकर कोई नागरिक उसे पुलिस थाने लाया था.
 इस बिल्ले को नागरिक ने उस समय पकड़ा था, जब वह चोरों के समान...(क्या किया जाए, बिल्ले दिखते ही ऐसे हैं? ऐसा इसलिए नहीं है कि वे पापी होते हैं, बल्कि इसलिए कि वे डरते हैं, कि कोई उनसे अधिक शक्तिशाली प्राणी – कुत्ते या मनुष्य, उन्हें कोई हानि न पहुँचाए, उनका अपमान न करे. दोनों ही करना बहुत आसान है, मगर इसमें मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, कोई गरिमा की बात नहीं है. हाँ, कोई भी नहीं!) हाँ, तो चोरों के समान बिल्ला न जाने क्यों कुकुरमुत्तों के ऊपर झपटने वाला था.
बिल्ले पर झपटकर उसे बाँधने के लिए गर्दन से टाई उतारते हुए वह नागरिक धमकी भरे स्वर में बड़बड़ा रहा था, “आहा! शायद अब आप हमारे यहाँ, आर्मावीर में तशरीफ लाए हैं, सम्मोहक महाराज! मगर यहाँ आपसे कोई नहीं डरता. आप गूँगे बनने का नाटक न कीजिए. हमें अच्छी तरह समझ में आ गया है कि आप क्या चीज़ हैं!”
नागरिक बिल्ले को, जो हरे रंग की टाई से बँधा था, अगले पंजों से घसीटता हुआ पुलिस थाने लाया; वह बिल्ले को हल्की-हल्की ठोकरें भी मार रहा था, जिससे वह पिछले पंजों पर चल पाए.    
नागरिक अपने पीछे-पीछे सीटी बजाते चलते बच्चों से बोला, “तुम यह बेवकूफियाँ बन्द करो! इससे कुछ नहीं बनेगा! जैसे सब चलते हैं, वैसे ही चलो!”
काला बिल्ला सिर्फ दर्द से भरी आँखें इधर-उधर घुमा रहा था. बोल न सकने के कारण वह अपनी सफाई में कुछ नहीं कह सकता था. अपनी सुरक्षा के लिए वह दो लोगों का आभारी था, पहले पुलिस का, और दूसरे अपनी मालकिन – एक सम्माननीय विधवा वृद्धा का. जैसे ही बिल्ले को पुलिस स्टेशन लाया गया, फौरन लोगों को विश्वास हो गया कि नागरिक बुरी तरह नशे में धुत था, अतः उसके बयान पर किसी को विश्वास नहीं हुआ. इसी बीच वृद्धा मालकिन पड़ोसियों से यह सुनकर कि उसके बिल्ले को पकड़ लिया गया है, पुलिस थाने भागी.. वहाँ वह सही वक्त पर पहुँची. उसने बिल्ले की भरपूर प्रशंसा की; बताया कि वह उसे पाँच वर्षों से जानती है, तब से जब वह बच्चा था; वह उसके बारे में उतने ही विश्वास के साथ कह सकती है जितना अपने बारे में, कि उसने कभी गलत काम किया ही नहीं, और वह मॉस्को कभी गया ही नहीं; कैसे वह आर्मावीर में पैदा हुआ, वहीं बड़ा हुआ, और वहीं उसने चूहे पकड़ना सीखा.
बिल्ले को आज़ाद करके मालकिन को सौंप दिया गया, सिर्फ तभी जब उसने दुःख का अनुभव कर लिया, और अपने अनुभव से सीख लिया कि गलती और दोषारोपण का क्या मतलब होता है.

बिल्लों के अलावा कुछ लोगों को छोटी-मोटी परेशानियाँ हुईं. कुछ गिरफ्तारियाँ की गईं. जिन लोगों को थोड़े समय के लिए पकड़ा गया, उनमें थे : लेनिनग्राद में – वोलमान और वोलपेर; सारातोव में, कीएव में और खारकोव में – तीन वोलोदिन; कज़ान में – वोलोख और पेंज़ा में, न जाने क्यों रसायन शास्त्र के प्रोफेसर बेतचिंकेविच...यह सच है कि वह बहुत विशाल डीलडौल वाला, साँवले रंग का, काले बालों वाला था.

इसके अलावा अलग-अलग स्थानों पर नौ कोरोविन, चार कोरोव्किन और दो कारावायेव पकड़े गए.
एक नागरिक को सेवास्तोपोल वाली रेलगाड़ी से उतारकर बेलगोरद स्टेशन पर बाँध दिया गया.इस नागरिक ने अपने सहयात्रियों को ताश के खेल से बहलाना चाहा था.
यारोस्लाव्ल में दोपहर के भोजन के समय रेस्तराँ में एक नागरिक स्टोव के साथ घुसा, जिसकी वह अभी-अभी मरम्मत करवाकर लाया था. जैसे ही दोनों दरबानों ने उसे देखा, वे अपनी-अपनी जगह छोड़कर भागने लगे, और उनके पीछे-पीछे रेस्तराँ के सभी ग्राहक भागे, नौकर, कर्मचारी भी भागे. इसी भगदड़ में कैशियर के हथों से न जाने कैसे सारी रोकड खो गई.

और भी बह्त कुछ हुआ, सब कुछ तो याद नहीं रखा जा सकता. काफी दिमाग दौड़-भाग करते रहे.
अन्वेषण विभाग की भी बार-बार तारीफ करनी होगी. अपराधियों को पकड़ने के लिए हर सम्भव उपाय किए गए; साथ ही सभी घटनाओं के कारण समझाए गए, जिन्हें एकदम बेतुका भी नहीं जा सकता.
अन्वेषण दल के प्रमुख और अनुभवी मनोवैज्ञानिकों ने कहा कि इस अपराधी दल के सदस्य या उनमें से कोई एक (सबसे अधिक सन्देह कोरोव्येव पर किया गया) अभूतपूर्व शक्तिशाली सम्मोहक थे, जो अपने आपको उस जगह नहीं प्रकट करते थे, जहाँ वे वास्तव में होते थे, अपितु काल्पनिक, परिवर्तित परिस्थितियों में प्रदर्शित करते थे. इसके अलावा उन्होंने खुलकर इस बात का समर्थन किया कि कुछ चीज़ें या लोग वहाँ दिखाई देते हैं, जहाँ वे वास्तव में नहीं होते; इसके विपरीत वे चीज़ें या लोग उस दायरे से दूर दिखाई देते हैं, जिसमें वे होते हैं.   

क्रमशः

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