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बुधवार, 18 जनवरी 2012

Master aur Margarita-13.2


मास्टर और मार्गारीटा -13.2
इवान परेशान नहीं हुआ क्योंकि उसने वादा किया था, मगर वह अन्दर तक दहल गया.
 यह असम्भव है! शैतान का अस्तित्व ही नहीं है!
 माफ़ कीजिए! कम से कम आपको तो यह बात नहीं कहनी चाहिए. आप पहले व्यक्ति हैं जिसको उसके कारण दुःख उठाना पड़ा है. आप यहीं पागलखाने में बैठे रहिए और सोचते रहिए कि वह है ही नहीं. बड़ी अजीब बात है!
 इवान प्रतिवाद नहीं कर सका.
 जैसे ही आपने उसका वर्णन करना शुरू किया, मैं अन्दाज़ लगाता रहा कि कल आपको किससे बातें करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. मुझे तो बेर्लिओज़ पर आश्चर्य हो रहा है! मगर आपमें बहुत बचपना है, मेहमान ने माफ़ी माँगने के अन्दाज़ में कहा, उसके बारे में मैंने कितना सुना है, थोड़ा बहुत पढ़ा भी है! इस प्रोफेसर की पहली ही बातों से मेरा सन्देह दूर हो गया. उसे ना पहचानना असम्भव है, मेरे दोस्त! मगर आप...आप मुझे फिर माफ़ कीजिए, अगर मैं ग़लत नहीं हूँ, तो बड़े कच्चे आदमी हैं?
 बेशक, इवान को पहचानना मुश्किल हो रहा था.
 और...चेहरा भी, जिसका वर्णन आप कर रहे थे...अलग-अलग तरह की आँखें, भँवे! माफ़ करना, शायद आपने फ़ाउस्ट ऑपेरा के बारे में भी नहीं सुना?
इवान बुरी तरह बौखला गया और लाल चेहरे से न जाने क्यों याल्टा के सेनिटोरियम की यात्रा के बारे में बड़बड़ाने लगा...
 यही तो,...यही तो...मुझे ज़रा भी ताज्जुब नहीं है! मगर बेर्लिओज़ ने, मैं फिर कहता हूँ, उसने मुझे चौंका दिया है. उसने न केवल काफ़ी-कुछ पढ़ रखा था, बल्कि वह बहुत चालाक भी था. मगर वोलान्द तो बड़े-बड़े धूर्त लोगों की आँखों में भी धूल झोंक सकता है, तो फिर बेर्लिओज़ की क्या बात है!
 क्या...? अब चिल्लाने की बारी इवान की थी.
 धीरे!
इवान ने सिर पर हाथ मारते हुए फुसफुसाहट से कहा, ठीक है, ठीक है, उसके विज़िटिंग कार्ड पर अक्षर था. हाय, हाय, हाय; तो यह बात थी! वह कुछ देर तक चुप रहा. बौखला गया था. जाली के उस पार तैरते हुए चाँद को देखते हुए उसने पूछा, तो, वह, निश्चय ही पोंती पिलात के पास मौजूद था? क्या उसका तब जन्म हो चुका था? और सब मुझे पागल कहते हैं! इवान ने दरवाज़े की ओर इशारा करते हुए कहा.
मेहमान के होठों पर एक कटु मुस्कान छा गई.
 हम सच का सामना करें, मेहमान मुँह फेरकर बादलों के बीच भागते हुए रात के मुसाफिर को देखते हुए बोला, तुम और मैं पागल हैं, इनकार कैसे करें! देखो न, उसने तुम्हें बुद्धू बनाया और तुम उसके जाल में फँस गए; तुम्हारी मनःस्थिति इसके लिए अनुकूल थी. जो तुम कह रहे हो, वह सब कुछ वास्तव में घटित हुआ था. यह इतनी अजीब बात है कि मनोवैज्ञानिक स्त्राविन्स्की ने भी तुम्हारा विश्वास नहीं किया. उसने तुम्हें देखा था? (इवान ने सिर हिला दिया.) तुमसे बातें करने वाला पिलात के पास भी था, काण्ट के साथ नाश्ते की मेज़ पर भी था, और अब वह मॉस्को आ गया है.
 शैतान जाने यहाँ वह क्या-क्या गुल खिलाने वाला है! किसी तरह उसे पकड़ना चाहिए? नए इवान में पुराने इवान ने सिर उठाते हुए कुछ अविश्वास से कहा.
 तुम कोशिश तो कर चुके हो, पछताओगे, मेहमान ने व्यंग्यपूर्वक कहा, मैं तो कहता हूँ कि किसी को भी ऐसी कोशिश नहीं करनी चाहिए. वह जो भी करेगा, शायद अच्छा ही करेगा. आह, आह! मुझे कितना अफ़सोस हो रहा है कि उसकी मुलाक़ात तुमसे हुई, मुझसे नहीं! मेरा सब कुछ तो जल चुका है, मगर मैं इस मुलाक़ात के लिए प्रास्कोव्या फ़्योदोरोव्ना की चाबियों का गुच्छा भी दे देता और तो मेरे पास देने के लिए कुछ है भी नहीं, मैं निर्धन हूँ!
 मगर तुम्हें उसकी ज़रूरत क्यों पड़ गई?
मेहमान उदास हो गया, हिचकिचाया और काफ़ी देर ख़ामोश रहने के बाद बोला, देखो, कैसी अजीब बात है, मैं यहाँ उसी की बदौलत आया हूँ, जिसके कारण तुम आए हो. हाँ, उसी पोंती पिलात के कारण, मेहमान ने भयभीत नज़रों से इधर-उधर देखते हुए कहा, बात यह है, कि साल भर पहले मैंने पोंती पिलात के बारे में एक उपन्यास लिखा था.
 तुम लेखक हो? कवि ने उत्सुकता से पूछा.
 मेहमान के चेहरे पर स्याही छा गई, उसने इवान को घूँसा दिखाते हुए कहा, मैं मास्टर हूँ, वह गम्भीर हो गया और उसने अपने गाउन की जेब से काली टोपी निकाली जिस पर पीले रेशमी धागे से एम अक्षर काढ़ा गया था. उसने टोपी पहन ली और इवान को अपनी पूरी काया घूमकर दिखाने लगा, जैसे सिद्ध करना चाहता हो कि वह मास्टर है, उसने ख़ुद अपने हाथों से यह टोपी मेरे लिए बनाई है, उसने रहस्यमय अन्दाज़ में कहा.
 तुम्हारा उपनाम क्या है?
 अब मेरा कोई नाम, उपनाम नहीं, विचित्र मेहमान ने उदास लहज़े में कहा, मैंने उसे ठुकरा दिया है. उसी तरह जैसे ज़िन्दगी की और चीज़ों को. उसे भूल जाएँ.
कम से कम तुम उपन्यास के बारे में तो बताओ, इवान ने बड़ी शराफ़त से कहा.
 तो सुनो, मेरी कहानी, बिल्कुल आम कहानियों जैसी नहीं है, मेहमान ने कहना शुरू किया.
...इतिहास में शिक्षा प्राप्त करने के बाद कोई दो वर्ष तक, वह मॉस्को के एक म्युज़ियम में काम करता रहा था. साथ ही अनुवाद कार्य भी करता था.
 किस भाषा से? इवान ने दिलचस्पी लेते हुए पूछा.
 मैं मातृभाषा के अलावा पाँच भाषाएँ जानता हूँ, मेहमान ने बताया, अंग्रेज़ी, फ्रेंच, जर्मन, लैटिन और ग्रीक. इटालियन भी थोड़ी-बहुत पढ़ लेता हूँ.
 उस्ताद हो! इवान के स्वर में ईर्ष्या थी.
इतिहासकार अकेला रहता था. उसके न तो कोई रिश्तेदार थे और न ही मॉस्को में कोई परिचित. और, एक दिन उसने लॉटरी में एक लाख रूबल जीत लिए. मेरी ख़ुशी का आप अन्दाज़ा नहीं लगा सकते, काली टोपी वाले मेहमान ने उसी तरह फुसफुसाकर आगे कहा, जब मैंने मैले कपड़ों वाली टोकरी से टिकट निकालकर देखा कि उस पर भी वही नम्बर है जो अख़बार में छपा है! टिकट..., उसने समझाया, मुझे म्युज़ियम में दिया गया था.
एक लाख जीतने के बाद इस रहस्यमय मेहमान ने यह किया कि किताबें ख़रीदीं, म्यास्नित्स्काया वाले अपने कमरे को छोड़ दिया...
 ऊ...ऊ, वह तो कबूतरखाना था... मेहमान शिकायत के स्वर में बोला.
...और अर्बात के पास एक मकान मालिक से मकान किराए पर लिया.

 जानते हो मकान मालिक क्या होता है? मेहमान ने इवान से पूछा और तुरंत ही समझाते हुए बोला, यह कुछ गिने-चुने बदमाश हैं, जो मॉस्को में सही-सलामत बच गए हैं. तो मकान मालिक के पास दो कमरे किराए पर लिए. ये कमरे बगीचे से घिरे एक छोटे से घर के तहख़ाने में थे. म्युज़ियम की नौकरी छोड़कर पोंती पिलात के बारे में उपन्यास लिखने लगा.

 ओह, यह सुनहरे दिन थे, चमकती आँखों से वक्ता बोला, एकदम स्वतंत्र घर, साथ ही प्रवेश कक्ष सिंक के साथ, उसने कुछ गर्व से कहा, ठीक प्रवेश-द्वार से आती पगडंडी पर खुलती नन्ही-नन्ही खिड़कियाँ, चार कदम दूर लिली, लिण्डन और मैपल के सुगन्धित वृक्ष! आहा, आहा, आहा! सर्दियों में मैं कभी-कभार खिड़की से किसी के काले पैर देखता और उनके नीचे करकराती बर्फ की आवाज़ सुनता. मेरे कमरे की अँगीठी में सदा आग जलती रहती. मगर अचानक बहार आ गई और मटमैले शीशों के पार मैंने लिली की नंगी शाखों को हरियाले वस्त्र पहनते हुए देखा. और तब पिछले बसंत में एक ऐसी ख़ुशनुमा बात हो गई जो एक लाख रूबल जीतने से भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण थी. वैसे, एक लाख काफ़ी होते हैं, यह तो आप भी मानेंगे.

 ठीक कहते हो, ध्यान से सुनते हुए इवान ने कहा.

 मैंने खिड़कियाँ खोल दीं और बिल्कुल नन्हे, दूसरे कमरे में बैठने लगा. मेहमान ने हावभाव करते हुए बताया, यह दीवान, उसके सामने एक और दीवान, उनके बीच एक नन्ही-सी टेबुल, उस पर ख़ूबसूरत नाइट लैम्प, और उधर खिड़की के पास किताबें; और यहाँ छोटी सी लिखने की मेज़, और सामने वाले चौदह वर्ग मीटर क्षेत्रफल के बड़े कमरे में हैं किताबें, किताबें और अँगीठी! आह क्या बात थी! लिली की ख़ुशबू आती! मेरा सिर थककर हल्का हो जाता, पिलात अन्त की ओर बढ़ता रहता...

 सफ़ेद चोगा, लाल किनार! मैं समझ रहा हूँ! इवान चहका.

 बिल्कुल ठीक! पिलात भागता रहा, अन्त की ओर, अन्त की ओर, और मैं जानता था कि उपन्यास के अन्तिम शब्द होंगे : जूडिया के पाँचवें न्यायाधीश, अश्वारोही पोंती पिलात. फिर, ज़ाहिर है, मैं घूमने निकल जाता. एक लाख काफ़ी मोटी रकम थी. मेरे पास भूरे रंग का ख़ूबसूरत सूट था. या मैं कभी किसी सस्ते रेस्तराँ में खाने के लिए चला जाता. अर्बात में एक गज़ब का रेस्तराँ है, मालूम नहीं अब वह है या नहीं.

मेहमान की आँखें पूरी खुल गईं और वह चाँद की तरफ़ देखते हुए आगे बोला :

 वह हाथों में घिनौने, उत्तेजित करने वाले पीले फूल लिए जा रही थी...

                                                        क्रमशः

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